राष्ट्रीय राजनीति में फिलहाल जो मंथन चल रहे हैं उसके दो पहलू हैं. लेकिन आप परेशान न हों, मैं केंद्रीय मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल को लेकर अटकलें लगाने वाला नशा नहीं करने जा रहा हूं. यह काम राजधानी के अर्द्ध-बेरोजगार ‘अंदरूनी मंडली के ज्ञानियों’ के जिम्मे छोड़ दीजिए.
मेरी दिलचस्पी उन दो चीजों में है जो परस्पर विरोधी तो दिखती हैं मगर वैसी हैं नहीं. एक यह कि लोकसभा में अल्पमत में होने के बावजूद भाजपा ने भारत को लगभग एक पार्टी के शासन वाला देश बनाने का चमत्कार कर डाला है.
और दूसरी यह कि यह काम जबकि क्षेत्रीय दलों को तोड़ कर, अधिग्रहीत करके या बर्बाद करके किया जा रहा है, कांग्रेस ही एकमात्र महत्वपूर्ण साबुत विपक्षी पार्टी बची है. इस तरह भारतीय राजनीति दो-दलीय समीकरण में तब्दील हो गई है.
यह बिलकुल सरल और सीधा समीकरण होना चाहिए था, बशर्ते कांग्रेस दमदार चुनौती के रूप में सामने होती. लेकिन भाजपा के खिलाफ केवल 10 फीसदी मुक़ाबले में जीत हासिल करने की दर के बूते वह ऐसा नहीं कर सकती.
वैसे, दो दलीय व्यवस्था तो भाजपा को बिलकुल मुफीद होगी क्योंकि उसे केवल ताकतवर क्षेत्रीय दलों से मुक़ाबले में मशक्कत करनी पड़ती है. और ऐसे अधिकतर दल तबाह किए जा चुके हैं. अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का इम्तिहान आगामी मुकाबले में योगी से हो जाएगा.
अब तीन सवाल उभरते हैं. पहला: मोदी-शाह की भाजपा को कांग्रेस इतनी सुविधाजनक प्रतिद्वंद्वी क्यों नजर आती है? दूसरा: कांग्रेस के अंदर क्या कमी है कि वह विश्वसनीय चुनौती नहीं बन सकती? तीसरा: कांग्रेस खुद को कैसे उबारे?
पहले सवाल का जवाब बहुत आसान है: भाजपा चार इंजिन के बूते उड़ान भर रही है— कट्टरपंथी हिंदुत्व, उससे भी उग्र राष्ट्रवाद, जनकल्याण के कार्यक्रमों का कुशल और स्वच्छ क्रियान्वयन, और सबकी नजरों में आने वाले भारी-भरकम इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास. कांग्रेस के पास इन सबका कोई विश्वसनीय जवाब नहीं है, यह दूसरे सवाल का जवाब दे देता है. कांग्रेस के मुताबिक, भाजपा जो भी कर रही है वह सब गलत है, तो सवाल उठता है कि वह खुद सत्ता में आने के बाद क्या करेगी?
अर्थव्यवस्था, रणनीतिक मसलों, और डिफेंस के मोर्चों वह भाजपा से अलग क्या करेगी? पाकिस्तान, चीन, अमेरिका, और पश्चिम एशिया से वह कैसे निबटेगी? डिफेंस पर वह किस तरह खर्च करेगी? भाजपा के विकल्प के तौर पर भविष्य का उसका क्या खाका है? भाजपा अगर उसके मुताबिक “भ्रष्ट, भाई-भतीजावादी पूंजीवादी है, और राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता कर रही है”, और ऐसे आरोप लगाना राजनीतिक होड़ में जायज भी मान लें, तो आप ऐसा क्या करेंगे जो अलग होगा? अगर कांग्रेस खुद को एक विकल्प मानती है जिसे मतदाता भाजपा के बदले चुनेंगे, तो वह अलग क्या पेश कर रही है?
कांग्रेस को पहले इन सारे सवालों का जवाब देना होगा. इसके अलावा, हमने भाजपा की उड़ान को ऊंचाई देने वाले जिन चार इंजिनों का जिक्र किया था उनका जवाब ढूंढना होगा. हमने विशाल रथ की उपमा जानबूझकर नहीं दी. भाजपा जिस तेजी से आगे बढ़ी है उसके मद्देनजर वह उपमा फिट नहीं बैठती. वैसे भी हम धार्मिक परंपरा से उपमा चुनने से परहेज करते हैं.
