आज़ाद और खुले वैश्विक निज़ाम से सिर्फ कुछ फैसलों या अंदाज़ों में चूक नहीं हुई थी. बात इससे कहीं गहरी थी. इसकी बुनियाद ही एक ऐसी खोट पर टिकी थी जो शुरू से मौजूद थी: यह अंधविश्वास कि अगर इंसानी मामलों में विज्ञान और अक्ल का इस्तेमाल पूरी कड़ाई से किया जाए, तो इतिहास का रुख अमन के रास्ते पर मोड़ा जा सकता है.
इस सोच की अपनी एक गहरी पड़ताल होनी ज़रूरी है. यह समझने के लिए कि आज यह पूरा निज़ाम क्यों बिखर रहा है, हमें यह जानना होगा कि इसे बनाने वालों के ज़हन में क्या था, और वे इसे एकजुट रखने के लिए विज्ञान पर इतना भरोसा क्यों कर रहे थे.
निष्पक्ष तरीके का भ्रम
विज्ञान के बारे में हम खुद को जो कहानियाँ सुनाते हैं, उनका एक खास ढर्रा होता है. समां कुछ ऐसा होता है—किसी आबादी से दूर बनी एक साफ-सुथरी लैब या कोई वेधशाला, जहाँ एक ऐसा दिमाग बैठा है जिसे इंसानी जज्बातों और राग-द्वेष से कोई सरोकार नहीं है. वह सिर्फ अक्ल और सबूतों के सहारे भ्रम के परदों को हटाकर ऐसा सच सामने लाता है जो हर ज़माने और हर जगह के लिए सही हो. हम देखते हैं कि कैसे अफरा-तफरी को एक सलीके में बदला जाता है, कैसे सदियों का अंधेरा ज्ञान के उजाले में तब्दील हो जाता है.
यह कहानी जितनी खूबसूरत है, उतनी ही लुभावनी भी है. इसे अपोलो 8 मिशन की ‘अर्थराइज़’ (धरती का उगना) वाली उस मशहूर तस्वीर से बेहतर शायद ही किसी चीज़ से समझा जा सके. उस शांत, काले अंतरिक्ष में हमारी धरती नीले और सफेद बादलों के बीच एक नाज़ुक गोले की तरह तैरती दिखती है. यह हकीकत का एक बेदाग नज़ारा है—हमारी अपनी ही एक ऐसी तस्वीर, जो विज्ञान के सबसे ऊंचे रूप ने हमें तोहफे में दी है.
लेकिन इतिहास की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है. विज्ञान की दुनिया में जो ‘खोजों का दौर’ आया, उसमें नए पौधों की पहचान करने वालों की मेहनत या किसी अनजान समंदर के किनारे का नक्शा बनाने वालों का काम—यह सब उस औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी खेल से पूरी तरह जुड़ा हुआ था जिसकी वे सेवा कर रहे थे. दुनिया को सिर्फ बंदूकों और बही-खातों से नहीं जीता गया, बल्कि नक्शों, पैमानों और कोणमापकों के ज़रिए भी काबू में किया गया.
इसलिए, विज्ञान को राजनीति से अलग एक ऐसी पाकीज़ा साधना मानना, जो दुनिया को एक सुरक्षित दूरी से देखती है, महज़ एक ख्याली पुलाव पकाना है. विज्ञान ताकत के खेल से बाहर नहीं है. यह सत्ता, पहचान और वक्त के उन ढांचों के साथ अंदर तक गुँथा हुआ है, जिन्हें यह सिर्फ दूर से देखने का दावा करता है.
सिर्फ नीतियों की नाकामी नहीं, सोच की खोट
विज्ञान के इस तरीके को हथियार बनाकर इस आज़ाद निज़ाम ने मान लिया था कि लोकतंत्र, खुली बाज़ार और समझदार शासन को किसी जाँचे-परखे वैज्ञानिक नुस्खे की तरह दुनिया भर में भेजा जा सकता है—यह मानकर कि इसकी उपयोगिता हर जगह एक जैसी होगी और इसे लागू करना महज़ एक तकनीकी काम है. इस सोच की वियतनाम के जंगलों से लेकर इराक के रेगिस्तानों तक जो करारी हार हुई, उसे अक्सर सिर्फ गलत फैसलों या राष्ट्रवाद और सत्ता की राजनीति की कड़वी सच्चाइयों को न समझ पाने की नाकामी कहा जाता है.
