तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार ने अपने पहले 60 दिनों में भारी राजनीतिक उथल-पुथल का सामना किया है. मुख्य विपक्षी दल डीएमके पर आरोप है कि उसने जवाबी जोड़-तोड़ (काउंटर हॉर्स-ट्रेडिंग) के जरिए सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की, लेकिन इन दो महीनों की सबसे बड़ी कहानी विजय की मुश्किलें नहीं, बल्कि डीएमके और एआईएडीएमके की हार के बाद की खामोशी है.
करीब छह दशक तक तमिलनाडु की सत्ता में बारी-बारी से आने वाली ये दोनों पार्टियां अब शांत नजर आ रही हैं. वहीं, दूसरी ओर विजय जीत के बाद भी लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं. शांत और सधे हुए स्वभाव की छवि रखने वाले विजय में अचानक एक अलग ही जोश और आक्रामकता दिखाई देने लगी है, बिल्कुल किसी बड़ी फिल्म के हीरो की तरह.
उन्होंने अपनी सरकार को अब तक अच्छी तरह संभाला है. ऐसा लगता है जैसे उन्होंने मुश्किलों के काले बादलों के ऊपर से उड़ान भर ली हो और कॉकपिट से ‘सीट बेल्ट बांधिए’ का संकेत भी हटा दिया हो. कम से कम विजय के समर्थक और राजनीतिक विश्लेषक तो डीएमके और एआईडीएमके जैसे द्रविड़ दलों के साथ उनके टकराव को इसी नजरिए से देखते हैं. उनका मानना है कि इस रणनीति का फायदा विजय को लगातार मिल रहा है.
TVK के पास अभी भी मजबूत संगठन नहीं
विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी अपनी पार्टी का संगठन है, जो अभी भी पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाया है. पार्टी में अभी भी कई स्तरों पर कमियां हैं. इस चुनौती का सामना उन्हें दो मोर्चों पर करना पड़ रहा है.
पहला, एआईएडीएमके के करीब 75 प्रतिशत शीर्ष नेता टीवीके में शामिल हो चुके हैं. इसके बावजूद विजय अब भी पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पाडी पलानीस्वामी (ईपीएस) को उसी खेमे में अपना सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानते हैं. दूसरे मोर्चे पर उनका सामना अपने असली राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उदयनिधि स्टालिन से है, जो तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं.
इन 60 दिनों में विजय ने दोनों मोर्चों को अच्छी तरह संभाला है. अब वह खुद को ऐसे बहुदलीय गठबंधन के नेता के रूप में पेश कर रहे हैं, जो एक जैसी व्यापक विचारधारा पर आधारित है, लेकिन जिसमें द्रविड़ राजनीति के पुराने सहयोगी दल भी शामिल हैं. विजय सिर्फ अपनी ताकत मजबूत नहीं कर रहे, बल्कि लगातार अपना दायरा बढ़ा रहे हैं. आज तमिलनाडु में विजय सबसे मजबूत और बिना किसी बड़ी चुनौती वाले नेता बने हुए हैं. विपक्ष का कोई भी नेता फिलहाल उनके आसपास भी नहीं दिखता. राजनीतिक तौर पर इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे फॉर्मूला-1 (F1) रेस में विजय चौथे गियर में तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहे हों.
सबसे पहले राज्य की आर्थिक व्यवस्था को पटरी पर लाना
विजय ने शुरुआत में ही तमिलनाडु की आर्थिक स्थिति को संभालने पर ध्यान दिया. इसके लिए उन्होंने एक श्वेत पत्र जारी कराया. इस कदम की केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी सराहना की. विजय ने अपने वैचारिक विरोधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर भी दोस्ती का हाथ बढ़ाया, लेकिन उन्होंने इस रिश्ते को सिर्फ केंद्र और राज्य के संबंध तक ही सीमित बताया.
