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Wednesday, 20 May, 2026
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दूसरी कैबिनेट बैठक में सतीशन सरकार ने पिनाराई विजयन की पसंदीदा K-Rail परियोजना रद्द की

केरल के मुख्यमंत्री सतीशन ने कहा कि हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के लिए जमीन अधिग्रहण से जुड़े सभी आदेश भी रद्द किए जाएंगे.

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तिरुवनंतपुरम: केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) सरकार ने सत्ता संभालने के एक हफ्ते के भीतर ही पिछली एलडीएफ सरकार की महत्वाकांक्षी सिल्वरलाइन परियोजना को बुधवार को रद्द कर दिया.

दूसरी कैबिनेट बैठक के बाद फैसले की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने कहा कि परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण से जुड़े सभी आदेश निरस्त किए जाएंगे.

पिनाराई विजयन सरकार के दूसरे कार्यकाल की इस प्रमुख परियोजना को सिल्वरलाइन या K-Rail कहा जाता था. यह तिरुवनंतपुरम से कासरगोड तक सेमी-हाई-स्पीड रेल परियोजना थी, जिससे यात्रा का समय 12 घंटे से घटकर चार घंटे से कम होने वाला था. हालांकि, कांग्रेस ने पर्यावरण और जमीन अधिग्रहण से जुड़े मुद्दों को लेकर इस परियोजना का कड़ा विरोध किया था.

सतीशन ने कहा, “यह परियोजना अब नहीं होगी और इसे खत्म कर दिया गया है. कई सालों से लोग परेशान थे, वे अपनी जमीन न बेच पा रहे थे और न खरीद पा रहे थे. केंद्र सरकार ने भी मंजूरी नहीं दी थी और हमने भी इस परियोजना का विरोध किया था.”

उन्होंने कहा कि राज्य का गृह विभाग इस परियोजना से जुड़े मामलों की जांच करेगा और उनकी प्रकृति के आधार पर अदालतों से उन्हें खत्म करने की सिफारिश करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि राजस्व विभाग को परियोजना के लिए लगाए गए पीले सीमा पत्थरों को हटाने के निर्देश दिए गए हैं.

सतीशन ने कहा कि यूडीएफ सरकार हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के खिलाफ नहीं है, लेकिन उसने एलडीएफ सरकार की योजना का विरोध इसलिए किया क्योंकि यह पर्यावरण के लिहाज़ से टिकाऊ नहीं थी और इससे पर्यावरणीय आपदा हो सकती थी. उन्होंने कहा कि परियोजना अनौपचारिक रूप से बंद होने के बावजूद इसकी अधिसूचना अब तक जारी थी.

परियोजना क्या थी

हालांकि, K-Rail की कल्पना 2016 में की गई थी, लेकिन पूरे राज्य में हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर का विचार काफी समय से चल रहा था. 2009 में वी. एस. अच्युतानंदन के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार ने तिरुवनंतपुरम को कर्नाटक के मंगलुरु से जोड़ने वाली लाइन का प्रस्ताव रखा था.

यह परियोजना ओमन चांडी के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार (2011-16) के दौरान भी जारी रही, लेकिन जमीन अधिग्रहण और वित्तीय समस्याओं के कारण बाद में रुक गई.

पहली विजयन सरकार (2016-21) ने परियोजना को फिर शुरू किया और 2019 में इसकी व्यवहार्यता रिपोर्ट पूरी हुई. दूसरी विजयन सरकार के सत्ता में आने के तुरंत बाद जमीन अधिग्रहण सर्वे शुरू कर दिया गया.

2020 में दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) द्वारा तैयार विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) में कहा गया था कि केरल का मौजूदा रेलवे नेटवर्क और हाईवे भारी ट्रैफिक, तीखे मोड़ और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण तेज यात्रा के लिए उपयुक्त नहीं हैं. रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में रेल और सड़क यात्रा की औसत गति पड़ोसी राज्यों से 30 से 40 प्रतिशत कम है.

दस्तावेज़ के मुताबिक, यह परियोजना रेलवे मंत्रालय और केरल सरकार का संयुक्त उपक्रम थी. यह स्टैंडर्ड गेज, इलेक्ट्रिफाइड, सेमी-हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर था, जो पूरे केरल में चलता और तिरुवनंतपुरम से कासरगोड की यात्रा 12 घंटे से घटाकर चार घंटे कर देता. रास्ते में आने वाले 11 जिलों में एक-एक स्टेशन प्रस्तावित था. केरल में कुल 14 जिले हैं.

529.45 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर को 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलाने की योजना थी और इसका संचालन 2025 से शुरू होना प्रस्तावित था. परियोजना के लिए कुल 1,383 हेक्टेयर ज़मीन की ज़रूरत बताई गई थी, जिसमें 185 हेक्टेयर दक्षिण रेलवे की मौजूदा जमीन और 1,198 हेक्टेयर निजी जमीन शामिल थी.

हालांकि, जमीन अधिग्रहण, विस्थापन, पर्यावरणीय प्रभाव और वित्तीय व्यवहार्यता को लेकर इस परियोजना का भारी विरोध हुआ. राज्यभर में विरोध प्रदर्शन बढ़ने के साथ अधिकारियों द्वारा लगाए गए पीले सर्वे पत्थर विरोध का प्रतीक बन गए. कई प्रदर्शनकारियों ने इन्हें हटाया, उखाड़ा या ढक दिया.

सरकार लगातार परियोजना का बचाव करती रही, लेकिन रेलवे मंत्रालय ने “तकनीकी कारणों” का हवाला देते हुए डीपीआर को अंतिम मंजूरी नहीं दी, जिसके बाद सर्वे प्रक्रिया धीरे-धीरे रुक गई.

इस साल जनवरी में, विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले, वाम सरकार ने सिद्धांत रूप में 583 किलोमीटर लंबे नए रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस) को मंजूरी दी थी. इसे कोच्चि मेट्रो और तिरुवनंतपुरम व कोझिकोड की प्रस्तावित मेट्रो परियोजनाओं सहित मौजूदा शहरी मेट्रो सिस्टम से जोड़ने की योजना थी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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