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Thursday, 11 June, 2026
होमफीचरयूपी पुलिस कांस्टेबल परीक्षा सेंटर्स पर हज़ारों की भीड़, ट्रेन आते ही कैसे शुरू होती है असली जंग

यूपी पुलिस कांस्टेबल परीक्षा सेंटर्स पर हज़ारों की भीड़, ट्रेन आते ही कैसे शुरू होती है असली जंग

ऐसे सिस्टम में, जहां पेपर लीक और परीक्षाएं रद्द होने की घटनाएं बढ़ रही हैं, हर नौकरी के लिए होने वाली भागदौड़ किसी ओलंपिक खेल से कम नहीं है. दिप्रिंट ने मेरठ से मुजफ्फरनगर तक अभ्यर्थियों के साथ सफर किया, देखें हमारी फोटो गैलरी.

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बिजनौर, मेरठ: रात करीब 12:30 बजे मेरठ से निकलने वाली आखिरी बस बिजनौर स्टेशन पहुंची. बिमल और अभिषेक की पहली प्राथमिकता एक मुफ्त और इस्तेमाल करने लायक शौचालय ढूंढना थी, फिर सोने के लिए जगह तलाशना. वे उन हज़ारों जॉब एस्पिरेंट्स में शामिल हैं, जो उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों के अलग-अलग हिस्सों से बहुप्रतीक्षित और बेहद प्रतिस्पर्धी पुलिस कांस्टेबल परीक्षा देने पहुंचे थे. तरोताज़ा होने के बाद उन्होंने बस स्टेशन के एक कोने में गमछा और अपने साथ लाया हुआ सफेद कपड़ा बिछाकर सोने की तैयारी की.

अभिषेक ने कहा, “सरकार को हमारे लिए स्पेशल ट्रेन, ज्यादा बसें या कम से कम ठहरने की व्यवस्था करनी चाहिए थी.” वह SSC, यूपी SI और कांस्टेबल परीक्षा समेत 10 से ज्यादा प्रतियोगी परीक्षाएं दे चुके हैं.

मेरठ से मुजफ्फरनगर जाने वाली ट्रेन में एस्पिरेंट्स ठूंस-ठूंसकर भरे हुए हैं. गर्मी सफर की परेशानी को और बढ़ा देती है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
मेरठ से मुजफ्फरनगर जाने वाली ट्रेन में एस्पिरेंट्स ठूंस-ठूंसकर भरे हुए हैं. गर्मी सफर की परेशानी को और बढ़ा देती है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

सिस्टम की शिकायत करने के बावजूद बिमल और अभिषेक हर परीक्षा के लिए सफर करते हैं. उनकी परेशानियां हमेशा एक जैसी रहती हैं—लंबी दूरी, असुविधा और उससे भी लंबा इंतज़ार. नीरज घायवान की फिल्म होमबाउंड में रेलवे स्टेशनों पर परीक्षा देने पहुंचे हताश एस्पिरेंट्स की भीड़ का जो दृश्य दिखाया गया है, वह बिल्कुल भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया गया. ट्रेन में चढ़ने की होड़ कई बार सुरक्षा की कीमत पर भी होती है. वे सार्वजनिक बसों और ट्रेनों में ठूंस-ठूंसकर सफर करते हैं. भारत में नौकरियां कम हैं, लेकिन एस्पिरेंट्स की संख्या बेहिसाब है.

इस साल यूपी पुलिस में कांस्टेबल के 32 हज़ार से ज्यादा पद निकले हैं और कुल 28,86,797 एस्पिरेंट्स ने परीक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है. परीक्षा 8, 9 और 10 जून को तीन दिनों तक हर दिन दो शिफ्ट में आयोजित की गई. पहले दिन ही सात लाख से ज्यादा एस्पिरेंट्स परीक्षा में शामिल हुए. यह परीक्षा आखिरी बार 2023-24 में हुई थी. तब सरकार ने 60 हज़ार से ज्यादा पद निकाले थे और 48 लाख से ज्यादा आवेदक थे.

ऐसे सिस्टम में, जहां पेपर लीक और परीक्षाएं रद्द होने की घटनाएं बढ़ रही हैं, हर नौकरी के लिए होने वाली बेतहाशा दौड़ किसी ओलंपिक खेल से कम नहीं है. वर्षों की पढ़ाई और तैयारी के बाद परीक्षा केंद्र तक पहुंचने का सफर ही आखिरी चुनौती बन जाता है. उस एक सरकारी नौकरी को पाने की पूरी कोशिश उनके चेहरों पर साफ दिखाई देती है.

