नई दिल्ली: सऊदी अरब के उप विदेश मंत्री वलीद अल-ख़ुरैजी के नेतृत्व में एक सऊदी प्रतिनिधिमंडल ने ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होकर तेहरान में अप्रत्याशित रूप से मौजूदगी दर्ज कराई.
ईरानी मीडिया के अनुसार, अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले विदेशी प्रतिनिधिमंडलों की सूची में सऊदी अरब का नाम पहले से शामिल नहीं था. कार्यक्रम से पहले केवल ओमान और कतर के अधिकारियों के आने की सार्वजनिक जानकारी दी गई थी. ऐसे में रियाद की मौजूदगी को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है.
शुक्रवार को तेहरान में अंतिम संस्कार की रस्में शुरू हुईं, जहां खामेनेई का पार्थिव शरीर ग्रैंड मोसल्ला में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया. इसके बाद उनके पार्थिव शरीर को तेहरान की सड़कों से अंतिम यात्रा के रूप में ले जाया जाएगा और मंगलवार को उसे शिया धार्मिक शिक्षा के प्रमुख केंद्र कोम शहर ले जाया जाएगा.
ईरानी मीडिया के मुताबिक, सऊदी उप विदेश मंत्री ने बाद में खामेनेई के निधन पर शोक संदेश भी लिखा. पश्चिम एशिया युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण रिश्तों और सतर्क कूटनीति के बीच सऊदी प्रतिनिधिमंडल की यह मौजूदगी अहम मानी जा रही है.
फाइनेंशियल टाइम्स की मई 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, युद्धविराम के बाद बनी नाजुक स्थिति के बीच सऊदी अरब ने ईरान और खाड़ी के अरब देशों को शामिल करते हुए क्षेत्रीय ‘गैर-आक्रामकता ढांचे’ का विचार आगे बढ़ाया था.
रिपोर्ट में कहा गया कि सऊदी नीति-निर्माताओं का मानना है कि भविष्य में क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था बनाते समय ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, ताकि खाड़ी क्षेत्र में किसी बड़े सैन्य टकराव का खतरा कम किया जा सके.
बदलते क्षेत्रीय समीकरण
यह प्रस्ताव इस बात का संकेत है कि खाड़ी के देश अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं का नए सिरे से आकलन कर रहे हैं. पश्चिम एशिया युद्ध के बाद बने अनिश्चित माहौल में वे क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के तरीके तलाश रहे हैं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बदलते क्षेत्रीय हालात को लेकर खाड़ी देशों के बीच सोच में अंतर बढ़ रहा है. जहां सऊदी अरब कूटनीति और तनाव कम करने पर जोर दे रहा है, वहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अमेरिका और इजरायल के साथ अपनी सुरक्षा साझेदारी मजबूत बनाए रखी है.
मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि मई में सऊदी अरब ने अमेरिका के नेतृत्व में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ में प्रस्तावित समुद्री सुरक्षा अभियान का समर्थन नहीं किया और अमेरिकी सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया. द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने खाड़ी क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा अभियानों को लेकर हुई चर्चाओं की जानकारी दी थी. हालांकि, वॉशिंगटन और रियाद के बीच मतभेद कितने गंभीर थे, इसे लेकर अलग-अलग दावे हैं और दोनों सरकारों ने इन खबरों की सार्वजनिक पुष्टि नहीं की है.
कुल मिलाकर, खाड़ी देशों की सरकारें अब ऐसे कूटनीतिक रास्ते तलाश रही हैं, जिनसे भविष्य में संघर्ष की आशंका कम हो और साथ ही पश्चिमी सहयोगी देशों के साथ उनकी सुरक्षा साझेदारी भी बनी रहे.
दो हफ्ते पहले सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) का स्वागत करते हुए कहा था कि यह तनाव कम करने का एक महत्वपूर्ण मौका है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी स्थायी समझौते में मजबूत सत्यापन व्यवस्था और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े व्यापक मुद्दों को शामिल करना जरूरी होगा.
उन्होंने कहा, “असल महत्व समझौते के विवरण का होगा. सबसे जरूरी यह होगा कि लंबे समय तक टिकने वाली और भरोसेमंद सत्यापन व्यवस्था कैसे बनाई जाती है.”
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ में जहाजों की आवाजाही के लिए नई व्यवस्था बनाने के प्रस्तावों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया युद्ध से पहले मौजूदा व्यवस्था ठीक तरह से काम कर रही थी.
उन्होंने कहा, “संघर्ष शुरू होने से पहले जलडमरूमध्य का प्रबंधन ठीक चल रहा था. जहाज बिना किसी परेशानी के आ-जा रहे थे. फिर अब सिर्फ एक युद्ध की वजह से हम ऐसी नई व्यवस्था क्यों स्वीकार करें, जिसे हम पर थोपा जाए?”
ईरान के साथ सऊदी अरब के रिश्तों पर बोलते हुए फैसल ने माना कि हालिया संघर्ष ने 2023 में बीजिंग की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध बहाल होने के बाद बनने लगे भरोसे को काफी नुकसान पहुंचाया है. रिपोर्टों के मुताबिक, फरवरी में पश्चिम एशिया युद्ध शुरू होने के बाद सऊदी अरब ने ईरान पर गुप्त जवाबी हमले भी किए थे, लेकिन उसके बाद से उसने अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया है.
उन्होंने कहा कि रियाद ने तेहरान के साथ दोबारा बातचीत और आर्थिक सहयोग की संभावनाओं को सावधानी से आगे बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन फिलहाल वे प्रयास लगभग रुक गए हैं.
सऊदी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि उनका देश पर्दे के पीछे कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन करता रहा, लेकिन उसने औपचारिक मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभाई.
उन्होंने कहा, “हमने समर्थन दिया और पर्दे के पीछे दोनों पक्षों को यह समझाने की कोशिश की कि वे सबसे ज्यादा ध्यान कूटनीतिक रास्ते पर दें.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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