भारत की व्यापार नीति में अक्सर समझौतों पर हस्ताक्षर करना, बड़े आंकड़ों का ऐलान करना और सफलता का दावा करना ज्यादा दिखाई देता है, लेकिन इसके बाद होने वाली सरकारी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं ही आखिर में तय करेंगी कि केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का इस साल 1 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य सच होगा या सिर्फ एक उम्मीद बनकर रह जाएगा.
शुक्रवार को नई दिल्ली में हुई बोर्ड ऑफ ट्रेड की बैठक के बाद पीयूष गोयल ने कहा कि भारत इस लक्ष्य को हासिल करने की “सही राह पर” है. उन्होंने इसे समझाने के लिए एक उदाहरण भी दिया. उन्होंने कहा, “जब आप पतंग उड़ाते हैं, तो उसकी डोर को मजबूती से पकड़कर रखना पड़ता है.”
उसी दिन वित्त मंत्रालय ने भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते (CETA) के लिए रूल्स ऑफ ओरिजिन जारी किए. यह नियम इसलिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इन्हीं के आधार पर तय होगा कि 15 जुलाई से समझौते के तहत मिलने वाली ड्यूटी-फ्री सुविधा का फायदा किन भारतीय निर्यातकों को मिलेगा. यानी बड़ा लक्ष्य और उससे जुड़े छोटे-छोटे नियम, दोनों एक-दूसरे से सीधे जुड़े हुए हैं.
दो दशक पुरा दांव
भारत का फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) की ओर बढ़ना कोई नया कदम नहीं है. यह पिछले करीब 20 वर्षों में धीरे-धीरे हुआ एक बड़ा बदलाव है. नीति आयोग की Trade Watch Quarterly रिपोर्ट के मुताबिक, एफटीए वाले देशों के साथ भारत के कुल व्यापार का हिस्सा 2006 में 4.6 प्रतिशत था, जो 2024 तक बढ़कर 28.8 प्रतिशत हो गया.

इसी वजह से भारत का लगातार नए एफटीए करना और CETA को लागू करना समझ में आता है. लेकिन इसी रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा भी दिया गया है, जिस पर कम ध्यान गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे हालिया तिमाही में एफटीए वाले देशों को भारत का निर्यात पिछले साल की तुलना में 7 प्रतिशत घटकर 40.26 अरब डॉलर रह गया. वहीं, इन्हीं देशों से भारत का आयात 6 प्रतिशत बढ़कर 70.98 अरब डॉलर पहुंच गया.
यानी इस दिशा में निवेश और कोशिशें तो बहुत बड़ी हैं, लेकिन उनका असली असर इस तिमाही के नतीजे बताएंगे. यह सवाल अब इतिहास का नहीं, बल्कि मौजूदा समय का है.
बढ़ता व्यापार, बढ़ता व्यापार घाटा
लंबे समय के आंकड़े बताते हैं कि इस पैटर्न को सिर्फ एक संयोग कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भारत के तीन पुराने बड़े फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) — Association of Southeast Asian Nations (2010), जापान (2011) और दक्षिण कोरिया (2010) से भारत के निर्यात में जरूर बढ़ोतरी हुई है. अगर एफटीए से पहले की अवधि (2007-2009) की तुलना 2023 से 2025 के बीच की अवधि से करें, तो ASEAN को भारत का निर्यात 104 प्रतिशत बढ़ा, जापान को 48 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया को 63 प्रतिशत बढ़ा.
लेकिन हर मामले में आयात इससे भी ज्यादा तेज़ी से बढ़ा. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की एफटीए रिपोर्ट कार्ड 2026 के मुताबिक, इसी अवधि में आयात और निर्यात के बीच का अंतर यानी व्यापार घाटा ASEAN के साथ 381 प्रतिशत, जापान के साथ 318 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया के साथ 268 प्रतिशत बढ़ गया. इसके मुकाबले दुनिया के बाकी देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा 142 प्रतिशत बढ़ा.

