लखनऊ: “हमको न चाहने वाले लोग…आजकल कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हैं” — सोशल मीडिया पर इस रहस्यमयी टिप्पणी के जरिए उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने उन दावों पर नाराज़गी ज़ाहिर की, जिनमें कहा गया कि वह 27 गाड़ियों के काफिले के साथ चलते हैं.
सोशल मीडिया पर एक “फेक रील” वायरल हुई है, जिसमें दावा किया गया कि शर्मा 27 गाड़ियों के काफिले के साथ यात्रा करते हैं. यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोगों से ईंधन की खपत कम करने की अपील कर रहे हैं.
इसके बाद शर्मा ने एक्स पर सफाई देते हुए कहा कि जिला दौरों के दौरान वह सिर्फ तीन गाड़ियों और लखनऊ में दो गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं. उन्होंने कहा कि “फेक रील” को लेकर कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
हमको न चाहने वाले लोग आज कल कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हैं।
हमें निरंतर सजग रखने के लिए उनका धन्यवाद।
लेकिन हर बार की तरह विरोधी इस बार भी झूठ बोल रहे हैं।
भदोही के प्रवास के दरम्यान हमारे काफिले में मात्र तीन गाड़ियाँ थीं। मैं राजधानी में दो गाड़ी और जिला प्रवास में तीन गाड़ी… https://t.co/0G7k47a9d0
— A K Sharma (@aksharmaBharat) May 16, 2026
मंत्री के करीबी लोगों का कहना है कि यह विवाद उस बड़े पैटर्न का हिस्सा है, जो 1988 बैच के गुजरात कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी शर्मा के राजनीति में आने के बाद से लगातार उनके साथ जुड़ा हुआ है. उनका दावा है कि यूपी की राजनीति का एक वर्ग कभी भी उनके बीजेपी में आने से सहज नहीं था.
2021 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के कुछ दिनों बाद शर्मा बीजेपी में शामिल हुए थे. उस समय उन्हें यूपी में एक नए “पावर सेंटर” के रूप में पेश किया गया था.
हालांकि, पांच साल बाद भी उनके आसपास की चर्चा ज्यादातर विवादों और टकरावों को लेकर रही है. इनमें सरकारी अधिकारियों के साथ मतभेद और सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग भी शामिल है.
राज्य में बिजली और शहरी विकास जैसे अहम विभाग संभालने के बावजूद शर्मा वैसी राजनीतिक छवि नहीं बना पाए, जैसी उनके बीजेपी में शामिल होने के समय दिखाई गई थी.
बीजेपी के कई नेता निजी तौर पर मानते हैं कि शर्मा जमीनी राजनीति के तौर-तरीकों में खुद को ढालने में संघर्ष कर रहे हैं.
दिप्रिंट से बातचीत में यूपी बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि शर्मा अभी भी एक राजनेता से ज्यादा नौकरशाह की तरह काम करते हैं.
नेता ने कहा, “शर्माजी अभी भी सख्त अफसर की तरह काम करते हैं. लेकिन राजनीति का स्वभाव ऐसा नहीं होता. एक जनप्रतिनिधि के तौर पर आपको आलोचना को धैर्य से सुनना पड़ता है. आप लोगों के काम को सीधे मना नहीं कर सकते.”
उन्होंने आगे कहा, “केंद्र के समर्थन के साथ आने की वजह से उन्होंने स्थानीय नेताओं या कैबिनेट के कई सहयोगियों के साथ मजबूत रिश्ते नहीं बनाए, और शायद बनाना भी नहीं चाहा.”
नेता ने यह भी बताया कि शर्मा 2027 के विधानसभा चुनाव में मऊ जिले की मधुबन सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं, जो फिलहाल बीजेपी के पास है.
दिप्रिंट ने शर्मा के कामकाज और पार्टी के भीतर उनकी स्थिति को लेकर यूपी बीजेपी प्रवक्ताओं से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. शर्मा से भी फोन पर संपर्क किया गया, लेकिन उनके कार्यालय ने कहा कि वह बात करने के लिए उपलब्ध नहीं हैं.
