अब से दो महीने बाद BSP की देश की संसद में कोई मौजूदगी नहीं रहेगी. यह 37 साल में पहली बार होगा. अभी BSP का राज्यसभा में सिर्फ एक सांसद है, रामजी गौतम. उनका कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो जाएगा. लोकसभा में पार्टी का कोई सांसद नहीं है.
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को होने वाले द्विवार्षिक चुनाव में किसी उम्मीदवार को जीतने के लिए विधायकों के 37 पहली पसंद के वोट चाहिए. BSP के पास उत्तर प्रदेश में एक भी MLA नहीं है. विधान परिषद में भी उसका कोई सदस्य नहीं है.
BSP के इकलौते विधायक, बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट से उमाशंकर सिंह का अगस्त में 55 साल की उम्र में निधन हो गया. उनके निधन के बाद 403 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के विधायकों की संख्या शून्य हो गई.
राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी खतरे में
संसद में प्रतिनिधित्व खत्म होने के बाद BSP के राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर भी ध्यान जाएगा. चुनाव आयोग की मौजूदा सूची में BSP अभी भी राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त है.
नियमों के अनुसार, किसी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने के लिए कुछ तय चुनावी शर्तों में से किसी एक को पूरा करना होता है. इनमें से एक शर्त है कि पार्टी को चार या उससे ज्यादा राज्यों में कम से कम 6 प्रतिशत वैध वोट मिलें और लोकसभा की कम से कम चार सीटें जीतें. दूसरी शर्त है कि पार्टी लोकसभा की कम से कम 2 प्रतिशत सीटें जीते और उसके सांसद कम से कम तीन राज्यों से चुने गए हों. इसके अलावा, अगर किसी पार्टी को कम से कम चार राज्यों में राज्य पार्टी के रूप में मान्यता मिली हो, तो भी उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल सकता है.
BSP की स्थापना कांशीराम ने 1984 में की थी और उसे 1997 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था. चुनावों में पहले भी झटके लगने के बावजूद BSP का राष्ट्रीय दर्जा बना रहा, क्योंकि मान्यता की समय-समय पर होने वाली समीक्षा के नियम ऐसे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद, जब पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी, चुनाव आयोग ने 2016 में नियमों में बदलाव किया. इसके तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तर की पार्टी की मान्यता की समीक्षा 10 साल के लिए टाल दी गई. इसके बाद 2019 के चुनावों के बाद भी BSP का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बना रहा.
इसलिए अगले विधानसभा चुनाव, जिनमें 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी शामिल है, पार्टी की राष्ट्रीय पहचान के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
1989 में 4 सीटों से 2024 में 0
BSP पहली बार 1989 में लोकसभा में पहुंची थी. उस समय उत्तर प्रदेश से उसके तीन और पंजाब से उसका एक उम्मीदवार चुनाव जीता था. पार्टी का सबसे अच्छा प्रदर्शन 2009 के लोकसभा चुनाव में रहा. उस चुनाव में BSP ने 21 सीटें जीतीं. इनमें 20 सीटें उत्तर प्रदेश से और एक सीट मध्य प्रदेश से थी. उस समय पार्टी को देशभर में 6.17 प्रतिशत वोट मिले थे.
2014 के चुनाव में BSP की लोकसभा सीटों की संख्या घटकर शून्य हो गई. उस चुनाव में उसे देशभर में 4.19 प्रतिशत वोट मिले. लेकिन 2019 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन से BSP ने वापसी की. उस चुनाव में उसके 10 सांसद लोकसभा पहुंचे. उस साल पार्टी का वोट शेयर 3.66 प्रतिशत था.

2024 में यह गठबंधन दोबारा नहीं हुआ. BSP ने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ा और फिर एक भी सीट नहीं जीत सकी. पार्टी का वोट शेयर भी और गिर गया.
