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Thursday, 11 June, 2026
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नेहरू मोदी से ज्यादा समय तक PM रहे, लेकिन हिंदू राष्ट्रवादियों से बहस करने का कोई मतलब नहीं है

अगर नेहरू की राजनीति और शासन धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद को दिखाते थे, तो मोदी की राजनीति और शासन हिंदू राष्ट्रवाद को दर्शाते हैं.

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भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) एक नए राजनीतिक “कीर्तिमान” का जश्न मना रही है. हिंदू राष्ट्रवाद के प्रमुख विचारकों में से एक राम माधव ने 10 जून को लिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “लगातार 4,399 दिन पद पर पूरे कर लेंगे और पहले आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री के रूप में जवाहर लाल नेहरू के 4,398 दिनों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ देंगे.” इस मौके के राजनीतिक महत्व को दिखाने के लिए भाजपा ने पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भारत मंडपम में आधिकारिक कार्यक्रम आयोजित किया. मोदी का नेहरू से ज्यादा समय तक शासन करना भाजपा और उसकी विचारधारा हिंदू राष्ट्रवाद के लिए एक प्रतीकात्मक क्षण है.

हालांकि, भारत के विद्वानों और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए मोदी का नेहरू से अधिक समय तक शासन करने का दावा कुछ उलझाने वाला है. आखिरकार नेहरू 15 अगस्त 1947 से 27 मई 1964 तक प्रधानमंत्री रहे थे. यानी लगभग 17 साल, जबकि मोदी अभी करीब 12 साल से प्रधानमंत्री हैं.

यह उलझन कुछ हद तक तब दूर होती है जब हम देखते हैं कि शासन अवधि की गणना कैसे की गई है. राम माधव के अनुसार, गिनती 1947 से नहीं, बल्कि पहले आम चुनाव (1952) के बाद नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के दिन से शुरू होनी चाहिए. हिंदू राष्ट्रवादियों का एक बार-बार दोहराया जाने वाला दावा, जिस पर अकादमिक जगत में विवाद है, यह है कि अगर महात्मा गांधी ने हस्तक्षेप न किया होता और नेहरू को न चुना होता, तो आजादी के बाद वल्लभभाई पटेल भारत के प्रधानमंत्री बनते.

शायद शासन अवधि की इस हिंदू राष्ट्रवादी गणना पर ज्यादा बहस नहीं करनी चाहिए. आंकड़े चाहे जो भी कहें, मोदी काफी लंबे समय से भारत पर शासन कर रहे हैं और मोदी तथा नेहरू की तुलना राजनीतिक और वैचारिक रूप से महत्वपूर्ण है. अगर नेहरू ने बी. आर. आंबेडकर के साथ मिलकर भारत में संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की नींव रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई, तो मोदी हिंदू राष्ट्रवादी व्यवस्था बनाने की एक सुनियोजित कोशिश के प्रमुख चेहरों में रहे हैं. हिंदू राष्ट्रवाद को अभी तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिली है. ऐसा शायद तब हो सकता था अगर 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को दो-तिहाई बहुमत मिल जाता. लेकिन राजनीतिक रूप से यह विचार काफी आगे बढ़ चुका है. आज भाजपा का राजनीतिक शासन या प्रभाव भारत की लगभग 75 प्रतिशत आबादी तक फैला हुआ है.

वोट शेयर का सवाल

मोदी और नेहरू के राजनीतिक अंतर पर बात करने से पहले, एक और आंकड़े वाली बात को जल्दी से समझ लेते हैं. नेहरू के सत्ता में रहने के दौरान कांग्रेस को 40 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे. 1952 में कांग्रेस को 45 प्रतिशत वोट मिले, 1957 में 47.8 प्रतिशत और 1962 में 44.7 प्रतिशत

उन्हीं वर्षों में भाजपा की पूर्ववर्ती पार्टी भारतीय जनसंघ को क्रमशः 3.1 प्रतिशत, 5.9 प्रतिशत और 6.4 प्रतिशत राष्ट्रीय वोट मिले थे. उस समय की यह छोटी शुरुआत अब बहुत बड़े चुनावी प्रदर्शन में बदल चुकी है, लेकिन भाजपा अभी भी 40 प्रतिशत वोट शेयर तक नहीं पहुंच पाई है, जिसे कांग्रेस 1984 तक (1977 को छोड़कर) लगातार पार करती रही थी. भाजपा जितनी भी मजबूत हो, चुनावी नजरिए से वह अभी भी उतनी विशाल नहीं हुई है, जितनी कभी कांग्रेस हुआ करती थी.

