नई दिल्ली: चुनाव आयोग की उस सूची के अनुसार, जिसमें आज़ादी के बाद सबसे ज्यादा मतदान वाले 11 राज्यों को शामिल किया गया है, पूर्वोत्तर के त्रिपुरा, नागालैंड और मणिपुर के लोग अपने मतदान के संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने को लेकर सबसे ज्यादा उत्साहित रहते हैं.
हाल ही में चुनाव कराने वाले पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी इस सूची में क्रमशः 93.71 प्रतिशत और 89.87 प्रतिशत मतदान के साथ शामिल हैं.
पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में इस बार ज्यादा मतदान का कारण विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची में नाम हटने से वोटरों की संख्या कम होना माना जा रहा है, लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में लगातार ज्यादा मतदान का एक स्थायी पैटर्न दिखाई देता है.
ये आंकड़े इस बात का भी कोई सीधा संबंध नहीं दिखाते कि ज्यादा मतदान होने से मौजूदा सरकार की जीत या हार तय होती है, जैसा आमतौर पर माना जाता है.
उदाहरण के तौर पर, त्रिपुरा में, जो इस सूची में दूसरे और तीसरे स्थान पर है—2013 और 2008 में क्रमशः 93.61 प्रतिशत और 92.49 प्रतिशत मतदान हुआ था और दोनों बार मौजूदा सरकार को फिर से जनादेश मिला था.
2018 में मतदान थोड़ा कम होकर 91.38 प्रतिशत रहा, जब राज्य में सरकार बदल गई. इसी तरह, इस साल पुडुचेरी में रिकॉर्ड 89.87 प्रतिशत मतदान हुआ और वहां एनडीए सरकार फिर से सत्ता में लौट आई.
2013 और 1993 के नागालैंड विधानसभा चुनाव इस सूची में चौथे और पांचवें स्थान पर हैं, जहां क्रमशः 91.62 प्रतिशत और 91.53 प्रतिशत मतदान हुआ था.
इसके बाद मणिपुर के 2002, 1990 और 2000 के चुनाव आते हैं, जिनमें क्रमशः 90.38 प्रतिशत, 89.95 प्रतिशत और 89.87 प्रतिशत मतदान हुआ था. 10वां स्थान 2000 के मणिपुर चुनाव और 2026 के पुडुचेरी चुनाव के बीच बराबरी पर है, जहां 89.87 प्रतिशत मतदान हुआ.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने कहा, “पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में हमेशा से देश के बाकी हिस्सों की तुलना में ज्यादा मतदान होता रहा है. हमें हमेशा इस बात पर गर्व रहा है कि पूर्वोत्तर में लोकतंत्र बहुत जीवंत रहा है. वहां के लोग ज्यादा शिक्षित और राजनीतिक रूप से जागरूक हैं, इसलिए वे बाहर निकलकर वोट डालते हैं. यह गर्व की बात है.”
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने ज्यादा मतदान का कारण पूर्वोत्तर राज्यों में उच्च साक्षरता दर और राजनीतिक जागरूकता को बताया.
उन्होंने कहा, “उत्तर भारत के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में डुप्लीकेट वोटरों की संख्या काफी ज्यादा है. लोग रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं. ऐसे में वोटर लिस्ट में कई नाम ऐसे रहते हैं जो वास्तव में वोट डालने नहीं आते. इससे मतदान प्रतिशत 5-10 प्रतिशत तक कम हो जाता है.”
रावत ने कहा कि पश्चिम बंगाल, केरल और पूर्वोत्तर राज्यों में ऐसा नहीं होता क्योंकि वहां साक्षरता दर ज्यादा है और लोग जानते हैं कि अगर वे कहीं और चले जाएं तो पुरानी मतदाता सूची से अपना नाम हटवाना ज़रूरी है.

उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर में राजनीतिक जागरूकता भी बहुत ज्यादा है. “वहां के लोग हमेशा सुनिश्चित करते हैं कि वे चुनाव और राजनीति में हिस्सा लें.”
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के त्रिपुरा समन्वयक बिस्वेंदु भट्टाचार्य के मुताबिक, “पूर्वोत्तर राज्यों में ज्यादा मतदान का कारण उनके राज्य बनने का संघर्ष भी हो सकता है. पूर्वोत्तर राज्यों ने बहुत कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बाद राज्य का दर्जा हासिल किया. मणिपुर में सशस्त्र संघर्ष हुआ, त्रिपुरा में उग्रवाद था और समानांतर सरकार बनाने की कोशिशें हुईं. असम और मिजोरम में भी ऐसी स्थितियां थीं.”
भट्टाचार्य ने आगे कहा, “इसी वजह से वहां के लोगों में यह आदत विकसित हो गई है कि उन्हें वोट जरूर डालना है. लोगों को लगता है कि उनके वोट की कीमत है और यह उनका कर्तव्य है.”
‘आपसी रिश्ते’
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि छोटे राज्यों में मतदाता अपने स्थानीय नेताओं के साथ ज्यादा व्यक्तिगत रिश्ते बना लेते हैं, जबकि बड़े राज्यों में ऐसा कम होता है.
दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) के राजनीतिक विश्लेषक प्रवीण राय ने हाल के वर्षों में बढ़े मतदान प्रतिशत का श्रेय चुनाव आयोग को दिया. उन्होंने कहा कि मतदान को त्योहार जैसा माहौल बनाने, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और ईवीएम के जरिए मतदान रिकॉर्ड करने जैसी चुनाव आयोग की पहल इसका कारण हैं.
पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों के बारे में राय ने कहा कि वहां सबसे ज्यादा मतदान “उग्रवाद में कमी, सुरक्षित मतदान माहौल, आर्थिक ज़रूरतों और सरकार पर दोबारा बढ़े भरोसे” की वजह से होता है.
राय ने दिप्रिंट से कहा, “लोग सरकारी नौकरियां पाने और सरकारी अस्पतालों व स्कूल जैसी सुविधाओं के लिए विधायकों और सांसदों पर निर्भर रहते हैं. बदले में वे बड़ी संख्या में वोट डालते हैं, इस उम्मीद के साथ कि जनप्रतिनिधि सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने और मुश्किल समय में मदद करेंगे.”
उन्होंने कहा कि छोटे राज्यों में मतदाताओं की संख्या कम होने के कारण लोगों और उनके विधायक-सांसदों के बीच ज्यादा नज़दीकी होती है, जो बड़े राज्यों में कम देखने को मिलती है.
राय ने आगे कहा, “ज्यादा संपर्क से आपसी रिश्ते बनते हैं और वोट डालना एक व्यक्तिगत जिम्मेदारी जैसा बन जाता है. जबकि बड़े राज्यों में मतदान का व्यवहार ज्यादा औपचारिक होता है और वोट डालने की प्रेरणा कम होती है.”
उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय मीडिया में छोटे राज्यों को कम जगह मिलने के कारण वहां के लोग ज्यादा संख्या में वोट डालते हैं, ताकि वे यह मजबूत संदेश दे सकें कि वे बड़े राज्यों की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक हैं, जो भारतीय राजनीति पर हावी रहते हैं.
सत्ता विरोधी लहर से सीधा संबंध नहीं
इस सूची में शामिल चुनावों में ऐसा कोई साफ संबंध नहीं दिखता कि ज्यादा मतदान का मतलब सत्ता विरोधी लहर हो. 2008 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में, जिसमें भारत के इतिहास का दूसरा सबसे ज्यादा मतदान हुआ था, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट ने लगातार चौथी बार सरकार बनाई थी. गठबंधन ने 49 सीटें जीतकर दो-तिहाई से ज्यादा बहुमत हासिल किया था.
2013 के चुनाव, जिनमें तीसरा सबसे ज्यादा मतदान हुआ, उसमें भी लेफ्ट फ्रंट लगातार पांचवीं बार सत्ता में लौटा. केवल 2018 के चुनाव—जो इस सूची में सातवें स्थान पर हैं, में भाजपा और उसकी सहयोगी इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) ने लेफ्ट फ्रंट को हराकर सरकार बनाई.
इसी तरह, सूची में चौथे स्थान पर रहे 2013 नागालैंड चुनाव में नागालैंड पीपुल्स फ्रंट फिर से सत्ता में लौटा था. वहीं, मतदान प्रतिशत की टॉप-10 सूची में पांचवें स्थान पर रहे 1993 के चुनाव में भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) ने दोबारा सरकार बनाई थी.
मणिपुर में 1990 के चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने सबसे ज्यादा सीटें जीती थीं, लेकिन सरकार मणिपुर पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने बनाई. 1995 के चुनाव के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सरकार बनाई.
2000 के चुनाव के बाद बनी विधानसभा अपना पूरा कार्यकाल नहीं चला सकी और 2002 में फिर चुनाव हुए. उस चुनाव में कांग्रेस ने सबसे ज्यादा सीटें जीतीं, लेकिन उसने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी और मणिपुर स्टेट कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर सेक्युलर प्रोग्रेसिव फ्रंट गठबंधन में सरकार बनाई.
SIR थ्योरी
विशेषज्ञ पश्चिम बंगाल में ज्यादा मतदान का कारण स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान को मानते हैं, जिसके चलते चुनाव से पहले करीब 91 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा, “वास्तविक मतदान से पहले कई हफ्तों तक चले SIR अभियान और उससे जुड़े विवादों ने जमीनी स्तर पर काफी जागरूकता पैदा की, जिससे लोग चुनाव और मतदान को लेकर ज्यादा सक्रिय हुए.”

इन 91 लाख नामों में 58 लाख ऐसे मतदाता थे जो या तो मर चुके थे या राज्य छोड़कर कहीं और चले गए थे. वहीं, करीब 27 लाख नाम जांच प्रक्रिया के दौरान हटाए गए.
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड मतदान के पीछे SIR अभियान बड़ी वजह रहा.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने दिप्रिंट से कहा, “बंगाल में मतदान प्रतिशत पर ज्यादा खुश होने की ज़रूरत नहीं है. SIR अभियान के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए गए, इसलिए प्रतिशत बढ़ गया.”
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “मान लीजिए 100 लोगों में से 80 वोट डालते हैं तो मतदान 80 प्रतिशत होगा, लेकिन अगर 10 लोगों के नाम हटा दिए जाएं और फिर 90 में से वही 80 लोग वोट डालें, तो प्रतिशत अचानक बढ़ जाएगा.”
रावत ने भी पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड मतदान का श्रेय मतदाता सूची संशोधन को दिया.
उन्होंने कहा, “मतदान से पहले कई हफ्तों तक चले SIR अभियान और उससे जुड़े विवादों ने जमीनी स्तर पर लोगों को चुनाव और वोटिंग के लिए काफी उत्साहित किया.”
उन्होंने आगे कहा, “SIR के जरिए मृत, डुप्लीकेट, स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले गए या सामान्य रूप से वहां नहीं रहने वाले लोगों के नाम हटाए गए. साथ ही ऐसे लोगों के नाम भी हटाए गए जो 2003 की सूची से खुद को जोड़ नहीं पाए या अपने दावे को सही साबित नहीं कर पाए.”
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