बीजेपी और इतालवी महिलाओं को लेकर ऐसा क्या है? दशकों से पार्टी सोनिया गांधी को लेकर जुनूनी नजर आती थी. पार्टी इस बात को मानने को तैयार नहीं थी कि उन्होंने भारत को अपना घर बनाने का फैसला किया है और इसके बजाय उनका ध्यान उनकी इतालवी पहचान पर रहता था. जब सोनिया गांधी के जन्म वाले देश को लेकर बीजेपी नेतृत्व व्यस्त था, तब ट्विटर पर मौजूद घटिया लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि हर गोरी महिला के चरित्र खराब होते हैं. इसलिए सोशल मीडिया पर बीजेपी समर्थकों ने उन्हें बार डांसर या ‘इटालियन बार डांसर’ कहा.
मुझे नहीं पता कि सोनिया गांधी ने इन अपमानों और गालियों को लेकर कैसा महसूस किया क्योंकि उन्होंने कभी जवाब नहीं दिया, लेकिन बीजेपी के किसी नेता ने भी ऐसा नहीं किया. किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति ने इन लोगों को यह नहीं बताया कि उनकी भाषा महिलाओं के खिलाफ है और बिल्कुल भी स्वीकार करने लायक नहीं है.
सोनिया गांधी इन दिनों पहले की तुलना में बहुत कम दिखाई देती हैं, इसलिए ऑनलाइन भीड़ ने उनमें दिलचस्पी खो दी है. इसके बजाय अब उनका जुनून इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर है—इस बार एक प्रशंसा भरे अंदाज़ में. दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में मेलोनी के सत्ता में आने पर उनके फासीवादी विचारों से जुड़े इतिहास को लेकर (शायद अनुचित) टिप्पणियां की गईं, लेकिन भारत में इसका ज़िक्र बहुत कम होता है और अगर ऐसा होता भी, तो उनके बारे में पोस्ट करने वाले कुछ लोग इसे गर्व की बात मान सकते हैं.
दक्षिणपंथ में मेलोनी को लेकर मौजूदा जुनून नरेंद्र मोदी के साथ उनके रिश्ते पर आधारित है. इसमें कोई शक नहीं कि दोनों नेता आपस में अच्छे संबंध रखते हैं और बीजेपी समर्थक ‘मेलोनी’ की तारीफ करते हुए बात करते हैं, जो इस ‘जोड़ी’ को दिया गया नाम है. भारतीय प्रधानमंत्री ने भी मजाकिया अंदाज में अपनी इतालवी समकक्ष को ‘मेलोडी’ नाम की चॉकलेट दी थी और, इसी तरह मजाकिया अंदाज में, उनके कुछ समर्थकों ने मेलोनी को प्यार भरे पारिवारिक नामों से बुलाना शुरू कर दिया.
अपमान और भारतीय राजनीति
मैं यह सब इसलिए बता रहा हूं क्योंकि बीजेपी समर्थकों ने राहुल गांधी द्वारा मेलोनी के कथित अपमान को लेकर नाराज़गी जताई है. गुरुवार को एक सार्वजनिक सभा में राहुल कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित को गले लगाने गए. इसके जवाब में दीक्षित ने मेलोनी का ज़िक्र करते हुए एक मजाक किया और राहुल ने आगे कहा कि विदेश नीति सिर्फ लोगों को गले लगाने से कहीं ज्यादा होती है.
दीक्षित का ऐसा कहना मूर्खतापूर्ण और असंवेदनशील था और इसकी निंदा होनी चाहिए. अगर उन्होंने खुद की तुलना उन पुरुष नेताओं में से किसी से की होती, जिन्हें मोदी अक्सर गले लगाते हैं, तो बात अलग होती क्योंकि मेलोनी एक महिला हैं, इसलिए इस टिप्पणी का संदर्भ अलग हो गया और भले ही यह टिप्पणी राहुल ने नहीं बल्कि दीक्षित ने की थी, फिर भी इससे कांग्रेस की छवि खराब होती है.
सोनिया गांधी ने पहले जिस तरह धैर्य दिखाया था, उसी तरह इतालवी धैर्य के साथ मेलोनी ने इस टिप्पणी को नज़रअंदाज़ कर दिया, लेकिन बीजेपी को अपना मौका दिखाई दिया और पार्टी के प्रवक्ताओं (सोशल मीडिया हैंडल, टीवी चैनल आदि) को इस घटना को ज्यादा से ज्यादा दिखाने और महिलाओं के प्रति राहुल के कथित अनादर की निंदा करने के निर्देश दिए गए.
दुर्भाग्य से सरकार के लिए, इटली की ओर से कोई नाराजगी भरी प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन यह कोई बड़ी समस्या नहीं थी. इटली के दूतावास का आधिकारिक अकाउंट होने का दावा करने वाले एक फर्जी अकाउंट ने टिप्पणियों के विरोध में एक नकली बयान पोस्ट कर दिया. बयान को देखने वाला कोई भी सामान्य रूप से समझदार व्यक्ति तुरंत समझ जाता कि यह फर्जी है, लेकिन आदेश तो आदेश होते हैं, इसलिए टीवी चैनलों ने भी यह खबर चला दी कि इटली की सरकार ने विरोध जताया है और राहुल ने एक अंतरराष्ट्रीय विवाद खड़ा कर दिया है.
