नई दिल्ली: दिल्ली के जीके III में खुले नए साउथ इंडियन रेस्टोरेंट नाडू में अगर आप डोसा, सांभर या इडली मांगेंगे, तो शेफ श्री बाला आपको विनम्रता से मना कर देंगी. उत्तर भारत के शहरों में लंबे समय से साउथ इंडियन खाने की पहचान इन्हीं खानों तक सीमित रही है, लेकिन नाडू के मेन्यू में ये नहीं हैं. जब वह दिल्ली आईं और उन्होंने मेन्यू तैयार किया, तो सबसे पहले उन्होंने इन्हें हटा दिया. और उनका मानना है कि इससे चीजें बेहतर हुई हैं.
“साउथ इंडियन खाना सिर्फ इडली, सांभर और डोसा तक सीमित नहीं है. यहां छह या सात अलग-अलग क्षेत्र हैं और हर क्षेत्र के अपने खास स्वाद और डिश हैं. मेरा मकसद लोगों को उनसे परिचित कराना है. मैंने 400 डिश चुनी थी, जिनमें से 60 को मेन्यू में रखा है.” शेफ बाला ने अपने नए जीके III स्थित साउथ इंडियन रेस्टोरेंट नाडू में दिप्रिंट से बातचीत में यह बात कही. चेन्नई में जन्मी और पली-बढ़ी श्री बाला सिर्फ शेफ नहीं, बल्कि फूड एंथ्रोपोलॉजिस्ट भी हैं. दिल्ली और गुरुग्राम में नाडू के जरिए वह एनसीआर के लोगों के स्वाद और साउथ इंडियन खाने को लेकर उनकी सोच बदलना चाहती हैं.
वह अभी गुरुग्राम के सिकंदरपुर स्थित नाडू की दूसरी शाखा में लंच सर्विस खत्म करके आई थीं, जो जून में खुली थी. उनका ब्रेक सिर्फ तब तक रहता है, जब तक उनकी मसाला चाय खत्म नहीं होती. उसके बाद वह फिर डिनर सर्विस शुरू होने से पहले तैयारियों में जुट जाती हैं. खासकर नॉन-वेज व्यंजनों की तैयारी पर वह खुद नजर रखती हैं.
उन्होंने हंसते हुए कहा, “जो लोग साउथ इंडियन खाने को अच्छी तरह नहीं जानते या सिर्फ फिल्मों में दिखाई गई गलत तस्वीर के जरिए उसे समझते हैं, वे मेन्यू में इतने सारे नॉन-वेज करी देखकर हैरान रह जाते हैं. या फिर जैसा मैं कहती हूं, ‘Nat Geo Dead’.”
कई सालों से उत्तर भारत में साउथ इंडियन खाने को कुछ तयशुदा व्यंजनों तक सीमित करके देखा गया है. यहां तक कि ज्यादातर साउथ इंडियन रेस्टोरेंट भी सिर्फ एक-दो राज्यों के खाने तक ही सीमित रहते हैं. जबकि दिल्ली-एनसीआर में साउथ इंडियन खाने के हजारों रेस्टोरेंट हैं. इनमें कार्नाटिक कैफे, दासप्रकाश और सरवणा भवन जैसे मशहूर रेस्टोरेंट से लेकर मोहल्लों के उडुपी रेस्टोरेंट भी शामिल हैं. सिर्फ जोमैटो पर ही राजधानी क्षेत्र में 2,000 से ज्यादा साउथ इंडियन रेस्टोरेंट दर्ज हैं. लेकिन अब तक किसी ने इस खाने की पूरी विविधता को सही तरीके से पेश नहीं किया था. हालांकि द्राविन कैंटीन भी नाडू की तरह कई तरह के व्यंजन परोसता है, लेकिन शेफ बाला का रेस्टोरेंट इस खानपान को एक अपस्केल फाइन-डाइनिंग अनुभव के रूप में पेश करता है.