बिजनौर में परीक्षा केंद्र के बाहर एस्पिरेंट | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
बिजनौर में परीक्षा केंद्र के बाहर एस्पिरेंट | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

Aspirants outside the exam centre in Bijnor. | Manisha Mondal | ThePrint

Aspirants outside the exam centre in Bijnor. | Manisha Mondal | ThePrint

25 साल के सागर ने कहा, “युवा अपने सपनों को पूरा करने और नौकरी पाने के लिए दुर्घटना का जोखिम उठा रहे हैं और ऐसे सफर झेल रहे हैं. हममें से कई लोग तीन-चार साल से तैयारी कर रहे हैं. पेपर लीक हो जाते हैं, भर्तियां देर से होती हैं और जवाबदेही खत्म हो गई है. सत्ता में कोई भी सरकार हो, छात्रों के लिए रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है.”

सागर रेलवे में होमगार्ड की लिखित परीक्षा पास कर चुके हैं.

बिमल और अभिषेक की परीक्षा आखिरी दिन थी.

बैग लिए भटकते साये

बिजनौर बस स्टेशन पर रात की डरावनी खामोशी हर दो घंटे में आने वाली एक बस से ही टूटती है. बिमल और अभिषेक रात बिताने के लिए बैठ चुके हैं, लेकिन एस्पिरेंट्स का आना-जाना अभी भी जारी है.

बस स्टेशन के बाहर बिजनौर और आसपास के गांवों से युवा लगातार पहुंच रहे हैं. दूर से लोग स्कूल बैग लेकर भटकते सायों जैसे दिख रहे हैं—परेशान और बिना किसी स्पष्ट दिशा के.

बिमल (काले कपड़ों में) और अभिषेक (हरे कपड़ों में), बिजनौर बस स्टेशन पर | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
बिमल (काले कपड़ों में) और अभिषेक (हरे कपड़ों में), बिजनौर बस स्टेशन पर | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

मेरठ जाने वाली अगली बस का इंतज़ार कर रहे 23-वर्षीय एस्पिरेंट राकेश ने कहा, “हम ट्रेन से नहीं जा सकते क्योंकि बहुत भीड़ है और कोई सीधी सेवा भी नहीं है.” वह रात 12 बजे बिजनौर स्थित अपने घर से आखिरी बस पकड़कर निकले थे.

राकेश और उनके दोस्तों के समूह को करीब 150 किलोमीटर दूर बुलंदशहर पहुंचना है. वहां जाने के लिए उन्हें पहले मेरठ, जो सबसे नजदीकी बड़ा शहर है, तक बस लेनी होगी और फिर दूसरी बस बदलनी होगी.

एक एस्पिरेंट ने कहा, “जब परीक्षा केंद्र इतना दूर दिया है, तो कम से कम बस सेवा तो देनी चाहिए थी.” दूसरे भी बातचीत में शामिल हो गए और सुविधाओं की कमी को लेकर प्रशासन को कोसने लगे. बात जल्दी ही राजनीति, “कॉकरोच जनता पार्टी” और विकल्पों की तलाश पर पहुंच गई—ऐसी चर्चा जो राज्य भर में एस्पिरेंट्स को ले जाने वाली ट्रेनों, बसों और साझा वाहनों में बार-बार सुनाई देती है.

बिमल और अभिषेक एक ही गांव—कासगंज के रहने वाले हैं. दोनों साथ बड़े हुए और अब सरकारी नौकरी के अपने सपने को पूरा करने के लिए साथ सफर कर रहे हैं. वे अपने परिवार में कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने वाली पहली पीढ़ी हैं.

मेरठ से बिजनौर जाने वाली बस के दृश्य | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
मेरठ से बिजनौर जाने वाली बस के दृश्य | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

Scenes from the bus going from Meerut to Bijnor. | Manisha Mondal | ThePrint

करीब तीन साल पहले बिमल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दिल्ली के मुखर्जी नगर चले गए थे, जबकि अभिषेक गांव में ही रहे, लेकिन दूरी उनकी दोस्ती को प्रभावित नहीं कर सकी. बिमल शाम 7 बजे दिल्ली के कश्मीरी गेट से निकले थे. लगभग उसी समय अभिषेक कासगंज से रवाना हुए. हापुड़ और फिर मथुरा होते हुए दोनों मेरठ में मिले. इसके बाद उन्होंने मेरठ से बिजनौर की बस साथ में पकड़ी.

