हाल में म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग की भारत और चीन की यात्रा, और बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारीक़ रहमान की चीन यात्रा को एक ही कड़ी के हिस्से तौर पर लिया जाना चाहिए. ये कोई अलग-अलग कूटनीतिक घटनाएं नहीं हैं. ये दौरे म्यांमार से लेकर बंगाल की खाड़ी के तट और बांग्लादेश तक भारत के पूर्वी पड़ोस पर; नदियों, बिजली के नेटवर्क, रक्षा खरीद, और राजनीतिक सत्ता पर अपना प्रभाव जमाने की चीन की व्यापक कोशिश की ओर, और इसका मुक़ाबला करने के भारत के प्रयासों की तरफ इशारा करते हैं.
म्यांमार के राष्ट्रपति ने बागडोर संभालने के बाद अपने पहले विदेश दौरे के तहत 30 मई से 3 जून तक भारत की यात्रा की. इसके बाद वे 15 से 19 जून तक चीन के दौरे पर रहे. इसके तीन दिन बाद बांग्लादेश के प्रधानमंत्री ने सत्ता संभालने के बाद पहली बड़ी रणनीतिक पहल के तहत चीन का दौरा करने का फैसला किया, हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भारत आने का निमंत्रण पहले से दे रखा था. ये कूटनीतिक हरकतें अपना अर्थ रखती हैं. म्यांमार संतुलन कायम करने के संकेत दे रहाहै; बांग्लादेश बदलाव केसंकेत दे रहा है, तो चीन अपनी महत्वाकांक्षाएं उजागर कर रहा है.
भारत की चिंता सिर्फ इतनी नहीं है कि चीन उसके पड़ोसी देशों से रिश्ते मजबूत कर रहा है. हर स्वतंत्र देश को अपने नए साझीदार बनाने का अधिकार है. लेकिन चिंता की बात यह है कि म्यांमार और बांग्लादेश में चीन की भूमिका से भारत की सीमा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, उसके उत्तर-पूर्व में अस्थिरता पैदा हो सकती है, बंगाल की खाड़ी के मामले में रुख बदल सकता है, संपर्क की परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं, प्रवासियों का दबाव और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ सकता है.
लेकिन तस्वीर एकतरफा ही नहीं है. चीन वित्त, वेपन, और इन्फ्रास्ट्रक्चर की पेशकश कर सकता है, लेकिन भूगोल, इतिहास, संस्कृति, बाजार, नदियों, ऊर्जा, औषधि, संपर्क, और जनता के साथ जनता के जुड़ाव के कारण भारत म्यांमार और बांग्लादेश, दोनों के लिए अपरिहार्य बना रहेगा.
म्यांमार भारत पहले आया लेकिन चीन का साया बड़ा
ह्लाइंग ने चीन से पहले भारत जाने का जो फैसला किया, वह सांकेतिक महत्व रखता है. भारत के सरकारी बयान में म्यांमार को भारत की ‘पड़ोसी पहले’, एक्ट ईस्ट’, और ‘महासागर’ जैसी नीतियों मिलन बिंदु पर रखा गया. ह्लाइंग ने दोनों देशों के बौद्ध तथा सभ्यतागत संबंधों को रेखांकित करते हुए दौरे की शुरुआत बोधगया से की. एजेंडा में सीमा सुरक्षा, कलादान मल्टी-मोडल ट्रांज़िट प्रोजेक्ट, भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय हाइवे, रुपया-क्यात समझौता, दुर्लभ खनिज, साइबर सिक्यूरिटी, समुद्री सहयोग, और क्षमता निर्माण जैसे मुद्दे शामिल थे.
