चंडीगढ़: महाराष्ट्र के नांदेड़ साहिब के एक गुरुद्वारे में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल पर गुरुवार को हुए हमले, जिसमें कथित तौर पर एक ‘निहंग’ शामिल था, ने एक बार फिर इस सिख समूह को चर्चा में ला दिया है. यह समूह 300 से ज्यादा वर्षों से सिखों की योद्धा परंपरा में सबसे आगे रहा है.
अपने खास नीले कपड़ों और सजी हुई बड़ी पगड़ियों के लिए पहचाने जाने वाले ‘निहंग’ आमतौर पर भारी हथियार रखते हैं. वे सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह से अपनी शुरुआत जुड़ी होने की बात कहते हैं और खुद को “गुरु दी लाडली फौज” (गुरु की पसंदीदा सेना) बताते हैं.
गुरुवार को पुणे के पूर्व वकील जसपाल सिंह, जो डेढ़ साल पहले ‘निहंग’ समूह में शामिल हुए थे, ने कथित तौर पर खंजर से बादल पर हमला किया और उनके दाहिने हाथ को गंभीर रूप से घायल कर दिया. बादल के सुरक्षा कर्मचारियों ने तुरंत जसपाल सिंह को काबू में कर लिया. महाराष्ट्र पुलिस ने जसपाल सिंह के खिलाफ हत्या की कोशिश का मामला दर्ज किया है.
बादल अपने परिवार के साथ दो दिन के लिए नांदेड़ साहिब गए थे. वे हजूर साहिब में माथा टेकने गए थे. यह गुरुद्वारा गुरु गोबिंद सिंह के अंतिम विश्राम स्थल की याद में बनाया गया है.
गुरुवार सुबह हजूर साहिब जाने के बाद बादल अपने परिवार के साथ गांव मुगत में स्थित एक दूसरे गुरुद्वारे, माता साहिब देवाजी, गए. यह हजूर साहिब से करीब 20 किलोमीटर दूर है. हजूर साहिब बोर्ड के प्रशासक और महाराष्ट्र के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी विजय सतबीर सिंह ने शुक्रवार को दिप्रिंट से कहा, “यह गुरुद्वारा हजूर साहिब बोर्ड के प्रशासनिक नियंत्रण में नहीं है. पिछले तीन दशकों से इसे ‘निहंग’ समूह स्वतंत्र रूप से चला रहा है.”
माता साहिब देवाजी गुरुद्वारे को नियंत्रित करने वाले ‘निहंग’ समूह के प्रवक्ता ज्ञानी गुरपिंदर सिंह ने दिप्रिंट को बताया कि गुरुवार को जो हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण था.
ज्ञानी गुरपिंदर सिंह ने कहा, “जसपाल सिंह पुणे के एक बहुत पढ़े-लिखे परिवार से हैं. उनकी बेटी और दामाद भी वकील हैं. उन्हें सिख धर्म से जुड़ी चर्चाओं में काफी रुचि है. वह डेढ़ साल पहले गुरुद्वारे में आए थे और उन्होंने काली पगड़ी पहन रखी थी, जो शायद अदालतों में पहनी जाने वाली पोशाक का हिस्सा थी. हमने इस पर आपत्ति जताई और उन्होंने नीले कपड़े पहनना शुरू कर दिया. इसके बाद वह गुरुद्वारे में रहने लगे और यहां ‘निहंग’ समूह के प्रमुख बाबा तेजा सिंह जी की सेवा करने लगे.”
ज्ञानी गुरपिंदर ने बताया कि जसपाल सिंह उस काउंटर पर ड्यूटी कर रहे थे, जहां सिरोपा और प्रसाद बांटा जाता है. “उन्होंने ही काउंटर पर बादल को सिरोपा और प्रसाद दिया था. मुझे बताया गया है कि उन्होंने बादल से कुछ बातचीत शुरू की और अपना काउंटर छोड़कर उनके साथ चलने लगे. इसके बाद क्या हुआ, हमें वास्तव में नहीं पता. शायद उन्हें बादल से सही जवाब नहीं मिला और वह गुस्सा हो गए और उन पर हमला करने के लिए अपना खंजर निकाल लिया.”