लेकिन वैचारिक रूप से भाजपा का प्रभुत्व बेहद महत्वपूर्ण है. मोदी उन सभी बातों के बिल्कुल उलट हैं, जिनका प्रतिनिधित्व नेहरू करते थे. दोनों एक-दूसरे से जितने अलग हो सकते हैं, उतने अलग हैं. यही कारण है कि मोदी और नेहरू की अलग-अलग राजनीतिक यात्राएं यह बताती हैं कि भारत की राजनीति और समाज किस दिशा में बढ़ रहे हैं. 1940 और 1950 के दशक में मुख्यधारा के बुद्धिजीवी हिंदू महासभा, आरएसएस और जनसंघ द्वारा प्रस्तुत हिंदू राष्ट्रवाद को राष्ट्रवाद का रूप नहीं मानते थे. उसे “हिंदू सांप्रदायिकता” कहा जाता था. इसी तरह मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाले मुस्लिम राष्ट्रवाद को “मुस्लिम सांप्रदायिकता” कहा जाता था.

नेहरू ने सांप्रदायिकता को परिभाषित करते हुए कहा था कि यह “एक संकीर्ण समूह मानसिकता है, जो धार्मिक समुदाय के आधार पर खड़ी होती है, लेकिन वास्तव में उसका मकसद उस समूह के लिए राजनीतिक शक्ति और संरक्षण हासिल करना होता है.” नेहरू की यह परिभाषा बाद में अकादमिक और राजनीतिक जगत की सामान्य समझ बन गई. हालांकि, आधुनिक सामाजिक विज्ञान के अनुसार, हिंदू राष्ट्रवाद और पहले का मुस्लिम राष्ट्रवाद दोनों ही धार्मिक राष्ट्रवाद के रूप हैं और एक-दूसरे की प्रतिबिंब जैसी तस्वीर पेश करते हैं.

राष्ट्रवाद के प्रसिद्ध विद्वान अर्नेस्ट गेलनर के शब्दों में, राष्ट्र का अर्थ है “किसी संस्कृति को उसकी अपनी राजनीतिक छत देना.” धार्मिक राष्ट्रवाद धर्म को संस्कृति के समान मानते हुए अपने धार्मिक समुदाय के लिए राजनीतिक छत चाहता है. ऐसा राष्ट्रवाद आमतौर पर समावेशी नहीं बल्कि बहिष्कारी होता है. यह धार्मिक समुदाय के भीतर राजनीतिक एकता बनाता है, लेकिन अलग-अलग धर्मों के बीच मिलाव नहीं बनाता.

धार्मिक राष्ट्रवाद धार्मिक आधार पर राजनीतिक अधिकार और विशेषाधिकार भी चाहता है. इस प्रक्रिया में धर्म से जुड़े सिद्धांत और धार्मिक बहसें पीछे छूट जाती हैं. धार्मिक समुदाय एक राजनीतिक समुदाय में बदल जाता है, आस्था या धार्मिकता से ज्यादा सत्ता, पद और सार्वजनिक संसाधन महत्वपूर्ण हो जाते हैं. 1920 के दशक से विनायक दामोदर सावरकर हिंदू भारत के लिए इस सोच के प्रमुख प्रवर्तक बने. उन्होंने इसमें एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पहलू भी जोड़ा.