अभिषेक ने कहा, “मैं एक छोटे गांव में रहता हूं, वहां कोई सीधा परिवहन नहीं है.”

23 साल के अभिषेक दूसरी बार यूपी पुलिस कांस्टेबल परीक्षा दे रहे हैं. तीन साल की कड़ी तैयारी के बावजूद उन्हें अभी तक सफलता नहीं मिली है. कई अन्य एस्पिरेंट्स की तरह वह भी अब शिक्षक भर्ती से लेकर पुलिस सेवाओं तक कई परीक्षाएं देते हैं, इस उम्मीद में कि इनमें से कोई एक उन्हें सरकारी नौकरी दिला देगी.

कोचिंग का वीडियो देखते हुए सो गया एक एस्पिरेंट | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
कोचिंग का वीडियो देखते हुए सो गया एक एस्पिरेंट | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

मेरठ स्टेशन पर बिमल के साथ एक छोटी प्लेट वेज बिरयानी खाते हुए अभिषेक ने कहा, “सरकार बदलने के साथ परीक्षा की प्रक्रिया भी बदल जाती है. हम देख रहे हैं कि अभी क्या हो रहा है. यह सब प्रचार है.”

रात 10 बजे यह दोनों का दिन का पहला सही खाना था.

बिमल और अभिषेक कुछ खाते हुए | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
बिमल और अभिषेक कुछ खाते हुए | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
बिमल और अभिषेक कुछ खाते हुए | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
बिमल और अभिषेक कुछ खाते हुए | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

अभिषेक 2026 की यूपीटीईटी (उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा) देने की भी तैयारी कर रहे हैं. यह प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में शिक्षक बनने के इच्छुक एस्पिरेंट्स के लिए पात्रता परीक्षा है. यह परीक्षा जुलाई में होने वाली है. 2018 के बाद पहली बार राज्य में बड़े स्तर पर शिक्षकों की भर्ती हो रही है.

अभिषेक की पुलिस परीक्षा दूसरी पाली में है, जबकि बिमल सुबह की पाली में परीक्षा देंगे, लेकिन उससे पहले ज़रूरी है—नींद.

बिजनौर रेलवे स्टेशन पर एस्पिरेंट | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
बिजनौर रेलवे स्टेशन पर एस्पिरेंट | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

Aspirants at the Bijnor train station. | Manisha Mondal | ThePrint

Aspirants at the Bijnor train station. | Manisha Mondal | ThePrint

Aspirants at the Bijnor train station. | Manisha Mondal | ThePrint

Aspirants packed like sardines at the Bijnor train station. | Manisha Mondal | ThePrint

जगह की जंग

महेश (23) और ईश्वर (24) मेरठ से बिजनौर जा रही बस में एक-दूसरे के पास बैठे हैं, लेकिन वे परीक्षा देकर अब घर लौट रहे हैं.

पिछले दो साल से उन्होंने सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं किया है. घर लौटने की चार घंटे की बस यात्रा उनके लिए उन मनोरंजन चीज़ों को देखने का मौका थी, जिन्हें वे मिस कर रहे थे. यूट्यूब पर तमन्ना भाटिया का गाना ‘आज की रात’ उनके साझा ईयरफोन में बज रहा था और वे वीडियो देख रहे थे.

ईश्वर ने कहा, “यह हमारा मजे करने का समय है. मैंने न फिल्म देखी, न वीडियो और न ही फोन इस्तेमाल किया. मैं बस पढ़ाई करता रहा.”

उन्हें पूरा भरोसा था कि इस बार उन्हें नौकरी मिल जाएगी.

उनका उत्साह बस में कुछ सीट पीछे बैठे बिमल और अभिषेक तक भी पहुंच रहा था. दोनों उसी प्लेलिस्ट पर झूम रहे थे और अपने पसंदीदा गाने चलाने का इंतज़ार कर रहे थे.

