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Saturday, 20 June, 2026
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शिंदे का ‘ऑपरेशन टाइगर’ सिर्फ उद्धव से टकराव नहीं, दो मोर्चों पर लड़ाई है

पिछले डेढ़ साल से शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना, सेना (यूबीटी) के सांसदों से संपर्क साधने की कोशिश कर रही है. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में हुई टूट के बाद ‘ऑपरेशन टाइगर’ ने रफ्तार पकड़ ली.

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मुंबई: अपने 60वें स्थापना दिवस पर शिवसेना चार साल से भी कम समय में दूसरी बार टूट की कगार पर खड़ी है. उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट के कम से कम छह सांसदों के आने वाले दिनों में पार्टी छोड़कर एकनाथ शिंदे का साथ देने की संभावना है.

अगर यह दूसरी टूट होती है, तो इससे उद्धव ठाकरे के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े हो जाएंगे और जून 2022 में पहली टूट कराने वाले महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को बड़ा राजनीतिक फायदा मिलेगा. इससे न केवल भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में बल्कि राज्य की राजनीति में भी शिंदे की स्थिति मजबूत होगी.

दिप्रिंट से बात करने वाले विश्लेषकों का मानना है कि शिवसेना (यूबीटी) में होने वाली इस संभावित टूट की वजह उद्धव की नेतृत्व शैली, आदित्य ठाकरे की मुंबई से बाहर सीमित पहुंच और कांग्रेस व भाजपा के बीच पार्टी की कभी नरम तो कभी सख्त रुख अपनाने की रणनीति है.

दूसरी ओर, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के साथ शिंदे की नजदीकी और राज्य की राजनीति में बढ़ता कद उनकी पार्टी को स्थानीय नेताओं के लिए ज्यादा उम्मीद वाली पसंद बना रहा है.

राजनीतिक विश्लेषक संजय पाटिल ने कहा, “इसके बाद राज्य और केंद्र दोनों जगह एकनाथ शिंदे की राजनीतिक ताकत और मोलभाव करने की क्षमता बढ़ जाएगी.”

उन्होंने आगे कहा, “वहीं उद्धव ठाकरे के लिए यह बहुत मुश्किल स्थिति है. खासकर स्थानीय निकाय चुनावों के बाद, जहां सेना (यूबीटी) को मुंबई के बाहर ज्यादा सफलता नहीं मिली. इसलिए संगठनात्मक स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल पहले से ही नीचे है.”

राजनीतिक विश्लेषक जयदेव डोले ने दिप्रिंट से कहा कि शिंदे एक मजबूत मराठा नेता के रूप में भी उभर सकते हैं और अब शिवसेना (यूबीटी) की वापसी मुश्किल दिखाई देती है.

शिंदे की बढ़ती अहमियत

जब शिवसेना (यूबीटी) ने गुरुवार को व्हिप जारी कर अपने सांसदों की बैठक बुलाई, तो उसमें केवल 1 राज्यसभा सांसद और 3 लोकसभा सांसद ही पहुंचे. बाकी 6 लोकसभा सांसदों की गैरमौजूदगी ने लगभग यह साफ कर दिया कि वे शिंदे की शिवसेना के साथ जाने वाले हैं.

हालांकि, शिवसेना नेताओं ने इसकी जानकारी सार्वजनिक किए बिना दिप्रिंट को बताया कि इस संबंध में एक पत्र लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपा गया है और इन 6 सांसदों को शामिल करने की प्रक्रिया अभी रुकी हुई है. नाम न छापने की शर्त पर एक शिवसेना नेता ने कहा, “कुछ तकनीकी और कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जानी हैं और उसके बाद इन्हें शामिल किया जाएगा.”

अगर यह विलय हो जाता है, तो शिंदे की शिवसेना महाराष्ट्र से 13 सांसदों के साथ सत्तारूढ़ महायुति की सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी. इसके बाद भाजपा के 9 सांसद होंगे.

शिवसेना सांसद नरेश म्हास्के ने कहा, “हां, इससे महायुति और राज्य की राजनीति में हमारी स्थिति निश्चित रूप से मजबूत होगी.”

उन्होंने आगे कहा, “इससे हमें अपनी पार्टी का विस्तार करने में मदद मिलेगी. इन छह क्षेत्रों में अब हमारी ताकत बढ़ेगी, जिसका फायदा हमें 2029 के चुनावों में भी मिलेगा.”

पिछले डेढ़ साल से शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना, सेना (यूबीटी) के सांसदों से संपर्क साधने की कोशिश कर रही है. पार्टी नेता इसे शिंदे का ‘ऑपरेशन टाइगर’ कहते हैं. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में हुई टूट के बाद इस अभियान ने तेजी पकड़ ली.