विधानसभा में अपने पहले भाषण में विजय ने खुद को “तमिलनाडु फर्स्ट” का समर्थक बताया. यह प्रधानमंत्री मोदी के “इंडिया फर्स्ट” नारे की तरह था. साथ ही उन्होंने साफ कहा कि राज्य के विकास के लिए वह किसी के भी दरवाजे पर जाने से नहीं हिचकेंगे. इसी बीच, दिल्ली में तमिलनाडु के राज्यपाल आर.वी. अर्लेकर ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की. यह इस बात का संकेत भी है कि बेहद कम बहुमत से बनी विजय सरकार पर केंद्र सरकार की नज़र बनी हुई है.
विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप, पुराने भी और नए भी
सत्तारूढ़ टीवीके और विपक्षी डीएमके के बीच लगातार विधायकों की खरीद-फरोख्त (हॉर्स-ट्रेडिंग) के आरोप लग रहे हैं. दोनों पार्टियां एक-दूसरे पर अपने-अपने विधायकों को तोड़ने की कोशिश करने का आरोप लगा रही हैं. टीवीके का आरोप है कि डीएमके के पूर्व मंत्री वी. सेंथिल बालाजी सरकार गिराने की कोशिश कर रहे थे. वहीं डीएमके ने राज्यपाल और भ्रष्टाचार निरोधक एवं सतर्कता निदेशालय (DVAC) से शिकायत की कि विजय और एमडीएमके नेता वाइको ने मिलकर डीएमके के दो विधायकों को तोड़ने की साजिश रची.
यह राजनीतिक लड़ाई अब और तेज हो गई है. चेन्नई पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया है. आरोप है कि उनका संबंध सेंथिल बालाजी के भाई से है. इन लोगों ने टीवीके के एक मौजूदा विधायक को 35 करोड़ रुपये की रिश्वत देने की कोशिश की, ताकि वह या तो सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में वोट दें या फिर सीधे पार्टी छोड़ दें. इसके जवाब में टीवीके सरकार सिर्फ बचाव की मुद्रा में नहीं आई, बल्कि उसने सेंथिल बालाजी के खिलाफ ही कार्रवाई तेज कर दी.
सरकार ने उनके बिजली और परिवहन मंत्री रहने के समय के मामलों को फिर से खोल दिया है. इनमें नौकरी के बदले पैसे (कैश-फॉर-जॉब्स) घोटाला और 397 करोड़ रुपये के ट्रांसफॉर्मर खरीद मामले की जांच भी शामिल है. यही विजय का आक्रामक अंदाज है. वह सिर्फ डीएमके के हमलों का जवाब नहीं दे रहे, बल्कि हर हमले को अपने नए राजनीतिक हमले में बदल रहे हैं.
गठबंधन को लेकर विजय आश्वस्त
विजय ने अपने “मित्र दलों” के साथ बैठकें की हैं. उन्होंने सहयोगी दलों से कहा कि सरकार की स्थिरता को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है और भरोसा जताया कि उनकी सरकार अपना पूरा कार्यकाल पूरा करेगी. हालांकि, उनकी अगली बड़ी परीक्षा उनका पहला बजट होगा.
उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों के अधिकारियों और उद्योग जगत के नेताओं के साथ बैठकें शुरू कर दी हैं. एक सफल अभिनेता रहे विजय की सबसे बड़ी ताकत उनकी तेज फैसले लेने की क्षमता मानी जाती है. उम्मीद है कि उनकी सरकार अगस्त की शुरुआत तक ऐसा बजट पेश करेगी, जो हर वर्ग को खुश करने की कोशिश करेगा. आर्थिक और राजनीतिक—दोनों मोर्चों पर विजय ने पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की सलाह ली है. यह तमिलनाडु से आने वाले उन दो बड़े नेताओं—पी. चिदंबरम और निर्मला सीतारमण—की ओर भी इशारा करता है, जिन्होंने केंद्रीय बजट पेश किया है.
