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Friday, 19 June, 2026
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शिवसेना केस में SC का फैसला TMC बागियों के लिए परेशानी बन सकता है—दल-बदल से अयोग्यता तक का जोखिम

TMC के बागी गुट अलग-अलग रास्ते पर चल पड़े हैं; लोकसभा सांसदों ने NCPI में विलय करने का इरादा जताया है, जबकि बंगाल के स्पीकर ने पार्टी से निकाले गए TMC नेता ऋतब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता (LoP) मान्यता दी है.

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नई दिल्ली: महाराष्ट्र में 2022 से शिवसेना के मामले में जो कुछ हुआ था, उसकी तुलना अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में चल रही घटनाओं से की जा रही है. लेकिन दिप्रिंट से बात करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों स्थितियां अलग हैं और इसलिए इनके नतीजे भी अलग हो सकते हैं.

2023 में शिवसेना मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखने से यह भी संकेत मिलता है कि टीएमसी का मामला आगे कैसे बढ़ सकता है. कोर्ट ने कहा था कि अयोग्यता (डिस्क्वालिफिकेशन) की कार्यवाही में “पार्टी में विभाजन” कोई बचाव नहीं है और यह सिर्फ “संख्याओं का खेल” नहीं है. साथ ही चुनाव आयोग यह तय करने के लिए कि असली पार्टी कौन है, कई अन्य कसौटियों का इस्तेमाल कर सकता है. यह फैसला अब बागी तृणमूल सांसदों और विधायकों के लिए मुश्किल पैदा करता दिख रहा है और दल-बदल विरोधी कानून से बचने की उनकी कोशिशों पर इसका असर पड़ सकता है.

शिवसेना और टीएमसी के मामलों की तुलना करने के लिए पहले महाराष्ट्र में क्या हुआ था, उसे देखते हैं.

जून 2022 में शिवसेना के विधायकों ने बगावत कर दी थी. उनके खिलाफ अयोग्यता याचिका दायर की गई और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नोटिस का जवाब देने के लिए 15 दिन का समय दिया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक दिन बाद तत्कालीन विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल को पत्र लिखकर कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पास विधानसभा में बहुमत नहीं है.

राज्यपाल ने उसी दिन उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया और मुख्यमंत्री को 30 जून को फ्लोर टेस्ट का सामना करने का निर्देश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और कोर्ट के आदेश के कुछ मिनट बाद ही ठाकरे ने इस्तीफा दे दिया.

30 जून 2022 को एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और 19 दिन बाद उन्होंने चुनाव आयोग के पास जाकर पार्टी के “धनुष-बाण” चुनाव चिन्ह की मांग की.

फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने यह चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को दे दिया और विधानसभा अध्यक्ष ने दोनों गुटों के 30-30 शिवसेना विधायकों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाएं भी खारिज कर दीं.

इन दोनों आदेशों को चुनौती देने वाली अपीलें फिलहाल सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट में अलग-अलग मामलों के रूप में लंबित हैं.

टीएमसी के मामले में बागी गुट अलग-अलग रास्ते पर चलते दिखाई दे रहे हैं. लोकसभा सांसदों ने कम चर्चित नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की इच्छा जताई है, जबकि पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष ने निष्कासित टीएमसी नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता मान्यता दे दी है. बनर्जी ने दावा किया था कि उन्हें पश्चिम बंगाल विधानसभा के 80 में से 58 टीएमसी विधायकों का समर्थन प्राप्त है. कलकत्ता हाई कोर्ट ने भी विपक्ष के नेता के रूप में उनकी नियुक्ति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है.

दोनों मामलों के बीच एक बड़ा अंतर यह है कि शिवसेना के मामले में कोई विलय नहीं हुआ था, जबकि टीएमसी में बागी गुट अलग-अलग रास्ते अपना रहे हैं, न कि एक संयुक्त रणनीति.

हालांकि, पार्टी के चुनाव चिन्ह पर दावा करने या बगावत से जुड़े अयोग्यता मामलों में 2023 का सुप्रीम कोर्ट का पांच-न्यायाधीशों वाला फैसला टीएमसी पर भी लागू हो सकता है.

