तेहरान में दुनिया के लगभग 100 देशों से बड़े स्तर पर प्रतिनिधि पहुंचे. इनमें राष्ट्राध्यक्ष, सरकारी अधिकारी, सत्ता और विपक्ष के नेता, सैन्य अधिकारी, सिविल सोसाइटी के प्रभावशाली लोग और धार्मिक नेता शामिल थे. ये सभी ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुंचे थे. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल के हवाई हमलों में उनकी मौत हो गई थी.
शोक में इतनी बड़ी दुनिया भर के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने दुनिया के साथ तेहरान के राजनीतिक, धार्मिक और रणनीतिक संबंधों को दिखाया. सबसे अहम बात यह रही कि इसमें वे देश भी शामिल हुए, जिन्होंने अमेरिका-इजराइल के हमलों के बाद भी संतुलित दूरी बनाए रखना पसंद किया था.
पश्चिमी देशों के नेता ज्यादातर नज़र नहीं आए. लेकिन रूस, चीन और भारत उन प्रमुख देशों में थे, जिन्होंने इसमें हिस्सा लिया. ईरान ने इस मौके का इस्तेमाल “क्षेत्रीय संपर्क” बढ़ाने के लिए भी किया. संसद अध्यक्ष मुहम्मद बाक़िर क़ालिबाफ़ ने इस दौरान अलग-अलग देशों के नेताओं से मुलाकात की.
भारत के पड़ोसी देशों की भी अच्छी मौजूदगी रही. खास तौर पर वे देश, जो ईरानी तेल आयात करते हैं और अमेरिका-ईरान युद्ध तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट से प्रभावित हुए हैं. इससे पता चलता है कि तेहरान आज भी सांस्कृतिक और रणनीतिक साझेदार के रूप में कितना अहम है.
हालांकि छोटे देशों पर इस संकट के असर को समझने के लिए आगे और अध्ययन की जरूरत होगी, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप इस अध्ययन का अहम केंद्र रहेगा. यह इलाका ईरानी तेल के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में है और इसमें सबसे ज्यादा आयात भारत करता है.
यहां इस क्षेत्र से शामिल हुए प्रमुख प्रतिनिधियों की एक झलक है.
भारत के आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल में बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन और विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा शामिल थे. आधिकारिक प्रतिनिधियों के अलावा कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के नेताओं और सिविल सोसाइटी के प्रमुख लोगों को भी आमंत्रित किया गया था.
मीडिया की खास नजर जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और कांग्रेस नेता तथा UPA-2 सरकार के पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की मौजूदगी पर रही.
भारत के विपक्षी नेताओं तक ईरान की पहुंच यह दिखाती है कि वह भारत के पूरे राजनीतिक नेतृत्व से रणनीतिक संबंध बनाए रखना चाहता है. वहीं कश्मीर से विपक्षी नेताओं की मौजूदगी वहां के शिया समुदाय के साथ गहरे धार्मिक रिश्तों को भी दिखाती है. यह उस वैचारिक और धार्मिक जुड़ाव को मजबूत करती है, जो सदियों से कश्मीर घाटी के साथ ईरान का रहा है.
अगर कोई एक देश है जिसके अमेरिका, इजराइल और ईरान तीनों के साथ अच्छे संबंध रहे हैं, तो वह भारत है. भले ही शांति स्थापित करने में भारत की सीधी भूमिका हमेशा दिखाई नहीं देती, लेकिन नई दिल्ली ने बार-बार बातचीत के जरिए इस विवाद को सुलझाने की वकालत की है.
3 जुलाई को भारतीय प्रतिनिधिमंडल के तेहरान रवाना होने से ठीक पहले, 30 जून को प्रधानमंत्री मोदी से ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने फोन पर बात की और उन्हें क्षेत्रीय हालात की जानकारी दी.
ईरान के पूर्वी पड़ोसी
पाकिस्तान की ओर से प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की चर्चित जोड़ी ने कथित तौर पर तेहरान में सबसे बड़े प्रतिनिधिमंडलों में से एक का नेतृत्व किया.