शेफ बाला ने यह कमी पहली बार 1990 के दशक में दिल्ली आने पर महसूस की थी. तभी से उनका सपना था कि वह यहां एक साउथ इंडियन रेस्टोरेंट खोलें. नाडू, जो उनके इसी सपने को पूरा करता है, बनने में दो दशक से ज्यादा का समय लगा. उन्हें जानने वाले लोग उन्हें “परफेक्शनिस्ट”, “प्योरिस्ट” और “लोगों को खाना खिलाने का शौक रखने वाली” बताते हैं. लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा खुशी तब होती है, जब लोग उन्हें “साउथ इंडियन खानपान की विरासत की संरक्षक” कहते हैं.
करीब दस साल के पेशेवर अनुभव में शेफ बाला ने अपनी अलग पहचान बनाई है. खास तौर पर असली तमिल खाने और 2,000 साल पुराने संगम काल के व्यंजनों को फिर से लोगों तक पहुंचाने के लिए वह जानी जाती हैं. उनका काम संगम साहित्य, मंदिरों के भोजन और चोल वंश के इतिहास के अध्ययन के साथ-साथ दक्षिण भारत के घरों से सीधे पारंपरिक रेसिपियां इकट्ठा करने पर आधारित है.

फूड सुपरस्टार्स ने उन्हें भारत के टॉप 30 शेफ में शामिल किया था. उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान तब मिली जब वह 2020 में गॉर्डन रामसे की सीरीज Gordon Ramsay: Uncharted के केरल एपिसोड में नजर आईं. उन्होंने रामसे को कांथारी (बर्ड्स आई मिर्च) फिश करी और कड़वे नींबू वाली पोर्क करी समेत कई पारंपरिक व्यंजन चखाए. अब उनका कहना है कि उनका मिशन दिल्ली के लोगों को साउथ इंडियन खाने की असली पहचान से परिचित कराना है. उनके शुरुआती ग्राहकों में फिल्म निर्माता बोनी कपूर भी शामिल थे.
नाडू की नियमित ग्राहक रिद्धिमा थप्पर ने कहा, “मुझे तो पता ही नहीं था कि एग पफ जैसी भी कोई चीज होती है. मैं इसे हर दिन खा सकती हूं और कभी बोर नहीं होऊंगी. लेकिन नाडू की असली खासियत इसकी चटनियां और साथ में मिलने वाली चीजें हैं. यहां तक कि जो लाल सॉस मिलती है, उसमें भी बहुत तीखापन और गहराई वाला स्वाद है.”
जोमैटो पर नाडू को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं. कई लोग रेस्टोरेंट के खूबसूरत इंटीरियर, अच्छे खाने और शानदार माहौल की तारीफ करते हैं. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि इसे जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है और खाना व अनुभव इसकी कीमत के हिसाब से नहीं है. कुछ ग्राहकों ने वीकेंड पर सिर्फ एडवांस बुकिंग और वॉक-इन ग्राहकों को एंट्री न मिलने पर भी नाराजगी जताई है. हालांकि शेफ बाला का कहना है कि यह व्यवस्था सिर्फ भीड़ को संभालने के लिए है, क्योंकि वीकेंड पर यहां काफी भीड़ रहती है.

हड्डी वाली मछली
शेफ बाला खुले किचन में जाती हैं. यहां कांच की दीवार नहीं है ताकि ग्राहक खाना बनते हुए देख सकें. वह देखती हैं कि सू शेफ पोल रोटी, इडली चुरोस, सॉरडो और लवाश के लिए अलग-अलग तरह का आटा तैयार कर रहे हैं. इन्हें केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की अलग-अलग करी के साथ परोसा जाता है.
