1930 के दशक में अमेरिका के आयोवा में एक किसान के सामने ऐसा फैसला आया, जिसका सामना उसके पिता ने कभी नहीं किया था. हाइब्रिड मक्का आने से ज्यादा फसल मिलने की उम्मीद थी, लेकिन इसकी कीमत ज्यादा थी और इसे हर साल खरीदना पड़ता था. कुछ ही वर्षों में स्थानीय ज्यादातर किसानों ने इस नई तकनीक को अपना लिया, जबकि अलबामा के किसानों ने इसे अपनाने में कई साल और लगाए.
1957 में युवा अर्थशास्त्री ज्वी ग्रिलिचेस ने एक पेपर में इस अंतर को समझाने की कोशिश की. यह पेपर बाद में इस क्षेत्र में काफी चर्चित हुआ. उनकी रिसर्च से पता चला कि नए बीज को तेजी से अपनाने की वजह शिक्षा या लोगों को समझाना नहीं, बल्कि आर्थिक फायदा था. जहां यह बीज आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद था, वहां इसे सबसे तेजी से अपनाया गया.
करीब 70 साल बाद, इसी तरह के आर्थिक कारणों ने भारत के ऑटोमोबाइल बाजार को धीरे-धीरे बदल दिया है. अगस्त 2026 में Federation of Automobile Dealers Associations (FADA) के आंकड़ों से पता चला कि CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी पैसेंजर व्हीकल की कुल बिक्री में 41.95 प्रतिशत हो गई. यह पहली बार था जब यह हिस्सेदारी पेट्रोल से चलने वाले वाहनों की 40.85 प्रतिशत हिस्सेदारी से ज्यादा हो गई.
सिर्फ 16 महीने पहले पेट्रोल वाहनों की बिक्री करीब 17 प्रतिशत अंक आगे थी. इस उपलब्धि को भले ही कारों की कहानी के तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन आंकड़े इससे ज्यादा दिलचस्प कहानी बताते हैं: बदलाव की शुरुआत कार खरीदने वालों ने नहीं, बल्कि ऑटो-रिक्शा चालकों ने की.
सबसे पहले हिसाब लगाने वाला ड्राइवर
किसी भी भारतीय शहर में तीन पहिया वाहन चलाने वाले एक ड्राइवर को देखें, जो सुबह जल्दी से लेकर देर रात तक काम करता है. उसके लिए ईंधन सिर्फ कभी-कभार होने वाला खर्च नहीं है, बल्कि कारोबार चलाने की सबसे बड़ी लागत है. इसलिए हर किलोमीटर पर बचने वाला एक-एक रुपया सीधे उसकी कमाई में जुड़ता है. यही आर्थिक फायदा ग्रिलिचेस की भविष्यवाणी से मेल खाता है और इलेक्ट्रिक वाहनों को जल्दी अपनाने की वजह बनता है.
अगस्त में भारत में बिकने वाले तीन पहिया वाहनों में 65.30 प्रतिशत इलेक्ट्रिक थे. पिछले साल यह आंकड़ा 56.63 प्रतिशत था. इस वजह से FADA ने इस सेगमेंट को “structurally electric” यानी संरचनात्मक रूप से इलेक्ट्रिक बताया. इसी तरह डिलीवरी वैन और छोटे ट्रक भी इलेक्ट्रिक की तरफ बढ़ रहे हैं. इन वाहनों से भी हर किलोमीटर के हिसाब से कमाई होती है. अप्रैल से अगस्त के बीच इन वाहनों की कुल बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 2.26 प्रतिशत से बढ़कर 5.18 प्रतिशत हो गई. यानी यह हिस्सेदारी दोगुने से भी ज्यादा बढ़ी.
इसके अलावा, भारत के यात्रियों और डिलीवरी के काम करने वाले लोगों के एक बड़े हिस्से के लिए इस्तेमाल होने वाले दोपहिया वाहनों में भी जून में पहली बार इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से ज्यादा हो गई.

इस क्रम की वजह सीधी है. इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने में शुरुआत में ज्यादा पैसा लग सकता है, लेकिन उन्हें चलाने का खर्च कम होता है. इसलिए वाहन जितना ज्यादा चलता है, शुरुआती खर्च की भरपाई उतनी जल्दी हो जाती है. इसके उलट परिवार की कार दिन का ज्यादातर समय खड़ी रहती है. इसलिए उसके मामले में शुरुआती ज्यादा कीमत की भरपाई जल्दी नहीं होती. यही वजह है कि परिवार की कारों में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की रफ्तार धीमी रही.