ज्यादातर एस्पिरेंट्स को उम्मीद थी कि उनका परीक्षा केंद्र घर के पास होगा, लेकिन उन्हें 100 किलोमीटर या उससे भी ज्यादा दूर केंद्र मिले, जिसके कारण उन्हें लंबी और अक्सर महंगी यात्रा करनी पड़ी. कुछ का मानना है कि पेपर लीक रोकने के लिए प्रशासन ने ऐसा किया, जबकि कुछ इसे पहले से ही कठिन भर्ती प्रक्रिया से गुज़र रहे एस्पिरेंट्स पर एक और बोझ मानते हैं.

ट्रेन आते ही अफरा-तफरी शुरू हो जाती है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
ट्रेन आते ही अफरा-तफरी शुरू हो जाती है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

The chaos begins as soon as the train arrives. | Manisha Mondal | ThePrint

The chaos begins as soon as the train arrives. | Manisha Mondal | ThePrint

बिमल और अभिषेक ने अपने परीक्षा केंद्र तक पहुंचने के लिए करीब 1500-1500 रुपये खर्च किए.

बिमल ने कहा, “खाना, बस और दूसरे खर्च मिलाकर इतना पैसा लग गया. इसमें रजिस्ट्रेशन के लिए दिए गए 500 रुपये शामिल नहीं हैं.”

बस एस्पिरेंट्स से भरी हुई है. कुछ परीक्षा देकर घर लौट रहे हैं, तो कुछ परीक्षा केंद्र की ओर जा रहे हैं. बसें ट्रेनों की तुलना में ज्यादा आरामदायक हैं, लेकिन महंगी भी हैं.

बिमल और अभिषेक को किराया देने में कोई परेशानी नहीं हुई, खासकर इसलिए क्योंकि परीक्षा देने वालों के लिए टिकट का किराया आधा कर दिया गया था.

बिमल ने कहा, “हम ट्रेन से जाना चाहते थे, वे ज्यादा सुरक्षित होती हैं, लेकिन कोई सीधी ट्रेन नहीं थी. और उन बेहद भरी हुई ट्रेनों में सफर करना लगभग नामुमकिन था.”

वह दूसरी बार कांस्टेबल परीक्षा दे रहे हैं.

मेरठ से मुजफ्फरनगर जाने वाली ट्रेन में सांस लेने तक की जगह नहीं है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
मेरठ से मुजफ्फरनगर जाने वाली ट्रेन में सांस लेने तक की जगह नहीं है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

There's barely space to breathe in the train from Meerut to Muzaffarnagar. | Manisha Mondal | ThePrint

There's barely space to breathe in the train from Meerut to Muzaffarnagar. | Manisha Mondal | ThePrint

सहारनपुर के कुछ एस्पिरेंट्स ने ट्रेन से साथ यात्रा करने का फैसला किया. उनका हिसाब था कि इससे हर व्यक्ति के करीब 50 रुपये बच जाएंगे. भर्ती परीक्षाओं के लिए बार-बार यात्रा करने वाले एस्पिरेंट्स के लिए यह छोटी लेकिन महत्वपूर्ण रकम है.

अनित, सागर, हर्षजीत, अंशु, हिमांशु और सौरभ मेरठ सिटी स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़े हैं. वे परीक्षा देकर अब सहारनपुर जाने वाली ट्रेन का इंतज़ार कर रहे हैं.

पिछली रात वे स्टेशन पर अजनबी बनकर पहुंचे थे. स्टेशन पर रात बिताने, परीक्षा देने और अपनी परेशानियां साझा करने के बाद ये 20-वर्षीय युवा अब दोस्त बनकर घर लौट रहे हैं.

उन्हें गंदी और भीड़भाड़ वाली ट्रेन में चढ़ने का कोई उत्साह नहीं है, लेकिन अब यह उनकी आदत बन चुकी है.

Elbows dig into ribs, bags brush against faces, and the crowd moves as a single restless mass. | Manisha Mondal | ThePrint

कोहनियां पसलियों में लगती हैं, बैग चेहरों से टकराते हैं और भीड़ एक बेचैन लहर की तरह आगे बढ़ती है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
कोहनियां पसलियों में लगती हैं, बैग चेहरों से टकराते हैं और भीड़ एक बेचैन लहर की तरह आगे बढ़ती है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

कोहनियां पसलियों में लगती हैं, बैग चेहरों से टकराते हैं और भीड़ एक बेचैन लहर की तरह आगे बढ़ती है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

सागर ने कहा, “हम कई सालों से ऐसा कर रहे हैं, अब तो यह आदत बन गई है.”

