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Monday, 6 July, 2026
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‘क्यों’ का सवाल छोड़ते ही विज्ञान ने अपनी आत्मा खो दी, अब वह सिर्फ तकनीक बन कर रह गया है

हमने अपना ध्यान 'फ़ीड' को सौंप दिया. हमने अपनी याददाश्त सर्च इंजन को सौंप दी. हमने अपना एकांत नोटिफ़िकेशन को सौंप दिया. जो चीज़ दोबारा मिल सकती है, उसे याद रखने की क्या ज़रूरत है?

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यह एक गहरी और शायद बेचैन कर देने वाली बात है कि आज हम तकनीक पर अपनी महारत के सबसे ऊंचे मुक़ाम पर खड़े हैं, और ठीक उसी वक़्त हमारा इंसानी एहसास पहले से ज़्यादा ग़रीब होता जा रहा है. अपनी बुलंद तकनीकी दुनिया के बीच खड़े होकर यह महसूस होता है कि असली बदलाव उन औज़ारों में नहीं आया जिन्हें हम इस्तेमाल करते हैं, बल्कि उस इंसान में आया है जो हम बनते जा रहे हैं. सदियों तक विज्ञान को इंसानी आज़ादी की सबसे बड़ी मिसाल माना गया — अंधविश्वास के अंधेरे के ख़िलाफ़ एक बग़ावत. यह एक पूरी तरह इंसानी क़िस्सा था, जिसमें “कैसे” से कहीं ज़्यादा अहम “क्यों” था, और अपने सबसे साफ़ रूप में यह अनंत को समझने की एक कोशिश थी.

धीरे-धीरे, और लगभग बिना महसूस किए, हम उस दुनिया से निकल आए जहां विज्ञान इंसान की तरक़्क़ी का ज़रिया था, और एक ऐसी दुनिया में आ पहुंचे हैं जहां इंसान को सिर्फ़ एक जैविक इकाई माना जाता है, जिसे एक बंद व्यवस्था के भीतर बेहतर बनाया जाना है. नई खोजों की आवाज़ अब एल्गोरिद्म के शोर में दब जाती है. सवाल अब यह नहीं रहा कि हम क्या बना रहे हैं. असली सवाल — जिसे हम बार-बार पूछने से बचते हैं — यह है कि यह सब बनाते-बनाते हम ख़ुद क्या बनते जा रहे हैं.

तयशुदा इंसान

आज का यह “तयशुदा इंसान” दरअसल हमारी मशीन जैसी सोच की सबसे बड़ी पैदावार है. जब हम बिग डेटा और न्यूरल नेटवर्क की बात करते हैं, तो असल में हम एक बेहद डरावनी सच्चाई को नए और नरम अल्फ़ाज़ में बयान कर रहे होते हैं — यह सोच कि इंसान की पूरी रूह बस एक सीमित डेटा-सेट है. अगर कोई मशीन आंकड़ों के आधार पर यह तय कर सकती है कि कोई शख़्स क्या ख़रीदेगा, किसे वोट देगा, ग़म में कैसे टूटेगा या उकसावे पर क्या करेगा, तो फिर इंसान के भीतर मौजूद राज़ की कोई गुंजाइश नहीं बचती. और जब राज़ ख़त्म हो जाता है, तो वह पुराना वैज्ञानिक भी उसी के साथ ख़त्म हो जाता है, जो हमेशा अनदेखी और अनजानी चीज़ों से जूझता रहा.

हम वही जी रहे हैं जिसकी चेतावनी समाज-वैज्ञानिक एरिख फ्रॉम ने कंप्यूटर के दौर की शुरुआत में दी थी. उन्होंने कहा था कि पहले का ख़तरा यह था कि इंसान ग़ुलाम बन जाएगा, लेकिन आगे का ख़तरा यह है कि इंसान ख़ुद रोबोट बन जाएगा. एक ग़ुलाम कम-से-कम यह जानता है कि वह आज़ाद नहीं है — उसके भीतर बग़ावत की चिंगारी अभी भी बची रह सकती है. लेकिन एक रोबोट, यानी वह इंसान जिसने मशीन की सोच अपने भीतर उतार ली हो, उसे यह तक पता नहीं चलता कि उसकी रूह उससे छिन चुकी है. वह काम करता है, पर जीता नहीं. वह जानकारी को प्रोसेस करता है, पर महसूस नहीं करता. हमने अपने सोचने की प्रक्रिया को भी बस स्पीड और देरी का मसला मानना शुरू कर दिया है, अपने जज़्बात को महज़ शरीर का बायोकेमिकल रिएक्शन समझने लगे हैं — और एक ऐसी बे-रुकावट ज़िंदगी की तलाश में हैं, जबकि इंसान का किरदार तो उन्हीं मुश्किलों और टकरावों से बनता है.