‘आसियान’ (ASEAN) देशों में अकेले म्यांमार और भारत की जमीनी सीमा सटी हुई है. यह भारत के लिए वह पुल है जिसे पार करके वह दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रवेश कर सकता है. भारत-म्यांमार की 1,643 किमी लंबी सीमा अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर, और मिजोरम से होकर गुजरती है. म्यांमार में अस्थिरता बगावत, नार्कोटिक्स की तस्करी, शरणार्थियों के आवागमन, हथियारों की आवाजाही, सीमा पार के जातीय तनाव, और उत्तर-पूर्व में आंतरिक सुरक्षा आदि को सीधे प्रभावित करती है. इसलिए, म्यांमार का यह आश्वासन महत्वपूर्ण है कि उसके जमीन का भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा. हालांकि म्यांमार के सीमावर्ती इलाकेउसके केंद्रीय नियंत्रण में नहीं हैं, इसलिए नेयप्यीदाव के साथ भारत का मेलजोल जरूरी है, चाहे यह असुविधाजनक क्यों न हो. भारत अगर इस बात की अनदेखी करता है कि म्यांमार की सत्ता किसकेहाथ में है, तो वह अपने चार सीमावर्ती राज्यों की सुरक्षा को मजबूत नहीं कर सकता.
चीन पर म्यांमार का अविश्वास
चीन के साथ म्यांमार का संबंध गहरा तो है मगर असहज है. म्यांमार की सेना कूटनीतिक सुरक्षा, हथियार, व्यापार, और स्थानीय हथियारबंद गुटों से निबटने के लिए चीन पर निर्भर रही है. इसके बावजूद उसके राजनीतिक और फौजी शासक चीन पर लंबे समय से भरोसा नहीं करते रहे हैं. यह अविश्वास पांच मसलों के कारण रहा है : काचिन में दुर्लभ खनिज के खनन, माइस्टोन बांध के निर्माण पर रोक, चीन-म्यांमार तेल एवं गैस पाइपलाइन, स्थानीय हथियारबंद गुटों पर चीनी प्रभाव, और उत्तरी शान स्टेट में सीमा पर कथित अतिक्रमण.
काचिन में मुख्यतः डिस्प्रोजियम और टर्बियम जैसे दुर्लभ खनिजों का खनन तनाव का बड़ा कारण बन गया है. मई 2026 में ‘रायटर्स’ ने खबर दी कि काचिन खासतौर से महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दुनिया में दुर्लभ भरी खनिजों के कुल उत्पादन में करीब 50 फीसदी का योगदान देता है. समस्या यह है कि इस उत्पाडंका बड़ा हिस्सा चीन के सप्लाइ चेन के काम आता है और म्यांमार को सिर्फ पारिस्थितिकी का विनाश हासिल होता है. ‘ग्लोबल विटनेस’ और दूसरों के द्वारा की गई जांच ने खनन में विषैली प्रक्रिया, जल प्रदूषण, पहाड़ियों के विनाश, काचिन में स्थानीय पर्यावरण को गंभीर नुकसान के खुलासे किए हैं.
माइस्टोन बांध अविश्वास का दूसरा प्रतीक है. जनता के विरोध के बाद इसका काम 2011 में स्थगित कर दिया गया. इस परियोजना के बारे में व्यापक धारणा यह है कि इससे इरावड्डी नदी को नुकसान पहुंचेगा और इस बांध से बनाई गई ज़्यादातर बिजली चीन ले जाएगा. चीन इस परियोजना पर पुनर्विचार करने का दबाव डालता रहा है. म्यांमार में कई लोगों का मानना है कि माइस्टोन बांध विषमतापूर्ण सौदा है जिसमें म्यांमार को पर्यावरणीय और राजनीतिक नुकसान झेलना है, जबकि चीन को रणनीति और ऊर्जा के मामले में लाभ हासिल होंगे.
क्याउकफ़्यू से यून्नान तक चीन-म्यांमार तेल और गैस के पाइपलाइन भी इसी असंतुलन को उजागर करते हैं. ये चीन को बंगाल की खाड़ी से दक्षिण-पश्चिम चीन तक ऊर्जा का स्थल मार्ग उपलब्ध कराते हैं, और मलक्का जलमार्ग पर उसकी निर्भरता कम करते हैं. म्यांमार को रास्ता देने के एवज में थोड़ी आय होती है और इन्फ्रास्ट्रक्चर का कुछ लाभ मिलता है. लेकिन स्थानीय समुदायों ने जमीन अधिग्रहण, मामूली मुआवजे, और विकास के मामले में अपर्याप्त लाभ आदि को लेकर शिकायत की है. पाइपलाइन म्यांमार से होकर गुजरती है, जो एक तरह से उसकी संप्रभुता पर प्रश्नचिह्न जैसे हैं.