इस फैसले में कहा गया था कि केवल “विधायी बहुमत” के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि असली पार्टी कौन है. चुनाव आयोग को यह तय करने के लिए अन्य कसौटियों का भी इस्तेमाल करना होगा कि पार्टी का चुनाव चिन्ह किसे मिलना चाहिए.

कोर्ट ने कहा था कि शिवसेना जैसे मामलों में यह देखना कि विधानसभा में किसके पास बहुमत है, पर्याप्त नहीं है. अन्य कसौटियों में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बहुमत का मूल्यांकन, पार्टी संविधान का विश्लेषण या कोई अन्य उपयुक्त परीक्षण शामिल हो सकता है.

अयोग्यता की कार्यवाही में भी कोर्ट ने कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष केवल विधायी बहुमत के आधार पर फैसला नहीं कर सकते.

संगठनात्मक रूप से लोकसभा और विधानसभा के बाहर ममता बनर्जी अब भी पार्टी पर नियंत्रण रखती दिखाई देती हैं.

इसलिए यह फैसला उनके पक्ष में जा सकता है.

‘यह सिर्फ संख्या का खेल नहीं’

संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून के अनुसार, अगर कोई सदस्य स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करता है, तो उसे दल-बदल माना जा सकता है.

ऐसे मामलों में सदस्य को अयोग्य ठहराया जा सकता है.

इस अयोग्यता से बचने के पांच आधार हैं, जिनमें एक राजनीतिक दल का किसी दूसरे दल में विलय भी शामिल है. 2004 से पहले एक और बचाव उपलब्ध था. यदि कम से कम एक-तिहाई विधायक अलग होकर नया गुट बना लेते थे, तो इसे पार्टी में विभाजन माना जाता था.

ऐसी स्थिति में न तो अलग होने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जाते थे और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य.

लेकिन 2004 में हुए संशोधन के बाद “विभाजन” वाले बचाव को हटा दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना फैसले में कहा था कि दसवीं अनुसूची से “विभाजन” वाला बचाव हटने के बाद अब अयोग्यता का सामना कर रहे सदस्य इसका सहारा नहीं ले सकते.

कोर्ट ने कहा कि अयोग्यता मामलों में विधानसभा अध्यक्ष को कभी-कभी यह तय करना पड़ सकता है कि “असली पार्टी” कौन है, जब पार्टी दो या अधिक गुटों में बंट जाती है.

यह जानना जरूरी होता है कि कौन सा गुट वास्तविक राजनीतिक दल है, ताकि यह तय किया जा सके कि किसने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ी और कौन अयोग्यता का सामना करेगा.

लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अध्यक्ष यह फैसला केवल इस आधार पर नहीं कर सकते कि विधानसभा में किस गुट के पास ज्यादा विधायक हैं.

कोर्ट ने कहा, “यह सिर्फ संख्या का खेल नहीं है, बल्कि इससे कहीं अधिक है. विधानसभा के बाहर पार्टी नेतृत्व की संरचना भी इस मुद्दे को तय करने में अहम है.”

ऋतब्रत बनर्जी लगातार दावा करते रहे हैं कि उनके पास तृणमूल के चुनाव चिन्ह पर चुने गए दो-तिहाई से अधिक विधायकों का समर्थन है. लेकिन यदि अयोग्यता की कार्यवाही होती है, तो कोर्ट की ये टिप्पणियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.

TMC सांसदों का विलय मामला बिगाड़ सकता है

इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968 का पैरा 15 चुनाव आयोग को मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजित गुटों या प्रतिद्वंद्वी समूहों के मामलों में अधिकार देता है.

पैरा 15 के अनुसार, यदि चुनाव आयोग को लगता है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के दो या अधिक गुट खुद को असली पार्टी बता रहे हैं, तो आयोग यह तय कर सकता है कि उनमें से कौन सा गुट वास्तविक पार्टी है या फिर कोई भी नहीं है.

आयोग यह फैसला मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और संबंधित पक्षों की बात सुनने के बाद कर सकता है.

चुनाव आयोग का फैसला सभी प्रतिद्वंद्वी गुटों पर बाध्यकारी होगा.

यह तय करने के लिए कि चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा, चुनाव आयोग को यह तय करना पड़ता है कि असली राजनीतिक दल कौन है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे मामलों में चुनाव आयोग का फैसला मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल की “जीवनरेखा” जैसा होता है.

