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Wednesday, 10 June, 2026
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E85 लॉन्च, लेकिन भारत के फ्लेक्स-फ्यूल मिशन के सामने ‘पहले गाड़ी या पहले ईंधन’ की बड़ी चुनौती

पिछले हफ्ते 48 पेट्रोल पंपों पर E85 ईंधन लॉन्च किया गया. विशेषज्ञों का कहना है कि फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों और ईंधन आउटलेट्स की कम उपलब्धता, ईंधन की लागत और कच्चे माल की स्थिरता जैसी चुनौतियां इस योजना के सामने हैं.

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नई दिल्ली: केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी द्वारा पिछले सप्ताह E85 ईंधन की शुरुआत भारत में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन इकोसिस्टम बनाने की दिशा में केंद्र सरकार का अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी कदम माना जा रहा है. यह ईंधन फिलहाल देश के 48 रिटेल आउटलेट्स पर उपलब्ध है. मोदी सरकार की योजना है कि इस साल दिसंबर तक इसे 500 आउटलेट्स और दिसंबर 2027 तक करीब 5,000 आउटलेट्स तक पहुंचाया जाए.

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFV) और ईंधन स्टेशनों की सीमित उपलब्धता, ईंधन की लागत और कच्चे माल की स्थिरता जैसी चुनौतियों को किस हद तक दूर कर पाता है.

E85 एक ऐसा ईंधन मिश्रण है जिसमें लगभग 85 प्रतिशत एथेनॉल और 15 प्रतिशत पेट्रोल होता है. इसे खास तौर पर ऐसे फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए तैयार किया गया है, जो E20 से E100 तक के एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर चल सकते हैं.

केंद्र सरकार E85 को पेट्रोल की तुलना में अधिक स्वच्छ और सस्ता विकल्प बता रही है, जिससे भारत की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम हो सकती है. पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, इसकी कीमत सामान्य पेट्रोल से करीब 20 रुपये प्रति लीटर कम होगी और इससे जीवनचक्र के दौरान होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 61 प्रतिशत तक कमी आ सकती है.

यह कदम भारत के एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए उठाया गया है. इस कार्यक्रम के तहत 2014 में एथेनॉल मिश्रण का स्तर 1.53 प्रतिशत था, जो 2026 में बढ़कर 20 प्रतिशत हो गया है. सरकार का अनुमान है कि इससे 1.84 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बची है और लगभग 302 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात की जगह ली जा सकी है.

अप्रैल 2026 से E20 देशभर के पेट्रोल पंपों पर डिफॉल्ट पेट्रोल के रूप में उपलब्ध हो गया है. ऐसे में E85 सरकार की एथेनॉल नीति का अगला बड़ा पड़ाव माना जा रहा है.

स्वतंत्र नीति शोध संस्थान सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस (CSEP) की एसोसिएट शेफाली गोयल ने दिप्रिंट से कहा, “भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में E85 का व्यापक इस्तेमाल आयात पर निर्भरता कम करने, ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने और विदेशी मुद्रा बचाने में मदद कर सकता है.”

उन्होंने कहा कि भले ही इलेक्ट्रिक वाहन कार्बन उत्सर्जन कम करने की रणनीति का अहम हिस्सा हैं, लेकिन भारत के पैसेंजर कार बाजार में उनकी हिस्सेदारी अभी भी एकल अंक (सिंगल डिजिट) में है और पूरी तरह बदलाव आने में कई साल लगेंगे. उन्होंने कहा, “E85 जैसे एथेनॉल आधारित ईंधन इस बड़े आंतरिक दहन इंजन (इंटरनल कंबशन इंजन) वाले वाहन तंत्र को कम प्रदूषण वाला बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.”

इन्फ्रास्ट्रक्चर और लागत की चुनौतियां

विशेषज्ञों के अनुसार, E85 को बड़े पैमाने पर अपनाने की सबसे बड़ी चुनौती इसके लिए जरूरी इकोसिस्टम तैयार करना है.

