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Saturday, 4 July, 2026
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व्हाट्सऐप यूज़रनेम में क्या है? निजता, धोखाधड़ी का खतरा और ऐप्स पर सरकार की पकड़

व्हाट्सएप, टेलीग्राम और सिग्नल को उनके यूजरनेम फीचर को लेकर सरकार द्वारा दिए गए नोटिस, ऐप्स पर दिल्ली की शक्ति बनाम निजता का अब तक का सबसे बड़ा परीक्षण बन गए हैं. एक ऐप ने तो बिना किसी नोटिस के ही नियमों का पालन कर लिया.

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यूजरनेम एक छोटी सी चीज लग सकती है, लेकिन पहले भी छोटी-छोटी सुविधाओं को लेकर बड़े विवाद हो चुके हैं. यह विवाद भी अब बड़ा होता दिख रहा है. मेटा के मालिकाना हक वाले व्हाट्सएप ने सोमवार को एक ब्लॉग पोस्ट के जरिए इस फीचर का ऐलान किया. गुरुवार तक सरकार ने सिर्फ मेटा (Meta) ही नहीं, बल्कि टेलीग्राम (Telegram) और सिग्नल (Signal) को भी ऐसे ही फीचर्स को लेकर नोटिस भेज दिए. यह मामला अब इस बात की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक बन गया है कि नई दिल्ली किसी निजी मैसेजिंग ऐप के नए फीचर्स पर कितना नियंत्रण रख सकती है.

व्हाट्सएप के नए ग्लोबल हेड कुणाल शाह ने इस फीचर को “ज्यादा प्राइवेसी के साथ जुड़ने का तरीका” बताया. इस फीचर के जरिए व्हाट्सएप पर दो लोग बिना एक-दूसरे का फोन नंबर देखे आपस में चैट कर सकेंगे. कंपनी का कहना है कि यह फीचर वैकल्पिक होगा. अनजान लोग किसी का यूजरनेम खोज नहीं सकेंगे. यूजर चाहें तो एक अतिरिक्त “यूजरनेम की” भी चालू कर सकते हैं. ऐसे में चैट शुरू करने के लिए यूजरनेम और यह की, दोनों की जरूरत होगी.

व्हाट्सएप ने अपने ब्लॉग में लिखा, “कई बार आप सिर्फ बात करना चाहते हैं, अपना नंबर देना नहीं.” कंपनी ने लोगों को इस साल बाद में फीचर पूरी तरह शुरू होने से पहले अपना यूजरनेम रिजर्व करने के लिए भी कहा.

पहली नजर में यह फीचर बहुत मामूली लग सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि दूसरे मैसेजिंग ऐप्स में पहले से ऐसे फीचर मौजूद हैं. लेकिन भारत में 50 करोड़ से ज्यादा यूजर्स वाले व्हाट्सएप के लिए, जो उसका सबसे बड़ा बाजार है, यह कोई छोटा बदलाव नहीं है. और ऐसी सरकार के लिए, जिसने पिछले एक साल में मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर अपनी निगरानी बढ़ाई है, यह फीचर बेहद संवेदनशील समय पर आया है.

यही वजह है कि प्राइवेसी देने वाले इस फीचर और उस सरकार के बीच टकराव, जो ऐसे फीचर्स को लेकर पहले से सतर्क है, व्हाट्सएप के यूजरनेम को दिप्रिंट का न्यूज़मेकर ऑफ दि वीक बनाता है.

बुधवार को आईटी मंत्रालय ने व्हाट्सएप के भारत में चीफ कंप्लायंस ऑफिसर को नोटिस भेजा. इसमें Meta से कहा गया कि वह इस फीचर की शुरुआत रोक दे और तीन दिन के भीतर इसका जवाब दे. मंत्रालय ने कहा कि धोखाधड़ी को लेकर गंभीर चिंताएं हैं और जवाब संतोषजनक नहीं हुआ तो नियामकीय कार्रवाई की जाएगी. अगले ही दिन Signal और Telegram को भी नोटिस भेजे गए. उनसे पूछा गया कि उनके यहां पहले से मौजूद बिना फोन नंबर वाले मैसेजिंग फीचर में धोखाधड़ी रोकने के क्या इंतजाम हैं.

अब डिजिटल अधिकारों से जुड़े संगठन सरकार के इस कदम का विरोध करने लगे हैं. वहीं अलग-अलग मैसेजिंग ऐप्स की प्रतिक्रिया अलग-अलग रही है. किसी ने विरोध किया, किसी ने चुप्पी साध ली और किसी ने पहले ही सरकार के संकेतों के मुताबिक कदम उठा लिया.

