नई दिल्ली: हर साल जून में पाकिस्तान का वित्त मंत्रालय थोड़े अंतराल पर दो अहम दस्तावेज जारी करता है. पहला, आर्थिक सर्वेक्षण, जो देश के पिछले आर्थिक प्रदर्शन का विश्लेषण करता है. दूसरा, संघीय बजट, जो सरकार की भविष्य की आर्थिक रणनीतियों की रूपरेखा पेश करता है.
अलग-अलग देखने पर ये दोनों दस्तावेज आशावादी लग सकते हैं. लेकिन जब इन्हें साथ पढ़ा जाता है, तो पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक स्थिति का एक बुनियादी विरोधाभास सामने आता है.
देश ने बदलाव के बिना स्थिरता हासिल की है, अपने कर्जदाताओं को संतुष्ट किया है लेकिन अपने नागरिकों की जरूरतों को पर्याप्त रूप से पूरा नहीं किया है. उसकी सबसे ज्यादा सराही गई वित्तीय उपलब्धि पूरी तरह हासिल होने से पहले ही कमजोर पड़ती दिख रही है.
पाकिस्तान आर्थिक सर्वे 2025-26 संकट से उबरने की कहानी पेश करता है. जीडीपी वृद्धि पिछले वित्त वर्ष के 3.18 प्रतिशत से बढ़कर 3.7 प्रतिशत हो गई है. वित्त वर्ष 2023 में 28-38 प्रतिशत तक पहुंची महंगाई चालू वित्त वर्ष के पहले 10 महीनों में औसतन 6.2 प्रतिशत रही. आमतौर पर घाटे में रहने वाला चालू खाता पहले तीन तिमाहियों में 7.2 करोड़ अमेरिकी डॉलर के अधिशेष में रहा. विदेशी मुद्रा भंडार कई वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गया है. जुलाई-मार्च वित्त वर्ष 2026 के लिए जीडीपी के 3.2 प्रतिशत के बराबर 4,091.5 अरब पाकिस्तानी रुपये का प्राथमिक अधिशेष एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया गया है. पाकिस्तान का वित्त वर्ष 1 जुलाई से शुरू होकर 30 जून को समाप्त होता है.
ये आंकड़े वास्तविक हैं और इनके पीछे किए गए प्रयास भी बड़े हैं. पाकिस्तान आर्थिक पतन के किनारे से वापस लौट आया है.
लेकिन स्थिरता का मतलब विकास नहीं होता. यह केवल एक बाधा को हटाती है. जब आर्थिक सर्वेक्षण को वित्त वर्ष 2026-27 के संघीय बजट के साथ रखा जाता है, तो पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति और उसकी विकास संबंधी आकांक्षाओं के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है.
उधार के सहारे बना अधिशेष
पाकिस्तान के इस चर्चित प्राथमिक अधिशेष का जश्न मनाने से पहले इसकी जांच जरूरी है. यह दो ऐसे तत्वों पर आधारित है जो न तो संरचनात्मक हैं और न ही टिकाऊ.
पहला, ब्याज भुगतान में 23.2 प्रतिशत की कमी आई. इसका कारण देश के कर्ज का बोझ कम होना नहीं था, बल्कि पाकिस्तान के स्टेट बैंक द्वारा संकट के बाद ब्याज दरों को कम करने का फैसला था. ब्याज भुगतान वह लागत है जो सरकार अपने जमा हुए कर्ज पर चुकाती है. यानी सार्वजनिक कर्ज उठाने की कीमत. किसी देश का कर्ज जितना ज्यादा होगा और जिस ब्याज दर पर उसने कर्ज लिया होगा, यह बोझ उतना ही भारी होगा.
संकट का दौर लगभग वित्त वर्ष 2022 से वित्त वर्ष 2024 तक रहा, जब पाकिस्तान ने आजादी के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक संकट झेला. इस दौरान महंगाई 38 प्रतिशत तक पहुंच गई, देश लगभग डिफॉल्ट की स्थिति में आ गया और स्टेट बैंक ने अपनी नीति दर बढ़ाकर रिकॉर्ड 22 प्रतिशत कर दी. ब्याज दरों में कटौती जून 2024 में शुरू हुई. इसलिए अगले वित्त वर्ष में ब्याज भुगतान में आई कमी उसी देरी से शुरू हुई राहत का सीधा नतीजा है.
इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि स्टेट बैंक ने सरकार को 2,428 अरब पाकिस्तानी रुपये का मुनाफा दिया. यह एक तरह का अतिरिक्त लाभ था, जो संकट के वर्षों में ऊंची ब्याज आय से मिला, जबकि उसी संकट ने देश को काफी नुकसान पहुंचाया था.
इन दोनों कारकों को अलग कर दें, तो वित्तीय स्थिति उतनी प्रभावशाली नहीं दिखती.
जब वित्त वर्ष 2026-27 के संघीय बजट को देखा जाता है, तो स्टेट बैंक का मुनाफा घटकर 1,435 अरब पाकिस्तानी रुपये रहने का अनुमान है. यानी सिर्फ एक गैर-कर राजस्व मद में लगभग 1,000 अरब रुपये की गिरावट.
यह अनुमान की अनिश्चितता का मामला नहीं है. यह वित्तीय अनिवार्यता को दिखाता है. जब किसी केंद्रीय बैंक की संकट के समय की कमाई सामान्य होती है, तो वह अनुमान के मुताबिक ही घटती है. वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कुल संघीय राजकोषीय घाटा 7,020 अरब पाकिस्तानी रुपये रहने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2025-26 के संशोधित अनुमान से अधिक है. प्राथमिक अधिशेष जीडीपी के 2.5 प्रतिशत से घटकर 2 प्रतिशत रहने की उम्मीद है. यानी पाकिस्तान की वित्तीय मजबूती का सर्वोच्च दौर पहले ही गुजर चुका है.


गलत दिशा में बढ़ती अर्थव्यवस्था
आर्थिक सर्वे में दिए गए क्षेत्रवार आंकड़े अर्थशास्त्रियों के लिए एक अहम तथ्य सामने रखते हैं. पाकिस्तान की 3.7 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि में सेवा क्षेत्र का योगदान 2.39 प्रतिशत अंक रहा, जो कृषि के 0.68 अंक और उद्योग के 0.64 अंक के संयुक्त योगदान से भी ज्यादा है.
हालांकि बड़े पैमाने का विनिर्माण पिछले साल की गिरावट से उबर गया है, लेकिन अर्थव्यवस्था का ढांचा अभी भी खुदरा व्यापार, सरकारी प्रशासन और डिजिटल सेवाओं पर केंद्रित है.

विकास अर्थशास्त्र में “समय से पहले औद्योगिकीकरण खत्म होना” या “प्रीमैच्योर डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन”, जिसे अर्थशास्त्री डैनी रोड्रिक ने पहचाना, आज के कई विकासशील देशों की बड़ी समस्या है. ये देश आर्थिक विकास के विनिर्माण चरण को पार कर सीधे सेवा आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ जाते हैं, बिना मजबूत औद्योगिक आधार बनाए. इसका परिणाम यह होता है कि आर्थिक गतिविधियां बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा नहीं कर पातीं, निर्यात में पर्याप्त क्षमता नहीं होती और वृद्धि से संरचनात्मक बदलाव नहीं आता.
इसके विपरीत, पूर्वी एशिया की वे अर्थव्यवस्थाएं जिन्होंने स्थायी विकास हासिल किया, उन्होंने तेज विकास के दौर में अपनी जीडीपी का 30 से 40 प्रतिशत निवेश किया. लेकिन पाकिस्तान का निवेश-से-जीडीपी अनुपात कई वर्षों से लगभग 14.38 प्रतिशत पर अटका हुआ है. भारत ने भी अपनी चुनौतियों के बावजूद विनिर्माण निवेश को रणनीतिक रूप से बढ़ावा दिया, जबकि पाकिस्तान ने ऐसा रास्ता नहीं अपनाया.
वित्त वर्ष 2026-27 का संघीय बजट भी इसका कोई समाधान नहीं देता. सार्वजनिक क्षेत्र विकास कार्यक्रम के लिए कुल आवंटन 1,000 अरब पाकिस्तानी रुपये ही रखा गया है, जो पिछले साल के बराबर है. यानी वास्तविक रूप से इसमें गिरावट हुई है. अगले वर्ष के लिए रक्षा मामलों और सेवाओं के लिए 3,010.9 अरब रुपये रखे गए हैं, जबकि शिक्षा के लिए 117.7 अरब रुपये और स्वास्थ्य के लिए 37.4 अरब रुपये आवंटित किए गए हैं.