सादिक अली बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे विवादों के समाधान के लिए तीन परीक्षणों पर विचार किया था.

पहला, पार्टी संविधान के प्रावधानों का विश्लेषण.

दूसरा, कौन सा गुट पार्टी के उद्देश्यों और सिद्धांतों का पालन कर रहा है.

तीसरा, किस गुट के पास संसद, राज्य विधानसभाओं और पार्टी संगठन में बहुमत है.

सादिक अली मामले में कोर्ट ने बहुमत वाले परीक्षण का उपयोग किया था. लेकिन शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैरा 15 के विवादों को तय करने के लिए यह न तो एकमात्र और न ही सबसे महत्वपूर्ण कसौटी है.

चुनाव आयोग किसी विशेष विवाद के अनुसार उपयुक्त परीक्षण अपना सकता है.

टीएमसी के मामले में बागी विधायक शिवसेना जैसी स्थिति दोहराने के लिए चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटा सकते हैं. लेकिन ऐसा करने पर उन्हें यह भी दिखाना होगा कि उनके पास तृणमूल के विधायी और संगठनात्मक दोनों ढांचे में बहुमत का समर्थन है.

अपने पक्ष में वे कम से कम लोकसभा में ऐसा बहुमत नहीं दिखा पाएंगे, क्योंकि 20 सांसद लोकसभा अध्यक्ष को लिखकर बता चुके हैं कि वे किसी दूसरे दल में विलय कर रहे हैं.

‘कोई तालमेल नहीं, बहुत भ्रम’

विशेषज्ञों का कहना है कि अपने विलय के दावे के साथ तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने पार्टी के स्वामित्व के दावे से लगभग खुद को अलग कर लिया है.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एम. बी. लोकुर ने इसे एक “बहुत अजीब स्थिति” कहा. उन्होंने द प्रिंट से कहा, “यह संवैधानिक नैतिकता के पूरी तरह खिलाफ है और सम्मान के साथ कहूं तो काफी अजीब है.”

पूर्व लोकसभा महासचिव पी. डी. टी. आचार्य ने कहा कि सांसद अब उस गुट का हिस्सा होने का दावा नहीं कर सकते जो टीएमसी के चुनाव चिन्ह पर दावा कर रहा है. उन्होंने कहा, “एक बार वे किसी अन्य पार्टी में विलय कर लेते हैं, तो वे उस पार्टी के सदस्य माने जाते हैं. इसलिए वे यह नहीं कह सकते कि हम असली तृणमूल हैं और हमें पार्टी का चिन्ह मिलना चाहिए.”

उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि विधायक अब भी चुनाव आयोग के पास जाकर टीएमसी के स्वामित्व का दावा कर सकते हैं, अगर उन्हें यकीन है कि पार्टी टूट गई है और उनके पास बहुमत है. “लेकिन उन्हें यह दिखाना होगा कि उनके पास पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में भी बहुमत है, सिर्फ सांसदों या विधायकों की संख्या नहीं. इसमें पार्टी का पूरा ढांचा शामिल है, शीर्ष से लेकर बूथ स्तर तक.”

उन्होंने इसे “वाकई अजीब” कहा कि सांसदों ने किसी अन्य पार्टी में विलय करने का फैसला किया है, जबकि विधायक अलग तरह से व्यवहार कर रहे हैं. “यहां कोई तालमेल नहीं है और बहुत भ्रम है,” उन्होंने कहा.

विद्वान स्वप्निल त्रिपाठी, जो विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में चर्खा (सेंटर फॉर कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ) के प्रमुख हैं, ने भी कहा कि टीएमसी का मामला शिवसेना वाले मामले से काफी अलग है, क्योंकि वहां कोई विलय का दावा नहीं था.

उन्होंने समझाया, “हालांकि मौजूदा न्यायिक स्थिति यह देखती है कि किस गुट को ‘असली पार्टी’ माना जाए, इसमें विधायी ताकत एक कारक होती है, लेकिन यह तरीका यहां सीधे लागू नहीं हो सकता. एक बार सांसदों का विलय हो जाने पर वे प्रभावी रूप से टीएमसी के सदस्य नहीं रहते, इसलिए उन्हें बागी गुट के ‘असली टीएमसी’ होने के दावे के समर्थन में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.”

