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Tuesday, 7 July, 2026
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विजयवर्गीय ने अधिकारियों की खुशामदगिरी पर तंज कसा, मगर IAS-IPS-IRS अफसरों का ही पलड़ा भारी है

मोदी सरकार सार्वजनिक तौर पर नौकरशाहों का मज़ाक उड़ा सकती है, लेकिन वफादार अधिकारियों पर उसका भरोसा और उनकी जरूरत पहले से कहीं ज्यादा नजर आती है.

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मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने हाल ही में एक बयान देकर विवाद खड़ा कर दिया. उन्होंने सरकारी अधिकारियों की कथित चापलूसी का मजाक उड़ाया. एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने बताया कि कई अधिकारी उनसे कहते हैं कि वे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखाओं में जाते थे. हर अधिकारी उन्हें अपनी कमर पर बंधी “बेल्ट” और “चड्डी”, यानी RSS की चड्डी, दिखाना चाहता है. एक अधिकारी ने तो यह भी कहा कि उसके पिता RSS की एक शाखा के “अध्यक्ष” थे. इस पर विजयवर्गीय ने मुस्कुराते हुए और तंज कसते हुए कहा, “अब मैं उसे क्या बताऊं? शाखा में कोई अध्यक्ष होता ही नहीं.”

मंत्री के इस बयान के बाद कांग्रेस ने विरोध किया. कांग्रेस का कहना था कि अगर अधिकारी ऐसा व्यवहार कर रहे हैं, तो यह नौकरशाही की निष्पक्षता और तटस्थता के लिए खतरा है. जाहिर है, RSS का नाम आते ही कांग्रेस की प्रतिक्रिया आनी ही थी. विजयवर्गीय ने यह नहीं बताया कि वे किन अधिकारियों की बात कर रहे थे. क्या वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) या किसी दूसरी सरकारी सेवा के अधिकारी थे. हो सकता है कि वे सामान्य रूप से सरकारी अधिकारियों की बात कर रहे हों. लेकिन यह सच है कि IAS और IPS अधिकारी अक्सर मंत्रियों के निशाने पर रहते हैं. कई बार मंत्री अपने समर्थकों का मनोबल बढ़ाने, लोगों का गुस्सा दूसरी तरफ मोड़ने या अपनी नाराजगी बड़े राजनीतिक नेताओं तक पहुंचाने के लिए अधिकारियों को निशाना बनाते हैं. मध्य प्रदेश की बात करें तो सत्ताधारी पार्टी या उससे जुड़े वैचारिक संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले IAS और IPS अधिकारियों का तबादला होना लगभग आम बात है.

कुछ ही हफ्ते पहले लोक निर्माण विभाग के मंत्री राकेश सिंह ने IAS अधिकारी और जबलपुर स्मार्ट सिटी के CEO अरविंद शाह को अपने घर बुलाया. खबरों के मुताबिक वहां उनका अपमान किया गया और उन्हें धमकाया गया. इसके बाद IAS एसोसिएशन ने यह मामला मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने उठाया.

हिमाचल प्रदेश के लोक निर्माण विभाग के मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने भी विवाद खड़ा कर दिया. उन्होंने कहा कि दूसरे राज्यों से आने वाले IAS और IPS अधिकारी हिमाचल की परंपराओं और मूल्यों का सम्मान नहीं करते.

पुडुचेरी के मुख्यमंत्री एन. रंगासामी ने आरोप लगाया कि IAS अधिकारी केंद्र शासित प्रदेश में “मौज-मस्ती करने” आते हैं.

उत्तर प्रदेश में मंत्री और विधायक लगभग हर दिन वरिष्ठ IAS अधिकारियों को निशाना बनाते हैं ताकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक अपना संदेश पहुंचा सकें.