प्राइवेसी का फायदा बनाम धोखाधड़ी का डर

यह समझना आसान नहीं कि यह फीचर इतना महत्वपूर्ण क्यों है, इसलिए इसे साफ तौर पर समझना जरूरी है. भारत में फोन नंबर सिर्फ एक नंबर नहीं होता. यह बैंक खाते, UPI ID और किसी व्यक्ति की डिजिटल जिंदगी के बड़े हिस्से से जुड़ा होता है. व्हाट्सएप पर किसी नए ग्रुप में जुड़ने की कीमत लंबे समय से अपना फोन नंबर सबको दिखाना रही है.

फोन नंबर साझा किए बिना चैट करने की सुविधा यूजर को उसकी बाकी डिजिटल पहचान से थोड़ा अलग रहने का मौका देती है.

इंडियन गवर्नेंस एंड पॉलिसी प्रोजेक्ट से जुड़े टेक्नोलॉजी पॉलिसी वकील ध्रुव गर्ग ने दिप्रिंट से कहा, “व्हाट्सएप पर यूजरनेम क्या करता है? यह आपको सिर्फ मेटा के सिस्टम तक सीमित रखता है.”

उन्होंने कहा कि एक यूजरनेम व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर देखा जा सकता है, लेकिन उससे बाहर नहीं. जबकि फोन नंबर हर जगह इस्तेमाल होता है. उन्होंने एक आम समस्या का उदाहरण दिया. अगर कोई महिला किसी ग्रुप में एक बार अपना नंबर साझा कर दे, तो एक व्यक्ति को ब्लॉक करने के बाद भी दूसरे लोगों के फोन आते रहते हैं. यूजरनेम इस रास्ते को बंद कर देता है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह सिर्फ फोन नंबर के ऊपर एक अतिरिक्त सुरक्षा परत है, उसका विकल्प नहीं.

सरकार ने इसी फीचर को अपराध की नई संभावना के रूप में देखा. उसकी सबसे बड़ी चिंता किसी और की पहचान बनाकर धोखा देने की है. ऐसे देश में जहां पहले से डिजिटल अरेस्ट स्कैम और फिशिंग के मामले बढ़ रहे हैं, सरकार को डर है कि बैंक, मंत्रालय या किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से मिलते-जुलते यूजरनेम बनाकर लोगों को ठगा जा सकता है.

Meta को भेजे गए नोटिस में कहा गया कि यह फीचर ऑनलाइन धोखाधड़ी, फिशिंग, डिजिटल अरेस्ट स्कैम और फर्जी पहचान वाले मामलों को “काफी बढ़ा सकता है.” कंपनी को तीन दिन में जवाब देने को कहा गया और यह भी कहा गया कि जब तक केंद्र सरकार संतुष्ट नहीं होती, तब तक यह फीचर शुरू नहीं किया जाए.

मंत्रालय का रुख बिल्कुल नरम नहीं था.

MeitY के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, “डरना व्हाट्सएप को चाहिए, हमें नहीं.”

शुरुआती दौर में ही कुछ चेतावनी वाले संकेत भी सामने आ गए. MobiKwik के बिपिन प्रीत सिंह और दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि उनके नाम से मिलते-जुलते यूजरनेम पहले ही रिजर्व हो चुके हैं. पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर शर्मा ने कहा कि जैसे ही वेरिफाइड यूजरनेम होंगे, वैसे ही उनसे मिलते-जुलते बिना वेरिफाइड यूजरनेम भी बड़ी संख्या में सामने आएंगे.

सबसे बड़ी चिंता यही है कि फोन नंबर की तुलना में किसी यूजरनेम की नकल करना ज्यादा आसान है, क्योंकि उसकी असली पुष्टि सिर्फ प्लेटफॉर्म ही कर सकता है.

मेटा पीछे नहीं हटा. गुरुवार को जारी FAQ में व्हाट्सएप ने कहा कि उसने पहले ही सार्वजनिक हस्तियों, मशहूर लोगों, सरकारी संस्थाओं और मेटा-वेरिफ़ाइड अकाउंट्स के यूजरनेम और उनसे मिलते-जुलते दूसरे यूजरनेम भी रिजर्व कर लिए हैं, ताकि उन्हें सिर्फ असली मालिक ही इस्तेमाल कर सकें. कंपनी ने इस दावे को “गलत” बताया कि लोकप्रिय यूजरनेम किसी और ने पहले ही ले लिए हैं.

सिर्फ व्हाट्सएप ही नहीं

इसके बाद सरकार की जांच और बढ़ गई. व्हाट्सएप को नोटिस भेजने के बाद मंत्रालय ने टेलीग्राम और सिग्नल से भी पूछा, जहां पहले से यूजरनेम की सुविधा मौजूद है, कि वे धोखाधड़ी और फर्जी पहचान से कैसे निपटते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक टेलीग्राम से यह भी पूछा गया कि उसे यह फीचर रखने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए.