उन्होंने कहा कि शिवसेना वाला रास्ता विधानसभा में चल सकता है, जहां बागी विधायक यह तर्क दे सकते हैं कि वही असली टीएमसी हैं. लेकिन अगर वे उन सांसदों की विधायी ताकत पर भरोसा करना चाहें जो NCPI में विलय कर चुके हैं, तो एक अतिरिक्त जटिलता पैदा हो सकती है, क्योंकि इस विलय को “कानून के दुरुपयोग” के रूप में भी देखा जा सकता है.

उन्होंने कहा, “यह तर्क दिया जा सकता है कि विलय अपवाद का इस्तेमाल केवल अयोग्यता से बचने के लिए किया गया, न कि वास्तविक राजनीतिक पुनर्गठन के लिए. इससे पूरा विलय संवैधानिक रूप से संदिग्ध हो सकता है.”

सांसदों का भविष्य

हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर बंटे हुए हैं कि टीएमसी के सांसद, जिन्होंने विलय की घोषणा की है, क्या अयोग्यता से बच पाएंगे या नहीं.

जस्टिस लोकुर ने कहा कि सांसदों के पास अयोग्य ठहराए जाने का “बहुत अच्छा मौका” है.

उन्होंने समझाया कि दल-बदल कानून के लिए दो शर्तें पूरी होना जरूरी है. पहली, राजनीतिक पार्टी का किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय होना. दूसरी, उस पार्टी के कम से कम दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य इस विलय के लिए सहमत हों.

टीएमसी के मामले में उन्होंने कहा कि दूसरी शर्त पूरी हो गई है, लेकिन पहली नहीं. “इसलिए विलय पूरा नहीं हुआ है और दल-बदल कानून लागू होगा,” उन्होंने द प्रिंट से कहा.

लोकुर ने एनसीपीआई को लेकर एक अहम सवाल भी उठाया. उन्होंने कहा कि दल-बदल कानून यह स्पष्ट नहीं करता कि एनसीपीआई के पास अपने कोई निर्वाचित सदस्य होने चाहिए या नहीं.

उन्होंने कहा, “वरना 20 सांसद शून्य सांसदों वाली पार्टी में विलय कर रहे हैं. यह किस तरह का विलय है? इसके अलावा दल-बदल कानून में ‘मान्यता प्राप्त’ राजनीतिक पार्टी शब्द का उपयोग नहीं है. इसलिए तकनीकी रूप से एक अकेला निर्वाचित सांसद भी एक पार्टी बना सकता है और अन्य 20 सांसदों को उसमें शामिल करवा सकता है ताकि विलय की शर्त पूरी हो जाए.”

उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि दल-बदल कानून में सुधार की जरूरत है.

हालांकि, स्वप्निल त्रिपाठी ने दिप्रिंट से कहा कि दसवीं अनुसूची की सख्त व्याख्या के अनुसार यह विलय वैध माना जा सकता है.

उन्होंने बताया कि दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 4(1) ‘मूल राजनीतिक पार्टी’ और ‘दूसरी राजनीतिक पार्टी’ के बीच विलय को अयोग्यता से बचाव के रूप में मान्यता देता है. लेकिन पैराग्राफ 4(2) कहता है कि ऐसा विलय तभी माना जाएगा जब कम से कम दो-तिहाई विधायक सहमत हों.

उन्होंने कहा कि इस बात पर बहस है कि क्या 4(1) और 4(2) को साथ पढ़ना चाहिए या अलग, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट और पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले कहते हैं कि अगर दो-तिहाई की शर्त पूरी हो जाती है तो विलय मान लिया जाता है.

उन्होंने यह भी कहा कि दसवीं अनुसूची यह नहीं बताती कि जिस पार्टी में विलय हो रहा है उसकी कोई विशेष स्थिति होनी चाहिए. उसमें केवल “दूसरी राजनीतिक पार्टी” कहा गया है.

इसलिए यह तथ्य कि नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया एक रजिस्टर्ड अनरिसीव्ड पॉलिटिकल पार्टी (RUPP) है और उसके पास फिलहाल कोई सांसद या विधायक नहीं है, अपने आप में विलय को अमान्य नहीं बनाता. अगर वह एक राजनीतिक पार्टी के रूप में योग्य है, तो पैराग्राफ 4 की शर्तें पूरी हो सकती हैं.

