चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी या 2.6 फीसदी की दर से इस पर प्राइम टाइम की बहस इन दिनों सामान्य से ज्यादा गर्म रही. स्टूडियो में बैठे लोग जिस तरह रातों-रात अर्थशास्त्री बनकर एक-दूसरे की आलोचना कर रहे थे, उसे देखकर सर्जियो गोर को भी ज़रूर काफी मज़ा आया होगा. सच में, यह सब मजेदार है, लेकिन राजनीति के नज़रिए से यह एक गलत बहस है. जो भी हो, वैसे भी दूसरी तिमाही आधे से ज्यादा गुजर चुकी है और यह बहस शांत हो जाएगी.
यह बहस सिर्फ इसलिए गलत नहीं है कि यह थोड़े समय के लिए है, बल्कि इसलिए भी है कि इतने ज्यादा बंटे हुए माहौल में लोग अपनी राजनीति के हिसाब से ही सोचते और मानते हैं. और जीडीपी के आंकड़ों को देखकर कोई वोटर अपना मन बदलने वाला नहीं है. जो बहस मायने रखती है, उसका मुद्दा बिल्कुल अलग है: पेट्रोल में एथनॉल की मिलावट का.
वाहन मालिकों का बड़ा हिस्सा, यानी ज्यादातर हिंदू मध्यवर्ग, मोदी-शाह की भाजपा का वफादार वोट बैंक है. आज वह काफी गुस्से में है. इस मुद्दे पर अभी तक कोई चुनाव तो नहीं हुआ है, लेकिन पिछले कई महीनों में एयरपोर्ट पर, शादियों में, होटल की लॉबी में, मेहमानों के रूप में और उबर टैक्सी ड्राइवरों के रूप में मुझे कई बिल्कुल अनजान लोग मिले जो काफी नाराज़ दिखे. उनका गुस्सा यह था कि वे हमें जबरदस्ती एथेनॉल मिला हुआ पेट्रोल (ईबीपी) कैसे दे सकते हैं?
उनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होगी, जो आर्थिक विकास को लेकर मोदी सरकार के आंकड़ों का उतना ही जोरदार समर्थन करते होंगे. इसका मतलब यह है कि भाजपा जिस ‘जनाधार’ को काफी गंभीरता से लेती है, वह सिर्फ इस एक मुद्दे को लेकर गुस्से में है. बेशक, वे सभी यह मानते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर में जीत हमारी हुई, कि उनके नेता का लोहा पूरी दुनिया मानती है, जिसमें पुतिन और शी जिनपिंग भी शामिल हैं और ‘यह हमने अभी बिश्केक में देखा’. तो फिर हमें यह मिलावटी पेट्रोल क्यों?
व्यापक तौर पर इन लोगों के सवाल ये हैं—हमें क्या फायदा होगा? हम कीमत तो उतनी ही देंगे, लेकिन कम माइलेज मिलेगा. सरकार भी यह मानती है. इसके साथ गाड़ी का इंजन भी खराब होगा, जबकि हम EMI का नियमित रूप से भुगतान कर रहे होंगे.
देश को क्या फायदा होगा? अगर कोई फायदा होगा तो हमें क्यों नहीं बताया जा रहा है?
हमें विकल्प चुनने का मौका क्यों नहीं दिया जा रहा है? पहली बात तो यह है कि कोई यह नहीं बता रहा कि हम ईबीपी का इस्तेमाल क्यों करें. हमसे मानो यह कहा जा रहा है कि इसका इस्तेमाल करो या पैदल चलो.
हमारी तकलीफ या हमारे त्याग से किसे फायदा हो रहा है?
ये सही और अहम सवाल हैं और सरकार के पास इनके जवाब होने चाहिए. हैरानी की बात यह है कि उसे वोटरों को भरोसे में लेने की कोई परवाह नहीं दिखती. उपभोक्ताओं को पहले इस बदलाव के लिए तैयार करने की किसी ने कोशिश नहीं की. अब मंत्रियों को सामने खड़ा करके फायदे गिनाने की कोशिश की जा रही है कि इससे किसानों को फायदा होगा, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और कार्बन उत्सर्जन कम होगा. लेकिन इन बातों का कोई असर नहीं हो रहा है. भाजपा का जनाधार बार-बार पेपर लीक के घोटालों के अलावा जिस एक मामले को लेकर गुस्से में है, वह यही ‘ईबीपी’ का मामला है.
