जनरल डगलस मैकआर्थर उन सैनिकों में थे जिन्होंने इस वाक्य को अमर बना दिया कि ‘पुराने सैनिक मरते नहीं, वे बस भुला दिए जाते हैं’. इस सप्ताह इस विडंबना को सामने ला दिया एक महान तथा सबसे ज्यादा सम्मान पाने वाले सैनिकों में गिने जाने वाले एक भारतीय सैनिक ने, जिन्हें हत्यारों ने अपनी गोलियों का निशाना बनाया था, लेकिन उन्हें भुला दिया गया. यह कुछ सवालों को जन्म देता है.
अब तक दो महावीर चक्र (एमवीसी) से सम्मानित केवल छह भारतीय सैनिकों में वे भी शामिल थे. ये सम्मान उन्हें दो सबसे भीषण युद्ध (1965 और 1971 के युद्ध) में शौर्य दिखाने के लिए मिला था. आगे चलकर वे भारत के 31वें सेना अध्यक्ष बने और 31 जनवरी 1986 को इस पद से रिटायर हुए. उसी साल 10 अगस्त को पुणे में वे अपनी मारुति 800 चलाते हुए अपनी ड्यूटी निभाने जा रहे थे कि दो हत्यारों की गोलियों ने उनकी हत्या कर दी थी.
उनकी 40वीं पुण्यतिथि की किसी को याद नहीं आई. कोई स्मृति सभा नहीं हुई, किसी ने उन्हें याद नहीं किया, सेना के एक्टिव हैंडलों पर कोई ट्वीट तक नहीं किया गया. ऐसा लगा मानो जनरल अरुण श्रीधर वैद्य की सभी यादों को मिटा डालने की कोई ‘सामूहिक’ सहमति हो.
‘असल उत्तर’/खेमकरण सेक्टर की लड़ाई में वैद्य ने अपनी 9 कैवेलरी (डेक्कन हॉर्स) रेजीमेंट का बड़ी शान से नेतृत्व किया था और पाकिस्तानी फौज की शान माने गए 1 आर्मर्ड डिवीजन का सफाया कर दिया था. इसके बाद बसंतर, चकरा और देहिरा में नष्ट किए जाते टैंकों की लड़ाई में उन्होंने 16 (इंडिपेंडेंट) आर्मर्ड ब्रिगेड का और भी शानदार नेतृत्व किया था.
यही नहीं, उनकी ही निगरानी में दो सबसे चर्चित कैवेलरी रेजीमेंटों, 17 (पूना) हॉर्स और 4 (हडसन्स) हॉर्स, को एक परमवीर चक्र (सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, मरणोपरांत, जिनकी कहानी पर ‘इक्कीस’ नामक फिल्म बनी) और वैद्य के अलावा तीन और ‘एमवीसी’ तथा छह वीर चक्र हासिल करने का गौरव प्राप्त हुआ, जहां गोलियां बरस रही हों वहां बारूदी सुरंगों को नष्ट करना टैंक के अंदर से लड़ने से कम खतरनाक नहीं होता.
बसंतर में अगर सिर्फ टैंकों की लड़ाई हुई थी, तो असल उत्तर/खेमकरण में हुई लड़ाई इस उपमहाद्वीप में लड़ी गई लड़ाइयों में सबसे विनाशकारी और निर्णायक थी. वहां वैद्य की रेजीमेंट अग्रिम मोर्चे पर थी, हालांकि, उसके शेर्मन टैंकों को पाकिस्तानी पैटन टैंकों ने परास्त, असुरक्षित कर दिया था. इंदिरा गांधी की सरकार ने ‘युद्ध के इस अनुभव’ के आधार पर वैद्य को 1983 में सेनाध्यक्ष बना दिया था, हालांकि, ले. जनरल एस.के. सिन्हा उनसे सीनियर थे और बारी उनकी ही थी और इस फैसले को राजनीतिक रंग भी दिया गया था. शानदार सोच वाले सिन्हा को जयप्रकाश नारायण के साथ अपनी नजदीकी की सजा भुगतनी पड़ी थी.
सैनिक कितने भी सीनियर क्यों न हों, वे अपनी नियति तय नहीं कर सकते, खासकर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में. पंजाब के हालात बिगड़ रहे थे और हालांकि, कानून-व्यवस्था सेना की जिम्मेदारी नहीं थी, फिर भी स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों से मुक्त कराने की जिम्मेदारी वैद्य के कंधों पर आ गई.