चीन सरकारी तौर पर तो म्यांमार की संप्रभुता का समर्थन करता है, लेकिन चीन में बने हथियार और चीन से जुड़े सप्लाई नेटवर्क म्यांमार-चीन सीमा पर हथियारबंद गिरोहों के साथ जुड़े हुए हैं, खासकर उत्तरी म्यांमार में सक्रिय यूनाइटेड व स्टेट आर्मी और दूसरे गुटों के साथ. स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में इस आरोप के साथ खबरें छपती रहती हैं कि चीन उत्तरी शान स्टेट और चिंसवेहाव, क्यूकॉक-पंसाई, और नमतित के हिस्सों में सीमा पर बाड़बंदी या अतिक्रमण कर रहा है. ये खबरें म्यांमार की संप्रभुता को लेकर गहरी चिंताओं को जाहिर करती हैं. चीन जमीनी स्थितियों को बदल रहा है; यह धारणा राष्ट्रवादी आक्रोश को भड़का सकती है.
चीन की म्यांमार नीति इन ठोस हितों से तय होती है: बंगाल की खाड़ी, क्याउकफ़्यू बंदरगाह तक पहुंच, तेल व गैस की पाइपलाइनें, चीन-म्यांमार आर्थिक कॉरीडोर, दुर्लभ खनिज, सीमा पर मजबूती, और स्थानीय सशस्त्र संगठनों के बूते बढ़त. भारत के लिए इसका अर्थ यह है कि म्यांमार उसके लिए होड़ का क्षेत्र बना रहेगा. भारत पैसे के मामले में बढ़त की स्थिति में नहीं है. बल्कि उसका भूगोल, बौद्ध धर्म वाले रिश्ते, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, सीमा को लेकर प्रासंगिकता, और चीन पर निर्भर न होने की म्यांमार की अपनी इच्छा ही भारत को बढ़त दिलाती है.
रहमान का चीन दौरा और भारत को संकेत
बांग्लादेश पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि चीन के दायरे का विस्तार भारत को कहीं ज्यादा सीधे तौर पर प्रभावित करता है. अपने पहले बड़े रणनीतिक कदम के लिए भारत की जगह चीन को चुनकर रहमान ने एक राजनीतिक संदेश दिया है. इसके पीछे इरादा भारत से अपनी स्वायत्तता दिखाना और यह संकेत देना है कि नये निज़ाम को अपने विशाल पड़ोसी पर निर्भर न देखा जाए.
दौरों के दौरान बांग्लादेश और चीन ने 17 एमओएयू पर दस्तखत करके रिश्तों को और मजबूत किया. इन एमओएयू में सरकार-सरकार के बीच के एमओएयू, निवेश और दोनों पक्षों के बीच एमओएयू शामिल हैं. बातचीत इन्फ्रास्ट्रक्चर, व्यापार, औद्योगिक आधुनिकीकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, मीडिया, ‘ग्रीन’ टेक्नोलॉजी, एआइ, बंदरगाह विकास, और तीस्ता नदी परियोजना जैसे मुद्दों पर हुई.
बांग्लादेश के प्रति चीन का आकर्षण क्यों है, यह आसानी से समझा जा सकता है. वह उसे इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए वित्त, रक्षा उपकरण, औद्योगिक निवेश, राजनीतिक संबंध, और कूटनीतिक संतुलन के लिए गुंजाइश उपलब्ध कराता है. वह पहले से ही बांग्लादेश का बड़ा डिफेंस सप्लायर रहा है. खबर है कि बांग्लादेश चीनी जे-10सीई लड़ाकू विमान हासिल करने की कोशिश कर रहा है. इसे इस संदर्भ में देखा जा सकता है. यह सौदा न भी फाइनल हो तो भी यह प्रस्ताव यही संकेत देता है कि बांग्लादेश चीन के अत्याधुनिक रक्षा उपक्रमों में अपने लिए गुंजाइश तलाश रहा है.