ज्ञानी गुरपिंदर ने यह भी कहा कि जसपाल सिंह के अलावा किसी और ‘निहंग’ ने बादल पर हमला करने की कोशिश नहीं की. उन्होंने कहा, “बीबी हरसिमरत कौर जो दूसरों के भी हमले में शामिल होने की बात कह रही हैं, वह गलत है.”
हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि जसपाल सिंह ने बादल पर हमला क्यों किया, लेकिन यह पहली बार नहीं है जब कोई ‘निहंग’ समूह गलत वजहों से खबरों में आया हो.
जून में उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में ‘निहंग’ श्रद्धालुओं से जुड़ा विवाद बढ़कर स्थानीय लोगों पर हथियारों से हमला करने के आरोप तक पहुंच गया था. चार ‘निहंगों’ को गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद यह टकराव रुद्रप्रयाग के नागरासू में एक गुरुद्वारे में बड़े विवाद में बदल गया, जहां हथियारबंद ‘निहंगों’ के एक समूह ने तीन दिनों तक छत पर कब्जा कर लिया और कथित तौर पर एक सिख श्रद्धालु को बंधक बना लिया. वे गिरफ्तार किए गए लोगों की रिहाई की मांग कर रहे थे.
बातचीत के बाद आखिरकार यह विवाद खत्म हुआ, लेकिन इस घटना में बड़ी संख्या में सुरक्षा बल तैनात किए गए और सेना को भी बुलाया गया.
हाल ही में दिल्ली में हुए छात्र आंदोलन के दौरान भी कुछ ‘निहंग’ प्रदर्शन कर रहे छात्रों के समर्थन में जंतर-मंतर पहुंचे और मदद देने की बात कही, लेकिन वहां ‘निहंगों’ और कुछ प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हो गया.
‘निहंग’ कौन हैं?
सिख विद्वान अमृत पाल सिंह ‘अमृत’, जिन्होंने ‘निहंगों’ पर रिसर्च की है, लिखते हैं कि ‘निहंग’ शब्द का इस्तेमाल गुरु ग्रंथ साहिब और दूसरे सिख ग्रंथों में किया गया है. हालांकि, इस शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग अर्थों में किया गया है, लेकिन उनका कहना है कि इसका मतलब है “वह जो निडर और बेबाक हो”.
‘निहंग’ हथियारबंद सिख योद्धा होते हैं, जिनकी ज़िम्मेदारी सिख धर्म की रक्षा करना और इसकी युद्ध-कला या शस्त्र विद्या को बनाए रखना है. माना जाता है कि इनकी शुरुआत सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद के सैनिकों के समूह ‘अकाल सेना’ से हुई थी.
बाद में यही अकाल सेना गुरु गोबिंद सिंह की ‘खालसा फौज’ में बदल गई. आनंदपुर साहिब, जहां गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 में खालसा की स्थापना की थी, इनका मुख्य केंद्र है. वे एक खास तरह का पहनावा पहनते थे और हमेशा हथियारबंद रहते थे.
18वीं सदी के दौरान, खालसा फ़ौज अलग-अलग रूपों और जत्थों (समूहों) में बंटी हुई थी और महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिख साम्राज्य के बनने से पहले पंजाब में हुई कई लड़ाइयों में शामिल रही. लड़ाइयों के दौरान बार-बार “अकाल अकाल” का जाप करने की वजह से उन्हें “अकाली” कहा जाने लगा.