उन्होंने जानबूझकर ऐसी डिश को जगह दी है जो उत्तर भारत में कम देखने को मिलती हैं. इनमें मटन कुजाम्बु, क्रैब कुजाम्बु, पचकरी इश्ट्यू, ब्लू क्रैब करी विद क्यूरी पोमेग्रेनेट पचड़ी और कई तरह के मांस व सीफूड के डिश शामिल हैं, जिन्हें दिल्ली के चिकन-केंद्रित खाने में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है.
करी लीफ लॉब्स्टर, जिसे व्हाइट बटर, काली मिर्च और करी पत्ते के साथ बनाया जाता है, और पूरी मछली के रूप में परोसी जाने वाली पोम्फ्रेट फ्राई इस बात का उदाहरण हैं कि उन्होंने पकाने और परोसने के असली तरीके से कोई समझौता नहीं किया. जबकि दिल्ली के लोग आमतौर पर कांटे वाली मछली खाने से बचते हैं.

उन्होंने कहा, “हड्डी के साथ मछली परोसने के पीछे भी विज्ञान है और हम इसे ऐसे ही खाते हैं. मैंने कभी इसे उत्तर भारतीय स्वाद के हिसाब से बदलने की कोशिश नहीं की. मैं खाना उसकी असली गरिमा के साथ परोस रही हूं.”
उनका यह तरीका इस सोच का भी विरोध है कि उत्तर भारतीय स्वाद ही पूरे भारतीय खाने की पहचान तय करे. वह चाहती हैं कि अलग-अलग क्षेत्रों की खासियत बनी रहे और मुख्यधारा की पसंद के लिए उसे बदला न जाए.
दिल्ली के ग्राहक ही नहीं, उनके सीफूड सप्लायर भी उनकी परफेक्शन की आदत से परेशान रहते हैं. अगर मछली उनके तय वजन से 100 ग्राम भी कम होती है, तो वह पूरा ऑर्डर लौटा देती हैं.
उन्होंने कहा, “एक जैसा स्वाद बनाए रखना सबसे जरूरी है और यही सबसे बड़ी चुनौती भी है. अगर मुझे वैसा सीफूड या मांस नहीं मिलता जैसा मैं चाहती हूं, तो मैं उस डिश को मेन्यू से हटा देती हूं.”
हालांकि शेफ बाला यह भी जानती हैं कि दिल्ली के लोगों का दिल कैसे जीता जाए. वह पूरी तरह सख्त परंपरावादी भी नहीं हैं. अपने दोस्त राजेश तारा के साथ सुबह-सुबह पुरानी दिल्ली में निहारी और छोले-भटूरे जैसी चीजें खाने के उनके दौरों का असर उनके खाने में भी दिखता है. दिल्ली में पसंद किए जाने वाले रान को श्रद्धांजलि देने के लिए, जो दक्षिण भारत में ज्यादा लोकप्रिय नहीं है, उन्होंने रसेल मार्केट रान तैयार की. यह चेट्टीनाड स्टाइल की डिश है, जिसे हाथ से पीसे मसालों के साथ बनाया जाता है और कुरकुरी कॉइन परोट्टा के साथ परोसा जाता है.

मांस और सीफूड के बावजूद नाडू में शाकाहारी डिश की भी कोई कमी नहीं है. इनमें उडुपी के श्रीकृष्ण मंदिर से जुड़ी रेसिपी वाला पाइनएप्पल गस्सी, अरबी से बना मॉक फिश स्टेक और गर्मागर्म स्ट्रिंग हॉपर के साथ परोसा जाने वाला पचकरी इश्ट्यू खास हैं. हर व्यंजन का स्वाद, बनावट और खुशबू अलग है.
लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान खींचते हैं यहां के डेजर्ट. फॉरबिडन राइस कोकोनट पुडिंग, क्रिस्पी पोंगल पाउच और कांथारी मिर्च वाले हॉट चॉकलेट के साथ परोसा जाने वाला इडली चुरो. पुडिंग का नाम उस काले चावल पर रखा गया है, जो कभी चीन के शाही परिवार के लिए ही सुरक्षित था और बाद में चेत्तियार व्यापारी उसे भारत लाए. पोंगल में खाने वाला कपूर भी डाला जाता है.