उक्त उद्धृत किए गए नेता ने कहा, “हमें पता था कि उनके नेता उद्धव ठाकरे से खुश नहीं थे. हमने सिर्फ उनकी बातें सुनीं, वहां नेतृत्व की कमी थी. हम सभी शिंदे के नेतृत्व पर विश्वास करते हैं और उन पर भरोसा रखते हैं. यूबीटी के लोगों को यह सोचना चाहिए कि उनके इतने नेता बार-बार उन्हें छोड़कर क्यों जा रहे हैं.”

लेकिन संजय पाटिल के अनुसार, यह मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री शिंदे के बीच चल रही राजनीतिक खींचतान का एक और कदम है. उनका कहना है कि अधिक सांसदों के साथ शिंदे की महायुति के भीतर मोलभाव करने की ताकत और बढ़ जाएगी.

पाटिल ने कहा, “मेरी नज़र में यह लड़ाई उद्धव ठाकरे से ज्यादा एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस के बीच है. टीएमसी के बागी नेताओं के एनडीए में आने के बाद शिंदे के लिए एनडीए के भीतर अपनी अहमियत बनाए रखना जरूरी हो गया था. यह बड़ी राजनीति का हिस्सा है, राज्य में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई है.”

उन्होंने आगे कहा, “यह राज्य भाजपा के लिए अच्छा संकेत नहीं है. असल में यह दो मोर्चों पर चल रही लड़ाई है.”

लेकिन एकनाथ शिंदे के लिए सबसे बड़ा फायदा यह है कि ग्रामीण महाराष्ट्र, खासकर मराठवाड़ा में उनकी पार्टी का प्रभाव बढ़ रहा है, जहां अविभाजित शिवसेना की परंपरागत रूप से मजबूत पकड़ रही है. मराठवाड़ा से सेना (यूबीटी) के तीन सांसद—हिंगोली, धाराशिव और परभणी, के मामले में इसे उनकी उस नाराजगी को दूर करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है कि सत्तारूढ़ भाजपा उन्हें क्षेत्र में काम नहीं करने दे रही थी.

मराठवाड़ा की राजनीति पर करीबी नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक जयदेव डोले ने कहा, “अजित पवार के बाद शिंदे राज्य में सबसे बड़ा मराठा चेहरा हैं. सहकारी क्षेत्र के हितों की रक्षा करने वाला कोई दूसरा बड़ा नेता नहीं है और भाजपा को ओबीसी वर्ग की ओर झुकाव रखने वाली पार्टी माना जाता है.”

डोले ने आगे कहा, “इसी वजह से मराठा नेता भी शिंदे के पीछे एकजुट हो रहे हैं और इससे शिंदे को फायदा मिल रहा है. वह मराठी युवा नेताओं, ठेकेदारों, नौकरशाहों आदि को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.”

उद्धव की गिरती पकड़

मातोश्री के करीबी एक वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट को बताया कि करीब एक साल पहले जब उद्धव ठाकरे इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली आए थे, तब यही सेना (यूबीटी) के सांसद उनके साथ तस्वीर खिंचवाने तक में हिचकिचा रहे थे.

नेता ने कहा, “वे सार्वजनिक रूप से साथ दिखने से बचते थे, लेकिन निजी तौर पर सभी बहुत मधुर व्यवहार करते थे और हमारे प्रति अपनी वफादारी जताते थे.”

फिर पिछले हफ्ते वही 6 सांसद, जिन्होंने कथित तौर पर निजी तौर पर उद्धव का साथ देने की कसम खाई थी, उन्हें छोड़कर चले गए.

पहले उद्धृत किए गए सेना (यूबीटी) नेता ने खुलासा किया कि 14 जून को हुई बैठक में ये सभी 6 सांसद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मौजूद थे, जबकि संजय दीना पाटिल व्यक्तिगत रूप से बैठक में शामिल हुए थे.

नेता ने कहा, “उस समय उन्होंने पार्टी न छोड़ने का वादा किया था. हालांकि हमें संजय जाधव और नागेश अष्टीकर को लेकर कुछ अंदेशा था क्योंकि उन्हें हमारे जिला स्तर के कार्यकर्ताओं से शिकायत थी और वे लगातार उन्हें बदलने की मांग कर रहे थे, लेकिन दीना पाटिल का जाना चौंकाने वाला है, क्योंकि इस महीने हुई सभी बैठकों में वे मौजूद रहे थे.”