वे प्लेटफॉर्म के किनारे खड़े होकर बेचैनी से कदम बदल रहे थे. एल नीनो की गर्मी में पसीने से उनकी शर्टें पीठ से चिपक गई थीं.

जैसे ही ट्रेन की सीटी सुनाई दी, उनके चेहरे तनाव से लाल हो गए—वे मानो किसी लड़ाई की तैयारी कर रहे थे.

सिर पर गमछा बंधा था, बैग कसकर पकड़े हुए थे, मोबाइल फोन बैग की अंदरूनी जेब में सुरक्षित रख दिए गए थे और एक हाथ पहले से ही ट्रेन की रेलिंग पकड़ने के लिए तैयार था.

ट्रेन रुकी और हंगामा शुरू हो गया.

हर दरवाजे पर दर्जनों एस्पिरेंट्स जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. कोहनियां पसलियों में लग रही थीं, बैग चेहरों से टकरा रहे थे और भीड़ एक बेचैन लहर की तरह आगे बढ़ रही थी. कुछ लोग हवा की कमी सहन न कर पाने के कारण पीछे हट गए. लेकिन ज्यादातर नहीं हटे.

ट्रेन छूट जाना कोई विकल्प नहीं था.

चिंता और अफरा-तफरी के बीच एक साझा संकल्प था—किसी भी कीमत पर ट्रेन में चढ़ना है.

पीछे न छूट जाएं, इसकी पागलपन भरी दौड़ | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
पीछे न छूट जाएं, इसकी पागलपन भरी दौड़ | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

पांच मिनट की अफरा-तफरी के बाद प्लेटफॉर्म खाली हो गया. सभी ट्रेन में चढ़ चुके थे.

लेकिन राहत अभी भी दूर थी.

घर बहुत दूर था और साथी यात्री बहुत पास.

वे मुश्किल से एक-दूसरे से एक इंच की दूरी पर खड़े थे. पसीना उनके चेहरों से बह रहा था, लेकिन जैसे ही ट्रेन चलने लगी, हवा का झोंका आया, जिससे सांस लेना और सफर सहना थोड़ा आसान हो गया.

ट्रेन के दरवाजे पर खड़े हर्षजीत ने कहा, “यह मेरा दूसरा प्रयास है. पिछली भर्ती में मैं सिर्फ एक नंबर से अंतिम मेरिट सूची से बाहर रह गया था. छात्रों के लिए, दोबारा परीक्षा देने वालों के लिए, किसी के लिए भी कोई सही व्यवस्था नहीं है. हर चरण संघर्ष जैसा लगता है.”

हर्षजीत की बात के बाद शिकायतों का सिलसिला शुरू हो गया.

सागर ने कहा, “मैं इतनी भीड़ में सफर कर चुका हूं कि पूरे रास्ते एक पैर पर खड़ा रहना पड़ा. छात्र क्या करें? लोग बहुत ज्यादा हैं और अवसर बहुत कम.”

एस्पिरेंट्स आम यात्रियों के साथ सफर करते हैं. उनके लिए कोई विशेष परिवहन व्यवस्था नहीं है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
एस्पिरेंट्स आम यात्रियों के साथ सफर करते हैं. उनके लिए कोई विशेष परिवहन व्यवस्था नहीं है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

हर स्टेशन पर भीड़ बढ़ती जा रही थी, लेकिन वे हंसी-मजाक और बीच-बीच में शिकायतों के सहारे एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते रहे. दिप्रिंट ने मेरठ से मुजफ्फरनगर तक उनके साथ यात्रा की.

सागर ने कहा, “जिन छात्रों का चयन हो चुका है, वे भी अभी तक जॉइनिंग लेटर का इंतज़ार कर रहे हैं. उनकी स्थिति देखिए—वे कहां रहें, क्या करें? हम लगातार ‘विकसित भारत’ की बात सुनते हैं, लेकिन कई युवाओं की हकीकत यही है.”

स्थिर आय की दौड़

जहां भी एस्पिरेंट जाते, वहां गरमागरम चर्चाएं शुरू हो जातीं. सीजेपी एक आम चर्चा का विषय था, विपक्ष भी और 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी.

