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Sunday, 20 September, 2026
होममत-विमतविजय तमिलनाडु की राजनीति में पुराने और प्रभावशाली द्रविड़वाद को खत्म करने की राह पर हैं

विजय तमिलनाडु की राजनीति में पुराने और प्रभावशाली द्रविड़वाद को खत्म करने की राह पर हैं

द्रविड़ आंदोलन की मूल संस्था से कई दल निकले—डीके, डीएमके, एआईएडीएमके, एमडीएमके, डीएमडीके और एएमएमके. 1972 और 1989 में जो राजनीतिक घटनाक्रम हुए थे, उनकी झलक अब 2026 में फिर दिखाई दे रही है.

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जोसेफ विजय ने तमिलनाडु में उस विचारधारा की शुरुआत की है, जिसे कई विश्लेषक “नव-द्रविड़वाद” कह रहे हैं. लगभग 100 साल पुराना द्रविड़ विचार अब चुनौती का सामना कर रहा है.

सिर्फ 27 महीने पुरानी तमिल वेत्री कषगम (टीवीके) ने तमिलनाडु की राजनीति पर पिछले 72 वर्षों से हावी दो बड़े दलों—डीएमके और एआईएडीएमके की पकड़ को कमजोर कर दिया है. विजय ने यह काम ज़ेन ज़ी युवाओं में डीएमके के खिलाफ बढ़ती नाराजगी और “मन्नार आच्ची” (राजशाही जैसी राजनीति) के विरोध का फायदा उठाकर किया.

क्या द्रविड़ राजनीति की छठी या सातवीं पीढ़ी का नेतृत्व इस गिरावट को रोक पाएगा?

सीधे शब्दों में कहें तो, क्या डीएमके की नई पीढ़ी का चेहरा उदयनिधि स्टालिन विजय की “सुनामी” और उस “नव-द्रविड़ युग” की चर्चा का मुकाबला कर पाएंगे, जिसे उन पांच बड़े नेताओं के नामों के साथ पेश किया जा रहा है जिन्होंने करोड़ों वंचित तमिलों के लिए सुधार किए थे?

यह साफ संकेत है कि राजनीति की दिशा बदल रही है—मुख्य रास्ते से हटकर दूसरे रास्ते की ओर. ऐसी पीढ़ीगत बदलावों के पीछे नई सोच काम करती है.

आने वाले 10 से 15 वर्षों तक टीवीके के तमिलनाडु की राजनीति में बने रहने की संभावना है. विजय कोशिश करेंगे कि डीएमके, एआईएडीएमके और जिले स्तर पर प्रभाव रखने वाले जाति आधारित दलों जैसे पीएमके, वीसीके और एनटीके की राजनीतिक ताकत को धीरे-धीरे कमजोर किया जाए.

अगर बीजेपी नेता के. अन्नामलाई के अलग पार्टी बनाने की अटकलें सही साबित होती हैं, तो उदयनिधि के अलावा वह टीवीके के लिए एक बड़ा राजनीतिक खतरा बन सकते हैं.

विजय और टीवीके सीधे तौर पर द्रविड़ विचारधारा से लड़ाई नहीं कर रहे हैं. इसके बजाय वे पांच नेताओं के नामों का सहारा लेकर उस विचार को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसे मैं “नियो-द्रविड़ियन विजयवाद” कहता हूं.

ये पांच नेता हैं—के. कामराज, ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’, वेलु नचियार, अंजलाई अम्माल और बी.आर. आंबेडकर.

अक्टूबर 2024 में टीवीके की शुरुआत करते समय विजय ने पार्टी की जाति-विरोधी और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक सोच के बारे में बात की थी. उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी द्रविड़ राष्ट्रवाद और तमिल राष्ट्रवाद को अलग नहीं मानेगी.

उन्होंने कहा था, “ये इस धरती की दो आंखें हैं.”

टीवीके द्रविड़ पहचान को कैसे बदलेगी?

मेरा मानना है कि फिल्मी दुनिया से आए नेताओं ने धीरे-धीरे पारंपरिक द्रविड़ मॉडल को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई. यह कहानी इस बात की भी है कि पिछले 50 वर्षों में द्रविड़ विचारधारा कैसे कई हिस्सों में बंटती चली गई.

द्रविड़ आंदोलन की मूल संस्था से कई दल निकले—डीके, डीएमके, एआईएडीएमके, एमडीएमके, डीएमडीके और एएमएमके.

तमिलनाडु में फिल्मी सितारों ने अपने प्रशंसकों को सफलतापूर्वक वोट बैंक में बदला और इसी प्रक्रिया में उन्हें कट्टर द्रविड़ विचारधारा से भी धीरे-धीरे दूर ले गए.

उन्होंने सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान की मशाल को जलाए रखा और यह भी सुनिश्चित किया कि वंचित वर्गों के लिए आरक्षण 69 प्रतिशत तक बना रहे, लेकिन उन्होंने आंदोलन की दिशा भी बदल दी. कई बार द्रविड़ विचारधारा अपनी मूल राह से भटक गई.

1972 में एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) ने एक बड़ा बदलाव किया. उन्होंने साबित किया कि द्रविड़ नेता होने के साथ-साथ कोई व्यक्ति भगवान में आस्था रखने वाला भी हो सकता है. उन्होंने 17 अक्टूबर 1972 को एआईएडीएमके की स्थापना की और 1977 में मुख्यमंत्री बने.

एक और फिल्मी सितारा, जयललिता, राजनीति में आईं और 1991 में मुख्यमंत्री बनीं. उनके उभार ने द्रविड़ राजनीति की दिशा को पूरी तरह बदल दिया. उनके करिश्मे ने 2016 तक छह कार्यकालों तक उनकी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी.