इससे एक सख्त सवाल उभरता है. बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था महंगाई, बेरोजगारी, विदेशी मुद्रा संकट, बाहरी मदद पर निर्भरता आदि से जूझ रही है. ऐसे में लड़ाकू विमान की बड़ी खरीद आर्थिक दृष्टि से संदिग्ध हो सकती है. बांग्लादेश को अपनी सेना का आधुनिकीकरण करने की जरूरत तो है ही. सेना के आधुनिकीकरण के लिए उसने जो ‘फोर्सेस गोल 2030’ योजना 2017 में औपचारिक रूप से अपनाई थी वह अभी भी लागू है, हालांकि अब ‘स्मार्ट डिफेंस’ के नाम से ऐसा नजरिया अपनाया गया है जिसमें दूरदर्शी, और दुश्मन में खौफ पैदा करने वाले उपायों पर ज़ोर दिया जा रहा है. लेकिन गहरा सवाल यह है कि आखिर यह ताकत किसके खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए बनाई जा रही है?
भूगोल की अनदेखी नहीं की जा सकती. बांग्लादेश भारत से बुरी तरह घिरा हुआ है. भारत के साथ उसकी जमीनी सीमा 4.096.7 किमी लंबी है, जबकि म्यांमार के साथ उसकी मात्र 271 किमी लंबी सीमा है. चीन उसे विमान, मिसाइल, रडार आदि दे सकता है लेकिन भारत के साथ अगर उसका कोई संकट खड़ा हुआ तो वह उसे वास्तविक भौगोलिक सुरक्षा नहीं दे सकता.
बांग्लादेश के लिए भारत क्यों अहम बना रहेगा
बांग्लादेश के लिए भारत का महत्व ढांचागत है. चीन उसे वित्त और हथियार दे सकता है, लेकिन भारत उसके अस्तित्व के लिए भौगोलिक सुरक्षा उपलब्ध कराता है. पानी, बिजली, भावी जलवायु, मेडिकल सेवा, व्यापार मार्ग, जन-जन से संपर्क, सांस्कृतिक पहचान, क्षेत्रीय सुरक्षा आदि तमाम चीजों के मामले में बांग्लादेश भारत के साथ कहीं करीब से जुड़ा है.
पहला मसला पानी का है. गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना नदियों के क्षेत्र में बांग्लादेश भौगोलिक रूप से भारत से नीचे स्थित है. उसकी नदियां, बाढ़, गाद, खेती, मछली पालन, आंतरिक जलमार्ग, और पेयजल सुरक्षा आदि पनि के उन प्रवाहों पर निर्भर है जो भारत से होकर गुजरते हैं या उससे प्रभावित होते हैं. बांग्लादेश की 57 में से 54 नदियां ऐसी हैं जो सीमा पार करके भारत तक बहती हैं. इनमें गंगा, तीस्ता, फेनी, मनु, मुहूरी, खोवई, गुमती, धरला, दूधकुमार, और कुशीयारा शामिल हैं. चीन बांग्लादेश की नदियों से जुड़ी समस्या नहीं निबटा सकता. वह इंजीनियरिंग के ठेके पेश कर सकता है, नदी क्षेत्र के मामले में सहयोग नहीं उपलब्ध करा सकता. केवल भारत ही नदी जल हिस्सेदारी, बाढ़ के पूर्वानुमान, तटबंध व्यवस्था, गाद, आंतरिक जलमार्ग, और जलवायु समायोजन के मामलों में उसे सार्थक सहयोग दे सकता है.
तीस्ता का मसला एक अच्छा उदाहरण है. चीन नदी प्रबंधन प्रोजेक्ट पेश कर सकता है लेकिन मूल राजनीतिक और जलीय मसले भारत और बांग्लादेश को ही मिलकर निबटाने होंगे. चीन द्वारा निर्मित तीस्ता परियोजना पानी के बहाव पर भारत और बांग्लादेश के बीच टिकाऊ समझदारी का विकल्प नहीं बन सकती. इसलिए, बांग्लादेश को दीर्घकालिक जल सुरक्षा भारत के सहयोग से ही हासिल हो सकती है, रणनीतिक तेवरों के बूते नहीं, जो कि रहमान के चीन दौरे के दौरान किए गए समझौते से जाहिर हो रहा है.