राजेश तारा ने कहा, “नाडू के मेन्यू की सबसे खास बात यह है कि इसमें उत्तर भारतीय स्वाद के हिसाब से किसी भी चीज को आसान या बदला हुआ नहीं बनाया गया है.”
यह सब X पर किए गए एक कमेंट से शुरू हुआ
शेफ बाला की पढ़ाई का उनके शेफ बनने से लगभग कोई संबंध नहीं है. उन्होंने कभी किसी कुकिंग स्कूल में पढ़ाई नहीं की और न ही कोई औपचारिक ट्रेनिंग ली. उनका शेफ बनने का सफर हैरान करने वाले तरीके से X पर किए गए एक कमेंट और मुंबई में हुए एक अचानक पॉप-अप इवेंट से शुरू हुआ.
शेफ बाला बनने से पहले वह रचनात्मक दुनिया से बिल्कुल अलग थीं. वह चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) हैं, कानून की पढ़ाई कर चुकी हैं और उनके पास सिक्स सिग्मा क्वालिटी कंट्रोल और आर्बिट्रेशन मैनेजमेंट में दो डिप्लोमा भी हैं. इनमें से किसी भी चीज से यह नहीं लगता था कि वह खाना बनाने की दुनिया में जाएंगी.
सब कुछ तब बदला जब उन्होंने 2015 में शेफ आशीष भसीन के एक कुकिंग वीडियो पर X पर कमेंट किया. उस समय भसीन मुंबई के द ओबेरॉय सेंटर ऑफ लर्निंग एंड डेवलपमेंट (OCLD) में थे. बाला ने लिखा कि साउथ इंडियन खाने को जितनी पहचान मिलनी चाहिए, उतनी नहीं मिल रही.
भसीन ने याद करते हुए कहा, “उस समय वह सच में इस बात को लेकर चिंतित थीं. इसलिए उन्होंने कमेंट सेक्शन से बातचीत को डायरेक्ट मैसेज तक पहुंचा दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि ओबेरॉय की प्रतिष्ठा भी दांव पर है. उन्होंने मुझसे कहा कि वह भी खाना बना सकती हैं. जब मैंने उनके अनुभव के बारे में पूछा, तो उन्होंने अपनी सारी डिग्रियां गिना दीं. चार्टर्ड अकाउंटेंसी, लॉ और डिप्लोमा. मैंने फिर पूछा कि खाना बनाने का अनुभव क्या है. तब उन्होंने कहा कि उन्होंने बड़े आयोजनों में खाना बनाया है.” वह घर में त्योहारों और कार्यक्रमों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के लिए खाना बनाती थीं.
शेफ भसीन ने माना कि उन्हें बिल्कुल उम्मीद नहीं थी. वह सिर्फ चाहते थे कि वह उन्हें परेशान करना बंद कर दें. उन्होंने OCLD चेन्नई के शेफ को फोन किया और कहा कि उन्हें एक बार कमर्शियल किचन में खाना बनाने का मौका दे दें ताकि वह उन्हें परेशान करना छोड़ दें.
उन्होंने कहा, “मैंने उनसे कहा कि इस महिला को आने दीजिए, खाना बनाने दीजिए और फिर उसकी समीक्षा दे दीजिए. कुछ देर बाद उनका फोन आया. वह उनके स्वाद से पूरी तरह प्रभावित थे. यहीं से शेफ बाला का असली सफर शुरू हुआ. स्वाद पर उनकी पकड़ बेहतरीन थी.”
इससे शेफ भसीन की जिज्ञासा बढ़ी और उन्होंने उन्हें मुंबई बुलाकर खुद उनका खाना देखा. यही निमंत्रण घर में खाना बनाने वाले लोगों को आगे बढ़ाने की उनकी अपनी यात्रा की भी शुरुआत बना.