इसी बीच एक और फिल्मी हस्ती विजयकांत ने 14 सितंबर 2005 को डीएमडीके बनाई. उन्होंने कुछ हद तक द्रविड़ संस्कृति के कमजोर पड़ने को रोकने की कोशिश की.

अब सी. विजय जोसेफ ने एमके स्टालिन की डीएमके को चुनौती दी है और सात दशक से चली आ रही द्रविड़ राजनीतिक पकड़ को सीधी चुनौती दी है.

विजय ने पेरियार और आंबेडकर की सामाजिक न्याय की विरासत की नई व्याख्या पेश की है और इसके साथ ही “विजयवाद” को आगे बढ़ाया है.

टीवीके में ब्राह्मणों को जगह देना एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है. ऐसा लगता है कि विजय ने जयललिता से प्रेरणा ली है, जो वडकलई अयंगर ब्राह्मण थीं और जिन्होंने सफलतापूर्वक एक द्रविड़ पार्टी का नेतृत्व किया था.

विजय ने अपनी सरकार में ब्राह्मणों को मंत्री बनाया है, यहां तक कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती जैसे संवेदनशील विभाग भी दिए हैं. उन्होंने आठ दलितों को भी महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी है.

द्रविड़वाद अपनी राह से कैसे भटका?

पहला कारण जेन ज़ी है. दूसरा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस. तीसरा द्रविड़ पहचान पर परिवारों का नियंत्रण. चौथा भ्रष्टाचार के आरोप. और पांचवां, बुजुर्ग नेताओं का युवाओं को आत्मसम्मान आंदोलन से जोड़ने में असफल रहना.

पिछले दो दशकों में द्रविड़ विचारधारा के अस्तित्व को लेकर चुनौतियां लगातार बढ़ी हैं. डिजिटलीकरण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वर्चुअल रियलिटी और नई तकनीकों ने युवाओं की सोच और आकांक्षाओं को बदल दिया है.

तमिलनाडु अब ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां जेन ज़ी राजनीतिक चर्चा को तेजी से प्रभावित कर रही है, चाहे उसका असर अच्छा हो या बुरा.

आमतौर पर जेन ज़ी उन लोगों को कहा जाता है जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है. 2026 में उनकी उम्र लगभग 20 से 30 साल के बीच है.

1916 में तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी (जिसे आधिकारिक रूप से साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन कहा जाता था) का उदय हुआ. यह एक सामाजिक आंदोलन से आगे बढ़कर 1960 के दशक के मध्य के बाद एक मजबूत राजनीतिक ताकत बन गई.

पेरियार ने ऊंची जातियों के खिलाफ राजनीति, राज्यों की स्वायत्तता, महिलाओं के सशक्तिकरण और कुछ मौकों पर अलगाववादी विचारों का समर्थन किया.

1967 में द्रविड़ आंदोलन एक नए दौर में पहुंचा, जब सी.एन. अन्नादुरई ने जस्टिस पार्टी के कुछ मूल सिद्धांतों को नरम किया और सत्ता हासिल करने के लिए अधिक व्यावहारिक रास्ता अपनाया.

ब्राह्मण और दक्षिणपंथी नेता सी. राजगोपालाचारी ने डीएमके के उभार को पहले ही भांप लिया था. उन्होंने कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए DMK के साथ हाथ मिला लिया.

इस गठबंधन ने द्रविड़ आंदोलन को पहली बार सत्ता का स्वाद चखाया. 1967 के बाद द्रविड़ राजनीति अपनी कुछ मूल वैचारिक स्थितियों से दूर जाने लगी, जबकि सत्ता के फायदे उठाती रही.

यहीं से कट्टर द्रविड़वाद के कमजोर पड़ने की शुरुआत हुई.

इसके बाद करुणानिधि इस आंदोलन के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे. लेकिन कथित भ्रष्टाचार और परिवारवाद को लेकर लोगों की नाराजगी ने एमजीआर के लिए जगह बनाई. एमजीआर ने 1972 में एआईएडीएमके बनाई और द्रविड़ राजनीति के ढांचे से नास्तिकता को हटा दिया.

एमजीआर ने तमिलनाडु की राजनीति में बड़ी जीत हासिल की और द्रविड़ राजनीति के एक नए मॉडल के निर्विवाद नेता बन गए.

1972 और 1989 में जो राजनीतिक घटनाक्रम हुए थे, शायद वैसी ही स्थिति अब 2026 में फिर दिखाई दे रही है.

आज ऐसा कोई बड़ा नेता नजर नहीं आता, जो द्रविड़ आंदोलन से निकले अलग-अलग संगठनों को एक झंडे के नीचे फिर से एकजुट कर सके और जस्टिस पार्टी तथा पेरियार की विरासत को और कमजोर होने से रोक सके.

यह विरासत अब निश्चित रूप से खतरे के दौर में प्रवेश कर चुकी है. डिजिटलीकरण, जेन ज़ी की आकांक्षाएं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का आकर्षण नई पीढ़ी को पारंपरिक वैचारिक आंदोलनों से लगातार दूर ले जा रहा है.

ऐसा लगता है कि टीवीके प्रमुख विजय सामाजिक न्याय की राजनीति में बने खाली स्थान को भरने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और इसके लिए वह “नियो-द्रविड़ियन विजयवाद” को बढ़ावा दे रहे हैं.

आर. राजगोपालन एक सीनियर पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं. वे @RAJAGOPALAN1951 पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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