अमेरिका की जॉर्ज मेसन विश्वविद्यालय के एनर्जी लीडर और सीनियर विजिटिंग फेलो उमुद शोकरी ने दिप्रिंट से कहा, “निकट भविष्य में बड़े पैमाने पर इसे अपनाना मुश्किल होगा. इसकी शुरुआत प्रतीकात्मक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन मौजूदा इकोसिस्टम अभी बहुत सीमित है.”

फिलहाल E85 पूरे देश में केवल 48 रिटेल आउटलेट्स पर उपलब्ध है, जबकि फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFV) की व्यावसायिक उपलब्धता भी काफी सीमित है. विशेषज्ञ इसे “चिकन एंड एग” यानी “पहले मुर्गी या पहले अंडा” जैसी समस्या बताते हैं. उपभोक्ता तब तक FFV खरीदने से बचेंगे, जब तक ईंधन आसानी से उपलब्ध नहीं होगा, वहीं वाहन निर्माता और ईंधन विक्रेता तब तक निवेश करने से हिचकेंगे, जब तक मांग नहीं बढ़ती.

शोकरी ने कहा, “अगर एक ही बाज़ार में पर्याप्त वाहन और पर्याप्त पंप नहीं होंगे, तो E85 राष्ट्रीय बदलाव की बजाय एक सीमित पायलट परियोजना बनकर रह सकता है.”

गोयल के अनुसार, इस कार्यक्रम की सफलता के लिए तीन चीज़ें बेहद ज़रूरी हैं—आम लोगों के लिए बड़े पैमाने पर फ्लेक्स-फ्यूल पैसेंजर वाहनों की लॉन्चिंग, सरकारी लक्ष्यों के अनुसार ईंधन वितरण ढांचे का विस्तार और एथेनॉल की लगातार उपलब्धता.

ऑटोमोबाइल उद्योग अभी इस बदलाव की तैयारी कर रहा है. हीरो मोटोकॉर्प ने E85 के अनुकूल दो दोपहिया वाहन—स्प्लेंडर प्लस और HF डीलक्स—लॉन्च किए हैं, लेकिन पैसेंजर कारों के विकल्प अभी बहुत कम हैं. मारुति सुजुकी और टोयोटा जैसी कंपनियों ने फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक विकसित कर ली है, लेकिन इसे बड़े स्तर पर बाजार में उतारना अभी बाकी है.

दिप्रिंट ने इस मुद्दे पर भारतीय ऑटोमोबाइल निर्माता सोसायटी और ऑटो कार इंडिया से संपर्क करने की कोशिश की. जवाब मिलने पर रिपोर्ट अपडेट की जाएगी. एक और बड़ी चुनौती उपलब्धता की है. E85 पर चलने के लिए वाहनों में तकनीकी बदलाव करने पड़ते हैं. गोयल के अनुसार, एथेनॉल पेट्रोल की तुलना में अधिक संक्षारक (कोरोसिव) होता है, इसलिए निर्माताओं को इंजन के हिस्सों, फ्यूल सिस्टम और सेंसर में विशेष सामग्री का इस्तेमाल करना पड़ता है.

उपभोक्ता भी वाहन खरीदते समय कुल लागत पर ध्यान देंगे, जिसमें वाहन की कीमत, माइलेज, रखरखाव खर्च, दोबारा बिक्री मूल्य और ईंधन की उपलब्धता शामिल है. गोयल और शोकरी दोनों का मानना है कि शुरुआती दौर में अतिरिक्त प्रोत्साहन देने की जरूरत हो सकती है, जैसे FFV पर टैक्स में छूट और E85 की कीमतों में अधिक पारदर्शिता.

के.के. गांधी, जो पहले SIAM में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रह चुके हैं और सेंटर फॉर ऑटो पॉलिसी एंड रिसर्च में संयोजक हैं, ने कहा कि FFV सामान्य पेट्रोल वाहनों की तुलना में अधिक जटिल होते हैं क्योंकि इनमें ईंधन के मिश्रण की पहचान करने और इग्निशन टाइमिंग को समायोजित करने के लिए कई सेंसर लगाने पड़ते हैं.