आलोचना, टकराव और बढ़ती नाराज़गी
बिजली मंत्री के तौर पर शर्मा का कार्यकाल कई बार उनके टकराव वाले रवैये की वजह से सुर्खियों में रहा है.
इसी महीने की शुरुआत में शर्मा तब चर्चा में आए, जब राज्य सरकार ने बिजली उपभोक्ताओं के लिए अनिवार्य प्रीपेड स्मार्ट मीटर व्यवस्था वापस लेने और फिर से पोस्टपेड बिलिंग लागू करने का फैसला किया.
इस फैसले को लाखों उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत माना गया, जिन्होंने बढ़े हुए बिल, रिचार्ज खत्म होने पर बिजली कटने और बार-बार आने वाली तकनीकी दिक्कतों की शिकायत की थी. यूपी के कई जिलों से स्मार्ट मीटर के खिलाफ प्रदर्शन की खबरें भी सामने आई थीं.
बिजली विभाग के अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि स्मार्ट मीटर को अनिवार्य बनाने का फैसला शर्मा का था, जिसे बिजली सप्लाई और बिलिंग को लेकर बढ़ती नाराजगी के कारण वापस लेना पड़ा.
पिछले साल जुलाई में पूरे राज्य में बिजली कटौती की शिकायतों के बीच शर्मा का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के अधिकारियों पर गुस्सा करते नज़र आए थे.
जिलों के निरीक्षण से लौटने के बाद शर्मा ने अधिकारियों पर जमीनी स्थिति की गलत तस्वीर पेश करने का आरोप लगाया था.
सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में वह कथित तौर पर कहते सुनाई दिए, “आप लोग यहां अंधे और बहरे बनकर बैठे हैं. आपको नहीं पता कि जनता क्या झेल रही है और आपके विभाग के बारे में क्या सोचती है. फर्जी रिपोर्ट भेजी जा रही हैं और शीर्ष नेतृत्व को गुमराह किया जा रहा है.”
मंत्री ने आगे आरोप लगाया कि बिजली विभाग जनता की समस्याओं से कट गया है.
उन्होंने कहा, “बिजली विभाग कोई साहूकार की दुकान नहीं है, जो सिर्फ बिल वसूले. यह जनता की सेवा के लिए है.” उन्होंने सवाल उठाया कि जब कुछ लोग नियमित बिल भर रहे हैं, तब भी पूरे फीडर और गांवों की लाइनें क्यों काट दी जाती हैं.
उन्होंने आगे कहा, “लोगों को गलती से करोड़ों रुपये के बिजली बिल भेजे जा रहे हैं और फिर उन्हें ठीक कराने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है. विजिलेंस की छापेमारी गलत जगहों पर हो रही है, जबकि बड़े स्तर पर बिजली चोरी जारी है.”
अगले दिन हुई एक दूसरी बैठक में शर्मा ने अपनी आलोचना और तेज़ कर दी और अधिकारियों को खुली चेतावनी दी.
एक और वायरल वीडियो में वह कहते नजर आए, “मैं तीन साल से समझा रहा हूं. अब समय खत्म हो गया है. अगर अधिकारियों को लगता है कि मंत्री उनका ट्रांसफर या सस्पेंड नहीं कर सकता, तो याद रखिए, अगर मैंने भगवान राम की तरह एक तीर छोड़ दिया, तो दिल्ली से लेकर राष्ट्रपति भवन तक कोई नहीं बचा पाएगा.”
दिलचस्प बात यह है कि शर्मा ने कभी भी इन वीडियो में अपनी मौजूदगी से इनकार नहीं किया.
पिछले साल जुलाई में सुल्तानपुर से भी एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह बिजली कटौती से नाराज लोगों के सामने “जय श्री राम” के नारे लगाते दिखाई दिए थे.