अकाल तख्त के जत्थेदार नवाब कपूर सिंह ने 1730 में सभी जत्थों को एक साथ लाकर ‘दल खालसा’ नाम का एक संगठन बनाया. इसे दो समूहों में बांटा गया था: बुड्ढा दल और तरना दल. बुड्ढा दल को ज़्यादा उम्र वाले और अनुभवी योद्धाओं का समूह माना जाता था, जबकि तरना दल को युवा लड़ाकू फ़ौज माना जाता था. तरना दल खुद पांच जत्थों में बंटा हुआ था.
बुड्ढा दल ऐतिहासिक रूप से अहम हो गया और इसने “चलदा वहीर” या चलते-फिरते कैंप के तौर पर काम किया, जिसमें ‘निहंग’ एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल से दूसरे स्थल तक जाते थे. उनके कुछ समय के लिए रुकने की जगह को “छावनी” या कैंटोनमेंट कहा जाता था. बुड्ढा दल के प्रमुख या जत्थेदार को “96 करोड़ी” (960 मिलियन) का सम्मानजनक खिताब दिया जाता है. यह खिताब पारंपरिक रूप से खालसा सेना की उस ताकत से जुड़ा है जो सच्चाई और धर्म की रक्षा के लिए बनी है. यह एक ऐसी असीम और अजेय आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है जिसे दुनिया की कोई भी सत्ता कुचल नहीं सकती.
रणजीत सिंह के समय में, सिख धार्मिक जीवन में ‘निहंगों’ का एक खास स्थान था. अकाली फूला सिंह सिख सेना में अकाली टुकड़ी के कमांडर थे और सिखों की सबसे बड़ी सांसारिक संस्था, अकाल तख्त के जत्थेदार भी थे.
1849 में अंग्रेज़ों की जीत के बाद ‘निहंगों’ की भूमिका के बारे में कई ऐतिहासिक बातें मिलती हैं. बुड्ढा दल एक संरक्षक और धार्मिक संस्था बन गया और इसके अधिकार का दावा खास तौर पर अकाल तख्त और सिखों के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों से जुड़ा था.
बुड्ढा दल की विरासत जारी है
सालों तक बुड्ढा दल मुख्य संस्था के तौर पर बना रहा, जबकि तरना दल कई हिस्सों में बंट गया. हालांकि, 13वें जत्थेदार बाबा संता सिंह की मौत के बाद उत्तराधिकार की कड़वी लड़ाई से बुड्ढा दल की विरासत पर दाग लग गया.
2008 में बाबा संता सिंह की मौत से पहले के आखिरी सालों में, उनके भतीजे बाबा बलबीर सिंह और बाबा सुरजीत सिंह व बाबा मान सिंह जैसे दूसरे प्रमुख ‘निहंग’ नेताओं के बीच गंभीर मतभेद पैदा हो गए. जहां बाबा बलबीर सिंह का दावा था कि उन्हें उनके पूर्ववर्ती ने आधिकारिक तौर पर 14वां जत्थेदार नियुक्त किया था, वहीं बाबा सुरजीत सिंह के समर्थकों ने इसका पुरजोर विरोध किया. उनका कहना था कि बीमार बाबा संता सिंह ने असल में 2005 में सुरजीत सिंह को चुना था.
विरोधी गुटों ने बलबीर सिंह पर आरोप लगाया कि उन्होंने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके संगठन की विशाल संस्थागत संपत्ति और मुख्यालय पर जबरन कब्ज़ा कर लिया.
सितंबर 2007 में, बाबा उदय सिंह अपने समर्थकों और बाबा सुरजीत सिंह के साथ पटियाला में बुड्ढा दल के परिसर में गए, जहां संता सिंह ठहरे हुए थे. उस समय की खबरों के मुताबिक, वे बीमार संता सिंह से मिलना चाहते थे, लेकिन बलबीर सिंह के समर्थकों ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया. उन्होंने कहा कि संता सिंह इतने बीमार हैं कि किसी से मिल नहीं सकते. हालात बिगड़ गए और हथियारों के साथ टकराव हुआ, जिसमें बाबा बलबीर सिंह के परिवार के चार सदस्यों की मौत हो गई.