दोपहिया वाहनों के आंकड़े यह भी बताते हैं कि यह बदलाव सिर्फ सब्सिडी की वजह से नहीं हो रहा है. मार्च में इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी बढ़कर 9.79 प्रतिशत हो गई थी. इसकी वजह यह थी कि कुछ इंसेंटिव्स खत्म होने से पहले ग्राहकों ने तेजी से वाहन खरीदे, लेकिन अप्रैल में यह आंकड़ा घटकर 7.76 प्रतिशत रह गया. अगर मांग सिर्फ incentives पर निर्भर होती, तो इसके बाद इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी कम ही रहती. इसके बजाय यह लगातार बढ़ती रही और जुलाई में रिकॉर्ड 11.24 प्रतिशत तक पहुंच गई.
इससे पता चलता है कि इंसेंटिव्स ने लोगों के खरीदने का समय जरूर प्रभावित किया, लेकिन वाहन चुनने का फैसला प्रति किलोमीटर कम खर्च होने की वजह से हुआ.
परिवार की कारों ने कैसे पकड़ी रफ्तार
पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी से यह समझने में मदद मिलती है कि कार खरीदने वालों ने शुरुआत में बदलाव क्यों किया और इसके बाद परिवार की कारों में भी यह बदलाव क्यों तेज हुआ. यह तेजी मई में आई. करीब चार साल तक पेट्रोल पंप पर पेट्रोल की कीमतें लगभग स्थिर रहीं, लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं. इसके बाद तेल कंपनियों ने 15 मई को पेट्रोल की कीमत बढ़ाई और इसके बाद भी कीमतें बढ़ाती रहीं. 10 दिनों के अंदर पेट्रोल की कीमत करीब 7.50 रुपये प्रति लीटर बढ़ गई. दिल्ली में तब से पेट्रोल की कीमत 102.12 रुपये प्रति लीटर बनी हुई है.
नोबेल पुरस्कार विजेता क्रिस्टोफर सिम्स का सिद्धांत इसके बाद हुए बदलाव को समझने में मदद करता है. उनका “rational inattention” यानी “जरूरी चीजों पर ही ध्यान देने” का सिद्धांत कहता है कि लोगों का ध्यान सीमित होता है. इसलिए जब कीमतें लंबे समय तक नहीं बदलतीं, तो लोग उन पर ध्यान देना कम कर देते हैं. चार साल तक पेट्रोल की कीमतें स्थिर रहने के बाद कुछ ही कार खरीदारों को गाड़ी चलाने के खर्च की चिंता थी. लेकिन मई में कीमतें बढ़ने के बाद शोरूम में यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया. डीलरों ने FADA को बताया कि कम ईंधन खर्च करने वाली गाड़ियों के बारे में पूछताछ में साफ बढ़ोतरी हुई. खरीदारों ने E20 पेट्रोल पर जाने को लेकर भी सावधानी दिखाई. कारों की कुल बिक्री में वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों की हिस्सेदारी अप्रैल में 36.66 प्रतिशत थी. यह मई में बढ़कर 38.02 प्रतिशत और जून में 40.35 प्रतिशत हो गई. आखिरकार अगस्त में इन वाहनों की बिक्री पेट्रोल वाहनों की बिक्री से आगे निकल गई.

अगर तेल की कीमतें घट गईं तो क्या यह बदलाव जारी रहेगा? क्या कच्चे तेल की कीमतें कम होने पर भी यह बदलाव जारी रहेगा? व्यापार पर हुई रिसर्च बताती है कि ऐसा होगा. 1989 में रिचर्ड बाल्डविन और पॉल क्रुगमैन ने बताया था कि 1980 के दशक में डॉलर की कीमत में हुए बड़े बदलावों का लंबे समय तक असर क्यों रहा. अमेरिकी बाजार में प्रवेश करने के लिए जिन विदेशी कंपनियों ने काफी पैसा खर्च किया था, वे डॉलर की कीमत गिरने के बाद भी अमेरिकी बाजार में बनी रहीं. अर्थशास्त्री इस घटना को “hysteresis” कहते हैं.
