scorecardresearch
Wednesday, 20 May, 2026
होमदेशहरियाणा में 3 साल में 8 IAS अधिकारियों को मुकदमों से राहत, सरकार ने अभियोजन मंजूरी नहीं दी

हरियाणा में 3 साल में 8 IAS अधिकारियों को मुकदमों से राहत, सरकार ने अभियोजन मंजूरी नहीं दी

विजय दहिया और जयवीर सिंह आर्य से लेकर, जो हफ्तों जेल में रहने के बाद बरी हो गए, से लेकर अशोक खेमका और फरीदाबाद नगर निगम घोटाले से जुड़े अधिकारियों तक, यहां देखिए राज्य का सेक्शन 17-A का रिकॉर्ड.

Text Size:

गुरुग्राम: पिछले तीन साल में हरियाणा सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जांच या अभियोजन की मंजूरी देने से अक्सर इनकार किया है, जिससे अदालत में मामले कमजोर पड़ गए.

जिन आईएएस अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया या जेल भेजा गया, उन्हें कभी सज़ा नहीं हुई और न ही मुकदमा चल पाया. कुछ अधिकारियों को इसलिए राहत मिल गई क्योंकि एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत जरूरी सरकारी मंजूरी लिए बिना उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. वहीं कुछ अन्य अधिकारियों को इसलिए बरी कर दिया गया क्योंकि मामला अदालत पहुंचने पर सरकार ने अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार कर दिया. दोनों ही स्थितियों में नतीजा एक जैसा रहा—अधिकारी बच निकले.

राज्य सरकार द्वारा 645 करोड़ रुपये के आईडीएफसी बैंक घोटाले में सेक्शन 17-A के तहत आठ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को जांच की अनुमति देने के बाद, दिप्रिंट ने इस मामले में राज्य के रिकॉर्ड पर नजर डाली.

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के सेक्शन 17-A को 2018 के संशोधन के जरिए जोड़ा गया था. इसके तहत किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उसके आधिकारिक काम से जुड़े कथित अपराध की जांच या पूछताछ बिना सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी के कोई पुलिस अधिकारी नहीं कर सकता. आईएएस अधिकारी के मामले में सक्षम प्राधिकारी राज्य सरकार होती है.

सेक्शन 17-A को सरकारी अधिकारियों को बेवजह या राजनीतिक कारणों से होने वाले मुकदमों से बचाने के लिए बनाया गया था. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह अब एक ऐसी ढाल बन गया है, जिसका इस्तेमाल राज्य सरकारें अपने पसंदीदा अधिकारियों को बचाने के लिए करती हैं.

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के सेक्शन 19 के तहत अभियोजन की मंजूरी बाद के चरण में ली जाती है. इसके तहत अदालत किसी मामले पर संज्ञान लेकर मुकदमा शुरू करे, उससे पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी ज़रूरी होती है.

जो मामले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत नहीं आते, उनमें जांच एजेंसी को किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 197 के तहत मंजूरी लेनी होती थी. अब इसकी जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218 ने ले ली है.

मंजूरी न देने का पैटर्न

आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जांच या अभियोजन की मंजूरी न देने का पैटर्न साफ दिखाई देता है. हरियाणा में कम से कम आठ आईएएस अधिकारी तीन साल से भी कम समय में कानूनी कार्रवाई से बच गए, क्योंकि राज्य सरकार ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया.

उदाहरण के तौर पर आईएएस अधिकारी विजय सिंह दहिया का मामला लें. 2001 बैच के अधिकारी दहिया को एंटी करप्शन ब्यूरो ने अक्टूबर 2023 में रिश्वत मामले में गिरफ्तार किया था. उस समय वह हरियाणा स्किल विभाग के कमिश्नर थे.

उन्होंने कई हफ्ते न्यायिक हिरासत में बिताए. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी और कहा था कि मामले में उनकी संलिप्तता “स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.” लेकिन जब एसीबी ने उनके खिलाफ अभियोजन की मंजूरी मांगी, तो हरियाणा सरकार ने इसे खारिज कर दिया. बाद में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया.

इसी तरह 2009 बैच के आईएएस अधिकारी जयवीर सिंह आर्य को 11 अक्टूबर 2023 को हरियाणा स्टेट वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन में एक महिला अधिकारी की पोस्टिंग के बदले कथित रिश्वत मांगने के मामले में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें 28 नवंबर 2023 को नियमित ज़मानत मिलने से पहले डेढ़ महीने से ज्यादा समय तक जेल में रहना पड़ा.

जब एसीबी ने उनके मामले में अभियोजन की मंजूरी मांगी, तो सरकार ने इनकार कर दिया. नवंबर 2025 में पंचकूला की ट्रायल कोर्ट ने आर्य को बरी कर दिया, क्योंकि राज्य सरकार ने मंजूरी देने से मना कर दिया था. जांच एजेंसी ने खुद अदालत को बताया कि वह सिर्फ उनके खिलाफ चालान दाखिल करने के पक्ष में नहीं है.