2008 में बाबा संता सिंह की मौत के बाद, बाबा बलबीर सिंह का आधिकारिक बुड्ढा दल प्रशासन पर मान्यता प्राप्त नियंत्रण बना रहा, लेकिन एक समानांतर और बहुत प्रभावशाली गुट ने उनकी वैधता को मानने से इनकार कर दिया. इस अलग हुए गुट ने बाबा सुरजीत सिंह को अपना नेता नियुक्त किया, और उनके बाद क्रमशः बाबा प्रेम सिंह, बाबा जोगिंदर सिंह और बाबा मान सिंह नेता बने.
ज्ञानी गुरपिंदर सिंह ने कहा, “बुड्ढा दल के पास 740 से ज़्यादा छावनियां, 20 से ज़्यादा स्कूल और 25,000 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन है.”
उन्होंने यह भी बताया कि नांदेड़ साहिब का गुरुद्वारा बाबा सुरजीत सिंह गुट के पास है.
अलग जीवनशैली
हथियार ‘निहंगों’ की पहचान का अहम हिस्सा हैं, इसलिए वे आम तौर पर आधुनिक बंदूकों के साथ-साथ पारंपरिक हथियार भी रखते हैं. इनमें कलाई पर पहने जाने वाले लोहे के कड़े शामिल हैं जिन्हें ‘जंगी कड़ा’ कहा जाता है और वे सिर पर पगड़ी के चारों ओर ‘चक्र’ या स्टील का घेरा भी पहनते हैं.
वे दो तलवारें या कृपाण और हाथ में पकड़े जाने वाले छोटे खंजर भी रखते हैं. जब वे पूरी तरह से हथियारों से लैस होते हैं, तो उनकी पीठ पर ढाल के तौर पर भैंस की खाल होती है और गले में ‘चक्र’ और लोहे की जंजीरें होती हैं. आमतौर पर उन्हें हाथों में लंबे भाले लिए देखा जाता है.
वे नीले रंग के लंबे फ्रॉक और चमड़े के जूते पहनते हैं जिन्हें ‘जंगी मोज़े’ कहा जाता है; इनके पंजों पर धातु की नुकीली फिटिंग होती है, जिसका इस्तेमाल हथियार के तौर पर किया जा सकता है. उनके पहनावे की सबसे खास चीज़ ‘दमल्ला’ नाम की पगड़ी है. पगड़ी का आकार गर्व की बात होती है, और कुछ ‘निहंग’ अपने सिर से कई गुना बड़ी पगड़ी पहनते हैं, जिसे वे ‘खंडा साहिब’ से सजाते हैं.
‘निहंगों’ के अपने डेरे और जीवन जीने का एक खास तरीका होता है. जो लोग शादीशुदा होते हैं, उन्हें डेरों की देखभाल की ज़िम्मेदारी दी जाती है, जबकि बाकी लोग राज्य में घूमते रहते हैं. डेरों में हथियार, लाइसेंस वाली बंदूकें और घोड़े होते हैं और हर कोई मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग लेता है.
उनके पास साल भर होने वाले कार्यक्रमों का एक कैलेंडर होता है, जिसमें वे शामिल होते हैं. इनमें माघी, बैसाखी, राखड़ पुनिया, दिवाली और जोर मेला जैसे सभी महत्वपूर्ण धार्मिक मेले शामिल हैं. वे ‘भांग’ या किसी अन्य नशे का पारंपरिक रूप से सेवन करने के लिए जाने जाते हैं; इसे खाया या पिया जाता है, लेकिन कभी भी धूम्रपान नहीं किया जाता.
