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Thursday, 5 November, 2026
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शिकस्त, ‘लेम-डक’, और खतरा: ट्रंप के अगले दो साल भारत और दुनिया के लिए बढ़ा सकते हैं चिंता

अपने आखिरी टर्म में एक लेम-डक प्रेसिडेंट के पास बहुत ज़्यादा एग्जीक्यूटिव पावर्स भी होती हैं, जिसमें ट्रीटी साइन करना, युद्ध शुरू करना या उनसे पीछे हटना शामिल है.

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यह बात पहले से ही सबको पता थी कि दुनिया भर में ट्रंप के चाहने वालों से ज्यादा उनके विरोधी हैं. अब उनकी पार्टी की मध्यावधि चुनावों (मिडटर्म चुनाव) में करारी हार से इसका सबूत भी मिल गया है कि अमेरिका में भी उनका समर्थन खत्म हो गया है. इसमें वे इलाके भी शामिल हैं, जहां दो साल पहले राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने बड़े अंतर से जीत हासिल की थी.

इस स्थिति का सबसे अच्छा वर्णन अभिनेता सलमान खान की उस बात से किया जा सकता है, जो उन्होंने 23 जुलाई को अनशन कर रहे सोनम वांगचुक से कही थी.

उन्होंने कहा था, “सोनम, इट्स डन ब्रो” यानी “सोनम, अब सब खत्म हो गया भाई”. तब से यह बात हमारी राजनीतिक बातचीत का हिस्सा बन गई है. विपक्षी नेता इसका इस्तेमाल करने लगे, सबसे पहले राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के लिए इसका इस्तेमाल किया.

क्या अब यही बात डॉनल्ड ट्रंप से भी कही जा सकती है? ‘डॉनल्ड, अब सब खत्म हो गया भाई…’ उनकी निगरानी में उनकी पार्टी को मिली हार को देखते हुए ऐसा कहा जा सकता है. उनकी पार्टी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, दोनों में बुरी तरह हार गई है. यह जीत का जश्न मनाने के लिए ट्रंप के पसंदीदा पुराने शब्दों में से एक ‘बिगली’ (बहुत बड़े अंतर से) का इस्तेमाल करते हुए कहा जा सकता है. लेकिन ऐसा कहने से पहले आपको रुककर दो बार सोचना चाहिए. दुनिया भर में उनके विरोधी मानना चाहेंगे कि उनका राजनीतिक सफर खत्म हो गया है. लेकिन अमेरिका की व्यवस्था अलग है.

अपने आखिरी टर्म में एक लेम-डक प्रेसिडेंट के पास बहुत ज़्यादा एग्जीक्यूटिव पावर्स भी होती हैं, जिसमें ट्रीटी साइन करना, युद्ध शुरू करना या उनसे पीछे हटना शामिल है. मैं इसकी पांच मिसालें दूंगा. इसके बाद कुछ बातें होंगी कि इस झटके का भारत पर खास तौर पर और दुनिया पर, खासकर पश्चिम एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर क्या असर पड़ सकता है.

इससे पहले, हमें यह समझना होगा कि अमेरिकी व्यवस्था में ‘लेम-डक प्रेसिडेंट’ (lame-duck President) का असल में क्या मतलब है. आज मैंने ‘फॉरेन अफेयर्स’ पत्रिका में डैनियल ड्रेजनर और एलिज़ाबेथ सॉन्डर्स का एक लेख पढ़ा, जिसमें इसकी सबसे सटीक परिभाषा दी गई है. इस लेख का शीर्षक है— ‘The Dangers of a Lame-Duck Trump: How Far Will He Go to Make Peace—and War?’ (लेम-डक ट्रम्प के खतरे: शांति—या युद्ध—लाने के लिए वे किस हद तक जा सकते हैं?)

उनका कहना है कि वे राष्ट्रपति को ‘लेम-डक’ तब मानते हैं, “जब उन्हें चुनावों — चाहे वे राष्ट्रपति चुनाव हों या मध्यावधि चुनाव — का सामना न करना पड़े.” अगर कोई राष्ट्रपति एक कार्यकाल के बाद दोबारा चुनाव हार जाता है, तो यह दौर सिर्फ कुछ महीनों का होता है. यह तब तक रहता है, जब तक नया राष्ट्रपति नहीं चुन लिया जाता और शपथ नहीं ले लेता. लेकिन ट्रंप जैसे दूसरे कार्यकाल वाले राष्ट्रपति के लिए यह दौर दो साल तक चल सकता है. ये दो साल काफी मुश्किल भरे हो सकते हैं.