यह हालत अचानक नहीं आई. यह बरसों में, छोटी-छोटी रियायतों से जमा हुई. हमने अपना ध्यान सोशल मीडिया की फ़ीड को सौंप दिया. अपनी याददाश्त सर्च इंजन के हवाले कर दी. अपनी तन्हाई नोटिफ़िकेशन के हवाले कर दी. हर बार यह समझौता छोटा और सही-सा लगा — आख़िर जो चीज़ कभी भी दुबारा खोजी जा सकती है, उसे याद रखने की क्या ज़रूरत? जब जवाब एक टैप की दूरी पर हो, तो अनिश्चितता के साथ बैठने की क्या ज़रूरत? लेकिन इन तमाम “समझदार” समझौतों का कुल हासिल कुछ ऐसा है जो बहुत ख़तरनाक है: हमने वही सलाहियतें बाहर सौंप दी हैं जिनसे हमारी असली पहचान बनती है.

वैज्ञानिक सोच से तकनीकी निज़ाम तक

इस मशीनी सोच का गहरा असर समाज में विज्ञान के किरदार पर, और उस समाज पर भी पड़ रहा है जिसकी ख़िदमत विज्ञान अपने बेहतरीन रूप में हमेशा करता आया है.

बीसवीं सदी के दरमियान विज्ञान को एक अख़लाक़ी सफ़र माना जाता था — जिसका ताल्लुक़ जर्मन परंपरा के उस ख़याल से था जिसे Bildung कहते हैं: यानी मुश्किल, ख़ूबसूरती और असली दुनिया की रुकावटों से गुज़रकर इंसान का ख़ुद को गढ़ना. विज्ञान सीखना सिर्फ़ कोई तकनीक हासिल करना नहीं था. यह ख़ुद को बदल डालने का अमल था. जिस छात्र ने थर्मोडायनामिक्स का दूसरा क़ानून सच में समझ लिया, या यूक्लिड की दलील को उसके अंजाम तक समझा, वह पहले से सिर्फ़ ज़्यादा जानकार नहीं बना — वह बदल चुका था: ज़्यादा गंभीर, पेचीदगी के सामने ज़्यादा विनम्र, और ध्यान को देर तक क़ायम रखने के क़ाबिल. विज्ञान इंसान को गढ़ने का एक स्कूल था.

आज विज्ञान को धीरे-धीरे एक ऐसी मशीन बना दिया गया है जो सवाल ठीक से पूछे जाने से पहले ही जवाब दे देती है. जब हम लोगों को बस ऐसे आंकड़े समझने लगते हैं जिन्हें “नज थ्योरी” और एल्गोरिद्मी निगरानी के ज़रिए मैनेज किया जा सकता है, तो हम इंसानियत की ख़िदमत में विज्ञान नहीं कर रहे होते — हम एक तरह की जदीद तकनीकी पशु-पालन व्यवस्था चला रहे होते हैं. वैज्ञानिक मिज़ाज — यानी सवाल पूछने, शक करने और अपनी ग़लती मान लेने का हौसला — अब उस तकनीकी घमंड से बदला जा रहा है जिसका बस एक ही मक़सद बचा है: समाज का बे-रुकावट चलते रहना.

इस बदलाव की जड़ यह है कि हमने अपने वजूद से जुड़े सवालों से ही मुंह मोड़ लिया है. पुराने वैज्ञानिक तरीक़े का मक़सद क़ुदरत के आफ़ाक़ी क़ानूनों को उजागर करना था. रोमन शायर वर्जिल ने लिखा था — “Felix, qui potuit rerum cognoscere causas,” यानी “ख़ुशनसीब है वह जिसने चीज़ों की वजह जान ली.” यह वजह की तलाश सिर्फ़ वैज्ञानिक नहीं, बल्कि अख़लाक़ी भी थी — यह इस यक़ीन पर टिकी थी कि यह दुनिया अक़्ल के लिए समझ में आने लायक़ है, और यह कि इंसानी दिमाग़ इतना क़ीमती है कि दुनिया का उसकी समझ में आना बनता है. मक़सद सिर्फ़ पेशनगोई करना नहीं, बल्कि समझना था.