दोनों देशों के रिश्तों में पहले तनाव भी रहा है. खास तौर पर 2024 में ईरान ने पाकिस्तान में आतंकवादी संगठन जैश अल-अदल को निशाना बनाकर हवाई हमले किए थे. इस संगठन पर कम से कम 2013 से ईरानी सीमा सुरक्षा बलों पर जानलेवा हमले करने के आरोप हैं. इसने पहले सीमा पुलिस पर बम धमाकों और अपहरण की जिम्मेदारी भी ली थी.
हालांकि पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद पाकिस्तान के इन दोनों नेताओं ने अपने देश में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत कराने की कोशिशों को प्रमुखता से पेश किया है.
ऐसा लगता है कि पाकिस्तान इस संकट के दौरान क्षेत्र में अपनी भूमिका बनाने का मौका तलाश रहा है. लेकिन आतंकवाद से उसके संबंध और उस पर कार्रवाई करने में नाकामी की वजह से यह कोशिश अब तक सफल नहीं हो पाई है.
और भी दिलचस्प बात यह है कि व्हाइट हाउस की लगातार यात्राओं और अमेरिकी नेताओं से मुलाकातों के बावजूद अमेरिकी कांग्रेस की ताजा रिपोर्ट “Terrorist and Other Militant Groups in Pakistan” (पाकिस्तान में आतंकवादी और अन्य उग्रवादी समूह) अब भी पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों की मौजूदगी और उनकी गतिविधियों का जिक्र करती है.
हालांकि ईरान, व्हाइट हाउस के साथ इस्लामाबाद के संबंधों को अहम मानता है, लेकिन तेहरान अपने इस पड़ोसी देश की नीयत और गतिविधियों को लेकर हमेशा सतर्क रहा है.
ईरान के दूसरे पूर्वी पड़ोसी अफगानिस्तान की ओर से तालिबान सरकार के उप प्रधानमंत्री अब्दुल गनी बरादर और विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी शामिल हुए. ईरान अफगानिस्तान का बड़ा व्यापारिक और ऊर्जा साझेदार रहा है. लेकिन प्रवास, शरणार्थियों और हेलमंद नदी के पानी के बंटवारे जैसे मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं. इन मतभेदों के बावजूद क्षेत्र में पाकिस्तान दोनों का साझा चुनौती बना हुआ है.
बांग्लादेश ने भी तेहरान में अपना आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजा, जिसका नेतृत्व बांग्लादेश जातीय संसद के स्पीकर हाफिज उद्दीन अहमद ने किया.
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा, “स्पीकर हाफिज उद्दीन ने महामहिम के दुखद निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया और उनकी निर्मम हत्या की कड़ी निंदा की.”
मंत्रालय ने आगे कहा, “उन्होंने राष्ट्रीय शोक की इस घड़ी में ईरान की सरकार और वहां के भाईचारे वाले लोगों के साथ बांग्लादेश की सरकार और जनता की एकजुटता व्यक्त की.”
बांग्लादेश का आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल उन चुनिंदा देशों में था, जिसने ईरान के संसद अध्यक्ष कालीबाफ से अलग से मुलाकात की. जातीय संसद के स्पीकर के अलावा जमात-ए-इस्लामी के नेता मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में 11 विपक्षी दलों का एक प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद था.
बांग्लादेश के ईरान के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्ते हैं. लेकिन ऊर्जा के नजरिए से भी उसकी मौजूदगी अहम रही. होर्मुज जलडमरूमध्य इस क्षेत्र से ढाका के ऊर्जा आयात का प्रमुख रास्ता है. आम लोगों के लिए ऊर्जा की कीमतें काफी बढ़ गई हैं और इसका असर कृषि समेत कई क्षेत्रों पर पड़ा है, जिससे ढाका मुश्किल दौर से गुजर रहा है.
