नई दिल्ली: मार्क्सवादी विचारधारा, माओ त्से-तुंग के उद्धरणों वाली किताबें और गाज़ा के समर्थन में प्रदर्शन—ये उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा 65-वर्षीय पत्रकार सत्यम वर्मा को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए), 1980 के तहत हिरासत में रखने के कुछ आधार बताए गए हैं. उन पर पिछले महीने नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान “हिंसा भड़काने” का आरोप है.
गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी द्वारा जारी हिरासत आदेश में शामिल पुलिस रिपोर्ट में कहा गया है, “औद्योगिक अशांति और हिंसक माहौल के कारण औद्योगिक प्रगति के वातावरण पर बुरा असर पड़ा है, जिससे उद्योग योजनाकारों और निवेशकों में डर, आतंक और घबराहट पैदा हुई है. यह आप जैसे तर्कहीन, जिद्दी और हिंसक आंदोलनजीवी लोगों की घृणित विचारधारा के कारण हुआ है, जो अपनी अत्यधिक सक्रियता से हरियाणा के मानेसर औद्योगिक क्षेत्र और नोएडा में सार्वजनिक और औद्योगिक अशांति पैदा करने वाली परिस्थितियों के निर्णायक योजनाकार हैं.”
मंगलवार को वर्मा की पत्नी शकंभरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर एनएसए के तहत की गई हिरासत को अवैध घोषित करने की मांग की. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है.
नोएडा मजदूरों का प्रदर्शन मानेसर से शुरू हुआ था, जहां हरियाणा सरकार ने मार्च और अप्रैल में हुए प्रदर्शन और झड़पों के बाद सभी श्रेणियों के मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी में 35 प्रतिशत बढ़ोतरी की थी.
सुप्रीम कोर्ट में वर्मा की ओर से पेश वकील शाहरुख आलम ने मंगलवार को कहा, “यह सिर्फ जमानत या एनएसए का विरोध करने का मामला नहीं है. हम अदालत को यह समझाना चाहते हैं कि जब प्रक्रिया ही सजा बन जाए तो क्या होता है. जिस तरह आपराधिक कानून का इस्तेमाल किया गया और एफआईआर दर्ज की गईं, उसमें हमेशा यह मान लिया गया कि हिंसा सिर्फ एक तरफ से आती है.”
उन्होंने कहा, “हमें यह स्वीकार करना होगा कि मजदूरों को उनकी ज़रूरत के हिसाब से मजदूरी नहीं मिल रही थी. यह भी महत्वपूर्ण है कि एफआईआर जिस तरह लिखी गई, वह मजदूरों के खिलाफ है. किसी का पढ़ना-लिखना और असहमति जताना हिंसा की तैयारी की तरह पेश किया जा रहा है.”
पुलिस का नज़रिया
लखनऊ निवासी सत्यम वर्मा अप्रैल के मध्य से एनएसए के तहत हिरासत में हैं. गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी के आदेश के साथ लगी पुलिस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्मा ने नोएडा के फेज-1, 2, 3 और सेक्टर 58, 63 सहित अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों को सामूहिक हिंसा, हथियारबंद अशांति और सार्वजनिक व निजी संपत्तियों में बड़े स्तर पर आगजनी के लिए उकसाया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे “औद्योगिक प्रगति के माहौल पर प्रतिकूल असर” पड़ा और उद्योग योजनाकारों व निवेशकों में “डर, आतंक और घबराहट” पैदा हुई.
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “आप RWPI (रिवोल्यूशनरी वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया) के संस्थापक सदस्य हैं और जनचेतना पुस्तक प्रतिष्ठान की किताबों और साहित्य के जरिए नई पीढ़ी को विद्रोही संगठनों में शामिल होने के लिए उकसाने वाला वामपंथी और दूसरे शब्दों में हिंसक लेखन करते हैं. आप मजदूर बिगुल अखबार के प्रकाशक और लेखक भी हैं.”
पुलिस जांच में जनचेतना पुस्तक प्रतिष्ठान और मजदूर बिगुल को नोएडा अशांति का मास्टरमाइंड बताया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि RWPI से जुड़े संगठनों के मुख्य सदस्य और वर्मा “मजदूर बिगुल” नाम के “अत्यधिक सक्रिय व्हाट्सऐप ग्रुप” के सदस्य थे.
पहले गिरफ्तार किए गए आदित्य आनंद और रूपेश रॉय इस ग्रुप के एडमिन बताए गए हैं. रिपोर्ट में कहा गया, “इनके जरिए 883 मजदूरों को इस ग्रुप में जोड़ा गया…इसी समेत 10 ग्रुपों के जरिए बल्क मैसेज भेजकर हिंसा भड़काई गई, जिसके बाद आगजनी हुई और 50 से ज्यादा वाहन जला दिए गए और तोड़े गए.”
रिपोर्ट में कहा गया, “आपके दफ्तर से मजदूर बिगुल अखबार की प्रतियां, माओ त्से-तुंग के उद्धरणों वाली किताबें और अन्य आपत्तिजनक, लोकतंत्र विरोधी लेख मिले. सबूतों से साफ होता है कि इन चीजों ने हिंसा भड़काने में सक्रिय भूमिका निभाई, जिसके कारण बड़े स्तर पर हिंसा और आगजनी हुई और सार्वजनिक जीवन की सामान्य व्यवस्था बाधित हुई.”
