scorecardresearch
Sunday, 16 August, 2026
होमराजनीतिAIADMK में बगावत की लहर: EPS के लिए इसे काबू करना क्यों मुश्किल हो सकता है

AIADMK में बगावत की लहर: EPS के लिए इसे काबू करना क्यों मुश्किल हो सकता है

दो वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी के उस निर्देश को नहीं माना, जिसमें उन्हें TVK सरकार के ख़िलाफ़ 14 अगस्त को होने वाले विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने के लिए कहा गया था.

Text Size:

चेन्नई: मुश्किलों से घिरी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) एक बार फिर नए इस्तीफों और वरिष्ठ नेताओं की खुली बगावत से जूझ रही है. इससे पार्टी के अंदर लंबे समय से चल रही दरारें एक बार फिर सामने आ गई हैं.

यह दरार तब साफ दिखी जब नाथम आर. विश्वनाथन और एस.पी. वेलुमणि ने पार्टी महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी के उस निर्देश को नहीं माना, जिसमें उन्हें 14 अगस्त को पूरे तमिलनाडु में फसल ऋण माफी की मांग को लेकर होने वाले प्रदर्शनों का नेतृत्व करने को कहा गया था. इसके बाद EPS के समर्थकों ने दोनों नेताओं से उनके रुख को लेकर सवाल किए.

इसके अलावा, 12 अगस्त को AIADMK की उप प्रचार सचिव और आधिकारिक प्रवक्ता अप्सरा रेड्डी ने EPS को अपना इस्तीफा सौंप दिया.

अप्सरा ने अपने पत्र में लिखा कि उनका फैसला “कड़वाहट या अनादर की वजह से नहीं है, बल्कि यह एक भावनात्मक और बहुत सोच-समझकर लिया गया फैसला है, ताकि मैं अपनी मान्यताओं और उन सिद्धांतों के प्रति सच्ची रह सकूं, जिन्होंने मेरे सार्वजनिक जीवन को दिशा दी है”.

अप्सरा ने AIADMK की दिवंगत सुप्रीमो जयललिता के प्रति अपनी गहरी प्रशंसा पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि राजनीति का ध्यान लोगों को बांटने के बजाय निर्माण, समावेश और लोगों को एकजुट करने पर होना चाहिए. उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि EPS के साथ उनके व्यक्तिगत सम्मान का रिश्ता बना रहेगा.

यह ऐसे समय में हुआ है जब कुछ दिन पहले AIADMK छात्र विंग के प्रदेश सचिव सिंगई जी. रामचंद्रन ने 23 जुलाई को अपने पद और पार्टी से इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने हाल के संगठनात्मक घटनाक्रमों से निराशा और उन्हें “अपनी अंतरात्मा” के साथ मिलाने में असमर्थता को इसका कारण बताया था.

तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन के कुछ महीनों बाद, प्रवक्ताओं, पूर्व नेताओं और वरिष्ठ नेताओं के लगातार पार्टी छोड़ने और वरिष्ठ बागी नेताओं के खुले तौर पर निर्देश न मानने से यह साफ होता है कि मौजूदा नेतृत्व के तहत AIADMK के लिए स्थायी एकता हासिल करना मुश्किल हो रहा है. यह सब पार्टी की चुनावी और संगठनात्मक हार से उबरने की कोशिश के बीच हो रहा है.

शुक्रवार को हुए प्रदर्शन किसानों के फसल ऋण को पूरी तरह माफ करने की मांग और तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सरकार के खिलाफ अन्य मुद्दों को उठाने के लिए आयोजित किए गए थे.

प्रदर्शन से एक दिन पहले विश्वनाथन और वेलुमणि ने एक बयान जारी कर कहा कि वे प्रदर्शन के उद्देश्यों का समर्थन करते हैं, लेकिन EPS के निर्देश के अनुसार अपने गृह क्षेत्रों से बाहर दिए गए जिलों में जाने के लिए तैयार नहीं हैं.

EPS ने वेलुमणि को कोयंबटूर से थेनी में AIADMK के कावेरी से जुड़े प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए भेजा था. वहीं, विश्वनाथन को डिंडीगुल से रामनाथपुरम में नेतृत्व करने के लिए भेजा गया था. शुक्रवार को दोनों अपने-अपने गृह जिलों में ही प्रदर्शन की जगहों पर रहे. इसके बाद EPS समर्थकों ने बागी नेताओं को चुनौती दी कि वे इस्तीफा दें और अपने दम पर उपचुनाव जीतकर दिखाएं.