उन्होंने कहा, “इन अतिरिक्त सिस्टमों के कारण FFV की कीमत पारंपरिक पेट्रोल वाहनों से ज्यादा होती है.” इससे उपभोक्ताओं के लिए इन्हें अपनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि खरीदारी का फैसला आमतौर पर वाहन की कीमत और चलाने की लागत दोनों को देखकर लिया जाता है.

हालांकि, सरकार E85 को सामान्य ईंधन से सस्ता बता रही है, लेकिन गांधी का कहना है कि एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में प्रति लीटर कम ऊर्जा होती है. उन्होंने कहा, “सरकार को E85 को आर्थिक रूप से और ज्यादा आकर्षक बनाना होगा. पेट्रोल से 20 रुपये प्रति लीटर सस्ता होने के बावजूद इसकी कीमत अभी उतनी आकर्षक नहीं है.”

गोयल ने कहा, “मात्रा के हिसाब से एथेनॉल में सामान्य पेट्रोल की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है.” उन्होंने कहा कि कुछ वाहनों में कम ईंधन दक्षता (फ्यूल एफिशिएंसी) के कारण पेट्रोल पंप पर होने वाली बचत का फायदा काफी हद तक कम हो सकता है.

‘भारत ब्राज़ील मॉडल की नकल नहीं कर सकता’

केंद्र ने अक्सर ब्राज़ील की फ्लेक्स-फ्यूल सक्सेस स्टोरी का ज़िक्र किया है, जहाँ इथेनॉल ब्लेंडिंग मेनस्ट्रीम बन गई है और FFVs की सेल्स सबसे ज़्यादा हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स यह मानने से सावधान करते हैं कि ब्राज़ील के मॉडल को आसानी से दोहराया जा सकता है.

शोकरी ने कहा, “भारत ब्राज़ील के अनुभव के कुछ हिस्सों को दोहरा सकता है, खासकर पॉलिसी कोऑर्डिनेशन और कंज्यूमर चॉइस, लेकिन इसके लिए गन्ना, मक्का, सेकंड-जेनरेशन इथेनॉल और सावधानी से सस्टेनेबिलिटी सेफगार्ड्स पर आधारित एक इंडिया-स्पेसिफिक वर्शन की ज़रूरत होगी.”

गोयल ने बताया कि ब्राज़ील की सक्सेस दशकों में बनी है, जिसमें ज़मीन की बड़ी अवेलेबिलिटी और डेडिकेटेड एनर्जी क्रॉप्स का फायदा मिला है.

भारत की इथेनॉल सप्लाई अभी ज़्यादातर गन्ने और मक्का और चावल जैसे अनाज से आती है. एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि खाने-पीने की चीज़ों पर बहुत ज़्यादा डिपेंडेंस से खाने-पीने की चीज़ों की सप्लाई और कीमतों पर प्रेशर पड़ सकता है, खासकर कमज़ोर मॉनसून वाले सालों में.

गांधी के मुताबिक, भारत पानी की कमी वाला देश है और इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने और चावल जैसी खाने-पीने की फसलों पर डिपेंड नहीं रह सकता क्योंकि सिंचाई के दौरान हज़ारों लीटर पानी खर्च होता है.

अभी के लिए, E85 फ्यूल भारत को तेल इंपोर्ट कम करने और एमिशन कम करने का एक और रास्ता देता है. लेकिन यह मेनस्ट्रीम फ्यूल बनेगा या नहीं, यह लॉन्च पर कम और एग्ज़िक्यूशन पर ज़्यादा निर्भर करेगा.

शोकरी ने कहा, “असली टेस्ट, हमेशा की तरह, एग्ज़िक्यूशन है: सस्टेनेबल फीडस्टॉक सप्लाई, इंफ्रास्ट्रक्चर, कंज्यूमर इंसेंटिव और पॉलिसी कंसिस्टेंसी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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