उनका तर्क था कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत पर मुसलमानों का शासन था और वे राज्य सत्ता के जरिए हिंदुओं पर प्रभुत्व रखते थे. उसी तर्क के अनुसार, हिंदू भी राज्य सत्ता पर नियंत्रण स्थापित करके अपनी स्थिति बदल सकते हैं और गैर-हिंदुओं, खासकर मुसलमानों, पर प्रभुत्व स्थापित कर सकते हैं. इसके विपरीत, राष्ट्र की धर्मनिरपेक्ष अवधारणा धार्मिक रूप से समावेशी होती है. इस सोच को मानने वाले लोग धर्म और राष्ट्र को मूल रूप से अलग मानते हैं.

इतिहास की विडंबना यह है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दो बेहद धार्मिक नेता—महात्मा गांधी और अबुल कलाम आज़ाद—भी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के समर्थक बने. मोदी के लिए केवल नेहरू ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं. आजाद और खास तौर पर गांधी भी हैं. गांधी, जो स्वयं एक आस्थावान सनातनी हिंदू थे, ने कहा था:

“अगर हिंदू यह मानते हैं कि भारत में सिर्फ हिंदू ही रहने चाहिए, तो वे सपनों की दुनिया में जी रहे हैं. हिंदू, मुसलमान, पारसी और ईसाई, जिन्होंने भारत को अपना देश बनाया है, सभी देशवासी हैं.”

गहरे धार्मिक मुसलमान मौलाना आजाद ने जिन्ना और पाकिस्तान आंदोलन का विरोध किया था. उन्होंने कहा था, “मैं मुसलमान हूं और इस पर गर्व करता हूं. इसके साथ ही मुझे भारतीय होने पर भी गर्व है. मैं भारतीय राष्ट्रीयता की अविभाज्य एकता का हिस्सा हूं. हमारी भाषाएं, हमारी कविता, हमारा साहित्य, हमारी संस्कृति, हमारी कला, हमारा पहनावा, हमारे तौर-तरीके और हमारे रोजमर्रा के जीवन की अनगिनत घटनाएं, सब पर हमारे संयुक्त (हिंदू-मुस्लिम) प्रयासों की छाप है. यह जुड़ी हुई विरासत हमारी राष्ट्रीयता की धरोहर है.”

मोदी के भारत में पॉलिटिक्स

आज़ादी के बाद, भारत के संविधान ने देश के सेक्युलर नज़रिए को सपोर्ट किया. संविधान ने इस बहस के दो मुख्य सिद्धांतों को पक्का किया: सभी धर्मों की बराबरी और सरकार की धार्मिक निष्पक्षता. हिंदुओं को कोई खास अधिकार नहीं दिए गए. एक गहरे विधायक-रचनात्मक अर्थ में, नेहरू ने इस नज़रिए को अपनाया. उतने ही गहरे रूप से, मोदी ने सावरकर के नज़रिए को अपना लिया है. अगर नेहरू की पॉलिटिक्स और राज करने का तरीका सेक्युलर राष्ट्रवाद को दिखाता था, तो मोदी की पॉलिटिक्स और राज करने का तरीका हिंदू राष्ट्रवाद को दिखाता है.

भले ही संविधान अब तक असल में बदला नहीं है, लेकिन मोदी के चुनावी दबदबे का मतलब है कि, राजनीतिक रूप से, भारत ने मूल संवैधानिक सिद्धांतों से दूरी बना ली है. अब एक ज़रूरी सवाल यह है. क्या हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति आखिरकार संविधान को भी बदल देगी?

अगर ऐसा होता है, तो वह नेहरू को पूरी तरह से मिटाने जैसा होगा. मोदी आदर्श रूप से ऐसा ही बदलाव और जीत चाहेंगे. लेकिन डेमोक्रेसी के उतार-चढ़ाव का अंदाज़ा पूरी तेरह से नहीं  लगाया जा सकता. खास तौर पर, भारत और दुनिया की डेमोक्रेटिक पॉलिटिक्स में कमज़ोर लोगों की ताक़त ने कई बार ताकतवर लोगों के प्लान को पीछे धकेला है.

आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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