नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कम से कम सात राज्य ऐसे हैं, जहां पार्टी बिना फुल-टर्म महासचिव (संगठन) के काम कर रही है. इस पद पर आमतौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा भेजे गए लोग नियुक्त किए जाते हैं. इन राज्यों में महाराष्ट्र, केरल, गोवा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक शामिल हैं. पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश में भी महासचिव (संगठन) या अनौपचारिक रूप से कहे जाने वाले ‘प्रचारक’ का पद खाली है.
महासचिव (संगठन) पार्टी और आरएसएस के बीच कड़ी का काम करता है. पार्टी की अहम नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने में उसकी बड़ी भूमिका होती है. इन राज्यों में केरल में चुनाव हो चुके हैं, गोवा में अगले साल चुनाव होने हैं और कर्नाटक में 2028 में चुनाव होने हैं.
इस पद की अहमियत को लेकर कोई विवाद नहीं है. पिछले लोकसभा चुनावों को ही देख लीजिए, जब राजस्थान में इस पद के खाली होने को बीजेपी और आरएसएस के बीच तालमेल की कमी की बड़ी वजह माना गया था. इसका असर पार्टी के चुनाव प्रबंधन पर भी पड़ा था.
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “तालमेल की कमी और नेतृत्व के अभाव में पूरी इकाई बिना सिर वाली लग रही थी क्योंकि उस समय प्रदेश अध्यक्ष खुद चुनाव लड़ रहे थे. ये पद सिर्फ दिखावे के लिए नहीं होते, बल्कि इन पर नियुक्त लोग मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाते हैं.”
राजस्थान में इस पद पर रहे चंद्रशेखर को जनवरी 2024 में राजस्थान विधानसभा चुनाव के बाद तेलंगाना भेज दिया गया था.
सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी लंबे समय से कई राज्यों में ऐसे खाली पदों की समस्या झेल रही है. यह मुद्दा आरएसएस की कई बैठकों में भी उठ चुका है.
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “कुछ राज्यों में यह पद हाल ही में खाली हुआ है, जबकि कुछ राज्यों में कई सालों से इंतजार चल रहा है. पहले की तरह आरएसएस प्रचारकों को बीजेपी में नहीं भेजे जाने का मुद्दा संघ के सामने उठाया गया है और हमें भरोसा है कि इसका जल्द समाधान निकल जाएगा.”
एक अन्य वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा कि यह स्थिति अभी नहीं बनी, बल्कि काफी समय से तैयार हो रही थी.
उन्होंने कहा, “2019 की जीत और उसके बाद कई अहम राज्यों में जीत से उत्साहित बीजेपी ने ज़मीनी स्तर पर अपने कैडर और सिस्टम पर ज्यादा भरोसा करना शुरू कर दिया. वहीं, 2024 लोकसभा चुनाव से पहले क्या हुआ, यह सभी जानते हैं. उस समय बीजेपी अध्यक्ष जे. पी. नड्डा के आत्मनिर्भर होने वाले बयान से आरएसएस के साथ खटास ज़रूर पैदा हुई थी.”
नेता ने कहा, “प्रचारक बीजेपी और संघ के बीच संपर्क सूत्र का काम करते हैं और उनकी गैरमौजूदगी पार्टी के कामकाज पर असर डालती है. कई राज्यों में कई फैसले इसलिए नहीं हो पाए क्योंकि यह पद खाली पड़ा था.”
पार्टी सूत्रों ने बताया कि कई राज्यों में मौजूदा महासचिव ही महासचिव (संगठन) का काम भी संभाल रहे हैं, ताकि पार्टी का काम प्रभावित न हो.
सिर्फ एक पद नहीं
उदाहरण के तौर पर, फरवरी में आरएसएस ने मध्य प्रदेश के प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा को वापस संघ में भेज दिया. शर्मा कई सालों तक राज्य में संगठन महामंत्री रहे और उन्हें 2023 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत में अहम भूमिका निभाने का श्रेय दिया जाता है. उन्हें जबलपुर में आरएसएस के बौद्धिक प्रकोष्ठ के क्षेत्रीय कार्यालय का प्रमुख बनाया गया.
राज्य के एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा, “उन्हें 2022 में संगठन महामंत्री बनाया गया था और उन्होंने पार्टी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई. हमें उम्मीद है कि इस महत्वपूर्ण पद के लिए जल्द ही किसी नए व्यक्ति की घोषणा होगी.”
बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, शर्मा के आरएसएस में वापस जाने के बाद यह पहली बार है जब मध्य प्रदेश की बीजेपी इकाई बिना संगठन महामंत्री के काम कर रही है.