गाज़ा और प्रदूषण विरोधी प्रदर्शनों से भी जोड़ने का दावा
और भी बहुत कुछ. नोएडा के फेज-2 थाने के एसएचओ द्वारा सेंट्रल नोएडा के डीसीपी को भेजे गए एक पत्र, जिसे याचिका के साथ संलग्न किया गया है, में कहा गया है कि दिल्ली के करावल नगर स्थित RWPI के संस्थापक सदस्य सत्याम वर्मा “सक्रिय मार्क्सवादी विचारधारा के विचारक” हैं. उनके मुख्य समूह के सदस्य देश के कई हिस्सों में लेबर कोड के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय थे. आरोप है कि उन्होंने नोएडा औद्योगिक क्षेत्र में मजदूर आंदोलन को तेज करने के लिए अपने संगठनों के मुख्य सदस्यों को सक्रिय किया.
पत्र में कहा गया है कि मजदूर बिगुल और लखनऊ की “जनचेतना” नाम की प्रकाशन संस्था, जो उनकी मार्क्सवादी विचारधारा और साहित्य प्रकाशित करती है, ने 2015 से रूपेश रॉय को मार्क्सवादी विचारधारा फैलाने वाली प्रिंट सामग्री भेजनी शुरू की. रूपेश रॉय को एकता संघर्ष समिति, कुलेसरा नोएडा, नौजवान भारत सभा और मजदूर बिगुल दस्ते से जुड़ा सक्रिय कार्यकर्ता बताया गया है. दावा किया गया है कि इसका मकसद नोएडा के मजदूर वर्ग में पकड़ बनाना था.
पत्र में कहा गया है, “सबूतों और तथ्यों से पता चलता है कि RWPI एनसीआर के औद्योगिक क्षेत्र में बहुत सक्रिय रहा है. सत्यम वर्मा बिगुल मीडिया ग्रुप से जुड़े पाए गए हैं, जिसके एडमिन और मुख्य समन्वयक आदित्य आनंद हैं. साथ ही वे इस अखबार के फेसबुक पेज से भी जुड़े हैं और इसी नाम से एक टेलीग्राम चैनल भी शुरू किया गया था…वर्मा इस ग्रुप से जुड़े थे. यही सोशल मीडिया ग्रुप था जिसने फेज-2 के हॉटस्पॉट में हिंसक आंदोलन की जमीन तैयार की.”
रिपोर्ट में कहा गया, “वह सिर्फ इस ग्रुप से जुड़े नहीं थे…यह पाया गया कि मीडिया और न्यूज एजेंसियों के अनुभव रखने वाले इस व्यक्ति ने अपने वैचारिक कट्टरपन के जरिए मुख्य समूह के सदस्यों को वैचारिक रूप से प्रभावित किया और विस्फोटक स्थिति पैदा करने में योगदान दिया.”
हिरासत आदेश में कहा गया है कि ये कार्यकर्ता आंदोलनकारी समूहों के नेटवर्क से जुड़े हैं, जो मजदूर बिगुल, बिगुल मजदूर दस्ता और भगत सिंह जन अधिकार यात्रा जैसे संगठनों से जुड़े हैं. ये संगठन पूरे भारत में मजदूर आंदोलन और प्रदर्शन आयोजित करते हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है, “दिल्ली के प्रदूषण विरोधी प्रदर्शन में इन्होंने आंध्र प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ में मारे गए माओवादी कमांडर मडवी हिडमा के समर्थन में नारे लगाए. RWPI से जुड़े बाबा ठोके और धनंजय, गाजा के समर्थन में प्रदर्शन और मानखुर्द के संविधान चौक पर रसोई गैस सप्लाई के खिलाफ प्रदर्शन में सक्रिय पाए गए. नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भी RWPI के सक्रिय सदस्य मौजूद थे.” पुलिस का दावा है कि यह संगठन “10 से ज्यादा राज्यों में लेबर कोड के खिलाफ अभियान चला रहा है.”
रिपोर्ट में कहा गया है कि RWPI ने 12 फरवरी को यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) के साथ मिलकर देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया था. इसमें यह भी कहा गया, “सिर्फ इतना ही नहीं, उन्हें फिलिस्तीन से भी सहानुभूति है.” रिपोर्ट के अनुसार संगठन ने “इंडियन पीपल इन सॉलिडेरिटी विद फिलिस्तीन (IPSP)” नाम से अलग शाखा भी बनाई थी.
पुलिस रिपोर्ट में RWPI से जुड़े हिमांशु ठाकुर का भी ज़िक्र है, जो मजदूर बिगुल के लिए लिखते हैं और सत्याम वर्मा से जुड़े बताए गए हैं. रिपोर्ट में कहा गया, “हिमांशु के कमरे से ‘डायलेक्टिकल मैटेरियलिज्म’ और ‘कैपिटलिज्म एंड द क्राइसिस ऑफ जेन Z’ नाम के लेख मिले, जिन्हें RWPI की क्रिएटिव आर्टिस्ट लीग ने प्रकाशित किया था. इस लेख का निष्कर्ष यह है कि 25 साल से कम उम्र के भारत के किशोर और युवाओं का दिमाग अलग-थलग हो गया है, उनकी सामाजिक संवेदनशीलता सतही स्तर पर है और उनमें सामाजिक सरोकार या राष्ट्रीय चेतना नहीं है. ऐसे में व्यवस्था को फासीवादी बताकर उन्हें किसी भी आंदोलन के लिए तैयार किया जा सकता है.”
रिपोर्ट में कहा गया, “ऐसे तथ्य हैं जो दिखाते हैं कि नोएडा में हुई हिंसक घटनाओं के वैचारिक अगुआ और मार्गदर्शक सत्यम वर्मा थे.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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