1962 की पराजय के अलावा ऑपरेशन ब्लूस्टार सेना के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटना है. सिख उग्रवादियों ने हिट लिस्ट बना रखी थी. पहली हत्या की गई इंदिरा गांधी की. उनके बाद ऑपरेशन ब्लूस्टार का नेतृत्व करने वाले जनरलों का नंबर था—वैद्य, जनरल कृष्णस्वामी सुंदरजी (ऑपरेशन ब्लूस्टार के दौरान वेस्टर्न आर्मी कमांडर), उनके चीफ ऑफ स्टाफ ले. जनरल रणजीत सिंह द्याल और डिवीजन कमांडर मेजर जनरल के.एस. ‘बुलबुल’ ब्रार. इस हिट लिस्ट में दिल्ली कांग्रेस के नेताओं के नाम भी थे, जिन्हें इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दंगों में सिखों के कत्ल के लिए जिम्मेदार माना गया था.
इनमें से ललित माकन और अर्जुन दास की हत्या दंगे के कुछ महीनों के अंदर कर दी गई. इसके बाद ‘खालिस्तान कमांडो फोर्स’ के दो हत्यारों ने बैंक लूटे, पुलिसवालों की हत्या की और हिट लिस्ट में दर्ज सेना के कमांडरों के पीछे पड़ गए. इन्हीं हरजिंदर सिंह ‘जिंदा’ और सुखदेव सिंह ‘सुक्खा’ ने तब तक भारत में सबसे बड़ी (5.7 करोड़ रुपये की) बैंक डकैती लुधियाना में की और इसके बाद मुंबई में की. वे वैद्य को घेरने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन न तो खुफिया ब्यूरो ने, न महाराष्ट्र पुलिस ने और न ही सेना ने कोई सजगता दिखाई कि हाल में रिटायर हुए सेनाध्यक्ष पुणे के कोरगांव पार्क इलाके में अपना घर बनवा रहे थे.
उनकी सुरक्षा पुणे पुलिस के भरोसे छोड़ दी गई थी. लापरवाही की हद यह थी कि वैद्य की सुरक्षा के लिए पुलिस का केवल एक गनमैन तैनात किया गया था. यह पुलिस सिपाही रामचंद्र क्षीरसागर उस समय उनकी छोटी-सी मारुति कार में पिछली सीट पर बैठा था, जब इंड-सुजुकी मोटरसाइकिल पर सवार हत्यारों ने बगल में आकर वैद्य के सिर में गोली मारी थी. सदमे में डूबे क्षीरसागर ने कार से बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन उसका पैर दरवाजे में फंस गया और वह कुछ दूर तक घिसट गया था. भारत के सबसे महान युद्धवीर को असुरक्षित छोड़ दिया गया था.
उनकी बगल में बैठी उनकी पत्नी भानु को चार गोलियां मारी गईं, लेकिन किस्मत से वे बच गईं. सुक्खा और जिंदा को बाद में पकड़ लिया गया, यरवदा जेल में उन पर मुकदमा चला और 9 अक्टूबर 1992 को उन्हें फांसी दे दी गई. उनका कहना था कि वे ‘बेकसूर’ हैं क्योंकि वैद्य हत्या के हकदार थे. दूसरी हत्याओं में उनका साथ देने वाले रणजीत सिंह गिल को एफबीआई ने न्यू जर्सी में गिरफ्तार किया और बाद में निष्कासित करके भारत भेज दिया. ‘इंडिया टुडे’ के लिए इसकी रिपोर्ट मैंने मुंबई के ब्यूरो चीफ मसीह रहमान के साथ लिखी थी.
यह खबर अब दो धुरियों पर घूमती है. एक तो, जिंदा-सुक्खा का मुकदमा तब चला था जब पंजाब आतंकवाद के सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा था. सभी संस्थाएं पंगु हो गई थीं और जैसा कि पंजाब सरकार के पूर्व चीफ सेक्रेटरी रमेश इंदर सिंह ने अपनी आधिकारिक किताब ‘टर्मोइल इन पंजाब’ (हार्पर कॉलिन्स, भारत, 2022) में लिखा है, ‘मीडिया पूरी तरह से घुटने टेक चुका था’. उन्होंने लिखा है कि इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिंदा और सुक्खा ने 21 पेज का जो पत्र लिखा था उसे सभी प्रकाशनों को इस आदेश के साथ भेजा था कि इस पूरे पत्र को वे 26 जुलाई 1990 को प्रकाशित करें. अगले दिन यूएनआई तथा पीटीआई ने इस पूरे पत्र को जारी किया और कई अखबारों ने इसके अंश छापे. हथियारबंद आतंकवादी तो सम्मानित अखबार ‘ट्रिब्यून’ के संपादक वी.एन. नारायणन के पास पहले ही आ चुके थे, उनके अखबार ने पूरा पत्र तीन पन्नों पर छापा.