सबसे पहले तो हिंदुत्व को ही लें. कांग्रेस को इस मोर्चे पर भाजपा का मुकाबला करने की कोशिश तक नहीं करनी चाहिए. यह जमीन जीती जा चुकी है, और कांग्रेस उसमें कोई टूट-फूट नहीं कर सकती, चाहे उसके नेता कितने भी मंदिरों के दर्शन कर लें. शिवसेना तक ने यह कोशिश छोड़ दी है. वास्तव में, उद्धव ठाकरे ने कुछ दार्शनिक अंदाज से मुझसे एक बार कहा भी था कि उनके पिता बालासहब ने महाराष्ट्रवाद के मुद्दे को छोड़ हिंदुत्व को अपनाकर गलती की, इसने नरेंद्र मोदी को शिवसेना की जमीन पर कदम रखने और उसे कब्जा करने का मौका दे दिया. जनकल्याण के मुद्दे पर कॉंग्रेस पूरी दुनिया मुट्ठी में देने का वादा कर सकती है. ऐसा उसने कर्नाटक और तेलंगाना में करके सफलता हासिल की. इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में उसे समस्या का सामना करना पड़ सकता है. इतने सालों से वह कई प्रदर्शनीय परियोजनाओं का विरोध करती दिखी है, निकोबार की परियोजना ताजा मिसाल है.
धर्म का मुद्दा उसकी पहुंच से परे है, जनकल्याण/विकास का मुद्दा इतना निर्विवाद है कि उसमें भावनात्मकता नहीं जोड़ी जा सकती. सो, कांग्रेस के लिए राष्ट्रवाद का मुद्दा ही बचता है.
कांग्रेस ने राष्ट्रवाद के मुद्दे को किस तरह खारिज किया है, यह 2014 के बाद की उसकी सियासत का सबसे रहस्यमय पहलू है. इसके कुछ नेता यूरोप के पर्यावरणवादी नेताओं जैसे दिखने की कोशिश कर रहे होंगे लेकिन असली कॉंग्रेस खून के आंसू रोने वाले शांतिवादियों की पार्टी कभी नहीं रही है. यह वह पार्टी रही है जिसने इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए, और लाल बहादुर शास्त्री के राज में 1965 की जंग इस लिहाज से जीती कि उसने कश्मीर को हड़पने के इरादे से हमला करने वाले पाकिस्तान को पीछे खदेड़ दिया था.
इसने उत्तर-पूर्व के बागियों से क्रूरता के साथ भी मुक़ाबला किया, 5 मार्च 1966 को आइज़ोल की घेराबंदी किए बागियों को सरकारी खजाने पर कब्जा करने, असम राइफल्स की बटालियन के मुख्यालय और डिप्टी कमिश्नर के निवास पर कब्जा करने से रोकने के लिए वायुसेना के विमानों को रवाना किया था, और अब वह भले यह याद न करना चाहे लेकिन ऑपरेशन ब्लूस्टार के तहत उसने सेना को स्वर्ण मंदिर के अंदर भेज दिया था और इसके बाद ऑपरेशन ब्लैक थंडर-1,-2 भी किया था.
पहले दो ऑपरेशन इंदिरा गांधी के दौर में और अंतिम दो ऑपरेशन उनके पुत्र राजीव गांधी के दौर में किए गए. इसके बाद इसने कश्मीर घाटी और पंजाब (1991-95) में आतंकवाद और अलगाववाद के सबसे खूनी दौर का मुक़ाबला किया. यह पी.वी. नरसिंह राव के दौर में किया गया. यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू के दौर में भी नगा बागियों के साथ सबसे कठोर तरीकों से लड़ाई लड़ी गई. नेहरू ने गोवा को मुक्त कराने के लिए सेना भेजी थी. कांग्रेस अपने उन प्रधानमंत्रियों को भले न पसंद करे, जो गांधी/नेहरू परिवार से नहीं थे, लेकिन हकीकत यही है कि इसका कोई नेता ऐसा नहीं हुआ, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में कमजोर रहा हो. इसलिए भी आश्चर्य होता है कि उग्र राष्ट्रवाद वाली मूल पार्टी रास्ता कैसे भूल गई.
चाहे उरी कांड के बाद ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ हो या पुलवामा कांड के बाद बालाकोट पर हवाई हमला, या पूर्वी लद्दाख/गलवान में संकट, या ऑपरेशन सिंदूर, कांग्रेस ने सब पर सवाल खड़े करके और सबूतों की मांग करके खुद अपना ही नुकसान किया. ऐसे कुछ मामलों के लिए राहुल गांधी के करीबी जिम्मेदार माने जा सकते हैं, जैसे बालाकोट मामले में सैम पित्रोदा, सर्जिकल स्ट्राइक के मामले में दिग्विजय सिंह. बाद में खुद राहुल भी ऐसा करते दिखे.