2014 के बाद से मध्यवर्ग, जिसका बड़ा हिस्सा विशाल हिंदू बहुमत है, मोदी सरकार का सबसे मजबूत वोट बैंक रहा है. यह उसके प्रति इतना वफादार रहा है कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से काफी गुस्से में होने के बावजूद इसने मोदी को ही वोट दिया. इसने उसे तब भी माफ कर दिया, जब कच्चे तेल की कीमत में गिरावट के बावजूद सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ाकर फायदा खुद उठा लिया. उस छप्परफाड़ फायदे का इस्तेमाल गरीबों के बीच मुफ्त अनाज और दूसरे सीधे लाभ बांटने में किया गया.
इसे मैं ‘रॉबिन हूड बनने की कोशिश’ बता चुका हूं—वफादार मध्यवर्ग से वसूलो, गरीबों में बांटो और अमीरों की परवाह मत करो. इस कॉलम के जनवरी 2025 के लेख को देखें. हां, इसे गुस्ताखी कहा जा सकता है. लेकिन बात यह है कि ‘सेकुलर’ पार्टियां अगर मुस्लिम वोट को अपने लिए पक्का मानकर चलती हैं, तो भाजपा भी विशाल मध्यवर्ग को अपने लिए पक्का मान सकती है. इस वर्ग ने ईंधन की ऊंची कीमतों को इसलिए स्वीकार किया क्योंकि वह मोदी के हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के नारे को मानता है, लेकिन ये वोटर आज नाराज़ हैं.
किसी ने उन्हें पहले समझाने की कोशिश नहीं की. यह उस पार्टी के लिए हैरान करने वाली बात है, जो इस बात पर गर्व करती है कि उसके नेता कड़े से कड़े फैसले वोटरों से स्वीकार करवाने की क्षमता रखते हैं, चाहे वह नोटबंदी हो या कोविड महामारी के दौरान देशभर में अचानक लॉकडाउन करने का फैसला. बौद्धिक नज़रिए से देखें तो मोदी सरकार ‘टहोका’ लगाने वाली अर्थनीति पर चलती रही है. लेकिन ‘ईबीपी’ के मामले में न एक्शन का आह्वान किया गया और न इस अर्थनीति का इस्तेमाल किया गया.
ऐसा लगता है कि किसी को अचानक कुछ सूझ गया और 2013-14 में पेट्रोल में जो 1.56 प्रतिशत की मिलावट की जा रही थी, उसे चुपके से बढ़ाकर 20 फीसदी कर दिया गया और अब जोश में इसे 30 फीसदी करने की बात की जा रही है.
लेकिन दो मुश्किलें हैं. एक तो यह कि खरीदार गुस्से में हैं और उनकी संख्या बड़ी है. दूसरी यह कि ज्यादा एथेनॉल उपलब्ध नहीं है. वह इतना भी नहीं है कि मिलावट के इस अनुपात को बनाए रखा जा सके, जब तक कि आप चावल के सुरक्षित भंडार में गहरा हाथ न डालें. इसके अलावा, लोग और ज्यादा मिलावट को स्वीकार नहीं करेंगे.
कागज़ पर तो आयातित एथेनॉल की जगह देसी एथेनॉल का इस्तेमाल ठीक लगता है, लेकिन आपके पास एथेनॉल का कोई बहुत बड़ा स्रोत नहीं है कि आप ड्रिल करके उसे निकालने लगें. आपके किसानों को उस स्रोत—गन्ने, मक्के या धान—की खेती करनी पड़ेगी.
इसके इस्तेमाल का विचार तब आया था जब चीनी का सरप्लस उत्पादन हो रहा था. चीनी मिलें अपना पैसा वसूल करके किसानों के बकाये का भुगतान कर सकती थीं. यह इतना उत्साह बढ़ाने वाला था कि चीनी मिलों को इजाजत दे दी गई कि वे गन्ने के रस को एथेनॉल के उत्पादन के लिए दे सकती हैं. बाज़ार में चीनी भरपूर मात्रा में पड़ी थी.
यह सब बिल्कुल आराम से चल रहा था, लेकिन खेती से जुड़ी अनिश्चितताओं का किसी ने हिसाब नहीं लगाया, मसलन अनाज की मंडियों, मॉनसून की अनिश्चितता और कीड़ों के हमलों का. फसल के एक ही साल के अंदर गन्ना सरप्लस से अचानक नाटकीय रूप से अभाव में पहुंच गया, खासकर लाल फंगस और चोटी-बेधक कीड़ों की वजह से, जिन्होंने फसल को ही चट कर दिया.