इस बात के उदाहरण मौजूद हैं कि एक ‘लेम-डक’ राष्ट्रपति क्या कर सकता है. इतिहास बताता है कि ऐसे राष्ट्रपति आम तौर पर विदेश नीति पर ज्यादा ध्यान देते हैं, क्योंकि इस मामले में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट का दखल सबसे कम होता है. आइए, कुछ उदाहरण देखते हैं.

  • बिल क्लिंटन ने अपने दूसरे कार्यकाल के आखिर में इजरायल और फिलिस्तीन के बीच दो-राष्ट्र के समाधान पर बातचीत की थी और समझौता लगभग तय हो गया था.
  • 2014 के मध्यावधि चुनावों में हारने के बाद, बराक ओबामा – जो उस समय ट्रंप की तरह ही ‘डबल लेम-डक’ (यानी दोबारा चुनाव न लड़ने वाले) की स्थिति में थे – ने ईरान के साथ परमाणु समझौता किया और क्यूबा के साथ संबंधों को सामान्य बनाया.
  • 1992 में बिल क्लिंटन से राष्ट्रपति चुनाव हारने के बाद जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश ने सोमालिया में अकाल रोकने के लिए वहां सेना भेजी थी.
  •  उनके बेटे जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने अपने दूसरे कार्यकाल में 2007 के मध्यावधि चुनाव में करारी हार के बाद इराक में और ज्यादा सैनिक भेजे थे.

आखिर में इनमें से कोई भी कदम लंबे समय तक नहीं टिक पाया. फिलिस्तीन के साथ समझौता कभी पूरा नहीं हुआ. ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु समझौता रद्द कर दिया. इराक और सोमालिया में कभी स्थिरता नहीं आई. लेकिन अहम बात यह है कि ‘लेम-डक’ राष्ट्रपति के पास भी बहुत ज्यादा शक्तियां थीं. अगर ट्रंप चाहें, तो ईरान या हूती विद्रोहियों पर बड़ा हमला कर सकते हैं. यहां तक कि क्यूबा में भी सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं.

वह पुतिन के साथ कोई समझौता करने की कोशिश भी कर सकते हैं. इसमें शायद शी जिनपिंग भी मदद करें और तीनों देशों के नेताओं की बैठक में यूक्रेन और ताइवान को छोड़ने पर सहमति बन जाए. इस बात की पूरी संभावना है कि ट्रंप के बाद आने वाला राष्ट्रपति इन फैसलों को पलट देगा. मैं सिर्फ यह बताना चाहता हूं कि ट्रंप के पास अब भी कितनी ताकत होगी.

इस समय जिस क्षेत्र की नजर सबसे ज्यादा चिंता के साथ इन घटनाओं पर है, वह पश्चिम एशिया है. क्या ईरान युद्ध में अहम भूमिका निभाने के बाद मिली इस हार से ट्रंप की नीतियां ज्यादा दखल देने वाली होंगी या वह इस क्षेत्र से दूरी बनाएंगे? ट्रंप ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से बातचीत में माना कि ईरान युद्ध ने उनकी हार में अहम भूमिका निभाई, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस युद्ध पर कोई पछतावा नहीं है. ईरान के लोग उनकी हार से खुश तो होंगे, लेकिन वे यह भी सोच रहे होंगे कि इससे ट्रंप के रवैये में क्या बदलाव आएगा. इजरायल में नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने ईरान के लिए स्थिति को और जटिल बना दिया है.

सऊदी अरब, कतर, कुवैत और बहरीन इस स्थिति को लेकर काफी चिंतित होंगे. ट्रंप चाहे युद्ध फिर से शुरू करें या पश्चिम एशिया से यह कहते हुए पीछे हट जाएं कि उन्होंने जीत हासिल कर ली है, इन देशों को मुश्किल में छोड़ दिया जाएगा. उन्हें या तो खुद हालात संभालने होंगे या ईरान से अपने स्तर पर निपटना होगा. इजरायल के उलट, ये देश अपनी रक्षा भी नहीं कर सकते.