इसी तरह, अगर कोई परिवार इस साल सीएनजी वाहन खरीदता है, तो वह कई वर्षों तक उसी ईंधन का इस्तेमाल करने के लिए प्रतिबद्ध हो जाता है. यह भविष्य में कच्चे तेल की कीमत चाहे जो भी हो, धीरे-धीरे देश की पेट्रोल पर निर्भरता कम करता है. FADA ने सही तौर पर चेतावनी दी है कि इस साल बिक्री में बढ़ोतरी एक कमजोर आधार की वजह से ज्यादा दिखाई दे रही है. कमजोर आधार से यह प्रभावित होता है कि कितनी कारें बिकीं, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि ग्राहकों ने किस तरह की गाड़ियां चुनीं.
अगली लहर को लोन देना
अगली लहर को आगे बढ़ने से कौन-सी चीजें रोक रही हैं? पहले अर्थशास्त्री इसका कारण लोगों की दूर की सोच की कमी को मानते थे. 1979 में MIT के जेरी हाउसमैन ने पाया कि अमेरिका में एयर कंडीशनर खरीदने वाले ग्राहक भविष्य में बिजली की बचत को ऐसे देखते थे, जैसे उस पर हर साल करीब 20 प्रतिशत ब्याज दर लग रही हो. कम आय वाले परिवार भविष्य की इस बचत को और भी कम महत्व देते थे, लेकिन 2013 में मेघन बुसी, क्रिस्टोफर निटल और फ्लोरियन ज़ेटेलमेयर ने दिखाया कि अमेरिकी कार खरीदारों का व्यवहार उनके कार लोन पर लगने वाली असली ब्याज दर के करीब था. इसका मतलब था कि खरीदार भविष्य की बचत को नजरअंदाज नहीं कर रहे थे. वे भविष्य की बचत की तुलना लोन लेने की असली लागत से कर रहे थे. इससे समस्या खरीदार से हटकर लोन देने वाले तक पहुंच जाती है.
1981 में जोसेफ स्टिग्लिट्ज और एंड्रयू वीस ने बताया था कि जब बैंक किसी कर्ज लेने वाले के जोखिम का सही आकलन नहीं कर पाते, तो वे अक्सर ब्याज दर बढ़ाने के बजाय लोन देने से ही मना कर देते हैं. कम क्रेडिट हिस्ट्री वाला डिलीवरी राइडर या छोटा फ्लीट मालिक इसका उदाहरण है. अगर वह ऐसी बैटरी के बदले लोन लेना चाहता है, जिसकी दोबारा बिक्री की कीमत को लेकर बैंकों को भरोसा नहीं है, तो ऐसे कर्ज लेने वाले को लोन मिलने की संभावना कम हो सकती है. FADA के डीलरों ने इस साल कमर्शियल वाहनों के लिए फाइनेंस मिलने की धीमी रफ्तार की लगातार जानकारी दी है. लंबे समय तक चलने वाले वाहनों के लिए क्रेडिट गारंटी और बैटरी की सेहत के लिए प्रमाणित मानक इन खरीदारों के लिए शुरुआती कीमत पर बड़ी छूट देने से ज्यादा मददगार होंगे.
चार्जिंग स्टेशनों के साथ भी यही तरीका अपनाया जाना चाहिए. इन्हें सबसे पहले फ्लीट डिपो, हाईवे और टैक्सी स्टैंड पर बनाया जाना चाहिए. इससे टैक्सी और राइड-हेलिंग वाहन उन सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकेंगे, जो ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री ने पहले से तैयार की हैं. आयोवा के किसानों ने भविष्य की खेती पर भाषण सुनकर हाइब्रिड मक्का नहीं अपनाया था. उन्होंने इसे इसलिए अपनाया क्योंकि इससे ज्यादा फसल मिलती थी. इसी तरह, भारत के ऑटो ड्राइवरों को भी किसी भाषण की जरूरत नहीं थी. उन्हें प्रति किलोमीटर कम खर्च चाहिए था और जब उन्हें यह फायदा मिला, तो उन्होंने इलेक्ट्रिक वाहन अपना लिए.
अब परिवार की कार भी इसी रास्ते पर चलना शुरू कर रही है. अगर नीतियां रोजमर्रा में सबसे ज्यादा काम आने वाले वाहनों यानी workhorse को समर्थन देती हैं और जहां मांग है, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाता है, तो भारत की बाकी सड़कें भी उसी रास्ते पर चलेंगी, जो ऑटो-रिक्शा ने दिखाया है.
बिदिशा भट्टाचार्य दिप्रिंट की कंसल्टिंग एडिटर (इकोनॉमिक्स) और चिंतन रिसर्च फाउंडेशन की एसोसिएट फेल हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.
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