आज के दौर में हम उस मुक़ाम तक पहुंच गए हैं जिसे Wired पत्रिका में लिखते हुए विचारक क्रिस एंडरसन ने “थ्योरी का ख़ात्मा” कहा था. अगर कोई एल्गोरिद्म लाखों-करोड़ों आंकड़ों के बीच कोई रिश्ता ढूंढकर निन्यानवे फ़ीसद सटीकता से नतीजा बता सकता है, तो “क्यों” पूछना एक ऐसी फ़िज़ूलख़र्ची लगने लगती है जो हम अफ़ोर्ड नहीं कर सकते. हम दुनिया को एक ब्लैक-बॉक्स की तरह देखने लगे हैं — नतीजा मान लेते हैं, यह समझने की ज़हमत उठाए बग़ैर कि वह कैसे आया. यह विज्ञान नहीं है. यह एक बारीक क़िस्म की भविष्यवाणी है, और हर भविष्यवाणी की तरह यह इतनी बार सही साबित हो जाती है कि हम भूल ही जाते हैं कि हमने पूछना कब का छोड़ दिया.

इत्तेफ़ाक़ से मिलने वाली खोजों का खो जाना

हमें ख़ुद से एक ऐसा सवाल पूछना चाहिए जिसकी इजाज़त हम आम तौर पर ख़ुद को नहीं देते: क्या हमने मशीनी सोच सिर्फ़ दुनिया पर नहीं, बल्कि ख़ुद अपने ऊपर भी लागू करनी शुरू कर दी है?

हम अपने क़दम गिनते हैं, नींद का हिसाब रखते हैं, मूड का स्कोर देखते हैं, दिल की धड़कन के उतार-चढ़ाव को रिकॉर्ड करते हैं — और यह सब लगभग किसी इबादत जैसी लगन के साथ करते हैं. “क्वांटिफ़ाइड सेल्फ़” यानी ख़ुद को आँकड़ों में बदलकर समझने का यह चलन कभी सिलिकॉन वैली के कुछ लोगों का सीमित शौक़ था. आज यह हमारी रोज़मर्रा ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है. हमने यह मान लिया है कि हम बस इन्फ़ॉर्मेशन-प्रोसेसिंग यूनिट हैं, जिन्हें अपडेट और ठीक किया जा सकता है, और एक अच्छी ज़िंदगी का मतलब है हर तरह की कमज़ोरी ख़त्म करना, हर उतार-चढ़ाव को सपाट कर देना, नतीजे को ज़्यादा से ज़्यादा बेहतर बनाना.

इस सोच का नतीजा एक ऐसा समाज है जो तकनीकी तौर पर तो मुकम्मल है, मगर इंसानी तौर पर ख़ाली होता जा रहा है. और जब हम यही सोच ख़ास तौर पर विज्ञान पर, यानी तलाश के अमल पर ही लागू करते हैं, तो हम कुछ ऐसा खो देते हैं जिसकी भरपाई नामुमकिन है — वह है इत्तेफ़ाक़ से होने वाली खोजें, जिन्होंने इंसानी तारीख़ की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खोजों को जन्म दिया.

पेनिसिलिन किसी पूरी तरह तयशुदा प्रोसेस से नहीं निकली. अलेग्ज़ैंडर फ़्लेमिंग ने छुट्टियों से लौटने के बाद एक पेट्री-डिश में ऐसी चीज़ पर ग़ौर किया जिस पर उसे ग़ौर करना ही नहीं था — डिश ठीक से बंद भी नहीं की गई थी. वही गंदगी और संक्रमण असल खोज बन गया. इसी तरह आइंस्टाइन की ख़ास सापेक्षता थ्योरी भी किसी तयशुदा रिसर्च प्रोग्राम का नतीजा नहीं थी. यह एक जवान पेटेंट क्लर्क के उस ज़िद्दी, बरसों लंबे जुनून से निकली कि रोशनी की किरण के साथ चलने का एहसास कैसा होगा.

यह खोजें शोर के ख़ात्मे से नहीं मिलीं — यह उसी शोर से पैदा हुईं: ग़लतियों से, अंदाज़ों से, ग़लत रास्तों से, और उस ख़ूबसूरत इंसानी कमज़ोरी से जो ख़ुद को पूरी तरह मैनेज नहीं होने देती.