दूसरा मसला बिजली का है. बांग्लादेश को भारत से बिजली के आयात और ऊर्जा के क्षेत्र में भारत के सहयोग से काफी लाभ हुआ है. भारत से बिजली सप्लाई, सीमा पार ट्रांसमिशन, निजी क्षेत्र के साथ ऊर्जा के लिंक, और क्षेत्रीय ग्रिड की गुंजाइशें बांग्लादेश के लिए दूरदराज़ स्थित चीन के आश्वासनों के मुकाबले ज्यादा व्यावहारिक हैं. भारत उसे बिजली, ग्रिड बैलेंसिंग, नवीकरणीय सहयोग, और क्षेत्रीय ऊर्जा व्यापार की सुविधा उपलब्ध करा सकता है. चीन बिजली संयंत्र बना सकता है लेकिन वह सबसे उचित साझीदार के रूप में भारत का विकल्प नहीं उपलब्ध करा सकता. ऊर्जा से संबंधित भूगोल भारत की हिमायत करता है.
तीसरा मसला है जलवायु परिवर्तन. बांग्लादेश उन देशों में शामिल है जिन्हें जलवायु के कारण सबसे ज्यादा नुकसान झेलने का सबसे ज्यादा खतरा रहता है. समुद्र के स्तर में वृद्धि, तूफान, नदियों द्वारा कटाव, खारेपन का खतरा, बाढ़ आदि के कारण समय-समय पर बड़ी आबादी को विस्थापित होना पड़ सकता है. जलवायु के कारण दबाव केवल बांग्लादेश की समस्या नहीं है, इसका असर भारत के सीमावर्ती राज्यों, खासकर पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा, और मिजोरम को झेलना पड़ सकता है. चीन बांग्लादेश पर जलवायु के दबाव को कम नहीं कर सकता, शरणार्थियों की समस्या या सीमावर्ती समुदायों को स्थिरता नहीं प्रदान कर सकता. भारत और बांग्लादेश को जलवायु के मामले, पूर्व चेतावनी की व्यवस्था, आपदा पर कार्रवाई, तटबंध व्यवस्था, नदी प्रबंधन, बहुआयामी कृषि, और सीमा के व्यवस्थित प्रबंधन आदि के मामलों में आपसी सहयोग करना पड़ेगा.
छठा मसला मेडिकल मामले में निर्भरता का है. बांग्लादेश के लोग स्वास्थ्य सेवा के लिए लंबे समय से भारत आते रहे हैं. कोलकाता, चेन्नै, दिल्ली, हैदराबाद, बंगलूरू, मुंबई, और गुवाहाटी के अस्पताल उनकी पहुंच में रहे हैं, सांस्कृतिक रूप से परिचित रहे हैं; और चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया या पश्चिमी देशों के अस्पतालों के मुक़ाबले सस्ते रहे हैं. आम बांग्लादेशी के लिए भारत कोई निराकार रणनीतिक साझीदार नहीं है, यह वह जगह है जहां उसके यहां के लोग कैंसर, दिल रोग, अंगों से संबंधित प्रक्रियाओं, हड्डी रोग के इलाज, जांच, और स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से सलाह लेने के लिए जाते हैं. चीन इस सामाजिक मेल, भाषा संबंधी सुविधा, मेडिकल सेवा, और नजदीकी की बराबरी नहीं कर सकता.
पांचवां मसला संपर्क व्यवस्था का है. बांग्लादेश की भावी समृद्धि सड़कों, रेलवे, आंतरिक जलमार्ग, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, और क्षेत्रीय व्यापार पर निर्भर होगी. भारत उसे उत्तर-पूर्व से आगे नेपाल और भूटान से जोड़ सकता है. भारत उसे इस उपमहादेश और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच साजो-सामान का केंद्र बनने में मदद दे सकता है. रेल, सड़क, आंतरिक जलमार्ग, तटीय जाहज सेवा, सीमावर्ती हात, बंदरगाहों तक पहुंच, सब कुछ मुख्यतः भारत-बांग्लादेश सहयोग पर निर्भर होगा. चीन बांग्लादेश के अंदर इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास कर सकता है लेकिन वह इस तरह का क्षेत्रीय बाजार नहीं उपलब्ध करा सकता.