अब तक शेफ बाला भारत और विदेश में करीब 100 पॉप-अप आयोजित कर चुकी हैं. चेन्नई में उन्होंने एक छोटा सा रेस्टोरेंट भी चलाया था. कमर्शियल किचन में पहली बार उन्होंने अप्रैल 2016 में ट्राइडेंट बीकेसी में खाना बनाया था. शुरुआत आसान नहीं थी. उन्हें तेज आंच संभालने, टमाटर सुखाने और खाना सजाने में दिक्कत हुई. खाना बिल्कुल साधारण और घरेलू अंदाज में परोसा गया. लेकिन दस साल बाद उनका खाना भी काफी बदल चुका है और शेफ भसीन के साथ उनकी दोस्ती भी.
शेफ भसीन ने कहा, “वह घर में खाना बनाने वाली महिला से कमर्शियल शेफ बन गईं. जैसा नाडू में दिखता है, उनका खाना बहुत आगे बढ़ चुका है. यह फाइन-डाइनिंग साउथ इंडियन खाना है और यह सिर्फ वही कर सकती थीं.”
नाडू को बनाने में भी शेफ भसीन की अहम भूमिका रही. उन्होंने ही शेफ बाला की मुलाकात रेस्टोरेंट व्यवसायी साहिल सांभी से कराई, जो जापोनिको, लाटांगो और वियतनॉम जैसे रेस्टोरेंट के पीछे हैं.
भसीन ने कहा, “साहिल एक ऐसे साउथ इंडियन शेफ की तलाश में थे जो अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित हो. वहीं शेफ बाला दिल्ली आना चाहती थीं. यह बिल्कुल स्वर्ग में बनी जोड़ी जैसा लगा.”
उन्होंने आगे कहा, “दोनों ही परफेक्शनिस्ट हैं, इसलिए मुझे भी थोड़ा डर था. मुझे लगा था कि दोनों एक-दूसरे के बाल नोचेंगे. लेकिन उनकी साझेदारी उम्मीद से कहीं बेहतर साबित हुई.”
इसी तरह दो परफेक्शनिस्ट लोगों ने मिलकर नाडू बनाया.
नाडू का इंटीरियर
शेफ बाला ने बताया, “तमिल में नाडू का मतलब ‘जमीन’ या ‘क्षेत्र’ होता है.” यही सोच सिर्फ खाने में नहीं, बल्कि पूरे रेस्टोरेंट की डिजाइन में भी दिखाई देती है. इसे ऐसा बनाया गया है कि यह जमीन से जुड़ा, प्राकृतिक और बिना किसी घिसी-पिटी सजावट वाला लगे. जानबूझकर पारंपरिक साउथ इंडियन सजावट जैसे रंगोली (कोलम) या बड़े प्रवेश द्वार की मूर्तियों का इस्तेमाल नहीं किया गया.
इसके बजाय यहां मिट्टी, चिकनी मिट्टी और मसालों से प्रेरित रंगों का इस्तेमाल किया गया है. साथ ही एक छोटा सा जलाशय भी बनाया गया है, जिससे जगह घर जैसी महसूस होती है.

बैठने की व्यवस्था तीन हिस्सों में बांटी गई है. सन, लैंड और सी. सी ज़ोन में पीतल का नंदी रखा गया है और कलाकार आरना जई मदान की आध्यात्मिक कला कृतियां भी लगाई गई हैं. हर टेबल पर पीतल के डिजाइन बने हैं. हाथ से बने पीतल और कांसे के बर्तन, हस्तनिर्मित स्टोनवेयर, हाथ से रंगे कपड़े के मेन्यू और पीतल की सजावटी वस्तुएं इस जगह को और खास बनाती हैं.