ध्यान देने वाली बात यह है कि रक्षा बजट शिक्षा बजट से लगभग 25 गुना और स्वास्थ्य बजट से 80 गुना ज्यादा है. ऐसे देश में, जहां आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार शिक्षा पर खर्च जीडीपी का सिर्फ 0.8 प्रतिशत है, ये बजटीय आवंटन यह नहीं दिखाते कि सरकार अपनी संरचनात्मक समस्याओं को समझती है या उन्हें दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है.
प्रवासी पाकिस्तानियों के पैसों पर टिकी अर्थव्यवस्था
आर्थिक सर्वेक्षण और बजट से मिलने वाली जानकारियों में बाहरी खाते की कहानी सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है. पाकिस्तान का 7.2 करोड़ अमेरिकी डॉलर का चालू खाता अधिशेष मुख्य रूप से विदेशों में काम करने वाले पाकिस्तानियों द्वारा भेजी गई रकम, यानी रेमिटेंस, की वजह से है. चालू वित्त वर्ष की पहली तीन तिमाहियों में यह रकम 30.3 अरब अमेरिकी डॉलर रही, जो 8.2 प्रतिशत की वृद्धि है. इसके विपरीत, वस्तुओं का निर्यात 5.8 प्रतिशत घटकर 23.3 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया. इसका मतलब है कि पाकिस्तान प्रतिस्पर्धी उत्पादन के जरिए आर्थिक सफलता हासिल नहीं कर रहा है, बल्कि अपने प्रवासी नागरिकों की कमाई पर निर्भर है.

आर्थिक सर्वेक्षण में व्यापार के आंकड़ों की दिशा एक बड़ी संरचनात्मक समस्या को उजागर करती है.
वित्त वर्ष 2026 की पहली तीन तिमाहियों में अकेले चीन के साथ पाकिस्तान का द्विपक्षीय व्यापार घाटा 12.1 अरब अमेरिकी डॉलर रहा. इस दौरान पाकिस्तान का चीन को निर्यात 1.9 अरब अमेरिकी डॉलर और आयात 14 अरब अमेरिकी डॉलर रहा. हालांकि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपेक) ने बुनियादी ढांचे में निवेश को बढ़ावा दिया है, लेकिन एक दशक बाद भी यह निर्यात क्षमता बढ़ाने में सफल नहीं हुआ है. यह असंतुलन नीतिगत कमी को दिखाता है, जिस पर न तो आर्थिक सर्वेक्षण और न ही बजट पर्याप्त ध्यान देता है.
इस बीच, आईटी निर्यात, जिसे आर्थिक सर्वेक्षण ने सकारात्मक विकास बताया है, जुलाई 2025 से मार्च 2026 के बीच 19.7 प्रतिशत बढ़कर 3.38 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया. हालांकि यह वृद्धि उत्साहजनक है, लेकिन यह भी ध्यान देने की बात है कि भारत का आईटी सेवा क्षेत्र लगभग इतनी ही कमाई हर दो हफ्ते में कर लेता है. इस अंतर का जिक्र इन दोनों दस्तावेजों में कहीं नहीं है.
वृहद आर्थिक दृष्टि से देखें तो पाकिस्तान ने वह हासिल किया है जिसे सफल स्थिरता कहा जाता है. महंगाई संकट के स्तर से नीचे आ गई है, विदेशी मुद्रा भंडार फिर भर गए हैं, आईएमएफ की किश्तें मिल गई हैं और प्राथमिक अधिशेष भी हासिल कर लिया गया है. बहुपक्षीय संस्थानों के मानकों के अनुसार पाकिस्तान ने जरूरी शर्तें पूरी कर ली हैं.
लेकिन देश के 25.2 करोड़ लोगों के लिए, जिनमें से 28.9 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं और यह संख्या बढ़ रही है, स्थिति इतनी अच्छी नहीं है.
आर्थिक सर्वेक्षण और बजट मिलकर एक स्पष्ट बात बताते हैं. पाकिस्तान ने अपने लिए कुछ समय जरूर खरीद लिया है. लेकिन यह समय कैसे इस्तेमाल किया जाएगा, इसका जवाब वे नहीं देते, क्योंकि इनमें बताई गई नीतियां इस मुद्दे को नहीं सुलझातीं. बदलाव के बिना स्थिरता आखिरकार उसी मंजिल की ओर जाने वाला एक लंबा सफर बन जाती है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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