मेरठ से बिजनौर जाने वाली बस कंडक्टर के कहने पर 20 मिनट के लिए रुक गई. बस में बहुत ज्यादा एस्पिरेंट सवार थे. चलती बस में वह सभी के एडमिट कार्ड स्कैन नहीं कर पा रहे थे.

कौने में बैठे एक व्यक्ति ने कहा, “इन Gen Z की वजह से बस लेट हो रही है.”

बस की 90 प्रतिशत से ज्यादा सीटों पर एस्पिरेंट्स बैठे थे, लेकिन किसी ने उस बहस में हिस्सा नहीं लिया. शायद वे थक चुके थे या फिर उनके सामने लड़ने के लिए और भी बड़ी लड़ाइयां थीं.

An aspirant revises as he waits for the train at the Meerut station. | Manisha Mondal | ThePrint

मेरठ स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार करते हुए एक एस्पिरेंट पढ़ाई करते हुए | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

बिमल ने कहा, “मेरी बस एक ही इच्छा है—सरकारी नौकरी मिल जाए और बेरोजगारी खत्म हो जाए.” बीएससी पास बिमल के पिता गांव में टेंट-पंडाल किराये पर देने का काम करते हैं. बिमल एक स्थिर आय और ज़िंदगी में थोड़ी निश्चितता का सपना देखता है.

यह सपना सिर्फ उनका नहीं है. परीक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वाले करीब 29 लाख एस्पिरेंट भी यही सपना देख रहे हैं. खचाखच भरी ट्रेनें, बिना सोए की गई यात्राएं और एस्पिरेंट्स की बढ़ती भीड़ इस बात का सबूत हैं कि कितने युवा इस सपने के पीछे भाग रहे हैं.

स्टेशन पर पढ़ाई करते छात्र | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
स्टेशन पर पढ़ाई करते छात्र | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

Students revise at the station. | Manisha Mondal | ThePrint

फलौदा, मेरठ में अरसलान आखिरी समय की तैयारी कर रहे हैं. 23 साल के अरसलान ने तीन साल में 16 परीक्षाएं दी हैं. उनका दावा है कि उन्होंने 15 लिखित परीक्षाएं पास कीं, लेकिन अंतिम चरण पार नहीं कर पाए.

अरसलान के पिता ने उनके भाई से मोटरसाइकिल उधार मांगी ताकि वह अरसलान को परीक्षा केंद्र तक छोड़ सके. अरसलान ने कहा, “मैं किसी भी कीमत पर सफल होना चाहता हूं. मुझे सफर की परेशानी की परवाह नहीं है.” यह UP कांस्टेबल परीक्षा में उनका दूसरा प्रयास था.

उन्होंने कहा, “मुझे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर करनी है. मेरे लिए और कुछ मायने नहीं रखता, यहां तक कि मेरा धर्म भी नहीं.” उन्होंने उसने यह भी बताया कि उनके हिंदू दोस्त परीक्षा की तैयारी में उनकी मदद करते हैं.

मेरठ स्टेशन पर भीड़ | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
मेरठ स्टेशन पर भीड़ | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

Crowds at the Meerut station. | Manisha Mondal | ThePrint

Crowds at the Meerut station. | Manisha Mondal | ThePrint

अरसलान के पिता दर्जी हैं और पूरे परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है. अरसलान को उम्मीद है कि सरकारी नौकरी मिलने के बाद वह इस जिम्मेदारी को बांट पाएंगे.

परीक्षा देने जा रहे युवाओं और कुछ गिनी-चुनी युवतियों के बीच यह भावना बहुत आम है.

बिमल बस स्टेशन पर अभिषेक का इंतज़ार कर रहे हैं. उन्होंने दिन की पहली पाली में परीक्षा दी थी. दो घंटे की परीक्षा में जीके, गणित और रीजनिंग से सवाल पूछे गए थे. अब वह अपनी अगली परीक्षा के बारे में सोच रहे हैं—रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB) की Non-Technical Popular Categories (NTPC) परीक्षा.

यह परीक्षा नोएडा में है, लेकिन उन्हें इसकी ज्यादा चिंता नहीं है. यह दिल्ली के मुखर्जी नगर स्थित उनके घर के काफी करीब है. यानी अब इस भीषण गर्मी में ऐसी भागदौड़ और थका देने वाली यात्रा नहीं करनी पड़ेगी.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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