AIADMK के वरिष्ठ नेता के.पी. मुनुसामी ने पूर्व मंत्रियों वेलुमणि और विश्वनाथन से सीधे सवाल किए. उन्होंने शुक्रवार को पूछा, “हालांकि वेलुमणि और विश्वनाथन सार्वजनिक रूप से एडप्पादी के. पलानीस्वामी (EPS) को AIADMK का महासचिव कहते हैं, फिर वे महासचिव की बात क्यों नहीं मानते या उसका पालन क्यों नहीं करते, और वे उन्हें पूरी तरह स्वीकार क्यों नहीं करते?”

EPS के समर्थक डिंडीगुल श्रीनिवासन ने जोर देकर कहा कि दोनों वरिष्ठ नेताओं को अपने विधायक पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए. चेन्नई में एक प्रदर्शन के दौरान श्रीनिवासन ने कहा कि अगर दोनों ने अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता और ताकत के दम पर अपनी सीटें जीती हैं, तो उन्हें इस्तीफा देकर उपचुनाव लड़ना चाहिए.

संकट की शुरुआत राज्य विधानसभा चुनावों से हुई, जिसमें पार्टी को केवल 47 सीटें मिलीं और वह विधानसभा में तीसरे स्थान पर खिसक गई. यह कई वर्षों में पार्टी का सबसे खराब बड़ा प्रदर्शन है.

नतीजों के तुरंत बाद, 47 में से करीब 25 विधायकों ने, जो एस.पी. वेलुमणि और सी. वे. षणमुगम से जुड़े एक गुट के साथ थे, पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर TVK सरकार के विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया.

इसके बाद पलानीस्वामी ने बागी नेताओं को अयोग्य घोषित करने वाला बयान जारी किया और कई नेताओं से उनके संगठनात्मक पद छीन लिए, जिनमें जिला सचिव के पद भी शामिल थे.

बाद में आपसी समझौते के तहत दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाएं वापस ले लीं. कुछ बागी नेताओं को नए पद भी दिए गए, जिनमें वेलुमणि और विश्वनाथन के उप महासचिव के पद शामिल थे. हालांकि, दोनों ने ये पद लेने से इनकार कर दिया और कहा कि वे साधारण सदस्य बने रहना पसंद करेंगे. लेकिन यह समझौता ज्यादा समय तक नहीं चला.

पूर्व मंत्रियों सी. विजयबास्कर और एम.आर. विजयबास्कर समेत कम से कम छह विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया, जिससे AIADMK की ताकत और कम हो गई. करीब 16 पूर्व मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ी, जिनमें से 12 TVK में शामिल हो गए.

‘EPS में करिश्मा नहीं है’

पार्टी के पदाधिकारियों के स्तर पर भी 300 से ज्यादा जिला स्तर के पदाधिकारी TVK में शामिल हो गए. इन सभी का एक साझा कार्यक्रम आयोजित किया गया. इनमें से कई लोगों ने नेतृत्व से जुड़ी समस्याओं, अवसर न मिलने और अंदरूनी विवादों को पार्टी छोड़ने की वजह बताया.

राजनीतिक विश्लेषक श्री कुमार कन्नन ने दिप्रिंट से कहा, “बागी गुट के नेताओं ने जयललिता के समय एडप्पादी के साथ मिलकर काम किया है और अब आपसी सहमति के बिना एडप्पादी द्वारा पार्टी के फैसले थोपना ही दरारों की वजह बन रहा है. वह शशिकला, पन्नीरसेल्वम और टी.टी.वी. दिनाकरन को बाहर करने के बाद अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं, जिससे पार्टी के अंदर एकता और कमजोर हो रही है.”

“इससे AIADMK एक बहुत छोटी तीसरी पार्टी जैसी दिखने लगी है, जिसके पास कोई व्यक्तिगत प्रभाव या चुनावी ताकत नहीं है.”