छठा मसला समुद्री और हवाई मार्ग से संपर्क का है. समुद्री मामले में बांग्लादेश का भविष्य बंगाल की खाड़ी पर निर्भर है, जहां भारत एक बड़ी नौसैनिक ताकत के रूप में मौजूद है. चीन बंदरगाहों के विकास में मदद दे सकता है लेकिन वह खाड़ी के समुद्री भूगोल को नहीं बदल सकता. मोंगला बंदरगाह के समुद्र क्षेत्र में चीन अगर अपनी मौजूदगी बढ़ाता है तो भारत को मजबूरन जवाबी कदम उठाना पड़ेगा. यह बांग्लादेश के लिए रणनीतिक सुविधा बढ़ाने की जगह गिरा ही देगा. इसी तरह, उसका विमानन, पर्यटन, माल ढलाई, और व्यवसाय भी नजदीकी और यात्री की मांग के कारण भारत से जुड़े रहेंगे.
सातवां मसला इतिहास और संस्कृति से जुड़ा है. भारत और बांग्लादेश 1971 के संघर्ष, बंगाली संस्कृति, भाषा, साहित्य, संगीत, खाद्य व्यंजन, पारिवारिक संपर्कों, और सभ्यतागत निरंतरता की विरासत के साझीदार हैं. चीन के साथ ऐसा कोई भावनात्मक या ऐतिहासिक जुड़ाव नहीं है. भारत और बांग्लादेश के रिश्ते में रोड़े भी रहे हैं, लेकिन उसमें गहराई भी है. इस तरह की गहराई इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए कर्ज देकर नहीं बनाई जा सकती.
चीनी सेना बांग्लादेश की सुरक्षा की गारंटी नहीं
बांग्लादेश में चीनी फौज की बड़ी मौजूदगी ढाका स्थित रणनीतिक जानकारों के समुदाय को संतुलन के साधन के रूप में आकर्षक लग सकती है लेकिन यह बांग्लादेश की सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकती. बांग्लादेश का भूगोल ऐसा है कि वह भारत की अनदेखी नहीं कर सकता. चीन को फौजी जवाब के रूप में इस्तेमाल करने पर भारत का संदेह बढ़ सकता है, सीमाओं पर सख्ती बढ़ सकती है, नदियों और आवाजाही के मामले में सहयोग में जटिलता आ सकती और रोजान की स्थिरता के लिए जरूरी भरोसा घट सकता है.
वास्तविक संकट के समय में चीन भौगोलिक रूप से दूर नजर आ सकता है. चीनी फौजी समर्थन दूरी, बंगाल की खाड़ी में कार्रवाई की स्थितियों, भारतीय नौसेना की ताकत, क्षेत्रीय राजनीति, और टकराव बढ्ने के खतरों की वजह से बाधित हो सकता है. चीन उसे रक्षा के साजोसामान बेच सकता है लेकिन बांग्लादेश को रोज-रोज के पैमाने पर भारत के साथ ही रहना होगा. इसलिए बांग्लादेश के लिए सबसे बुद्धिमानी भरी दीर्घकालिक नीति यही होगी कि चीन से अपने रिश्ते को वह फौजी रंग में न रंगे, बल्कि अपनी आर्थिक विविधता के लिए चीन का इस्तेमाल करे और भारत को क्षेत्रीय स्थिरता के मूल स्तंभ के रूप में कायम रखे.
उत्तर-पूर्व भारत पर असर
इन घटनाओं का उत्तर-पूर्व भारत पर तुरंत असर पड़ेगा. म्यांमार मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड, और अरुणाचल प्रदेश को बगावत, शरणार्थियों, नशीले पदार्थों, और स्थानीय संपर्कों के जरिए प्रभावित करेगा. बांग्लादेश असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, और पश्चिम बंगाल को विस्थापन, व्यापार, नदियों, संपर्क व्यवस्था, तस्करी, और सांस्कृतिक रिश्ते के जरिए प्रभावित करेगा.