कर्नाटक में भी लगभग दो साल से फुल-टाइम संगठन महामंत्री नहीं है. जुलाई 2022 में संगठन महामंत्री बनाए गए जी.वी. राजेश को मई 2024 में अचानक पद से हटा दिया गया था.
दिप्रिंट ने रिपोर्ट की थी कि उनके अचानक हटाए जाने की खबर से पार्टी के भीतर और उसकी वैचारिक मातृ संस्था आरएसएस के साथ बढ़ते मतभेदों की चर्चा को बल मिला था. राजेश ने तब अपने पद छोड़ने को पार्टी के भीतर बड़े “संगठनात्मक बदलावों” का हिस्सा बताया था.
आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर ने दिप्रिंट से कहा, “देखिए, ये सभी संगठन के अंदरूनी इंतज़ाम हैं और उपलब्धता तथा जरूरत के आधार पर तय होते हैं, क्योंकि हर खास काम के लिए अलग स्किल और सोच की जरूरत होती है. मुझे लगता है कि 32 संगठन हैं (जो BJP से जुड़े हैं) और कई नए संगठन भी बन रहे हैं. अभी जरूरत और उपलब्धता के बीच अंतर है, जिसे दूर करने की कोशिश की जा रही है.”
2006 में पूर्व बीजेपी अध्यक्ष एम. वैंकेया नायडू द्वारा लाए गए और पार्टी की राष्ट्रीय परिषद से मंजूर किए गए बीजेपी संविधान संशोधन की प्रस्तावना में महासचिव (संगठन) के पद का वर्णन किया गया था. इसमें कहा गया था, “हमारे महासचिवों में एक महासचिव (संगठन) होता है. संगठन सचिव के रूप में काम करने की क्षमता रखने वाले कार्यकर्ता को इस पद पर नियुक्त किया जाता है.”
प्रस्तावना में आगे कहा गया था, “आमतौर पर संगठन सचिव पार्टी का पूर्णकालिक कार्यकर्ता होता है. उससे उम्मीद की जाती है कि वह तय सीमाओं के भीतर अपने कर्तव्यों का पालन करेगा. उसके पास अपना अलग जनाधार, कोई खास क्षेत्र या निर्वाचन क्षेत्र होना ज़रूरी नहीं है. उससे यह भी अपेक्षा की जाती है कि उसका कोई अलग कार्यक्षेत्र न हो, क्योंकि उसे अपना पूरा समय और ऊर्जा पार्टी संगठन को देनी होती है.”
इसमें कहा गया था, “पार्टी की विचारधारा, उसके कार्यकर्ता, उसकी नीतियां और कार्यक्रम ही उसके काम के मुख्य क्षेत्र होने चाहिए. उससे उम्मीद की जाती है कि वह पार्टी की विचारधारा का वाहक बने और पार्टी के बाकी हिस्सों के साथ तालमेल, समन्वय और संवाद की कड़ी के रूप में काम करे.”
जब इन खाली पदों के बारे में पूछा गया, तो बीजेपी ने इस मुद्दे को ज्यादा अहमियत नहीं दी. पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आर. पी. सिंह ने कहा, “यह पार्टी का अंदरूनी मामला है और यह लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. जहां जिसकी ज़रूरत होती है, वहां पार्टी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी जाती है. जैसा मैंने कहा, यह एक सतत प्रक्रिया है और चलती रहती है.”
महाराष्ट्र में भी यह पद 2021 से खाली है, जब 2018 में जिम्मेदारी संभालने वाले आरएसएस नियुक्त विजय पुराणिक ने पद छोड़ दिया था. सूत्रों ने बताया कि उस समय महाराष्ट्र BJP नेतृत्व के साथ मतभेदों के कारण उन्हें हटाया गया था.
गोवा में भी लंबे समय से फुल-टाइम संगठन सचिव (प्रभारी) नहीं है और अरुणाचल प्रदेश में भी दो साल से यही स्थिति बनी हुई है.
अरुणाचल प्रदेश के एक विधायक ने कहा, “हमें केंद्र से मार्गदर्शन मिलता रहा है, इसलिए हमारे काम पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है, लेकिन एक समर्पित संगठन महामंत्री होने से निश्चित तौर पर मदद मिलती है.”
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि जल्द घोषित होने वाली बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम के साथ इन पदों को भी भर दिया जाएगा.
नेता ने कहा, “हम सिर्फ नई टीम की घोषणा का इंतज़ार कर रहे हैं और उसी के मुताबिक इन पदों को भी भरा जाएगा. आरएसएस और बीजेपी दोनों एक ही सोच पर हैं. कभी-कभी इन खाली पदों को भरने में समय लगता है और इसे मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए.”
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