मैं यह सब सरकार के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक बड़े हिस्से पर पूरी तरह नियंत्रण या फर्जी दस्तावेज़ और फेक न्यूज़ को सच मानकर पेश करने की इच्छा की ओर इशारा करने के लिए नहीं बता रहा हूं. मेरी चिंता राजनीति में अपमान को लेकर अचानक बढ़े ध्यान से है. जंतर-मंतर के प्रदर्शनों में ज्यादातर नारे प्रधानमंत्री के खिलाफ थे और उनमें से कई बेहद अपमानजनक थे. ज्यादातर नेता गाली-गलौज या अपमान को नज़रअंदाज़ करते हैं और मुद्दों पर ध्यान देते हैं: और जब छात्र सरकार की कुर्सी के नीचे आग लगा दें, तो जाहिर तौर पर ऐसे कई मुद्दे होते हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है.
लेकिन प्रधानमंत्री ने सोनिया गांधी और मेलोनी के धैर्य वाले तरीके को नहीं अपनाया और देश को बताया कि वे इन अपमानजनक नारों से कितने आहत हुए हैं. उनके पास नाराज़ होने का अधिकार था; कुछ नारे उन्हें चोट पहुंचाने के लिए लगाए गए थे और यह देखते हुए कि वह एक दशक से ज्यादा समय से सर्वोच्च नेता रहे हैं, शायद कई साल हो गए हैं जब किसी ने उनकी हिम्मत करके उनका अपमान किया हो.
लेकिन शायद वह यह भूल गए कि भारत पर शासन करने से पहले भी न सिर्फ ऐसे अपमान राजनीतिक भाषा का हिस्सा थे, बल्कि वह खुद भी अपमान करने वाले प्रमुख नेताओं में से एक थे.
किसी और गहरी समस्या का संकेत
गुजरात की जानी-मानी पत्रकार दीपाल त्रिवेदी ने एक्स पर लिखा कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को सोनिया गांधी को “जर्सी गाय” और राहुल को “हाइब्रिड” कहते हुए सुना था. त्रिवेदी के अनुसार, उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने 20 लोगों से बात की थी और उनमें से एक भी व्यक्ति सोनिया गांधी को क्लर्क की नौकरी या राहुल गांधी को चपरासी की नौकरी देने के लिए तैयार नहीं था.
ये बातें बड़े दर्शक वर्ग के सामने सार्वजनिक रूप से कही गई थीं, न कि त्रिवेदी से निजी बातचीत में. उन्होंने ऐसे कई और उदाहरण दिए, लेकिन मुझे लगता है कि आपको बात का सामान्य मतलब समझ आ गया होगा.
यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री की भाषा से प्रभावित थे. ज्यादा संभावना है कि वे सोशल मीडिया पर बीजेपी समर्थक हैंडल्स की ओर से सरकार के आलोचकों के खिलाफ लगातार की जाने वाली गाली-गलौज और घटिया भाषा से प्रभावित थे. गाली देने वालों में कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें ज्यादा लोग नहीं जानते (जैसे जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री को नाम लेकर बुलाने वाले छात्र), लेकिन कुछ हैंडल्स का दावा है कि प्रधानमंत्री खुद उन्हें फॉलो करते हैं.
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि भारत के प्रधानमंत्री को गाली देना ठीक है. नरेंद्र मोदी सम्मान के हकदार हैं. इसी तरह कांग्रेस नेताओं को भी राजनीति में महिलाओं को लेकर मजाक नहीं करना चाहिए. इससे न सिर्फ महिलाओं का अपमान होता है, बल्कि कांग्रेस की भी बदनामी होती है.
मेरी बात बहुत साफ है—दूसरों पर उंगली उठाने से पहले यह देखना चाहिए कि खुद क्या किया जा रहा है. ये अपमान और गालियां किसी और गहरी समस्या का संकेत हैं: भारतीय राजनीति में भाषा का लगातार खराब होते जाना और ऐसी संस्कृति का बढ़ना, जहां गाली-गलौज को बातचीत या आलोचना समझ लिया जाता है.
मैं समझ सकता हूं कि प्रधानमंत्री को बुरा क्यों लगा. कम से कम कुछ मामलों में वह भी हम सबकी तरह इंसान हैं और किसी को भी इस तरह की गालियों का हकदार नहीं होना चाहिए. लेकिन अगर बीजेपी इस मुद्दे पर खुद को बहुत सही मानकर दूसरों को गलत ठहराने वाली है, तो उसे छात्रों और राजनीतिक विरोधियों पर उंगली उठाने से पहले अपने सांसदों, समर्थकों और नेताओं की ओर से लगातार इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और गालियों पर भी नजर डालनी चाहिए.
वीर सांघवी प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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