शेफ बाला ने कहा, “यहां की हर चीज हमारी विरासत और संस्कृति की कहानी कहती है. यहां कुछ भी सिर्फ इंस्टाग्राम पर अच्छा दिखने के लिए नहीं बनाया गया. यहां आने वाले लोगों को ऐसा महसूस होता है जैसे वे हमारे घर में खाना खा रहे हों.”
इस सपने की कीमत
50 साल की उम्र में दिल्ली आकर अपने शेफ बनने के सपने को पूरा करने में शेफ बाला को बहुत खुशी मिली है. लेकिन इसकी बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी है. उनका परिवार.
उनकी सबसे छोटी बेटी सृजा बताती हैं कि पहले दोनों साथ बैठकर कोरियन ड्रामा देखते थे, बॉलीवुड गाने सुनते थे और क्विज खेलते थे. अब यह सब लगभग बंद हो गया है.
20 साल की सृजा ने कहा, “मेरी मां मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा हैं. मैं उन्हें अपने दिन की हर छोटी-बड़ी बात बताती हूं. सब कुछ उन्हीं से शेयर करती हूं. लेकिन अब ऐसा कम हो गया है. वह दोनों रेस्टोरेंट चलाने में इतनी व्यस्त रहती हैं कि कई बार फोन उठाने का भी समय नहीं मिलता.”
फिर भी पूरा परिवार इस त्याग से खुश है.
सृजा ने कहा, “कोविड-19 के दौरान मुझे याद है कि वह बहुत परेशान रहती थीं. वह यात्रा नहीं कर सकती थीं, पॉप-अप नहीं कर सकती थीं. वह पहले जैसी नहीं रहीं. लेकिन जब से वह दिल्ली आई हैं, मैंने उन्हें पहले से कहीं ज्यादा खुश देखा है.”
उन्होंने कहा, “वह अपना सपना जी रही हैं और हम उनके सबसे बड़े समर्थक हैं.”
सृजा को अपनी मां के बनाए लगभग सभी व्यंजन पसंद हैं. लेकिन वह मानती हैं कि घर पर उन्हें कुछ चीजें याद आती हैं. जैसे फिल्टर कॉफी, राजमा और बेंगलुरु स्टाइल सांभर.
रेस्टोरेंट में भी शेफ बाला की एक पसंदीदा जगह है, झूला. हालांकि उन्हें वहां बैठने का मौका बहुत कम मिलता है. उनका दिन बहुत व्यस्त रहता है. उनके लिए शांति का असली समय सिर्फ सुबह की कॉफी होती है.
उन्होंने कहा, “मैं अपनी फिल्टर कॉफी खुद बनाती हूं. दुनिया में कोई भी इसे मेरी तरह नहीं बना सकता. मैं अपने दिन की शुरुआत इसी से करती हूं.” शायद यही वजह है कि बाकी पूरे दिन उनका सहारा मसाला चाय होती है.
सालों से लगातार दिल्ली आने की वजह से अब यह शहर उन्हें अजनबी नहीं लगता. यहां का मौसम, ट्रैफिक, खाना और लोग, सबके साथ वह आसानी से घुल-मिल गईं. लेकिन दो चीजें अब भी उन्हें परेशान करती हैं.
उन्होंने कहा, “यहां पार्किंग बहुत बड़ी समस्या है. मैं सच में हैरान रह गई कि अपनी ही सोसाइटी में गाड़ी खड़ी करने की जगह मिलना कितना मुश्किल है.” उन्होंने कहा कि पड़ोसियों को पार्किंग के लिए लड़ते-झगड़ते देखकर उन्हें बहुत अजीब लगता है.
उन्होंने हंसते हुए कहा, “और फिर एक बिल्कुल घरेलू समस्या है. मैं सुबह घर साफ करके निकलती हूं. लेकिन रात को लौटती हूं तो फिर से धूल की मोटी परत जम चुकी होती है. यहां घर को साफ रखना उम्मीद से कहीं ज्यादा मुश्किल है.”
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