अगर आप विजयवर्गीय समेत इन नेताओं की बातें सुनें, तो आपको लग सकता है कि पांच साल के लिए चुनी जाने वाली सरकार के सामने स्थायी सरकारी तंत्र यानी नौकरशाही पूरी तरह झुकी हुई है. लेकिन 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौकरशाही पर जो टिप्पणी की थी, उसे भी देखिए. मैंने जनवरी 2023 में अपने एक लेख में इसका जिक्र किया था. 2021 में लोकसभा में प्रधानमंत्री ने कहा था, “सब कुछ बाबू ही करेंगे. IAS बन गया तो वह फर्टिलाइजर का कारखाना भी चलाएगा. IAS बन गया तो वह केमिकल का कारखाना भी चलाएगा. IAS हो गया तो हवाई जहाज भी चलाएगा. यह कौन सी बड़ी ताकत बना कर रख दी हमने? बाबुओं के हाथ में देश दे करके हम क्या करने वाले हैं?

2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 303 सीटें मिलने के बाद दोबारा जनादेश हासिल करने वाले प्रधानमंत्री के इस बयान से ऐसा लगा कि उनके मुताबिक पिछली सरकारों के समय गैर-निर्वाचित नौकरशाही ने चुनी हुई राजनीतिक सरकार पर ज्यादा पकड़ बना ली थी. एक समय ऐसा भी था जब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा होती थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) गांधी परिवार के करीबी IAS अधिकारियों के हाथ में चलता था. इनमें टी.के.ए. नायर और पुलोक चटर्जी जैसे अधिकारी शामिल थे. दोनों उस समय प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव रहे. उन्हें ऐसे अधिकारियों के रूप में पेश किया जाता था जो गांधी परिवार की ओर से PMO चलाते थे. यह बात उस समय की उस आम धारणा से मेल खाती थी कि सरकार रिमोट कंट्रोल से चल रही है.

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस “रिमोट कंट्रोल” वाली धारणा का खूब इस्तेमाल किया. लोगों में यह धारणा और भी मजबूत इसलिए हुई क्योंकि पी. चिदंबरम, ए.के. एंटनी, कमल नाथ, जयराम रमेश और जयंती नटराजन जैसे कई मंत्री अपने-अपने मंत्रालय लगभग स्वतंत्र तरीके से चलाते थे. कई बार उनका काम मनमोहन सिंह की इच्छा के खिलाफ भी माना जाता था.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पूर्ववर्ती सरकारों के समय नौकरशाही के ज्यादा प्रभाव की जो बात कही, उसे उनके समर्थकों ने काफी पसंद किया. उनका मानना था कि व्यवस्था बदलनी चाहिए और IAS अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए. मोदी समर्थकों को यह बात अच्छी लगी.

मोदी की आलोचना और अफसरों पर भरोसा

सच यह है कि मोदी सरकार के समय नौकरशाही को जितनी ताकत और अहमियत मिली है, शायद पहले कभी नहीं मिली. प्रधानमंत्री ने कहा था कि IAS अधिकारी खाद कारखाने, केमिकल फैक्टरी और हवाई जहाज तक क्यों चलाएं. लेकिन हकीकत यह है कि आज भी सिविल सर्वेंट यही सब और इससे भी ज्यादा काम कर रहे हैं. मिसाल के तौर पर, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के चेयरमैन रहे सुशील चंद्र बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त (अप्रैल 2021 से मई 2022) बने. ठीक है, नवंबर 2016 से फरवरी 2019 के बीच CBDT ने विपक्षी नेताओं पर कई आयकर छापे मारे. लेकिन क्या सिर्फ यह मुख्य चुनाव आयुक्त बनने की योग्यता हो सकती है? उनके बाद CBDT के प्रमुख बने पी.सी. मोदी आगे चलकर राज्यसभा के महासचिव बने.