लेकिन यह आलोचना गहराई तक नहीं जाती. यह नाकामी महज़ सियासी नहीं थी; यह हमारी बुनियादी समझ और सोच की नाकामी थी. यह एक ऐसे नज़रिए का नतीजा था जो जीते-जागते इंसानी समाजों को किसी प्रयोगशाला के रसायनों या कड़ियों की तरह देखता है. यह तकनीकी और प्रशासनिक घमंड कि किसी देश के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को एक कंप्यूटर चिप की तरह सटीक रूप से ढाला जा सकता है, विज्ञान की गहराई को नहीं, बल्कि उसके सरकारी और दरबारी हो जाने को दिखाता है. इस फेर में विज्ञान एक आज़ाद और बेचैन खोज रहने के बजाय एक तावीज़ बन जाता है, जिसे बड़े-बड़े अफसर और हुक्मरान सबूतों का हवाला देकर अपने फैसलों और दखलंदाज़ी को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल करते हैं.
बेशक, हकीकतपसंदी हमेशा से एक कड़वे सच की तरह सामने खड़ी रही है, जो हमें सत्ता के खेल और सुरक्षा की मजबूरियों के दुष्चक्र की याद दिलाती है. इस सोच के लोग बड़ी खूबसूरती से एक ऐसी अराजक दुनिया का नक्शा खींचते हैं जहाँ अलग-अलग देश, बिलियर्ड्स की गेंदों की तरह, सिर्फ ताकत के नियमों के तहत आपस में टकराते हैं. यह मॉडल बड़ा साफ-सुथरा और भविष्य बताने वाला लगता है.
लेकिन यह सच को दिखाने से ज़्यादा छुपाता है, क्योंकि देश कोई बेजान गेंद नहीं हैं; वे पहचान, यादों, ख्वाहिशों, घमंड और पुराने ज़ख्मों के धधकते हुए अंगारे हैं. उनका बर्ताव सिर्फ नफ़े-नुकसान के तार्किक हिसाब से तय नहीं होता, बल्कि इतिहास के सायों और अपनों के साथ जुड़े रहने के उन जज्बातों से भी चलता है जो अक्सर अतार्किक होते हैं. भौतिकी जैसी अचूक भविष्यवाणियों की चाह रखने वाला यह विषय बार-बार इस बात से मात खा जाता है कि इंसान और समाज कभी बेजान चीज़ों की तरह बर्ताव नहीं करते. असली खिंचाव यहीं है.
राष्ट्रवाद इस मॉडल को क्यों हरा देता है
विज्ञान अपने सबसे अच्छे रूप में उन सच्चाइयों को ढूंढता है जो हर जगह और हर किसी के लिए एक हों. इसके उलट, राष्ट्रवाद अनोखी, न बटने वाली और पुरानी कहानियों (मिथकों) पर फलता-फूलता है. एक राष्ट्र, आखिरकार, ख्यालों में बसा हुआ एक कुनबा होता है, एक ऐसा सामाजिक ताना-बाना जिसकी ताकत इस बात में नहीं है कि वह विज्ञान की कसौटी पर कितना खरा है, बल्कि इसमें है कि वह लोगों को एक बड़े और साझे इतिहास की कहानी में पिरो सके.
इस तरह देखें तो यह एक तरह का ‘प्रति-विज्ञान’ है—इसलिए नहीं कि यह सच को नहीं मानता, बल्कि इसलिए कि यह आंकड़ों के ऊपर यादों को और नाप-तौल के ऊपर जज्बातों को रखता है. यह एक कड़वा सच सामने लाता है: विज्ञान इंसानी हालात को ठीक नहीं कर सकता क्योंकि इंसान की ज़िंदगी कोई तकनीकी खराबी नहीं है जिसे सुधारा जा सके. यह एक ऐसी उलझन है जिसे सिर्फ जिया जा सकता है, झेला जा सकता है और जिसके साथ हर दिन जूझना पड़ता है.