सभी संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि उद्धव ठाकरे के लिए एक बार फिर पार्टी को खड़ा करना आसान नहीं होगा.

राजनीतिक विश्लेषकों का भी कहना है कि इस चुनौतीपूर्ण और बदलते माहौल में पार्टी कार्यकर्ता भी अपने भविष्य के बारे में सोचने लगेंगे, क्योंकि संगठन को मजबूत बनाने की ज़रूरत है और ठाकरे परिवार इसमें सफल नहीं रहा है.

हालांकि, सेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने दिप्रिंट से कहा, “इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. हम पहले भी ऐसे कई विद्रोह देख चुके हैं और पार्टी का काम खुद को फिर से खड़ा करना होता है. हम यह करेंगे.”

ठाकरे परिवार पर लगने वाले आरोपों में से एक यह भी है कि उन्होंने पहली टूट के बाद पार्टी को दोबारा मजबूत करने के लिए जनता और कार्यकर्ताओं से पर्याप्त फीडबैक नहीं लिया.

डोले ने कहा कि 2022 में शुरुआती महीनों के दौरान आदित्य ठाकरे ने राज्यव्यापी यात्रा निकाली थी, लेकिन उसके बाद वे भी शांत हो गए.

उन्होंने कहा, “अगर उद्धव ठाकरे स्वास्थ्य कारणों से अपने निर्वाचन क्षेत्रों में नहीं जा सकते थे, तो कम से कम आदित्य को जाना चाहिए था. लेकिन वे भी इसमें विफल रहे.”

दिप्रिंट ने टिप्पणी के लिए आदित्य ठाकरे से फोन और संदेश के जरिए संपर्क किया, लेकिन खबर प्रकाशित होने तक उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला था.

हालांकि, शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं ने इस आकलन से असहमति जताई.

एक अन्य वरिष्ठ सेना (यूबीटी) नेता ने कहा, “फिलहाल कोई चुनाव नहीं है. 2024 के चुनाव के दौरान क्या उद्धव ठाकरे ने महाविकास अघाड़ी के नेताओं के साथ अपने-अपने क्षेत्रों में रैलियां नहीं की थीं? उन्होंने एक बार नहीं, दो बार ऐसा किया था. और क्या किया जाना चाहिए? उन्हें टिकट दिए जाते हैं, उनके परिवारों को भी अलग-अलग चुनावों में टिकट दिए जाते हैं. ये सिर्फ बहाने हैं. सांसद जाना चाहते थे, इसलिए चले गए.”

सेना (यूबीटी) छोड़ने वाले नेताओं की एक और दलील यह है कि पार्टी की वैचारिक स्थिति को लेकर स्पष्टता की कमी है. कार्यकर्ता इस बात को लेकर उलझन में थे कि ठाकरे हिंदुत्व के साथ हैं या धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ.

हालांकि, उद्धव ठाकरे कई बार कह चुके हैं कि उनकी पार्टी का हिंदुत्व भाजपा के हिंदुत्व से अलग है और उनकी पार्टी धर्म की परवाह किए बिना देश के साथ खड़े हर व्यक्ति का स्वागत करती है.

लेकिन 2024 में देवेंद्र फडणवीस के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद, गढ़चिरौली में उनके काम की शिवसेना (यूबीटी) द्वारा प्रशंसा, पार्टी विधायक मिलिंद नार्वेकर के फडणवीस और बाद में डीजीपी रश्मि शुक्ला को बधाई देने वाले पोस्ट, तथा आदित्य ठाकरे का फडणवीस के करीबी सहयोगी मोहित कंबोज की बेटी के जन्मदिन पर जाना—इन सबने कई सवाल खड़े कर दिए.

राउत ने दिप्रिंट से कहा, “यह सब भाजपा नेतृत्व के आशीर्वाद से हो रहा है. हम उनके खिलाफ लड़ रहे हैं. हमारी विचारधारा स्पष्ट है, हमारा हिंदुत्व स्पष्ट है. जिस दिन हमारी पार्टी फिर से भाजपा के साथ जाएगी, मैं राजनीति छोड़ दूंगा.”

पाटिल ने कहा कि जो लोग अभी ठाकरे के साथ हैं, वे अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसी स्थिति बनाई जा रही है जहां उन्हें पर्याप्त फंड नहीं मिल रहे हैं और उनका राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा हुआ है.

पाटिल ने कहा, “इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि जो लोग आज उनके साथ हैं, वे भविष्य में भी उद्धव के साथ रहेंगे या नहीं. इसका असर नीचे कार्यकर्ता स्तर तक भी देखने को मिल सकता है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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