जिस देश में राजनीतिक जागरूकता का स्तर कम हो और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति समझ और मानदंड अभी इतने मजबूत न हुए हों, वहां उदारवादी के सामने एक कठिन दुविधा खड़ी होती है. क्या वह अपने सिद्धांतों से समझौता करे, राज्य के व्यापक नियंत्रण को स्वीकार करे और उन राजनीतिक जोड़-तोड़ में शामिल हो जाए, जिनकी हाल के दिनों में नई दिल्ली में भरमार रही है? या फिर वह राजनीति से दूर रहकर अपने हाथ साफ रखे और इस आरोप का सामना करे, जो पेरिक्लीज़ ने लगाया था कि “जो व्यक्ति सार्वजनिक मामलों में कोई हिस्सा नहीं लेता, उसे हम शांतिप्रिय नहीं, बल्कि बेकार व्यक्ति मानते हैं”?
इसी तरह की दुविधा का सामना मुझे व्यक्तिगत रूप से तब करना पड़ा, जब मेरे मित्र जयप्रकाश नारायण ने 1976 के अंत में, आपातकाल के दौरान, मुझसे उनके उस प्रयास में मदद करने को कहा जिसमें वे बहुत अलग-अलग विचारों वाले लोगों को मिलाकर एक नई राजनीतिक पार्टी बनाना चाहते थे. आगे चलकर यही पार्टी जनता पार्टी के नाम से जानी गई. इसका उद्देश्य इंदिरा गांधी के सत्तावादी शासन को समाप्त करना था.
मैंने जेपी से कहा कि मैं उनके उद्देश्य से पूरी तरह सहमत हूं, लेकिन मैं उनसे आग्रह करूंगा कि प्रस्तावित नई पार्टी के गठन में मेरी सक्रिय भागीदारी न मांगें. दुर्भाग्य से, जिन लोगों को वे साथ लाना चाहते थे, उनमें से अधिकांश के साथ मुझे पहले भी काम करने का पर्याप्त अनुभव था, खासकर 1970 के दौरान. मुझे पूरा संदेह था कि वे एक टीम की तरह साथ काम कर पाएंगे या देश की समस्याओं का समाधान कर पाएंगे. मुझे डर था कि वे उन्हें निराश करेंगे और कुछ समय बाद ऐसी प्रतिक्रिया पैदा करेंगे जो फिर से सत्तावाद के पक्ष में जाएगी. ठीक यही बाद में हुआ.
मैंने कहा कि समय आने पर मैं निश्चित रूप से जेपी के उम्मीदवारों को वोट दूंगा, जैसा कि मैंने मार्च 1977 में किया भी, लेकिन उनके आंदोलन में इससे अधिक सक्रिय भूमिका निभाने से मुझे मुक्त रखा जाए.
कोई भ्रम नहीं
क्या मेरा दिया हुआ उत्तर गलत था? मेरे कुछ मित्रों का मानना है कि मैं गलत था और यदि मैं दिल्ली में जनता पार्टी के संगठन और जनता सरकार में शामिल होता, तो शायद कुछ फर्क पड़ता. काश मैं भी ऐसा मान पाता, लेकिन मेरा अहंकार भी मुझे इस तरह के भ्रम की अनुमति नहीं देता.
यदि मैं शामिल होता, तो कुछ ही महीनों में अपने कई साथियों की गतिविधियों के विरोध में मुझे इस्तीफा देना पड़ता. वास्तव में, ऐसा ही तब हुआ जब मुझे 1978 की शुरुआत में अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनने के लिए राजी किया गया.
अब एक बार फिर वैसी ही स्थिति पैदा हो गई है और न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना भी इसी दुविधा में फंस गए हैं. मौजूदा सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने ऐसा व्यवहार किया है जिससे गहरी निराशा और यहां तक कि घृणा भी पैदा हुई है. यह शब्द हाल ही में किसी और ने नहीं, बल्कि स्वयं जयप्रकाश ने इस्तेमाल किया था.
शोर-शराबे और एक-दूसरे पर लगाए जा रहे आरोपों के बीच दुखद सच्चाई यह सामने आती है कि इन नेताओं के बीच का अंतर उस प्रसिद्ध जोड़ी, ट्वीडलडम और ट्वीडलीडी, जितना ही है. जनता को सही ही ऐसा कोई कारण दिखाई नहीं देता कि वर्तमान संसद के कार्यकाल में जो भी सत्ता में आएगा, वह हमारे युवा लोकतंत्र की समस्याओं का समाधान कर पाएगा.
एक बार फिर उदारवादी के सामने वही दुविधा है: क्या उसे मौजूदा राजनीतिक दलों या समूहों में से किसी एक में इस आधार पर शामिल हो जाना चाहिए कि वह “कम बुराई” को चुन रहा है और इस तरह घटनाओं की दिशा को प्रभावित करने का प्रयास करे? गांधी ने हमें “कम बुराई” को स्वीकार करने से बचना और वह करना सिखाया था जिसे लुई फिशर ने अपनी पुस्तक द ग्रेट चैलेंज में “दोहरा अस्वीकार” कहा है. मैं कम से कम इस मामले में महात्मा का ही सम्मानपूर्वक अनुसरण करूंगा.