न्यूरोसाइंटिस्ट स्टुअर्ट फ़ायरस्टीन का कहना है कि विज्ञान असल में जानकारी की तलाश नहीं, बल्कि नादानी की तलाश है — एक ज़िंदा, ज़रख़ेज़, तख़लीक़ी रिश्ता उस चीज़ से जो अभी मालूम नहीं. एल्गोरिद्म इस मानी में नादान नहीं हो सकता. वह सिर्फ़ उसी दायरे में काम कर सकता है जिसे पहले से “मसला” तय कर दिया गया हो. इंसान वैज्ञानिक, इसके उलट, तय मसले से नज़र उठाकर देख सकता है कि उससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प सवाल ठीक उसकी हद के बाहर मौजूद है. सवाल को दुबारा गढ़ने की, दिए गए सवाल से हटकर सोचने की, सवाल के नीचे छिपे असली सवाल तक पहुंचने की यह सलाहियत किसी भी बेहतरीन-बनाने वाले निज़ाम की ख़ूबी नहीं है — यह दरअसल वही ख़ूबी है जिसे मिटाने के लिए ऐसे निज़ाम बनाए जाते हैं.

इंसानपरस्त और मशीन जैसी सोच

बीसवीं सदी में अंग्रेज़ी नॉवेलिस्ट सी.पी. स्नो ने विज्ञान और इंसानी इल्मों के दरमियान बढ़ती खाई पर अफ़सोस जताया था — उन्होंने इसे एक बड़ी तहज़ीबी समस्या बताया, जिसने दहाइयों तक बहस और पढ़ाई के तरीक़ों में बदलाव को हवा दी. मगर आज वह दरार एक ऐसी शक्ल ले चुकी है जिसकी कल्पना स्नो ने नहीं की थी, और जिसे उनकी सोच समेट नहीं सकती.

आज टकराव फ़िज़िसिस्ट और शायर के दरमियान नहीं है. असली टकराव इंसानपरस्त और मशीन जैसी सोच के दरमियान है. इंसानपरस्त मानता है कि इंसानी तजुर्बा इतना पेचीदा है कि उसे पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता — इंसान के अंदरूनी वजूद की एक हक़ीक़त है, और हर हालत का अपना ख़ास वज़न है. मशीन जैसी सोच कहती है कि पेचीदगी का मतलब बस इतना है कि अभी हमारे पास काफ़ी डेटा नहीं है. इंसानपरसी कहती है: “यह हालत वाक़ई उलझी हुई है, और यह उलझन कोई कमी नहीं बल्कि एक हक़ीक़त है जिसे जीना है.” मशीन जैसी सोच कहती है: “मुझे और डेटा दो, मैं इसे सुलझा दूंगा.”

आज जीत मशीन जैसी सोच की हो रही है — इसलिए नहीं कि वह सही है, बल्कि इसलिए कि वह तेज़ है, सस्ती है, और उन इदारों — कंपनियों, हुकूमतों, यूनिवर्सिटियों — को ज़्यादा आसानी से समझ आती है जो आज ज़हनी ज़िंदगी की शर्तें तय करते हैं.

इस जीत में सिर्फ़ कुछ विषय या पढ़ने के तरीक़े नहीं खो रहे. जो खो रहा है वह है बहु-हुनर आलिम की शख़्सियत — वह वैज्ञानिक जो फ़िलॉसफ़र भी था, वह हकीम जो शायर भी था, वह गणितज्ञ जो यह भी जानता था कि किसी साबित की ख़ूबसूरती उसकी सच्चाई से जुदा नहीं बल्कि उसका ही हिस्सा है. हिंदुस्तानी परंपरा में ऐसी शख़्सियतों की अपनी शानदार मिसालें रही हैं: जगदीश चंद्र बोस, जो फ़िज़िक्स, पेड़-पौधों के विज्ञान और बंगाली अदब के दरमियान आते-जाते रहे. श्रीनिवास रामानुजन, जिनकी रियाज़ी किसी तरीक़े से नहीं बल्कि एक ऐसी गहरी सूझ से निकली जो उनके इर्द-गिर्द के लोगों को “विज़न” जैसी लगती थी. रवींद्रनाथ टैगोर, जो आइंस्टाइन से हक़ीक़त की माहियत पर बहस करते थे, और दोनों में से किसी को भी यह बातचीत बेकार नहीं लगती थी. यह लोग शौक़िया नहीं थे. यह वह लोग थे जिनके लिए इल्मों की हदें आर-पार थीं, क्योंकि वह जानते थे कि हर असली तलाश आख़िरकार उन्हीं सवालों पर आ पहुँचती है: दुनिया क्या है, इंसान ख़ुद क्या है, और इन दोनों का आपस में क्या रिश्ता है.