यही वजह है कि इस आज़ाद निज़ाम का दांव बार-बार हार रहा है. उन्होंने मान लिया था कि जैसे-जैसे लोग अमीर होंगे, पढ़े-लिखे होंगे और सलीके से जिएंगे, संकीर्ण जज्बात और जात-पात की भावनाएं खत्म हो जाएंगी. पर हुआ इसके ठीक उलटा है. अमेरिका में राष्ट्रवाद का आना, यूरोप में लोकलुभावन ताकतों का बढ़ना, या मॉस्को से बीजिंग तक तानाशाही का मजबूत होना—ये सब कोई अचानक आए भटकाव नहीं हैं जिन्हें बेहतर आंकड़ों या अच्छी नीतियों से रोका जा सकता था. ये इस बात का सबूत हैं कि इंसानी फितरत को नापने का वह पैमाना ही गलत था.
इस निज़ाम का भरोसा इससे भी कहीं गहरा था. यह यकीन कि विज्ञान की तरक्की लाज़मी तौर पर इंसान को एक बेहतर और समझदार जीव बना देगी, एक ऐसी धार्मिक कहानी की तरह है जिसमें खुदा के बिना ही उद्धार का वादा हो. इतिहास ऐसी सीधी कहानियों का मज़ाक उड़ाता है.
बीसवीं सदी इस विरोधाभास का जीता-जागता गवाह है. जिस अक्ल और विज्ञान ने हमें इंसान के बुनियादी वजूद को समझने की ताकत दी, उसी ने बड़ी सफ़ाई और सलीके से लाखों लोगों का कत्लेआम करने का रास्ता भी दिखाया. अंतरिक्ष की होड़, जो बड़ी-बड़ी ताकतों की कामयाबी का परचम थी, हमेशा परमाणु संहार के साए में रही. यह एक अजीब पागलपन था, जहाँ ज़िंदा रहने का इकलौता रास्ता यह था कि हम एक-दूसरे को पूरी तरह मिटा देने की ताकत रखें. परमाणु क्रांति ने जंगों को खत्म नहीं किया, बस उनके मायने बदल दिए—जीत की होड़ को वजूद बचाने के खौफ में तब्दील कर दिया. इस कहानी में तरक्की और तबाही दो अलग चीजें नहीं हैं. दोनों एक ही कारखाने से निकलती हैं.
इक्कीसवीं सदी की कसौटी
अब हम एक नई सदी में हैं, जहां तूफानों का एक नया दौर हमारे सामने है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक और साइबर जंग सिर्फ नए औज़ार नहीं हैं; ये ऐसी ताकतें हैं जो हमारे पुराने दायरों को तोड़ देती हैं. ये फौजी और आम नागरिक, सरकारी और निजी, इंसान और मशीन के बीच के फर्क को मिटा देती हैं.
कंप्यूटर चिप्स पर अमेरिका और चीन की जंग कोई पुरानी हथियारों की दौड़ नहीं है जिसे संधियों से रोका जा सके. यह तकनीक हर तरह से इस्तेमाल हो सकती है, इस पर किसी एक का कब्ज़ा नहीं है, और इसकी रफ्तार किसी भी कानून या संधि से कहीं तेज़ है. ये चुनौतियां साफ दिखाती हैं कि पुराने दौर में बने हमारे राजनीतिक और सामाजिक ढांचे इन नए दौर के खतरों के सामने कितने कमज़ोर हैं.
इन सबमें सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली चुनौती मौसम के बदलाव की है. यह इस सदी का सबसे बड़ा मज़ाक है: हमारे वजूद पर मंडरा रहा यह सबसे बड़ा खतरा उसी औद्योगिक सोच का नतीजा है जिसने इंसान को कुदरत की गुलामी से आज़ाद कराने का वादा किया था. इंसानी दखल का यह नया दौर सिर्फ ज़मीन का बदलना नहीं है, बल्कि इंसानी महत्वाकांक्षाओं के अनचाहे नतीजों की कहानी है. कुदरत पर जीत पाने की अंधी चाहत ने आखिरकार उस पूरे चक्र को ही हिला दिया है जिस पर हमारी ज़िंदगी टिकी है.