या फिर क्या उदारवादी घर बैठ जाए, अपना काम करे और बेबस गुस्से में दांत पीसता रहे, जैसा कि इन दिनों देश के अधिकांश अच्छे और देशभक्त स्त्री-पुरुष करने के लिए मजबूर हैं? मुझे नहीं लगता कि जो व्यक्ति देश की चिंता करता है और कुछ मूल्यों को महत्वपूर्ण मानता है, उसके लिए यह कोई स्वीकार्य विकल्प हो सकता है.
“यू-टर्न” की जरूरत
तो फिर क्या किया जाए? उदारवादी जिस उत्तर को खोज रहा है, उसकी कुंजी शायद सरकार की भूमिका को सही ढंग से समझने में मिल सकती है. तीन दशकों से चले आ रहे राज्यवाद और हर क्षेत्र पर फैले नियंत्रण ने हमारे युवा लोकतंत्र के पौधे को बुरी तरह दबा दिया है. इसके परिणामस्वरूप हमारा पूरा राष्ट्रीय जीवन राजनीति से प्रभावित हो गया है—चाहे वह उद्योग और व्यापार हो, कृषि हो, शिक्षा हो, कला हो या खेल.
नई दिल्ली में राजनीतिक और आर्थिक शक्ति के कुछ हाथों में केंद्रित होने से राजनीतिक सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा का दांव बहुत ऊंचा हो गया है. इससे सत्ता पाने की होड़ और अधिक आकर्षक हुई है, राजनीतिक मर्यादाएं कमजोर हुई हैं और भ्रष्टाचार बढ़ा है. तो क्या हमें गांधीजी के उस विवेकपूर्ण विचार की ओर नहीं लौटना चाहिए कि “वही सरकार सबसे अच्छी है जो सबसे कम शासन करती है”?
यदि हमारे राष्ट्रीय जीवन में सार्वजनिक नैतिकता को फिर से स्थापित करना है, तो सरकार की भूमिका को उसकी उचित सीमाओं तक सीमित करना होगा. हमें उस बड़ी लेकिन कमजोर प्रशासनिक व्यवस्था के स्थान पर मजबूत लेकिन सीमित सरकार चाहिए, जिसके बोझ तले हम आज़ादी के बाद से दबे हुए हैं. दूसरे शब्दों में, भारत को वही चाहिए जिसे एन. ए. पालखीवाला ने “यू-टर्न” कहा है.
दुनिया भर में, और हमारे अपने पड़ोसी श्रीलंका में भी, नौकरशाही और राज्यवाद के खिलाफ जो बदलाव की हवा चल रही है, उससे पता चलता है कि ऐसा व्यापक सहमति बनना हमारी पहुंच से बाहर नहीं है. हाल ही में भारत में भी दो संकेत मिले हैं कि यह हवा हमारे देश में भी चलना शुरू हो गई है.
पहला संकेत उस समय मिला जब भारतीय प्रेस ने लगभग एकमत होकर उन प्रमुख उद्योगों के राष्ट्रीयकरण के विचार को खारिज कर दिया, जिसे जनता सरकार के दो मंत्रियों ने सामने रखा था. इस घटना की कहानी श्री आर. एम. लाल ने अपनी छोटी-सी पुस्तक इंडिया सेज़ ‘नो’ टू नैशनलाइज़ेशन में बताई है, जिसे मार्च 1979 में राजाजी फाउंडेशन ने प्रकाशित किया था.
दूसरा संकेत 25 मई को बंबई में आयोजित उस शानदार और विशाल सम्मेलन से मिला, जिसे मैंने संबोधित किया था. इसका आयोजन फेडरेशन ऑफ एसोसिएशंस ऑफ महाराष्ट्र ने महाराष्ट्र में बिक्री कर कानून में किए गए दमनकारी प्रावधानों के विरोध में किया था.
यदि हम राजनीति को और अधिक समय तक नई दिल्ली के राजनेताओं के भरोसे छोड़ते रहे, तो सत्तावाद के पक्ष में पैदा होने वाली प्रतिक्रिया—चाहे हम उसे कितना भी नापसंद करें—अपरिहार्य हो जाएगी.
हमें लोगों को लोकतंत्र का एक और विकल्प देना होगा—ऐसा लोकतंत्र जिसमें अनुशासन हो, और ऐसा अनुशासन जिसमें तानाशाही न हो. अगले कुछ महीनों में ऐसी परिस्थितियां और वातावरण तैयार करना ही उदारवादी की दुविधा से निकलने का बीच का रास्ता और समाधान है.
सवाल यह है: क्या हम भारत भर में बिखरे हुए उदारवादियों में अपने विश्वासों के प्रति साहस है और उनके लिए काम करने की तत्परता है? क्या हमारे पास समय है?
मुझे नहीं पता, लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि चुनौती हमारे दरवाजे पर खड़ी है और वह न तो इंतजार करेगी, न ही उसे इंतजार कराया जा सकता है.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “उदारवादी की दुविधा” था और इसका प्रकाशन मूलरूप से 1979 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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