EPS ने 400 महासभा और कार्यकारी समिति के सदस्यों को भी पद से हटा दिया था. कई नेताओं ने वी.के. शशिकला और टी.टी.वी. दिनाकरन को फिर से पार्टी में शामिल करने की मांग की है, लेकिन उन्होंने अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है.

विश्लेषकों ने कहा कि पार्टी के अंदरूनी बंटवारे की मुख्य वजहों में यह सवाल शामिल है कि क्या लगातार चुनावी हार के बाद EPS अपने मौजूदा आधार से आगे व्यापक समर्थन हासिल कर सकते हैं. पार्टी को 2021 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी हार मिली थी.

राजनीतिक विश्लेषक श्री कुमार कन्नन ने कहा कि AIADMK एक ऐसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जो पार्टी का नेतृत्व करता था और उसे एकजुट रखता था. जब तक पार्टी को एक मजबूत और सर्वमान्य नेता नहीं मिलता, तब तक ये दरारें बनी रहेंगी.

“एम.जी. रामचंद्रन (MGR) की मौत के तुरंत बाद पार्टी टुकड़ों में बंट गई थी, लेकिन जयललिता के एक मजबूत चेहरे के रूप में सामने आने और पार्टी को एकजुट करने के बाद यह धीरे-धीरे फिर सत्ता में आई. अगर एडप्पादी 2021 में जीत गए होते, तो स्थिति अलग होती. उन्हें ऐसा स्वीकार्य नेता नहीं माना जाता जो क्षेत्रीय राजनीति से आगे बढ़ सके.

“शशिकला और टी.टी.वी. दिनाकरन के समर्थक पार्टी में रह सकते थे, लेकिन जब उन्होंने उन्हें अलग कर दिया तो मुक्कुलथोर समुदाय नाराज हो गया. यह समुदाय AIADMK का मजबूत आधार था, लेकिन EPS ने उसका समर्थन खो दिया है,” उन्होंने कहा.

राजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि EPS में MGR और जयललिता जैसा करिश्मा नहीं है.

“जयललिता एक ऐसी नेता भी थीं जिन्हें किसी एक जाति से जोड़कर नहीं देखा जाता था और उनकी महिला समर्थकों की बड़ी संख्या थी, लेकिन EPS को केवल कोंगु वेल्लालर गौंडर समुदाय के नेता के रूप में देखा जाता है. अब समय आ गया है कि वह सच्चाई को स्वीकार करें और देखें कि पार्टी को एकजुट करने और पार्टी के सदस्यों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है,” कन्नन ने कहा.

MGR ने 1972 में AIADMK की स्थापना की थी. उन्होंने 1987 में अपनी मौत तक तीन बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में काम किया. इसके बाद उनकी शिष्या जयललिता ने 2016 में अपनी मौत तक पार्टी की कमान संभाली.

राजनीतिक विश्लेषक अरुण कुमार ने कहा कि TVK, अपने करिश्माई नेता विजय के साथ, AIADMK के नेताओं के लिए एक विकल्प बनकर सामने आया है.

उन्होंने कहा, “BJP को उम्मीद थी कि द्रविड़ राजनीति की बड़ी पार्टियां कमजोर होंगी, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई. अब TVK ने AIADMK के साथ ऐसा किया है. पार्टी को लगातार दो चुनावों में हार मिली है और वह कभी भी पांच साल से ज्यादा समय तक सत्ता से बाहर नहीं रही है. इससे पार्टी के सदस्यों में नाराजगी पैदा हुई है.”

अरुण ने भी कहा कि EPS में MGR और जयललिता जैसा करिश्मा नहीं है. “इस्तीफे इसलिए हो रहे हैं क्योंकि AIADMK के नेता TVK में अब एक करिश्माई नेता का वैसा ही पैटर्न देख रहे हैं और इसी वजह से वे दूसरी तरफ जा रहे हैं.”

उन्होंने आगे कहा कि नई-नई बनी TVK को राजनीतिक अनुभव वाले लोगों की भी जरूरत है. इसलिए “AIADMK के नेताओं का वहां स्वागत किया जा रहा है, जिससे पार्टी से नेताओं का जाना और भी तय होता जा रहा है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: 40 साल पहले हत्यारों की गोलियों से मारे गए जनरल वैद्य, दो महावीर चक्र पाने वाले सैनिक को देश भूला


 

share & View comments