यानी भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के अधिकारी आयकर छापे भी मार सकते हैं, देश के चुनाव भी करा सकते हैं और राज्यसभा सचिवालय भी चला सकते हैं. फिर प्रधानमंत्री के उस बयान का क्या मतलब रह जाता है कि अफसर खाद कारखाने और हवाई जहाज चला रहे हैं? यहां जिन दो मामलों का जिक्र है, उनमें अधिकारी IAS नहीं बल्कि IRS के थे. राजीव कुमार पहले भारत के वित्त सचिव रहे. उसके बाद वे पब्लिक एंटरप्राइजेज सेलेक्शन बोर्ड के अध्यक्ष बने. फिर चुनाव आयुक्त बने और आखिर में मुख्य चुनाव आयुक्त बने. मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, जो पूर्व IAS अधिकारी हैं, पहले संसदीय कार्य सचिव थे. उसके बाद अमित शाह के सहकारिता मंत्रालय में सचिव रहे. फिर चुनाव आयोग में पहुंचे और अब विपक्ष के निशाने पर हैं. इसलिए जब प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि IAS अधिकारी खाद, केमिकल फैक्टरी और हवाई जहाज चला रहे हैं, तो इस बात को ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है. क्योंकि IAS, IPS और IRS अधिकारी अच्छी तरह जानते हैं कि इस सरकार की असली ताकत किसके हाथ में है. उनके ही हाथ में. प्रधानमंत्री मोदी भी फैसला लेने की प्रक्रिया में उनका कोई विकल्प नहीं ढूंढ पाए हैं.

IAS अधिकारी प्रधानमंत्री मोदी के लिए हमेशा बेहद जरूरी रहे हैं. जबकि वे जरूरत पड़ने पर मुख्यमंत्री तक बदल देते हैं. पी.के. मिश्रा गुजरात में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव थे. वे 2008 में IAS से रिटायर हुए थे. आज भी वे प्रधानमंत्री मोदी के प्रधान सचिव हैं. अगले महीने उनकी उम्र 78 साल हो जाएगी. दिलचस्प बात यह है कि कहा जाता है कि वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उभरते वैश्विक दौर में भारत की तैयारियों की भी निगरानी कर रहे हैं. 69 साल के शक्तिकांत दास भी प्रधानमंत्री के एक और प्रधान सचिव हैं. गुजरात कैडर के 1979 बैच के IAS अधिकारी के. कैलाशनाथन 2013 में रिटायर हुए थे. लेकिन उसके बाद भी उन्हें सात बार सेवा विस्तार मिला और वे मुख्यमंत्री कार्यालय में मुख्य प्रधान सचिव बने रहे. दो साल पहले वे आखिरकार पुडुचेरी के उपराज्यपाल बन गए. ए.के. भल्ला को केंद्रीय गृह सचिव के रूप में चार बार सेवा विस्तार मिला. उनके कार्यकाल में 2020 के दिल्ली दंगे हुए, उसी समय अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर थे. इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी. बाद में भल्ला को मणिपुर का राज्यपाल बना दिया गया, जहां हालात पहले से ही बेहद खराब थे. यह जिम्मेदारी शायद उनके करियर का एक और ऐसा दौर साबित हो सकती है जिसे लोग भूल जाना ही बेहतर समझें.

स्थायी ताकत का ढांचा

ऐसे कई मिसाल हैं जो यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि मोदी सरकार को नौकरशाहों पर इतना अटूट भरोसा क्यों है. गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर दिल्ली के प्रधानमंत्री कार्यालय तक, असली फैसले लेने का काम इन्हीं अधिकारियों ने किया है. केंद्रीय मंत्रियों की बात ही छोड़ दीजिए, जिनमें से 90 प्रतिशत शायद मोदी के नाम के बिना चुनाव भी न जीत पाएं. लेकिन अगर मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता इन अधिकारियों का मजाक उड़ाते हैं, तो उन्हें यह अपने जोखिम पर करना चाहिए. प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानियों तक सरकार चलाने के लिए इन्हीं अधिकारियों पर भरोसा करते हैं. BJP शासित राज्यों में मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के पदों पर किसे नियुक्त किया गया है, इसकी सूची देख लीजिए. वहां मुख्यमंत्रियों से अक्सर सिर्फ औपचारिक भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने कार्यकाल के आठवें साल यानी 2025 में जाकर अपनी पसंद के मुख्य सचिव एस.पी. गोयल को नियुक्त करा पाए.