हरियाणा के सबसे ज्यादा तबादले झेलने वाले अधिकारियों में गिने जाने वाले आईएएस अधिकारी अशोक खेमका और संजीव वर्मा के मामलों में भी सरकार ने सेक्शन 17-A के तहत बाद में मंजूरी देने से इनकार कर दिया, जबकि एफआईआर पहले ही दर्ज हो चुकी थीं. सूत्रों के मुताबिक, एफआईआर दर्ज करने से पहले ज़रूरी सरकारी मंजूरी नहीं ली गई थी. उन्होंने कहा कि खेमका और वर्मा के खिलाफ दर्ज क्रॉस-एफआईर को आपसी विवाद का नतीजा ज्यादा माना गया.

खेमका के खिलाफ एफआईआर हरियाणा स्टेट वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन में 2010 में उनके मैनेजिंग डायरेक्टर रहने के दौरान कुछ भर्तियों में कथित गड़बड़ियों को लेकर दर्ज हुई थी. 2022 में एमडी बने संजीव वर्मा ने इनमें से कुछ अधिकारियों की सेवाएं समाप्त कर दी थीं और उसी समय कॉरपोरेशन ने गड़बड़ियों को लेकर खेमका के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी.

इसके बाद इन अधिकारियों ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी. नौ बर्खास्त अधिकारियों की याचिका में हाई कोर्ट ने 14 नवंबर 2025 के आदेश में उनकी बर्खास्तगी रद्द कर दी. कोर्ट ने कहा कि “याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति एक कड़ी और कई स्तर वाली चयन प्रक्रिया का नतीजा थी, जिसमें उनकी उम्मीदवारी, सेवा रिकॉर्ड और पेशेवर अनुभव की पहले स्क्रीनिंग कमेटी और फिर एक हाई-पावर्ड एग्जीक्यूटिव कमेटी द्वारा गहन जांच की गई थी.”

एक अन्य याचिका, जो जगदीश चंदर ने दायर की थी, उसे भी उसी दिन मंजूर कर लिया गया और उनकी बर्खास्तगी भी रद्द कर दी गई.

फरीदाबाद नगर निगम “घोटाला” शायद यह दिखाने वाला सबसे बड़ा मामला है कि सेक्शन 17-A कैसे लागू हुआ. हरियाणा सरकार ने राज्य विजिलेंस और एंटी करप्शन ब्यूरो के उन प्रस्तावों को खारिज कर दिया, जिनमें लगभग 200 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय गड़बड़ियों के मामले में चार आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जांच की अनुमति मांगी गई थी.

ये अधिकारी—सोनल गोयल, अनीता यादव, यश गर्ग और मोहम्मद शायिन—अलग-अलग समय पर फरीदाबाद नगर निगम के कमिश्नर रहे थे. सरकार ने 2022 और 2023 के बीच दर्ज कम से कम पांच एफआईआर से जुड़ी जांच की मंजूरी भी नहीं दी. ये सभी एफआईआर कथित वित्तीय गड़बड़ियों और नागरिक परियोजनाओं की बढ़ी हुई लागत से जुड़ी थीं.

गोयल और यादव के मामलों में सरकार ने शुरुआत में पीसी एक्ट के सेक्शन 17-A के तहत जांच की मंजूरी दी थी, लेकिन गोयल ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी और स्टे हासिल कर लिया. चूंकि, मामला हाई कोर्ट में लंबित है, इसलिए कथित घोटाले से जुड़े चारों आईएएस अधिकारियों के खिलाफ जांच की अनुमति नहीं दी गई.

‘मजबूत आधार’ पर इनकार

इस पैटर्न के बारे में पूछे जाने पर एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा कि ज्यादातर मामलों में मंजूरी न देने का फैसला कम से कम प्रक्रिया के लिहाज से मजबूत आधार पर था.

गोपनीयता की शर्त पर अधिकारी ने कहा, “राज्य विजिलेंस और एंटी करप्शन ब्यूरो ने विजय सिंह दहिया और जैवीर सिंह आर्य को पीसी एक्ट के सेक्शन 17-A के तहत पहले अनुमति लिए बिना बुक और गिरफ्तार किया. जब एसीबी ने उनके खिलाफ अभियोजन की मंजूरी मांगी, तो उसे सही तरीके से खारिज कर दिया गया क्योंकि एजेंसी ने प्रक्रिया का पालन नहीं किया था.”

उन्होंने खेमका और वर्मा के मामलों में भी यही बात कही.

उन्होंने कहा, “उनके मामलों में भी एफआईआर दर्ज करने से पहले सरकार की मंजूरी नहीं ली गई थी. बाद में जांच एजेंसी ने बाद में मंजूरी मांगी, जिसे सही तरीके से खारिज कर दिया गया. ऐसी मंजूरी कार्रवाई शुरू होने से पहले ली जानी चाहिए, बाद में नहीं.”

फरीदाबाद “घोटाले” के बारे में पूछे जाने पर अधिकारी ने कहा कि चूंकि सोनल गोयल को हाई कोर्ट से स्टे मिल गया था और बाकी मामलों के तथ्य भी लगभग समान थे, इसलिए यह स्टे संभवतः सभी पर लागू होगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: हरियाणा में देर रात बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 18 IPS और 2 HPS अधिकारियों के तबादले


 

share & View comments