TMC में विपक्ष के नेता का सवाल

2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया था कि सदन में व्हिप और पार्टी के नेता की नियुक्ति “राजनीतिक पार्टी” करती है, न कि केवल विधायी दल.

टीएमसी के मामले में यह मुद्दा पहले से ही कलकत्ता हाई कोर्ट में चल रहा है.

इस महीने की शुरुआत में पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष ने निष्कासित टीएमसी नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता मान्यता दी. बनर्जी ने अध्यक्ष रथिंद्र बोस को पत्र लिखकर दावा किया था कि उन्हें 80 में से 58 टीएमसी विधायकों का समर्थन प्राप्त है. यह घटनाक्रम तब हुआ जब टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर को पत्र लिखकर सोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता मान्यता देने की मांग की थी, “परंपरा और प्रक्रिया” का हवाला देते हुए.

स्पीकर के साथ बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऋतब्रत ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई से अधिक विधायकों ने अपना दावा प्रस्तुत किया है और इसे स्वीकार कर लिया गया है.

स्पीकर के इस फैसले को चट्टोपाध्याय ने हाई कोर्ट में चुनौती दी है.

फिलहाल कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस नियुक्ति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है. कोर्ट ने बंगाल विधान सभा (सदस्यों के वेतन) अधिनियम 1937 की धारा 3 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि विपक्ष का नेता वह सदस्य होता है जो उस समय सदन में विपक्षी दल का नेता हो और जिसके पास सबसे ज्यादा संख्या बल हो.

इसी व्याख्या के आधार पर कोर्ट ने कहा कि बागी गुट के 58 सदस्यों ने एक साथ दावा पेश कर और स्पीकर के सामने उपस्थित होकर सबसे बड़ा संख्यात्मक बल हासिल किया है.

शिवसेना के पक्ष में क्या गया

शिवसेना का चुनाव चिन्ह देने का चुनाव आयोग का आदेश सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले से तीन महीने पहले आया था.

चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना मानते हुए ‘बहुमत परीक्षण’ का इस्तेमाल किया था. इसमें देखा गया कि किस गुट के पास विधायी और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर बहुमत है. संगठनात्मक ढांचा पार्टी के कुल सदस्यों का पूरा ढांचा होता है.

चुनाव आयोग ने पार्टी संविधान के परीक्षण को लागू नहीं किया, क्योंकि शिंदे गुट ने कहा था कि 2018 में संशोधित शिवसेना का संविधान “अलोकतांत्रिक” है और आंतरिक लोकतंत्र को कमजोर करता है.

ठाकरे गुट ने कहा था कि केवल विधायी दल में विभाजन हुआ है, पूरी पार्टी में नहीं. लेकिन चुनाव आयोग ने माना कि मान्यता प्राप्त पार्टी के विवाद में केवल विधायी शाखा को अलग से नहीं देखा जा सकता.

शिंदे गुट के पक्ष में सीटों की संख्या और वोट प्रतिशत ने फैसला उनके पक्ष में झुका दिया.

इसी तरह विधानसभा अध्यक्ष ने भी 37 बनाम 55 विधायकों के भारी बहुमत के आधार पर शिंदे गुट को असली शिवसेना माना.

स्पीकर ने कहा था कि 2018 में लाया गया नेतृत्व ढांचा पार्टी संविधान के अनुसार नहीं था, इसलिए उसे असली पार्टी तय करने का आधार नहीं बनाया जा सकता. इसलिए उन्होंने विधायी बहुमत परीक्षण को अपनाया.

हालांकि चुनाव आयोग और स्पीकर दोनों ने अलग-अलग कारणों से पार्टी संविधान को निर्णायक आधार नहीं माना. लेकिन यह साफ नहीं है कि टीएमसी मामले में भी वही तरीका अपनाया जाएगा या नहीं.

इन दोनों आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. ठाकरे गुट ने 2023 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला दिया है. शिंदे गुट ने भी बॉम्बे हाई कोर्ट में स्पीकर के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें 14 शिवसेना (UBT) विधायकों को अयोग्य नहीं ठहराया गया था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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