एफटीए नहीं करने वाले देशों के साथ की गई यह तुलना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि इन समझौतों का असली असर क्या रहा. यह कोई छोटी या अलग राय नहीं है. यही चिंता 2019 में भारत के Regional Comprehensive Economic Partnership से बाहर होने की एक बड़ी वजह भी थी. सरकार ने तब भी ASEAN, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ इसी तरह के व्यापारिक पैटर्न का हवाला दिया था.
ये आंकड़े पुराने नहीं, बल्कि बिल्कुल ताजा हैं. वित्त वर्ष 2024-25 (FY25) में सिर्फ कोरिया CEPA के तहत भारत का व्यापार घाटा करीब 15.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया. वहीं, वित्त वर्ष 2023-24 (FY24) में AIFTA समझौते के तहत ASEAN के साथ भारत का व्यापार घाटा 43 अरब डॉलर से 46 अरब डॉलर के बीच रहा.
कागज़ी प्रक्रिया का बोझ
इस विश्लेषण का मतलब यह नहीं है कि भारत-यूके CETA भी पहले वाले समझौतों जैसा ही नतीजा देगा, लेकिन 1 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य सिर्फ इस भरोसे हासिल नहीं किया जा सकता कि ड्यूटी-फ्री सुविधा मिलते ही अपने आप निर्यात बढ़ जाएगा.
असल फैसला किसी बड़े स्तर की बैठक से नहीं, बल्कि प्रक्रिया से होगा. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट इसकी वजह साफ बताती है. भारत के कई एफटीए साझेदार देशों में समझौते से पहले ही आयात शुल्क (टैरिफ) काफी कम था. इसलिए भारतीय निर्यातकों को एफटीए का फायदा लेने से बहुत ज्यादा लाभ नहीं मिला. दूसरी तरफ, भारत में आने वाले विदेशी निर्यातकों को औसतन 12.6 प्रतिशत टैरिफ देना पड़ता है. ऐसे में उनके लिए ज़रूरी कागज़ी प्रक्रिया पूरी करना फायदे का सौदा बन जाता है. यही वजह है कि भारत के एफटीए के लिए पात्र सिर्फ 20-30 प्रतिशत निर्यात ही इन समझौतों का फायदा उठा पाते हैं, जबकि भारत को निर्यात करने वाले देशों के 60-70 प्रतिशत निर्यातक इनका लाभ लेते हैं.

इस मामले में CETA कुछ अलग है और इसमें सुधार की गुंजाइश भी है. यूनाइटेड किंगडम ने अब तक श्रम-आधारित (लेबर-इंटेंसिव) उद्योगों पर अपेक्षाकृत ज्यादा टैरिफ लगाए हुए थे और यह समझौता उन्हीं क्षेत्रों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाया गया है. जैसे कपड़ा और गारमेंट सेक्टर पर करीब 8-12 प्रतिशत, जबकि जूते और चमड़े के उत्पादों पर 4-8 प्रतिशत तक टैरिफ था. वहीं इंजीनियरिंग सामान और ऑटोमोबाइल के पुर्जे पहले से ही लगभग शून्य टैरिफ पर UK में जाते रहे हैं.
जिन सेक्टरों को एफटीए का सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता है, उनमें ज्यादातर छोटे और मझोले निर्यातक हैं. लेकिन यही निर्यातक प्रमाणपत्र और दूसरी कागजी प्रक्रिया का खर्च उठाने और उन्हें पूरा करने में सबसे ज्यादा मुश्किल महसूस करते हैं. दूसरी ओर, जिन बड़े सेक्टरों के पास यह सारी प्रक्रिया पूरी करने की क्षमता है, उन्हें टैरिफ में मिलने वाला फायदा बहुत कम है.
यानी यह ऐसी समस्या है जिसे हल किया जा सकता है, न कि ऐसा नतीजा जिसे बदला नहीं जा सकता. GTRI ने इसके लिए कुछ सुझाव भी दिए हैं. जैसे एफटीए के इस्तेमाल और अलग-अलग सेक्टरों को मिलने वाले फायदे पर नजर रखने के लिए एफटीए इम्पैक्ट मॉनिटरिंग अथॉरिटी बनाई जाए, भारत और यूके के टेस्टिंग स्टैंडर्ड को एक-दूसरे द्वारा मान्यता दी जाए और छोटे निर्यातकों के लिए नियमों का पालन करना आसान बनाया जाए. पहले हुए एफटीए की समीक्षा में इनमें से कोई भी कदम लागू नहीं किया गया.
पीयूष गोयल सही कहते हैं कि इस पूरी पहल पर सावधानी से नज़र रखना ज़रूरी है, लेकिन यह भी समझना होगा कि यहां असली निगरानी एक रूल्स ऑफ ओरिजिन सर्टिफिकेट की है, जिसे सही तरीके से भरने की जिम्मेदारी उन्हीं छोटे निर्यातकों पर है, जो इसके लिए सबसे कम तैयार हैं.
15 जुलाई के बाद आने वाली दो या तीन तिमाहियों में अगर CETA का इस्तेमाल भारत के अब तक के 20-30 प्रतिशत के औसत से काफी ज्यादा होता है, तो वही इस समझौते की असली सफलता बताएगा. सिर्फ ड्यूटी-फ्री प्रतिशत से इसका सही आकलन नहीं होगा. असल ध्यान इसी आंकड़े पर होना चाहिए, बाकी सब सिर्फ पतंग है.
बिदिशा भट्टाचार्य चिंतन रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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