एल्गोरिद्म को ऐसी आर-पार वाली सलाहियत की कोई ज़रूरत नहीं. उसे साफ़-सुथरी क़िस्में, तय इनपुट, और नापे जा सकने वाले नतीजे चाहिए. मशीन जैसी सोच की नज़र में बहु-हुनर आलिम बस एक ऐसा निज़ाम है जो अभी तक ठीक से तरतीब में नहीं लाया गया.

इंसानी “रूह” को वापस हासिल करना

अगर विज्ञान की असली तहज़ीब को, और उस बड़ी इंसानी तहज़ीब को बचाना है जिसकी ख़िदमत विज्ञान अपने बेहतरीन रूप में हमेशा करता आया है, तो हमें उस चीज़ को दुबारा हासिल करना होगा जिसे हम “रूह” कह सकते हैं — इंसान के भीतर मौजूद वह हिस्सा जिसे किसी कंप्यूटर की तरह नहीं समझाया जा सकता, और जिसे कोई बेहतरीन-बनाने वाला अमल न दुहरा सकता है, न बदल सकता है.

गणितज्ञ रॉजर पेनरोज़ ने तक़रीबन तीन दहाइयों की मेहनत में यह दलील दी है कि इंसानी रियाज़ी की समझ में एक ऐसा हिस्सा मौजूद है जिसे कंप्यूटर की ज़बान में नहीं समझाया जा सकता. जब एक गणितज्ञ किसी थ्योरम की सच्चाई अचानक समझ लेता है, तो वह समझ किसी एल्गोरिद्म का अमल नहीं होती, और न हो सकती है. चाहे कोई पेनरोज़ की पूरी दलील माने या न माने, जिस एहसास पर यह दलील टिकी है वह तजुर्बे के लिहाज़ से सही मालूम होता है: वह “यूरेका” का लम्हा, जब अचानक पूरा नज़रिया दुबारा तरतीब में आ जाता है, वह एहसास कि इंसान ने महज़ प्रोसेस नहीं बल्कि सचमुच “समझा” है — यह किसी भी कंप्यूटर के अमल से बुनियादी तौर पर अलग वाक़िया है. यह तेज़ कंप्यूटेशन नहीं है. यह एक बिल्कुल अलग क़िस्म का तजुर्बा है.

यह कोई रहस्यवाद नहीं है. यह दिमाग़ की माहियत के बारे में एक गंभीर फ़लसफ़ियाना दावा है, और इसके गंभीर नतीजे हैं. अगर पेनरोज़ की बात थोड़ी भी सही है, तो इंसानी फ़ैसले की जगह एल्गोरिद्मी फ़ैसले को पूरी तरह अपना लेना सिर्फ़ एक तहज़ीबी नुक़सान नहीं होगा — यह एक इल्मी नुक़सान भी होगा: उन सच्चाइयों के दायरे का सिमट जाना जिन तक पहुँचा जा सकता है, और समझ के उन तरीक़ों का बंद हो जाना जो तारीख़ी तौर पर सबसे ज़रख़ेज़ रहे हैं.

इसलिए हमें एक ऐसी साइंस तालीम और वैज्ञानिक तहज़ीब की वक़ालत करनी चाहिए जो “बेइंतहा” को “फ़ायदेमंद” पर तरजीह दे — इसलिए नहीं कि फ़ायदेमंद होना ग़ैर-ज़रूरी है, बल्कि इसलिए कि जो विज्ञान बेइंतहा को भूल चुका है, वह यह भी भूल चुका है कि उसकी शुरुआत क्यों हुई थी. जिस छात्र ने कैलकुलस को महज़ अमल की एक तरतीब की तरह सीखा, उसने कुछ फ़ायदेमंद सीखा है. मगर जिसने कैलकुलस को इस तरह सीखा कि यह एक इंसान की उस कोशिश का नाम है कि वह बेइंतहा को इतनी देर थाम ले कि उसे नाप सके — उसने कुछ ऐसा सीखा है जो उम्र भर उसका साथ नहीं छोड़ेगा.