यूरोप की चिंताएं भी कुछ ऐसी ही होंगी. पुतिन को और हौसला मिल सकता है और वह यूक्रेन पर दबाव बढ़ा सकते हैं. उन्हें उम्मीद हो सकती है कि ट्रंप अमेरिका और रूस के बीच किसी बड़े समझौते के लिए पहल करेंगे, जिसमें शायद चीन भी शामिल हो. यूरोप में कुछ लोगों का कहना है कि अब उसे रणनीतिक स्वायत्तता की अपनी हालिया नीति पर फिर से विचार करना चाहिए. लेकिन ज्यादा समझदारी इसी में होगी कि वह अपनी मौजूदा राह पर चलता रहे.

भारत के लिहाज से मैं छह बातें रखना चाहूंगा.

पहली: अगर ट्रंप अब हार चुके हैं, निराश हैं और दूसरी चीजों में उलझे हुए हैं, तो हो सकता है कि उनका ध्यान हमारे क्षेत्र से हट जाए. यह भारत के लिए सबसे अच्छा होगा. ऐसे में भारत को अपनी अर्थव्यवस्था और उससे भी अहम, अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए दो साल मिल सकते हैं.

दूसरी: रणनीतिक मुद्दों की बात करें, तो कमजोर पड़ चुके ट्रंप अपनी विरासत के तौर पर कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करने के लिए चीन से नए सिरे से संपर्क बढ़ा सकते हैं. इससे भारत को नुकसान हो सकता है. इस पर करीबी नजर रखनी होगी.

तीसरी: क्या ट्रंप अपनी आखिरी बड़ी उपलब्धि के तौर पर भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद सुलझाने की कोशिश करेंगे, ताकि नोबेल पुरस्कार के लिए दावा कर सकें? इसकी संभावना कम लगती है. उनके लिए सूडान में ऐसा करना ज्यादा आसान हो सकता है, जहां दोनों बाहरी ताकतें, सऊदी अरब और यूएई, उनकी सहयोगी हैं. उनके बीच प्रतिस्पर्धा जरूर है, लेकिन वे भारत और पाकिस्तान की तरह एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं.

चौथी: अगर ट्रंप विदेश नीति पर बहुत ज्यादा ध्यान देने लगते हैं और ईरान पर हमला करके पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ाते हैं, तो इसका भारत पर चिंताजनक असर पड़ेगा. इस क्षेत्र पर करीबी नजर रखनी होगी.

पांचवीं: अमेरिका के साथ भारत के रक्षा संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग भी जारी रहेगा. भारत की कुछ प्रस्तावित खरीद, खासकर नौसेना के लिए पी-8आई विमानों की नई खेप का सौदा, तय योजना के मुताबिक आगे बढ़ेगा.

छठी: कांग्रेस और सीनेट, दोनों में इतनी बड़ी हार के बाद ट्रंप के एकतरफा तरीके से टैरिफ लगाने के फैसलों पर कुछ रोक लगेगी. इस लिहाज से भारत का व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने से बचना सही फैसला था. ट्रंप जानते हैं कि टैरिफ लगाने की उनकी जिद से महंगाई बढ़ी, क्योंकि आखिरकार इसका बोझ उनके अपने देश के उपभोक्ताओं को उठाना पड़ा. क्या इससे उन्हें अपनी गलती का एहसास होगा, यह कहना मुश्किल है. इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उन्हें 2029 में अपनी पार्टी के भविष्य की चिंता है. लेकिन टैरिफ लगाने की उनकी कार्यकारी शक्तियां अब सीमित हो जाएंगी. क्या कांग्रेस उन्हें भारत के लिए अहम एच-1बी वीजा पर अपने फैसले को पलटने या उसकी रफ्तार धीमी करने के लिए मजबूर कर पाएगी, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी. लेकिन टेक उद्योग के पास लॉबिंग करने की ताकत है और अब कैपिटल हिल में ट्रंप विरोधी सांसदों की संख्या बढ़ने से भी मदद मिलेगी.

और सातवीं बात. भारत को बातचीत के लिए कुछ और गुंजाइश मिलेगी और थोड़ी राहत भी. लेकिन ट्रंप का कमजोर पड़ना यह नहीं बताता कि अमेरिका अब भारत का ज्यादा दोस्ताना रुख अपनाएगा. अगर कुछ है, तो वह यह कि ट्रंप की अनिश्चितता अब और बड़ी चिंता बन जाएगी. रणनीतिक और आर्थिक, दोनों लिहाज से भारत के लिए स्थिति मिली-जुली है, हालांकि इसका पलड़ा थोड़ा सकारात्मक है. दुनिया अब अगले दो साल और ज्यादा अनिश्चितता के दौर में जाने वाली है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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