छोटे देश
भारत, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अलावा हिमालयी देशों नेपाल और भूटान की ओर से किसी प्रतिनिधिमंडल के शामिल होने की जानकारी न तो मीडिया में आई और न ही उनके विदेश मंत्रालयों ने दी.
गौर करने वाली बात यह है कि नेपाल और भूटान दोनों ही स्थल से घिरे (लैंडलॉक) देश हैं और अपनी पेट्रोलियम जरूरतों के लिए भारत पर निर्भर हैं. हालांकि, काठमांडू के तेहरान के साथ राजनयिक संबंध हैं.
काठमांडू और तेहरान के बीच राजनयिक संबंध कतर के दोहा स्थित नेपाल दूतावास के जरिए बनाए जाते हैं. इसी दूतावास को ईरान के लिए गैर-आवासीय समानांतर मान्यता भी मिली हुई है.
दिलचस्प बात यह है कि नेपाल का तेहरान में एक मानद वाणिज्य दूतावास (Honorary Consulate) भी है, जिसकी स्थापना जुलाई 2011 में हुई थी. दूसरी ओर, भूटान के ईरान के साथ कोई राजनयिक संबंध नहीं हैं. यह भी पुष्टि नहीं हो सकी है कि ईरान ने इन दोनों हिमालयी देशों को निमंत्रण भेजा था या नहीं.
मालदीव के मामले में भी मीडिया रिपोर्टों और आधिकारिक जानकारी का ऐसा ही अभाव देखने को मिला. हालांकि डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म Javiyahi ने खबर दी कि मालदीव सरकार ने एक प्रतिनिधिमंडल भेजा था, लेकिन सुर्खियों से आगे कोई जानकारी नहीं मिल सकी. दोनों देशों के बीच धार्मिक संबंध रहे हैं.
श्रीलंका उन देशों में शामिल था, जिन्हें ईरान के सर्वोच्च नेता के राजकीय अंतिम संस्कार में बुलाया गया था. श्रीलंका की ओर से संसद के उपाध्यक्ष रिजवी सलीह ने प्रतिनिधित्व किया. वह श्रीलंका के एक मुस्लिम नेता हैं.
दोनों देशों के बीच लंबे समय से दोस्ताना संबंध रहे हैं. लेकिन पश्चिम एशिया के संकट के बाद पैदा हुए ऊर्जा संकट का असर श्रीलंका पर भी पड़ा है. कोलंबो में ईरानी मिशन ने द्वीपीय देश को ऊर्जा आपूर्ति में मदद करने का वादा किया है.
ऐतिहासिक रूप से श्रीलंका और ईरान के संबंध आर्थिक और ऊर्जा क्षेत्रों तक फैले रहे हैं. तेहरान ने श्रीलंका के तकनीकी विकास में भी योगदान दिया है.
फरवरी में ईरान पर अमेरिका-इजराइल के हवाई हमलों के बाद भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ देशों की ओर से सीमित प्रतिक्रियाएं आई थीं. लेकिन ईरान के सर्वोच्च नेता के राजकीय अंतिम संस्कार के लिए भारतीय उपमहाद्वीप के देशों को भेजे गए निमंत्रण यह दिखाते हैं कि तेहरान के इस क्षेत्र के साथ, खास तौर पर धार्मिक स्तर पर, मजबूत संबंध हैं.
भौगोलिक रूप से छोटे देश ऊर्जा सुरक्षा चाहते हैं. उम्मीद की जा रही है कि जैसे ही यह संकट खत्म होगा, उनकी अर्थव्यवस्थाएं फिर सामान्य होने लगेंगी, क्योंकि पश्चिम एशिया के युद्ध से बढ़ी महंगाई का असर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में महसूस किया गया है.
ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटिजिक मामलों पर कमेंटेटर हैं. इस लेख में व्यक्त की गई राय निजी है और यह किसी भी तरह से लेखक के मौजूदा या पिछले जुड़ाव को नहीं दिखाती है.
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