साफ कहें तो यह विज्ञान के तरीके की नाकामी नहीं है. यह उस कहानी की नाकामी है जिसने विज्ञान को असीमित तरक्की का जरिया माना था—वही कहानी जिसके भरोसे यह पूरी व्यवस्था चल रही थी. जो कंप्यूटर कोड आज दुनिया के व्यापार को आसान बनाता है, वही कल निगरानी तंत्र में बदलकर इंसानों को महज़ उपभोग के आंकड़ों में समेट सकता है.
विज्ञान की सीमाओं के साथ जीना
तो फिर, दुनिया के इस महानाटक में विज्ञान की सही जगह क्या है? इसे न तो मसीहा माना जा सकता है और न ही गुनहगार. यह वक्त और हालात से पैदा हुआ एक जरिया है. विज्ञान दुनिया को समझा तो सकता है, लेकिन यह उसका उद्धार या तारणहार नहीं बन सकता. इसके सच बदलते रहते हैं, और इसके नतीजे अनिश्चित हैं. वैश्विक राजनीति में इसकी भूमिका को समझने का मतलब है कि हम न तो इसके घमंड में चूर हों और न ही इससे पूरी तरह मुंह मोड़ें. हमें एक ऐसी समझ पैदा करनी होगी जो विज्ञान को जानकारी के साथ-साथ ताकत का एक केंद्र भी माने.
हकीकतपसंदों की यह बात अपनी जगह सही है कि दुनिया बेलगाम है, ताकत मायने रखती है, और बड़े-बड़े आदर्श अक्सर रणनीतिक ज़रूरतों के सामने टूट जाते हैं. लेकिन असल सबक यह है कि यह सोच भी महज़ एक कहानी ही है. यह एक ऐसा ढांचा है जो एक बेतरतीब दुनिया पर जबरन एक सलीका थोपने की कोशिश करता है. विज्ञान भी इसी कहानी का हिस्सा है. वह हमें सिर्फ वजहें नहीं बताता, बल्कि इस असीम और बेपरवाह ब्रह्मांड में खुद को ढूंढने का एक रास्ता भी देता है. यह एक बड़ी सेवा है, लेकिन यह कोई गारंटी नहीं है.
जिस निज़ाम का आज मातम मनाया जा रहा है, वह इसी गलतफहमी पर बना था कि अक्ल जब अपनी ऊंचाइयों पर होगी, तो हमें एक सही मंज़िल तक पहुंचा देगी. जैसे-जैसे इस सोच के पुराने पैरोकार यह मान रहे हैं कि वह मंज़िल कभी आई ही नहीं, तब सारा ज़ोर उस गलती को ढूंढने पर होगा जिसके कारण हम वहां नहीं पहुंच पाए. लेकिन सच तो यह है कि ऐसी कोई गलती हुई ही नहीं, क्योंकि वैसी कोई मंज़िल कभी थी ही नहीं.
सवाल कभी यह था ही नहीं कि क्या विज्ञान इंसान की ज़िंदगी की उलझनों को सुलझा सकता है. सवाल हमेशा से यह रहा है कि हम इस कड़वे सच के साथ जीना कैसे सीखें कि विज्ञान यह काम नहीं कर सकता. यही वह त्रासद समझ है जिसे हम बार-बार भूलने की कोशिश करते हैं. हमारी सबसे बड़ी कामयाबियां हमारी सबसे गहरी कमज़ोरियों से जुड़ी हुई हैं. हमारा काम लैब्स में उद्धार तलाशना नहीं है, बल्कि इस विरोधाभास का गवाह बनना है—उन नाज़ुक और परेशान करने वाले धागों को टटोलना है जो ज्ञान को सत्ता से, उम्मीद को मायूसी से, और तरक्की को उसके गहरे असंतोषों से जोड़ते हैं.
प्रणव शर्मा विज्ञान के इतिहासकार हैं, जो नई दिल्ली (भारत) और पारो (भूटान) में रहते हैं और लिखते हैं. विचार निजी हैं.
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