दूसरा पहलू यह था कि सेना अपनी संवेदनहीनता के एहसास के साथ सदमे और शर्म में थी. बाकी जनरलों की सुरक्षा के लिए विशेष उपाय किए गए. सेना में इस बात पर भी गहरा मंथन चला कि ब्लूस्टार जैसे ऑपरेशन में उसे शामिल होना चाहिए या नहीं. इस व्यापक मंथन के कारण ही 16 अक्टूबर 1984 को नेशनल सिक्यूरिटी गार्ड (एनएसजी) की स्थापना की गई. इसी सोच के तहत कश्मीर घाटी के लिए राष्ट्रीय राइफल्स की स्थापना 1 अक्तूबर 1990 को की गई. फिर भी, ले. जनरल ब्रार पर 30 सितंबर 2012 को (तब तक वे रिटायर हो चुके थे), जब वे लंदन के मेफेयर में टहल रहे थे, तब जानलेवा हमला करने की कोशिश की गई. उन्होंने हमलावरों का मुकाबला करके उन्हें नाकाम किया. बाद में उन्होंने मुंबई के सबसे सुरक्षित जोन में स्थित अपने घर में मेरे ‘वॉक द टॉक’ शो में हिस्सा लिया.
वैद्य के साथ मेरी पहली बातचीत संयोग से एक बोझिल सुबह हुई थी. इससे एक दिन पहले, 19 फरवरी 1982 को नगा बागियों ने सिख रेजीमेंट की 21वीं बटालियन के काफिले को घेर कर हमला किया था, जिसमें एक मेजर समेत 20 सैनिक मारे गए थे. उस समय कलकत्ता से इंफाल की फ्लाइट गुवाहाटी होकर जाती थी.
वैद्य उस समय ईस्टर्न आर्मी कमांडर थे और कलकत्ता से इस फ्लाइट में सवार थे. मैं गुवाहाटी पहुंचा और वहां से उनके साथ विमान में सवार हुआ. हम दोनों उसी खबर के कारण हमले के उस स्थान, उखरुल जाने वाले हाईवे पर स्थित नामथिलोक की ओर जा रहे थे. उदास जनरल का मन बहलाने की कोशिश में मैंने हमदर्दी जताई और मौतों को लेकर नाखुशी ज़ाहिर की.
वैद्य ने बिल्कुल भावहीन मुद्रा में जवाब दिया था : “आप हमलोगों के पेशे को नहीं समझ पाएंगे. लोग मारे जाते हैं और कभी-कभी उनके शव भी नहीं मिलते. दूसरे विश्वयुद्ध में उन्हीं जंगलों और पहाड़ों में हजारों शव नहीं पाए जा सके, शायद सियारों ने उन्हें खा लिया. जो कमजोर दिल वाले हैं वे सैनिक नहीं बन सकते.”
बाद में, भारत के सेना के आधुनिकीकरण पर ‘इंडिया टुडे’ (15 नवंबर 1985 अंक) के लिए मैंने जो कवर स्टोरी लिखी उसमें वैद्य समेत तीनों सेनाध्यक्षों से बातचीत भी प्रकाशित की गई. वैद्य के साथ बातचीत की दो बातें याद हैं. एक बात तो अपने देशवासियों का सामना करने की दुविधा को लेकर थी. उनका मत स्पष्ट था : “अपने देश की वैध रूप से निर्वाचित सरकार के खिलाफ जो भी हथियार उठाएगा उसे देशद्रोही कहा जाएगा. दुश्मन की हमारी यही परिभाषा है.”
ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद पलायनों के बारे में उन्होंने कहा : “यह कुछ मामलों में राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर जातीय निष्ठा हावी होने का मामला था. मत भूलिए कि मेरे मातहत 75 मुख्यतः सिख यूनिटें हैं, जिनमें से केवल 8 में गड़बड़ हुई…वह भी उन यूनिटों में जिनमें प्रोपगंडा तथा उकसावा ज्यादा था और कमांड कमजोर था.”
वैद्य को कई बार चेतावनी दी गई थी कि उनकी जान को खतरा है. उनका दार्शनिक जवाब था : “मैं दो लड़ाइयां लड़ा और बेदाग बच आया, अगर किसी बुलेट पर मेरा नाम लिखा है तो वह मुझे खोज ही लेगा.” 10 अगस्त 1986 को यही हुआ. क्या हमारी ‘सिस्टम’ ने उनके हत्यारों का काम आसान किया और वैद्य का साथ नहीं दिया? और क्या उसने उनके सर्वोच्च बलिदान की 40वीं बरसी पर इसका कोई संज्ञान न लेकर फिर उनका साथ नहीं दिया? क्या अपने सभी पूर्व सैनिकों, महान युद्धवीरों को इसी तरह भुला देना चाहिए जिस तरह वैद्य को भुला दिया गया? यह सवाल एक संस्था के रूप में सेना के लिए भी है.
पुनश्च: मैकआर्थर ने जिस वाक्य को अमर बना दिया वह मूलतः प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सेना के फौजी तराने से लिया गया था. इसमें निराशावादी उपहास का स्वर मिला हुआ है. मानो सैनिक यह कह रहा हो कि हमारे जाने के बाद भला हमें कौन याद करता है! लेकिन वैद्य के साथ तो ऐसा कतई नहीं होना चाहिए.
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