हालांकि तीनों मामलों में पूरी तरह समान स्थिति नहीं है. टेलीग्राम में यह फीचर पहले से चालू है, जबकि व्हाट्सएप ने सिर्फ इसकी घोषणा की है. टेलीग्राम पहले से विवादों में भी रहा है. हाल ही में कथित NEET पेपर लीक और फर्जी पेपर वाले चैनलों को लेकर भारत में उस पर एक हफ्ते का प्रतिबंध लगाया गया था. सरकार ने उस पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाया था, जबकि टेलीग्राम इस प्रतिबंध के खिलाफ अदालत पहुंच गया था.

फिलहाल Meta को तीन दिन के नोटिस का जवाब देना है. सरकार ने साफ कहा है कि अगर जवाब कमजोर हुआ तो फीचर शुरू नहीं होने दिया जाएगा. टेलीग्राम और सिग्नल ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

असली लड़ाई

अब मामला सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं है कि व्हाट्सएप फर्जी पहचान बनाने वालों को रोक पाएगा या आम यूजर की सुरक्षा कर पाएगा. एक हफ्ता पहले तक यूजरनेम सिर्फ एक छोटा सा फीचर था. आज यह इस बात की परीक्षा बन गया है कि दिल्ली किसी प्रोडक्ट के लॉन्च होने से पहले उसमें कितनी दखल दे सकती है. यहीं से कानूनी सवाल शुरू होता है.

धोखाधड़ी को लेकर सरकार की चिंता से सहमत कुछ लोग भी उसके कदम पर सवाल उठा रहे हैं.

इंटरनेट फ्रीडम फ़ाउंडेशन ने कहा है कि इस नोटिस का कानून में कोई साफ आधार नहीं है. संगठन का कहना है कि MeitY ने ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं बताया है, जो सरकार को किसी फीचर को लॉन्च होने से पहले मंजूरी देने या उसे वापस लेने का अधिकार देता हो, क्योंकि ऐसा कोई प्रावधान मौजूद ही नहीं है.

संगठन ने कहा, “कार्यपालिका बिना किसी कानूनी अधिकार के ऐसे वैध फीचर्स को रोक रही है, और उनके साथ उन निजी बातचीतों को भी सीमित कर रही है, जिनकी सुरक्षा ये फीचर करते हैं.”

इसी तरह सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर ने भी सरकार से नोटिस वापस लेने, उन्हें सार्वजनिक करने और यह बताने की मांग की कि यह कार्रवाई किस कानून के तहत की गई.

शुक्रवार को X पर किए गए एक पोस्ट में संगठन ने कहा, “ऐसी प्राइवेसी बढ़ाने वाली तकनीकों पर किसी भी नियामकीय कार्रवाई के लिए स्पष्ट और उचित कारण होना चाहिए और वह संतुलित भी होनी चाहिए.”

संक्षेप में आपत्ति यह है कि कार्यपालिका बिना किसी स्पष्ट कानून के यह तय कर रही है कि कोई निजी कंपनी कौन-सा फीचर बना सकती है और कौन-सा नहीं.

सरकार की ओर से भेजे गए इन नोटिसों पर एक भारतीय कंपनी की प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि सरकारी दबाव का असर कितनी तेजी से फैल सकता है.

वह ऐप जिसने इंतिजार नहीं किया

सबसे दिलचस्प प्रतिक्रिया उस प्लेटफॉर्म से आई, जिसे सरकार ने कोई नोटिस ही नहीं भेजा था. Zoho की बनाई भारतीय मैसेजिंग ऐप Arattai, जिसे लंबे समय से व्हाट्सएप के स्वदेशी विकल्प के रूप में पेश किया जाता रहा है, पहले से लोगों को फोन नंबर की जगह यूजरनेम से जुड़ने की सुविधा देती है.

बुधवार को, किसी भी तरह का नोटिस मिलने से पहले ही, Zoho के सह-संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने X पर घोषणा की कि कंपनी यह फीचर बंद कर देगी.

उन्होंने लिखा, “नियमों में हुए बदलाव का पालन करने के लिए हम Arattai में यूजरनेम आधारित अकाउंट फीचर बंद कर रहे हैं.”

सबसे खास बात यह थी कि पालन करने के लिए कोई नया नियम बना ही नहीं था. न कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी हुई थी और न ही यूजरनेम वाले अकाउंट्स को लेकर कोई नया ढांचा बनाया गया था.

नोटिस सिर्फ व्हाट्सएप, टेलीग्राम और सिग्नल को भेजे गए थे, Arattai को नहीं. इसके बावजूद वेम्बू ने पहले ही सरकार के मुताबिक कदम उठाने का फैसला कर लिया. एक भारतीय कंपनी ने सरकार के रुख को समझते हुए उससे पहले ही कार्रवाई कर दी. इससे पता चलता है कि जैसे ही सरकार किसी फीचर को लेकर असहज होने का संकेत देती है, कुछ प्लेटफॉर्म बिना किसी औपचारिक आदेश का इंतिजार किए ही अपने फैसले बदल सकते हैं.

(इस न्यूज़मेकर ऑफ दि वीक को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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