उन्होंने बयान दे दिया कि “चीनियों ने हमारे सैनिकों को पीट दिया”, या वे “हमारी 2,000 किमी जमीन पर कब्जा किए बैठे हैं”. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने मानहानि के एक मामले में उन्हें बरी करते हुए डांट भी दिया. ऑपरेशन सिंदूर के मामले पर संसद में उनके बयान में ज्यादा जोर इस बात पर था कि भारत ने कितने विमान गंवाए, और क्यों. उन्होंने विदेश मंत्री जयशंकर का 17 सेकंड का एक क्लिप अलग से ट्वीट करते हुए सवाल उठाया कि भारत ने पाकिस्तान को यह क्यों कहा कि वह उसके यहां के आतंकवादी अड्डों पर ही हमला करेगा, उसके सैन्य अड्डों पर नहीं. उनकी पार्टी के पंजाब के एक सांसद ने तो भारतीय वायुसेना के मार गिराए गए विमान का एक टुकड़ा तक प्रदर्शित किया.
इस सबको कितना ‘स्मार्ट’ कदम कहा जाएगा? ऐसे मसलों से उनकी दादी कैसे निबटतीं, इसका एक अंदाजा मैं आपको करा सकता हूं. हर बार वे भारतीय सेना की भारी तारीफ करतीं, उसकी कामयाबियों का बखान करने के बाद मोदी सरकार की कई नाकामियों पर हमले करतीं. सवाल उठातीं कि पुलवामा में 300 किलो आरडीएक्स कैसे पहुंच गया, पहलगाम में सुरक्षा का इंतिजाम क्यों नहीं था, और ऑपरेशन सिंदूर को लेकर शुरू में शायद वे नरम रवैया अपनातीं.
वे कहतीं कि हमारी शानदार और अजेय सेना ने ‘इस अक्षम और ढुलमुल सरकार’ के बावजूद चमत्कार कर दिखाया है इसलिए “सैनिको और अफसरो, पायलट और एयरमेन, आप सबको बहुत बहुत धन्यवाद!’ उन्होंने सेना को सरकार से साफ अलग बता दिया होता. सेना की वे प्रशंसा करतीं, सरकार पर हमले करतीं. वे कभी यह नहीं पूछतीं कि हमारा कोई विमान गिराया गया कि नहीं, या अपने दरबारियों के ट्वीट के आधार पर यह गैर-जिम्मेदाराना नहीं देतीं कि हम चीन के हाथों अपनी कितनी जमीन ‘गंवा’ बैठे हैं.
कांग्रेस अपनी भूल से पीछे नहीं लौट सकती. इसके बरक्स मोदी को देखिए. मैंने गौर किया कि 10 अगस्त 2023 को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव का जवाब देते हुए उन्होंने कच्चातिवु मुद्दे, 1966 में आइज़ोल में वायुसेना द्वारा ताबड़तोड़ बमबारी, और ऑपरेशन ब्लूस्टार पर, जिसे वे “अकाल तख्त पर हमला” कहते हैं, असावधानी भरे बयान दिए. आइज़ोल और ब्लूस्टार पर तो उन्होंने दोबारा कुछ नहीं कहा लेकिन कच्चातिवु मुद्दा 2024 के चुनाव में उठा और उसके बाद भुला दिया गया. इन गलत कदमों को उन्होंने वापस खींच लिया. ये तीनों मुद्दे राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित हैं.
भारतीय राष्ट्रवाद अपने आपमें अनूठा है. यह राष्ट्रवाद हमारे प्राचीन, मध्यकालीन, और आधुनिक इतिहासों, आजादी के आंदोलन, और संविधान के बारे में साझा भावनाओं से उभरा है. भाजपा ने इसका हिंदूकरण कर दिया है. इस मुद्दे पर काँग्रेस बहस उठा सकती है या मतभेद उभार सकती है. लेकिन अगर उसने अपना चालू रवैया ही जारी रखा, और यह ज़ोर देती रही कि भारत और उसकी सेना चीन और पाकिस्तान से मात खा रही है, तो कोई भी उसका विश्वास नहीं करेगा. मुझे डर है कि यही रवैया रहा तो आज जो दो दलीय समीकरण बना है वह असंदिग्ध रूप से एकदलीय व्यवस्था में तब्दील हो जाएगा.
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