मुंबई: पिछले महीने बांद्रा के गरीब नगर झुग्गी बस्ती हटाने की कार्रवाई के दूसरे दिन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता किरीट सोमैया घूमकर इलाके का मुआयना कर रहे थे. बुलेटप्रूफ जैकेट पहने और जेड-प्लस सुरक्षा घेरे से घिरे सोमैया कार्रवाई का ज़ायज़ा ले रहे थे. उन्होंने कथित अवैध कब्जों को “बांग्लादेशी” और “लैंड जिहाद माफिया” से जोड़कर बताया.
कुछ दिनों बाद, सोमैया फिर से सड़क पर थे, जिसमें सिक्योरिटी टीम भी शामिल थी. हालांकि, इस बार वह सैटेलाइट टाउन मीरा रोड की एक सोसाइटी से कुर्बानी के बकरे हटा रहे थे. बकरीद की वजह से जानवरों को एक हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में रखा गया था. बीच में कोई रुकावट नहीं है; सोमैया लगातार “गैर-कानूनी बांग्लादेशियों” और “मुसलमानों द्वारा ज़मीन हड़पने” का मुद्दा उठा रहे हैं, और अधिकारियों को सड़कों पर नमाज़ और ‘लव जिहाद’ जैसे दूसरे मुद्दों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए लिख रहे हैं.
यह सोमैया की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है.
पहले वह राजनीतिक भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने के लिए जाने जाते थे. अब वह बीजेपी की हिंदुत्व राजनीति और राष्ट्रवादी एजेंडे का अहम चेहरा बन चुके हैं. बीजेपी के एक पदाधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, “पार्टी को सभी नेताओं की ताकत का पता है और उसी हिसाब से जिम्मेदारियां दी जाती हैं. सोमैया दस्तावेजों और आंकड़ों के साथ काम करने में माहिर हैं और उनके कई खुलासे पहले असरदार साबित हुए हैं.”
राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे का कहना है कि सोमैया का सफर अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के दफ्तरों से निकलकर बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के दफ्तरों तक पहुंच गया है. उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि बीजेपी की रणनीति सोमैया और नीतेश राणे को हिंदुत्व राजनीति का प्रमुख चेहरा बनाने की है. वह सिर्फ मुंबई ही नहीं, पूरे महाराष्ट्र में सक्रिय हैं और इसी वजह से उन्हें बड़ी सुरक्षा भी दी गई है.”
पूर्व सांसद सोमैया ने अपने राजनीतिक जीवन में कई भूमिकाएं निभाई हैं. कभी वह भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वाले नेता रहे, तो कभी ठाकरे परिवार के सबसे बड़े आलोचकों में शामिल रहे. ठाकरे परिवार पर उनके लगातार हमलों का असर यह हुआ कि 2019 के लोकसभा चुनाव में, जब बीजेपी और अविभाजित शिवसेना साथ चुनाव लड़ रहे थे, तब उन्हें टिकट नहीं मिला. अब वह राज्य, खासकर मुंबई में, बीजेपी की सांप्रदायिक और हिंदुत्व राजनीति के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं. हालांकि पार्टी के लिए वह जितने उपयोगी हैं, कभी-कभी उतने ही मुश्किल भी साबित हो सकते हैं.
फिर भी सोमैया लगातार सुर्खियों में बने रहे हैं. उनके चर्चित बयानों में इस साल अप्रैल में मुंबई में कथित “स्कूल जिहाद” का आरोप शामिल है. इसके अलावा, उन्हें युद्धपोत आईएनएस विक्रांत को बचाने के लिए जुटाए गए फंड के कथित दुरुपयोग के आरोपों का भी सामना करना पड़ा था, हालांकि बाद में ये आरोप गलत साबित हुए. वह एक वायरल वीडियो विवाद को लेकर भी चर्चा में रहे. इस वीडियो में सोमैया बिना शर्ट के नज़र आए थे. इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि उस समय के गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी कहा था कि मामले की “गहन जांच” की जाएगी.
राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई ने दिप्रिंट से कहा, “अपने राजनीतिक करियर के शुरुआती दौर में सोमैया ज्यादा सांप्रदायिक नहीं थे. 2014 के बाद भी उन्होंने इस रास्ते को नहीं चुना था और उनका मुख्य फोकस शिवसेना और ठाकरे परिवार पर था. लेकिन अब मजबूत सुरक्षा घेरे के साथ वह ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं जो जोखिम भरे और सांप्रदायिक माने जाते हैं.”
सांप्रदायिक राजनीति का चेहरा
इस हफ्ते की शुरुआत में मुंबई की आरे कॉलोनी में बीएमसी ने एक सूफी दरगाह को तोड़ दिया. इस कार्रवाई का स्वागत करते हुए बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने दावा किया कि, “दरगाह के नाम पर 70,000 वर्ग फुट वन भूमि पर कब्ज़ा किया गया था. 12 महीने की लगातार कोशिशों, 6 दौरों, मंत्रियों और अधिकारियों के साथ 12 बैठकों तथा एक एफआईआर के बाद आखिरकार कल यह ढांचा हटाया गया.”
सोमैया ने कहा कि वह इस साल 9 अप्रैल को भी वहां गए थे और कथित “लैंड जिहाद” में शामिल लोगों के बारे में बात की थी. बुधवार को उन्होंने मुंबई पुलिस आयुक्त और बीएमसी आयुक्त को पत्र लिखकर सड़कों पर नमाज पढ़ने पर रोक लगाने की मांग की. उनका कहना था कि खासकर शुक्रवार को इससे यातायात प्रभावित होता है. सोमैया के पास सरकार या नगर निगम में कोई आधिकारिक पद नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने कथित बांग्लादेशी और रोहिंग्या मूल के फेरीवालों के खिलाफ अभियान चलाया है.
बीजेपी नेता केशव उपाध्याय ने दिप्रिंट से कहा, “वह अकेले काम नहीं कर रहे हैं. पार्टी में हर व्यक्ति की एक तय भूमिका होती है. वह पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और सभी लोग पार्टी के हित में काम करते हैं.” 2024 में महायुति सरकार बनने और बीजेपी को बड़ी जीत मिलने के बाद से सोमैया की भूमिका पार्टी में और ज्यादा दक्षिणपंथी राजनीति की ओर बढ़ गई है. उसी साल लोकसभा चुनाव में महायुति के अपेक्षा से कमजोर प्रदर्शन के बाद सोमैया ने कथित “वोट जिहाद” का मुद्दा उठाया था.
अपने पुराने अंदाज़ में उन्होंने मुस्लिम बहुल इलाकों के वोटों का आंकड़ा पेश किया और दावा किया कि महा विकास अघाड़ी (एमवीए) की जीत इसलिए हुई क्योंकि मुसलमानों ने महायुति के खिलाफ मतदान किया. अपनी बात साबित करने के लिए उन्होंने दक्षिण मुंबई की मुंबादेवी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र का उदाहरण दिया. उन्होंने भेंडी बाजार, चोर बाजार और मोहम्मद अली रोड जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों का नाम लेते हुए कहा कि वहां एमवीए उम्मीदवार को महायुति उम्मीदवार से ज्यादा वोट मिले.
पिछले महीने सोमैया “वंदे मातरम्” विवाद में भी कूद पड़े. उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी के उस बयान का विरोध किया जिसमें ओवैसी ने कहा था कि “वंदे मातरम् कहना देशभक्ति साबित करने का पैमाना नहीं है.” इस पर सोमैया ने कहा, “अगर भारत में रहना है तो वंदे मातरम् कहना होगा.” अप्रैल के आखिर में मुंबई के पास मीरा रोड में एक निर्माण स्थल पर जईब जुबैर अंसारी नाम के व्यक्ति द्वारा सुरक्षा गार्डों पर किए गए हमले के बाद सोमैया ने आरोप लगाया कि कुछ मुस्लिम नेता “नया पाकिस्तान” बनाना चाहते हैं. इसके बाद उन्होंने मुंबई के आसपास के कई स्कूलों की सूची जारी की, जिन्हें उन्होंने अवैध और “मुस्लिम माफिया” द्वारा संचालित बताया. उन्होंने इसे “स्कूल जिहाद” कहा और इन स्कूलों को तोड़ने की मांग की.
महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) शुरू होने से पहले ही सोमैया पूरे राज्य में कथित “अवैध बांग्लादेशी मतदाताओं” के नाम हटाने की मुहिम चला रहे थे. उन्होंने दिप्रिंट से कहा था, “कुछ शहरी और मुख्य रूप से हिंदू बहुल सीटों में मतदाताओं की संख्या लगभग स्थिर रही है, लेकिन मालेगांव, मुंब्रा, मालवणी, मानखुर्द-शिवाजीनगर, सिल्लोड, अकोला और अमरावती जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या 30-40 प्रतिशत तक बढ़ी है, कुछ जगह तो दोगुनी हो गई है.”
इसी आरोप को आगे बढ़ाते हुए सोमैया पिछले कुछ महीनों से राज्य में कथित फर्जी जन्म प्रमाणपत्र घोटाले का मुद्दा भी उठा रहे हैं. उन्हें इसमें भी कथित बांग्लादेशी कनेक्शन नजर आता है और उन्होंने फॉरेंसिक ऑडिट तथा विशेष जांच की मांग की है.
राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे का मानना है कि मुंबई में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए बीजेपी “सांप्रदायिक राजनीति” का सहारा ले रही है. उनके अनुसार बीएमसी में बीजेपी का मेयर और बाहर से किरीट सोमैया जैसे नेता पार्टी के लिए अतिरिक्त फायदा हैं. उन्होंने कहा, “1992 के दंगों के दौरान शिवसेना ने दावा किया था कि उसने हिंदुओं की रक्षा की. अब रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुद्दे को लेकर बीजेपी भी खुद को हिंदुओं का रक्षक दिखाना चाहती है.”
वहीं, बीजेपी नेताओं का मानना है कि सोमैया समाज की समस्याओं को उजागर कर रहे हैं. सोमैया के एक करीबी सहयोगी ने दिप्रिंट से कहा, “उनकी सबसे बड़ी ताकत दस्तावेजों और उपलब्ध जानकारी का समझदारी से इस्तेमाल करना है. जब वह कोई आरोप लगाते हैं तो उसके समर्थन में कागजात भी रखते हैं, जिससे प्रशासन कार्रवाई करता है.”
सहयोगी ने कहा, “लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने आंकड़ों के साथ ‘वोट जिहाद’ की बात उठाई थी. इसी वजह से वह अब उन मामलों को उजागर कर रहे हैं, जहां लोग सांप्रदायिक तरीकों का सहारा ले रहे हैं. उनकी राजनीति सांप्रदायिक नहीं है. वह पार्टी की ओर से अवैध लोगों को बेनकाब करना चाहते हैं.”
अखिल चित्रे ने दिप्रिंट से कहा, “न तो उन्हें केंद्र सरकार ने कोई जिम्मेदारी दी है और न ही वह राज्य सरकार या बीएमसी में किसी आधिकारिक पद पर हैं. तो क्या वह कोई सुपर-संवैधानिक प्राधिकरण हैं? राज्य सरकार इस पर क्या कर रही है? वह कौन होते हैं जो बीएमसी के मेयर और डिप्टी मेयर की बैठकों में बैठते हैं? बीएमसी अधिकारी उनकी बात क्यों सुनते हैं?”
चित्रे ने आगे कहा, “मुझे लगता है कि बीजेपी ने सोमैया जैसे लोगों को समाज में फूट डालने और बेकार की बातें करने के लिए आगे किया है. क्या वह यह सब जानबूझकर कर रहे हैं? मुझे लगता है कि बीजेपी असली मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाकर गैर-जरूरी मुद्दों की तरफ ले जाना चाहती है, इसलिए सोमैया को खुली छूट दी गई है.”