इस सीजन की शुरुआत चीनी के भंडार में 50 लाख टन की कमी के साथ हुई, जबकि आधार 34.3 मीट्रिक टन का होता था, जो अब गिरकर 28 मीट्रिक टन पर पहुंच गया. इसका नतीजा यह हुआ कि चीनी की कीमत करीब 50 फीसदी बढ़ गई. उम्मीद के मुताबिक, पुरानी कहानी दोहराई जा रही है: भंडार पर नियंत्रण करो, ‘जमाखोरी और मुनाफाखोरी’ पर हमला करो, निर्यात पर रोक लगाओ और ड्यूटी फ्री आयात के लिए रास्ता बनाओ. जब त्योहारों के दिन आ रहे हैं, तब क्या चीनी को महंगा होने दिया जा सकता है? ऐसा कहकर क्या आप सही बात कर रहे हैं?
एथेनॉल की खरीद में बेहिसाब बढ़ोतरी होती रही—2013-14 में 38 करोड़ लीटर से बढ़कर इस साल 1,200 करोड़ लीटर की खरीद हुई. रिफाइनरियों ने मक्के की ओर रुख किया. तब मक्के की कीमत में भी करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई. इसके कारण दूध, पोल्ट्री और मीट की कीमतें भी बढ़ती हैं क्योंकि इन्हें मक्का चाहिए. अब धान की ओर हाथ बढ़ाया जा रहा है. पहले टूटे चावल का और फिर सरप्लस चावल का नंबर आया. सरकार इन्हें बेच रही है क्योंकि वह पेट्रोल में मिलावट करने पर आमादा है. इस साल ईंधन के लिए 72 लाख टन चावल बाजार की कीमत से आधी कीमत पर आवंटित किया गया. इनमें से ज्यादातर आंकड़े मैंने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में हरीश दामोदरन और अशोक गुलाटी की बेहतरीन रिपोर्ट से साभार लिए हैं.
अब पूरी बात संक्षेप में. ‘ईबीपी’ का आइडिया बहुत अच्छा हो सकता है, लेकिन यह कृषि पर आधारित है, इसलिए इसे लागू करने से पहले तीन-चार साल तक तैयारी करनी चाहिए थी. किसानों को अपनी पसंद की फसल बदलने के लिए तैयार किया जाना चाहिए था. उनके लिए बाजार बनाने के साथ यह व्यवस्था की जानी चाहिए थी कि जरूरी चीजों की कमी न हो और हम ‘फूड बनाम फ्यूल’ के जाल में न फंसें. और अंत में, उपभोक्ताओं को मिलावटी पेट्रोल का इस्तेमाल करने के लिए राजी किया जाता. बेहतर तो यह होगा कि उन्हें एक विकल्प दिया जाए और मिलावटी पेट्रोल काफी कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाए. यह उत्पाद शुल्कों में कटौती करके आसानी से किया जा सकता है.
लेकिन आज ये नतीजे सामने आए हैं—चीनी की कमी हो गई है, विदेशी मुद्रा की स्थिति खराब है, महंगाई बढ़ी है जबकि त्योहार आने वाले हैं, और आप चावल के सुरक्षित भंडार को ‘ईबीपी’ की आधी कीमत पर आवंटित कर रहे हैं. फैसले करवाने वाला ‘इन्फ्लुएंसर’ समुदाय इस सबसे पैसे बना रहा है और उलझन में पड़े करोड़ों लोग नाराजगी के साथ यह सब देखने को मजबूर हैं.
कई तरह से, तमाम प्रमुख मुद्दों पर मोदी सरकार का यही रवैया दिखा है. इससे पहले, खासतौर से नोटबंदी और कृषि कानूनों (जिनका मैंने संपादकीय दृष्टि से समर्थन किया था) के बाद हमने मोदी सरकार की सदमे और हैरत में डालने वाली निर्णय प्रक्रिया की तुलना उस पैराट्रूपर से की थी जो पैराशूट की जांच किए बिना छलांग लगा देता है. यह सरकार जब कुछ तय कर लेती है तो उसके बाद उसमें पुराने, ‘बोरिंग’ ‘स्टाफ वर्क’ या किसी तरह की पहले से तैयारी करने का सब्र नहीं रहता. इस सबको नौकरशाही वाला ‘नॉनसेंस’ (बकवास) या ‘कांग्रेस मार्का’ ‘एनालिसिस-पारालिसिस’ (विश्लेषण-लकवा) मानकर खारिज कर दिया जाता है.
‘ईबीपी’ के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ है. चीनी और एथेनॉल का अकाल पड़ने लगा है, इनसे जुड़ी हर चीज महंगी होती जा रही है, कच्चे तेल की कीमतें भी चढ़ रही हैं. अब एक और फैसला, आंशिक रूप से ही सही, वापस लिया जा सकता है. या तो मिलावट का अनुपात घटाकर 10 फीसदी किया जाए, या उपभोक्ताओं के सामने विकल्प रखा जाए. याद रहे, भाजपा के वफादार मतदाता गुस्से में हैं.
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