अगर चीन म्यांमार और बांग्लादेश में अपनी भूमिकाओं में वृद्धि करेगा तब भारत के उत्तर-पूर्व को पूरब और पश्चिम से भी रणनीतिक दबाव का सामना करना पड़ेगा. म्यांमार पर चीनी प्रभाव कलादान, त्रिपक्षीय हाइवे, सीमावर्ती बगावत, और नार्कोटिक्स की तस्करी को प्रभावित करेगा. बांग्लादेश में भी ऐसे हालात बने तो भारत-बांग्लादेश संपर्क, सीमा प्रबंधन, तीस्ता को लेकर राजनीति, रक्षा कोलेकर चिंताओं, बंगाल की खाड़ी की सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है.
लेकिन उत्तर-पूर्व चीन के लिए भारत का जवाब बन सकता है. भारत अगर इस क्षेत्र को बांग्लादेश, म्यांमार और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच पुल के रूप में विकसित करता है तो वह इसे कमजोर कड़ी की जगह फायदे में बदल सकता है. बेहतर सड़कें, रेलवे, हवाई अड्डे, सीमावर्ती व्यापार, मेडिकल कॉरीडोर, शिक्षा केंद्र, और सांस्कृतिक आदान-प्रदान उत्तर-पूर्व को भारत की पूर्वी कूटनीति का केंद्र बना सकता है.
भारत चीन को बेअसर कैसे करे
भारत म्यांमार के साथ संपर्क की परियोजनाओं को जल्दी पूरा करने की कोशिश करे, सीमावर्ती क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर चिंताओं के मामले में ह्लाइंग के आश्वासनों का लाभ उठाए, बौद्ध कूटनीति का विस्तार करे, स्वास्थ्यसेवा और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाए, म्यांमार की संप्रभुता को आंच पहुंचाए बिना सभी प्रासंगिक किरदारों के साथ व्यावहारिक संवाद बनाए रखे. यह हानि-लाभ बराबर करने वाला खेल नहीं है, भारत को चीन पर म्यांमार के भारी अविश्वास का फायदा उठाना चाहिए.
बांग्लादेश अगर चीन की तरफ ज्यादा हाथ बढ़ाता है या म्यांमार अगर चीन पर ज्यादा निर्भर होता है तो भारत को जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं करना चाहिए. वह बांग्लादेश की नयी सरकार के साथ भरोसे का रिश्ता बनाए. गंगा और तीस्ता आदि से जुड़े जल समझौतों, बिजली के व्यापार, मेडिकल सेवा, संपर्क, आपदा प्रबंधन, सीमा पर स्थिरता, और बाजार तक पहुंच आदि के मामलों में आगे कदम बढ़ाना चाहिए.
भारत बांग्लादेश को यह जताए कि उसके विकास को चीन का रणनीतिक रूप से बंधक बनाने की जगह भारत से जोड़ा जाए तो वह ज्यादा सुरक्षित, सस्ता, और टिकाऊ होगा. भारत बांग्लादेश को केवल अवैध घुसपैठ और राजनीतिक संदेह के चश्मे से न देखे. सुरक्षा को लेकर चिंताएं जायज हैं, लेकिन अवसरों पर भी ध्यान देना जरूरी है. मजबूत और समृद्ध बांग्लादेश भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक थाती होगी. असंतुष्ट और चीन की तरफ हाथ बढ़ाता बांग्लादेश बड़ी रणनीतिक विफलता होगी.
भारत के सामने चुनौती यह है कि इन दोनों देशों के मामले में उसे जो प्राकृतिक बढ़त हासिल है उसे सक्रिय नीति में बदले. भूगोल ही पर्याप्त नहीं है, भारत को तेजी से काम करना होगा, सबक बेहतर तरीके से सीखना होगा, परियोजनाओं को पूरा करना होगा, सीमाओं को मजबूती से संभालना होगा, और उत्तर-पूर्व को अपनी पूर्वी रणनीति का केंद्र बनाना होगा. अगर वह ऐसा करता है तो चीन के प्रभाव को संतुलित कर लेगा. उसने देर की तो चीन हर खाली जगह को भरना जारी रखेगा.
लेखक असम राइफल्स के पूर्व डायरेक्टर जनरल हैं. वे अभी हैदराबाद स्थित सेंट मैरीज़ रिहैबिलिटेशन यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर हैं. विचार निजी हैं.
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