इसके बाद विपक्ष ने बीजेपी सरकार पर हमला बोला. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने एक्स पर वीडियो शेयर करते हुए कहा कि इतने साल सत्ता में रहने के बावजूद यूपी सरकार बिजली उत्पादन और वितरण में सुधार नहीं कर पाई.
अखिलेश ने कहा, “जब जनता सवाल पूछती है, तो बीजेपी नेताओं के पास जवाब नहीं बचते. अब तो उनकी खुद की बिजली भी चली जाती है.”
विभाग के अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि ऑनलाइन और जमीनी स्तर पर बिजली कटौती को लेकर बढ़ती आलोचना से शर्मा लगातार परेशान हो रहे हैं.
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “स्थानीय व्यापारी, विधायक और आम लोग खुलकर बिजली कटौती को लेकर उनका विरोध कर रहे हैं. इस साल भी उन्हें उसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है.”
बिजली सप्लाई को लेकर बढ़ते दबाव के बीच लखनऊ उत्तर से बीजेपी विधायक नीरज बोरा ने मंगलवार को शर्मा को पत्र लिखकर अपने क्षेत्र में बार-बार हो रही बिजली कटौती पर जवाब मांगा.
यह पत्र इस बात का भी संकेत माना जा रहा है कि अब सत्ताधारी पार्टी के विधायक भी सार्वजनिक रूप से सरकार के सामने अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं. विधायक ने शर्मा से इलाके में वरिष्ठ अधिकारियों को भेजने और बार-बार बिजली जाने की वजह स्पष्ट करने की मांग की.
बिजली विभाग के अलावा भी शर्मा विवादों में घिरे रहे हैं.
पिछले साल वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर दौरे के दौरान मंदिर कॉरिडोर परियोजना और ट्रस्ट गठन का विरोध कर रहे स्थानीय व्यापारियों ने उनके खिलाफ नारेबाजी की थी.
कई हफ्तों से चल रहा यह आंदोलन शर्मा के दौरे के दौरान और तेज हो गया था. प्रदर्शनकारी “कॉरिडोर हाय-हाय” के नारे लगा रहे थे.
शर्मा का राजनीतिक सफर
गुजरात कैडर के अधिकारी रहे अरविंद कुमार शर्मा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है. वह मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के समय से उनके साथ काम कर चुके हैं.
उस दौरान शर्मा गुजरात इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड (GIDB) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी रहे. इस पद पर काम करने के कारण उनकी पहचान इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ के तौर पर बनी.
मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने तक शर्मा मुख्यमंत्री कार्यालय में सचिव रहे. इसके बाद जब मोदी दिल्ली आए, तो शर्मा प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में संयुक्त सचिव के तौर पर शामिल हुए.
2017 में उन्हें अतिरिक्त सचिव के पद पर पदोन्नत किया गया और अप्रैल 2020 तक वह PMO में बने रहे.
2020 में कोविड के दौरान प्रवासी मजदूर संकट के समय उन्हें MSME मंत्रालय में सचिव बनाया गया. इसके बाद उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और जनवरी 2021 में बीजेपी में शामिल हो गए.
उस समय यह चर्चा तेज थी कि शर्मा उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बन सकते हैं. हालांकि ऐसा नहीं हुआ, लेकिन 2022 में दोबारा सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें दो अहम मंत्रालय सौंप दिए.
शर्मा के काम करने के तरीके पर टिप्पणी करते हुए समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज कुमार काका ने दावा किया कि वह बीजेपी के लिए राजनीतिक बोझ बन गए हैं.
काका ने कहा, “बीजेपी ऊपर से लोगों को जनता पर थोपती है.” उन्होंने सक्रिय राजनीति में आने के बाद से शर्मा की उपलब्धियों पर भी सवाल उठाए.
उन्होंने कहा, “पिछले पांच साल में शर्मा जी की एक बड़ी उपलब्धि बताइए. हमने कभी मुख्यमंत्री को मंच से उनकी खुलकर तारीफ करते नहीं सुना. साफ तौर पर अंदरूनी खींचतान है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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