दो महीनों में विजय ने काफी राजनीतिक मजबूती दिखाई है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दो बार मुलाकात की, नीति आयोग की बैठक में हिस्सा लिया और विधानसभा में भी आक्रामक रुख अपनाया, लेकिन उनकी असली परीक्षा अभी बाकी है. उन्हें यह साबित करना होगा कि वह मतदाताओं के बीच और विधानसभा के अंदर, दोनों जगह उदयनिधि स्टालिन को विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभरने से कितनी प्रभावी तरीके से रोक पाते हैं.
चुपचाप मोदी की रणनीति पर चल रहे हैं विजय
कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ विजय के निजी संबंध करीब 20 साल पुराने हैं. विचारधारा के स्तर पर विजय खुद को मध्यमार्गी (सेंटरिस्ट) बताते हैं. राहुल गांधी की मौजूदगी में भी उन्होंने साफ कहा है कि टीवीके पारदर्शिता में विश्वास रखती है और पार्टी में अंतिम अधिकार सिर्फ विजय के पास है.
लेकिन यह कहते हुए भी विजय अपनी 25 साल की सत्ता की योजना प्रधानमंत्री मोदी की रणनीति की तरह तैयार कर रहे हैं. यानी धीरे-धीरे और योजनाबद्ध तरीके से अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना. जिस तरह मोदी ने खुद को “प्रधान सेवक” कहा था, उसी तरह विजय ने खुद को “सेवकन” (जनसेवक) बताया है.
जैसे मोदी ने 2023 में “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा दिया था, वैसे ही विजय ने 2026 में दोनों द्रविड़ दलों को खत्म करने का लक्ष्य घोषित करते हुए कहा है—”कझगम इल्लाथा तमिलनाडु” (यानी द्रविड़ पार्टियों से मुक्त तमिलनाडु). विधानसभा में सिर्फ टीवीके के दम पर बहुमत हासिल करने की उनकी राजनीतिक गणित भी इसी लक्ष्य को मजबूत करती है.
चुनाव से पहले विजय ने समझदारी दिखाते हुए कई छोटी पार्टियों को अपने साथ जोड़ लिया था. उस समय कई लोगों ने इस कदम को ज्यादा महत्व नहीं दिया था, लेकिन चुनाव नतीजों के बाद डीएमके के कई चुनाव बाद के सहयोगी भी विजय की बड़ी जीत के बाद उनके साथ आ गए और दोबारा चुनाव की किसी भी चर्चा से दूरी बना ली. विजय की दूसरी रणनीति भी उतनी ही सोच-समझकर बनाई गई थी—भाजपा को तमिलनाडु में अपनी अलग राजनीतिक जमीन बनाने से रोकना.
234 सदस्यीय तमिलनाडु विधानसभा में टीवीके के पास 108 सीटें हैं. लेकिन विजय ने विश्वास मत 144-22 से जीत लिया. यानी उन्हें अपनी पार्टी की संख्या से 36 वोट ज्यादा मिले. यह वही रणनीति है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने भी केंद्र में अपनाया. 240 सांसदों के बावजूद उन्होंने क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर कामकाजी बहुमत बनाए रखा.
असली कहानी
सिर्फ 60 दिनों में विजय ने खुद को साबित भी किया और सरकार को भी संभालकर दिखाया. उन्होंने एक साथ तमिलनाडु की दो बड़ी द्रविड़ पार्टियों का मुकाबला किया, लेकिन सबसे बड़ी कहानी पर्दे के पीछे चल रही है. हार के बाद डीएमके और एआईएडीएमके अभी भी अपनी हार से उबरने की कोशिश कर रही हैं और लगभग खामोश हैं. वहीं विजय ने उन्हें संभलने का कोई मौका नहीं दिया. उनका पूरा ध्यान इस बात पर है कि उदयनिधि स्टालिन को तमिलनाडु की राजनीति में अगला बड़ा चुनौती देने वाला नेता बनने का मौका ही न मिले.
लेखक का एक्स हैंडल @RAJAGOPALAN1951 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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