दिप्रिंट से बातचीत में किरीट सोमैया ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई अब भी जारी है, लेकिन अब उनका ध्यान आर्थिक भ्रष्टाचार से हटकर आपराधिक भ्रष्टाचार पर आ गया है.
उन्होंने कहा, “एक तरह से दोनों चीजें समान हैं. 2024 में मैंने मुंबई में ‘वोट जिहाद’ की योजना, सैकड़ों करोड़ रुपये की बेनामी आर्थिक मदद और मुंबई की जनसंख्या संरचना बदलने की कथित कोशिश को उजागर किया था. हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों में जो आक्रामकता है, उसी वजह से ‘वोट जिहाद’ की बात करना जरूरी है और इसी कारण बांग्लादेशियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई.”
उन्होंने आगे कहा, “‘वोट जिहाद’ का इस्तेमाल महाराष्ट्र में कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की सेना और उनके सहयोगी दल कर रहे हैं, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.”
करप्शन के योद्धा
मुंबई यूनिवर्सिटी से बिज़नेस पॉलिसी और एडमिनिस्ट्रेशन में पीएचडी करने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट सोमैया ने अपनी पॉलिटिक्स को फाइनेंशियल फ्रंट पर विरोधी नेताओं की जांच पर फोकस करने के लिए चुना है. पिछले एक दशक से, सोमैया को पॉलिटिकल करप्शन पर नज़र रखने का काम सौंपा गया था. वह स्वर्गीय अजित पवार, सुनील तटकरे, नारायण राणे (जब वह कांग्रेस में थे), कृपाशंकर सिंह और हसन मुश्रीफ को बेनकाब करने पर फोकस कर रहे थे. सोमैया अविभाजित शिवसेना, खासकर ठाकरे परिवार के सबसे कड़े आलोचकों में से एक रहे हैं. वह उद्धव ठाकरे का विरोध करते रहते हैं.
सोमैया ने एक तरह का काम करने का तरीका बना लिया था: सूचना का अधिकार (Right To Information) के तहत रिक्वेस्ट फाइल करना और आरोप साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट इकट्ठा करना, उसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करना, या आजकल की तरह सोशल मीडिया पर वीडियो रिलीज करना. फिर वह अधिकारियों के पास ऑफिशियल शिकायत दर्ज कराते थे.
टारगेट किए गए लोग आखिरकार बीजेपी में शामिल हो गए, और सोमैया का मकसद खत्म हो गया. देशपांडे ने कहा, “लगता है यही उनकी स्ट्रेटेजी थी. सोमैया के आरोपों से बचने का एक ही तरीका था कि किसी तरह बीजेपी में शामिल हो जाएं; यह पार्टी के लिए काम कर गया. वह प्रेशर पॉलिटिक्स में माहिर हैं.”
2024 के चुनावों के दौरान, मीडिया ने अक्सर उनसे पूछा था कि जिन लोगों पर उन्होंने करप्शन का आरोप लगाया था, वे महायुति का हिस्सा कैसे बन गए. सोमैया का हमेशा का जवाब था, एक समझौता हुआ है, उन लोगों को चेतावनी दी गई है कि वे भविष्य में ऐसी चीजें न दोहराएं, और उनके खिलाफ जो भी केस हैं, उन्हें लड़ना होगा.
देसाई ने कहा, “अब जिन लोगों पर सोमैया ने करप्शन का आरोप लगाया है, वे या तो बीजेपी का हिस्सा हैं या उनके सहयोगी हैं. इसीलिए ऐसा लगता है कि पार्टी चाहती है कि वह राइट-विंग पॉलिटिक्स पर फोकस करें, जिसमें रिस्क होता है. लेकिन सोमैया रिस्क लेने वाले हैं.”
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