उत्तर प्रदेश में भी पार्टी का प्रदर्शन काफी कमजोर हुआ है. 2012 में BSP ने राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 80 सीटें जीती थीं. उस समय उसका वोट शेयर 25.91 प्रतिशत था. 2017 में उसकी सीटों की संख्या घटकर 19 रह गई, हालांकि उसका वोट शेयर 22.23 प्रतिशत था. 2022 में BSP सिर्फ एक सीट जीत सकी और उसका वोट शेयर घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया.
पिछले करीब डेढ़ दशक में BSP का सफर सीटों और वोट शेयर, दोनों में लगातार गिरावट दिखाता है. इसमें 2019 का SP के साथ गठबंधन एक थोड़े समय का अपवाद रहा.
2014 के लोकसभा चुनाव में BSP ने 503 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीती. उसे 4.19 प्रतिशत वोट मिले थे. 2019 में उसने 383 सीटों पर चुनाव लड़ा, 10 सीटें जीतीं और उसे 3.66 प्रतिशत वोट मिले. 2024 में उसने 488 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन फिर एक भी सीट नहीं जीत सकी. उसका वोट शेयर घटकर 2.06 प्रतिशत रह गया.
उत्तर प्रदेश में गिरावट और भी ज्यादा साफ दिखाई देती है. 2012 में पार्टी के पास 80 विधानसभा सीटें थीं. 2017 में यह संख्या घटकर 19 और 2022 में सिर्फ एक रह गई. उमाशंकर सिंह की मौत के बाद अब राज्य में पार्टी का एक भी विधायक नहीं है.
उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति पर नजर रखने वाले प्रोफेसर कवि राज ने कहा, “पिछले एक दशक में BSP की गिरावट हाल के समय की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में से एक है. एक समय जो पार्टी एक आंदोलन के लिए खड़ी थी, वह अब अपनी मूल पहचान खो रही है. इस आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए यह दुख की बात है. इसकी गिरावट की एक बड़ी वजह यह है कि पार्टी बदलते समय के हिसाब से खुद को नहीं बदल पाई. इसके अलावा, जब चुनाव धीरे-धीरे दो मुख्य पार्टियों या गठबंधनों के बीच मुकाबले में बदलने लगे, तब 2019 के चुनाव को छोड़कर BSP ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. यह रणनीति उसके पक्ष में काम नहीं कर पाई.”
बात सिर्फ चुनावों तक सीमित नहीं है
BSP की गिरावट सिर्फ उसके चुनावी प्रदर्शन तक सीमित नहीं रही है. पार्टी के कई बड़े नेता भी पिछले कुछ सालों में BSP छोड़ चुके हैं. दिप्रिंट ने पहले रिपोर्ट किया था कि मायावती के करीब एक दर्जन पूर्व मंत्री अब समाजवादी पार्टी के साथ हैं. समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक (PDA) फॉर्मूला बहुजन आंदोलन से जुड़े नेताओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है.
इस सूची में नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, सुखदेव राजभर, लालजी वर्मा, इंद्रजीत सरोज, वीर सिंह, दद्दू प्रसाद, राम अचल राजभर, अनीस अहमद खान, बादशाह सिंह, अकबर हुसैन और स्वामी प्रसाद मौर्य शामिल हैं.
BSP के सह-संस्थापक रहे RK चौधरी, जो अब मोहनलालगंज से समाजवादी पार्टी के सांसद हैं, ने कहा कि BSP के कई नेताओं, जिनमें दलित नेता भी शामिल हैं, का SP की ओर जाना मुख्य रूप से PDA फॉर्मूले की वजह से हुआ है.
चौधरी ने दिप्रिंट से कहा, “पहले BSP की राजनीति भी कुछ ऐसी ही सामाजिक एकता पर आधारित थी, जिसमें दलितों, अति पिछड़ी जातियों और मुसलमानों को एक साथ लाने की बात थी. लेकिन अब BSP अपने पुराने रास्ते से हट गई है. कांशीराम के बहुजन मिशन से जुड़े कई नेता अब समाजवादी पार्टी को अपना नया राजनीतिक घर मान रहे हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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