अपराध से बढ़ता जुड़ाव
एक ऐसे मार्शल ग्रुप के लिए जिसकी ऐतिहासिक पहचान सिख धर्म की रक्षा करने में निहित है, ‘निहंग’ पिछले दो-तीन वर्षों में ऐसी वजहों से खबरों में रहे हैं जिनका उनकी पारंपरिक भूमिका से बहुत कम लेना-देना है. पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट के पूर्व प्रोफेसर मंजीत सिंह कहते हैं, “यह पैटर्न इसलिए खास तौर पर ध्यान खींचने वाला है क्योंकि नीले चोगे, ऊंची दमालें और पारंपरिक हथियार – जो कभी सिखों की युद्ध-कला की परंपरा की पहचान हुआ करते थे – अब न्यूज़ रिपोर्ट और वायरल वीडियो में आक्रामकता और खुद कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति की पहचान बन गए हैं. हालांकि, ऐतिहासिक ‘निहंग’ परंपरा और उन लोगों या समूहों के बीच फर्क करना ज़रूरी है जो अपराध करते समय इस पहचान का इस्तेमाल करते हैं.”
मार्च 2025 में, लुधियाना ज़िले में दो प्रवासी मज़दूरों पर तलवारों से हमले के आरोप में गिरफ्तार तीन लोगों में एक ‘निहंग’ भी शामिल था. उसी महीने, ‘निहंग’ अमृतपाल सिंह मेहरॉन ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर कंचन कुमारी (जिन्हें कमल कौर भाभी के नाम से जाना जाता था) की हत्या की ज़िम्मेदारी ली; उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसे उनका ऑनलाइन कंटेंट अश्लील लगा था.
जनवरी 2024 में, ‘निहंग’ रमनदीप सिंह उर्फ़ मांगू मठ ने फगवाड़ा के एक गुरुद्वारे के अंदर एक युवक की हत्या कर दी; उस पर धार्मिक बेअदबी करने के लिए वहां आने का आरोप लगाया गया था. आरोपी ने हत्या से पहले पीड़ित का वीडियो भी बनाया और बाद में अपना कथित कबूलनामा भी रिकॉर्ड किया.
जुलाई 2024 में, लुधियाना में शिवसेना नेता संदीप थापर पर दिन-दहाड़े एक चौंकाने वाला हमला हुआ. सीसीटीवी में ‘निहंग’ वेशभूषा पहने चार लोगों को शहर के बीचों-बीच थापर पर तलवारों से हमला करते देखा गया. उसी दौरान, तरनतारन में पैसों के विवाद में ‘निहंगों’ ने कथित तौर पर एक दुकानदार की हत्या कर दी.
नवंबर 2023 में, कपूरथला के सुल्तानपुर लोधी में एक गुरुद्वारे के कंट्रोल को लेकर हुए विवाद के दौरान पुलिस और ‘निहंगों’ के बीच गोलीबारी में एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए.
15 अक्टूबर 2021 को, देशव्यापी किसान आंदोलन के दौरान सिंघु बॉर्डर पर लखबीर सिंह नाम के 35 वर्षीय मज़दूर की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. उसका क्षत-विक्षत शव जिसमें हाथ और पैर कटे हुए थे – पुलिस बैरिकेड से बांध दिया गया था. ‘निहंग’ सिख पंथ के सदस्यों ने हत्या की ज़िम्मेदारी ली और आरोप लगाया कि पीड़ित ने एक पवित्र ग्रंथ की बेअदबी करने की कोशिश की थी.
अप्रैल 2020 की एक और चौंकाने वाली घटना में, पटियाला के एक डेरे से आए ‘निहंग’ सिखों के एक समूह ने सनौर में थोक सब्जी मंडी के चारों ओर लगे कई बैरिकेड्स को अपनी गाड़ी से तोड़ दिया, जब पुलिस ने उन्हें कर्फ्यू के नियमों का उल्लंघन करने के लिए रोका. जब पंजाब पुलिस ने डंडों से मारकर उनकी चलती गाड़ी को रोकने की कोशिश की, तो गुस्से में भरे ‘निहंग’ गाड़ी से बाहर निकले और तलवारों से पुलिस पर हमला कर दिया. इसके बाद हुई हाथापाई में, एक ‘निहंग’ ने पुलिस के एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर का हाथ काट दिया.
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