असल सवाल यह है कि ये अधिकारी इतने ताकतवर क्यों हैं और मोदी सरकार के लिए यह क्यों मायने रखता है. पहले सवाल का जवाब देने से पहले मैं वह बात बताना चाहता हूं जो कई नेताओं ने मुझे सालों से बताई है और जिससे ज्यादातर IAS और IPS अधिकारी भी सहमत रहे हैं. उनके मुताबिक IAS अधिकारियों के चार प्रकार होते हैं. भ्रष्ट और अयोग्य. ईमानदार लेकिन अयोग्य. भ्रष्ट लेकिन सक्षम. और ईमानदार व सक्षम. राजनीति और नौकरशाही में मेरे लगभग सभी परिचित इस बात पर सहमत रहे हैं कि चौथी श्रेणी यानी ईमानदार और सक्षम अधिकारी अब बहुत कम बचे हैं, हालांकि पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं. एक मंत्री ने मुझसे कहा था कि अगर चौथी श्रेणी का अधिकारी न मिले, तो वे तीसरी श्रेणी यानी भ्रष्ट लेकिन सक्षम अधिकारी से भी काम चला लेंगे.

मेरे कुछ ब्यूरोक्रेट्स दोस्तों ने बताया कि अब चार गुणों के साथ एक और सबसे अहम गुण जुड़ गया है. वह है बड़े अक्षरों वाला “Loyalty”, यानी पूरी वफादारी. इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. क्योंकि मैं चुनाव आयोग के कुछ लोगों को इन चार श्रेणियों में रखने की कोशिश कर रहा था और मानहानि का जोखिम नहीं लेना चाहता था. लेकिन अगर इन चारों में “वफादारी” जोड़ दी जाए, तो फिर कोई उलझन नहीं रहती. हरियाणा कैडर के पूर्व IAS अधिकारी अशोक खेमका, जो पिछले साल रिटायर हुए, और भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी जैसे खुद को व्हिसलब्लोअर कहने वाले अधिकारी शायद यह बात अब भी नहीं समझ पाए हैं. कांग्रेस के समय रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ कार्रवाई करके चर्चा में आए खेमका का सपना था कि वे मोदी के प्रधानमंत्री कार्यालय का हिस्सा बनें. लेकिन केंद्र ने उन्हें मौका नहीं दिया. दूसरे व्हिसलब्लोअर संजीव चतुर्वेदी आज भी ट्रिब्यूनल और अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं ताकि यह समझ सकें कि केंद्र सरकार उन्हें क्यों नहीं चाहती. दिलचस्प बात यह है कि अब केंद्र कहता है कि अधिकारियों के पैनल में शामिल करने के लिए कोई 360 डिग्री मूल्यांकन नहीं होता. खेमका और चतुर्वेदी जैसे अधिकारियों के लिए मेरे मन में सिर्फ सहानुभूति है. जब एक पार्टी विपक्ष में थी, तब वे उसके हीरो थे. लेकिन वही पार्टी सत्ता में आने के बाद उन्हें शायद एक संभावित परेशानी मानने लगी.

वैसे अगर इससे उन्हें थोड़ी तसल्ली मिले, तो मैं उन PMO अधिकारियों को जानता था जो इस 360 डिग्री मूल्यांकन व्यवस्था के पीछे थे. लेकिन जब मैंने इस व्यवस्था की मनमानी और अपारदर्शिता पर एक लेख लिखा, जिसके बारे में मुझे लगा कि इसका मकसद राजनीतिक और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध नौकरशाही को आगे बढ़ाना है, तब से वे मुझे नहीं जानते. आज वही चुने हुए अधिकारी फैसले लेते हैं. फिर चाहे मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय उनके बारे में क्या सोचते हों या राज्यों में उनके जैसे दूसरे अधिकारियों के बारे में क्या राय रखते हों.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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