हमें अगली नस्ल को यह सिखाना होगा कि, एक ख़ास मानी में, वह “ग़लती” (glitch) बनना सीखें — यह जानें कि वैज्ञानिक विरासत क़ायदों की पैरवी की नहीं, बल्कि यह पहचानने की है कि क़ायदे कब एक पिंजरा बन जाते हैं. बड़े वैज्ञानिक वह नहीं थे जो तय किए गए तरीक़ों की सबसे अच्छी पैरवी करते थे. वह वह लोग थे जो उन तरीक़ों को इतनी अच्छी तरह समझते थे कि जान लें कि तरीक़े कब अपनी हद तक पहुँच गए हैं — और जिनके पास इतना सब्र, इतना हौसला, और ज़हन की इतनी अजीब परवरिश थी कि वह उस हद से आगे, सचमुच नामालूम इलाक़े में क़दम रख सकें.

हैरान होने का हक़

एक ऐसा हक़ है जिसे कोई क़ानून तहरीर नहीं करता, मगर जिसे हर असली तहज़ीब ने अपने सबसे गहरे लम्हों में तस्लीम किया है: हैरान होने का हक़. अपने डेटा से बड़ा होने का हक़. ख़ुद को हैरान करने का, अपनी ही तारीख़ के ख़िलाफ़ जाने का, और ऐसे काम करने का हक़ जिसकी पेशनगोई तुम्हारे रवैये का कोई भी पुराना मॉडल न कर सके.

यह हक़ सिर्फ़ ज़ाती नहीं है — यह वैज्ञानिक भी है. फ़िज़िक्स की तारीख़, एक बड़ी हद तक, दुनिया की उस ज़िद की तारीख़ है कि वह हैरान करती रहे, कि वह किसी भी मॉडल में — चाहे वह कितना ही ख़ूबसूरत या ताक़तवर क्यों न हो — पूरी तरह क़ैद न हो. क्वांटम मैकेनिक्स इसलिए नहीं आई कि फ़िज़िसिस्ट्स को बेहतर डेटा मिल गया. वह इसलिए आई क्योंकि दुनिया ऐसी चीज़ें करती रही जो मौजूदा मॉडल के मुताबिक़ नहीं कर सकती थी. एक तरह से कहें तो दुनिया ख़ुद न्यूटन की मशीन में एक “ग़लती” थी. हमारी सबसे गहरी थ्योरी हमेशा उस अनसुलझे राज़ का जवाब रही हैं, न कि उसे मिटाने की कोशिश.

एक ऐसी तहज़ीब बनाना, जिसमें राज़ को सिर्फ़ एक मसला समझा जाए जिसे सुलझाना है, जिसमें वह इंसान जिसका मॉडल न बन सके, एक “सिस्टम एरर” समझा जाए जिसे ठीक करना है — यह एक ऐसी तहज़ीब बनाना है जिसने अपनी सबसे गहरी सूझ की गुंजाइश ही ख़त्म कर दी है. यह उतने ही यक़ीन से, जितने से एक साबित हुआ थ्योरम, बिल्कुल ग़लत जवाब पर पहुंच जाना है.

हम आज अपनी तकनीकी तरक़्क़ी के सबसे ऊंचे मुक़ाम पर खड़े हैं. यहाँ से नज़ारा हमें विनम्र कर देना चाहिए था. इसके बजाय, इसे आख़िरी मक़सद को जायज़ ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है: ख़ुद इंसान का इंतज़ाम. मशीन में मौजूद वह “रूह” ही आख़िरी चीज़ है जिसे अभी तक बेहतर नहीं बनाया गया — और वह इकलौती चीज़ भी है जिसे बचाना ज़रूरी है.

हमारा काम मशीन को धीमा करने का नहीं है. यह इसरार करने का है, अपनी पूरी फ़लसफ़ियाना विरासत की ताक़त से, कि हमारे अंदर कुछ ऐसा है जिसे मशीन छू नहीं सकती — और फिर इस तरह जीने, सोचने और खोजने का, कि यह साबित हो जाए.

प्रणव शर्मा एक साइंस हिस्टोरियन हैं, जो नई दिल्ली (इंडिया) और पारो (भूटान) में रहते हैं और लिखते हैं. अर्चना शर्मा CERN, स्विट्जरलैंड में पार्टिकल फिजिसिस्ट और यूनिवर्सिटी लिब्रे डी ब्रुक्सेल्स, बेल्जियम में प्रोफेसर एमेरिटस हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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