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Thursday, 5 November, 2026
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SIR पर सुप्रीम कोर्ट के कई सवाल: चुनाव आयोग से जवाब कम, मतदाताओं के दोबारा पंजीकरण पर असमंजस बरकरार

कोर्ट ने ECI के वोटर वेरिफिकेशन प्रोसेस में बदलाव की मांग की है, लेकिन अभी तक एक्सक्लूजन, Form 6 के ज़रिए नए रजिस्ट्रेशन और लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी कैटेगरी पर ज़रूरी कानूनी सवालों को सुलझाना बाकी है.

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नई दिल्ली: जिन मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हट गए हैं, उनके मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कई बार अपनी बात रखी है, लेकिन अब तक कुछ अहम सवालों के साफ जवाब नहीं मिले हैं. पिछले डेढ़ साल में अदालत ने कई बार चुनाव आयोग (ECI) से सवाल किए हैं, अंतरिम निर्देश दिए हैं और वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में प्रक्रिया से जुड़ी खामियों की ओर ध्यान दिलाया है. इसके बावजूद इस पूरी प्रक्रिया की कानूनी वैधता और जिन मतदाताओं के नाम हट गए हैं, वे दोबारा अपना नाम कैसे जुड़वा सकते हैं, जैसे बुनियादी सवाल अब भी अनसुलझे हैं.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जजों ने कई सख्त मौखिक टिप्पणियां की हैं, लेकिन ये टिप्पणियां बाध्यकारी नहीं होतीं. अदालत ने चुनाव आयोग को बार-बार प्रक्रिया आसान बनाने की सलाह दी है और प्रक्रिया से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए कई अंतरिम निर्देश भी दिए हैं. हालांकि, उसने अब तक कुछ प्रमुख कानूनी चुनौतियों पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है.

SIR से जुड़े कई सवाल अब भी खुले हैं. इनमें ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी का इस्तेमाल और पहले से वोटर लिस्ट में शामिल मतदाताओं से नए सिरे से फॉर्म 6 भरने की मांग भी शामिल है.

दिप्रिंट से बात करने वाले कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रक्रिया से जुड़ी दखल और इस पूरी कवायद की कानूनी वैधता पर फैसला सुनाने की उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी, दोनों अलग-अलग बातें हैं.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस. ओका का मानना है कि 27 मई को बिहार में SIR को सही ठहराने वाले फैसले में फॉर्म 6 के इस्तेमाल से जुड़े कुछ खास सवालों पर विचार नहीं किया गया था. वहीं, विधि की जस्टिस, एक्सेस एंड लोअरिंग डिलेज इन इंडिया (JALDI) टीम की प्रियमवदा शिवाजी का मानना है कि बार-बार सुनवाई और अंतरिम निर्देश देना अदालत की उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें वह विवादित मुद्दों पर फैसला देने से बचती है और इस दौरान जमीन पर घटनाएं मुकदमे से आगे निकल जाती हैं.

दिप्रिंट ने उन मौकों की पड़ताल की है, जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को औपचारिक निर्देश दिए और जब उसने सिर्फ मौखिक टिप्पणियां कीं. साथ ही, अदालत ने जिन अंतरिम राहत की मांगों को ठुकराया और जिन कानूनी सवालों पर अब भी फैसला होना बाकी है, उन पर भी नजर डाली है.

दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई SIR की सबसे ताजा प्रक्रिया दिल्ली में हुई है. पिछले हफ्ते दिल्ली की वोटर लिस्ट के चुनाव आयोग की ओर से कराए गए SIR के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले से रजिस्टर्ड मतदाताओं से फॉर्म 6 भरने की चुनाव आयोग की जिद को ‘संरचनात्मक विसंगति’ बताया.

अदालत ने कहा कि फॉर्म 6 में आवेदक को यह घोषणा करनी होती है कि उसका नाम पहले कभी वोटर लिस्ट में दर्ज नहीं हुआ है. ऐसे में पहले से मतदाता रहे लोगों को यह फॉर्म भरने के लिए मजबूर करना उन्हें मुश्किल स्थिति में डालता है. अपने मतदान का अधिकार वापस पाने के लिए उन्हें गलत घोषणा करनी पड़ सकती है, जिसके लिए उन पर आपराधिक कार्रवाई भी हो सकती है.

सबसे अहम बात यह है कि जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि अदालत ने ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी के इस्तेमाल की कानूनी वैधता पर अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है. उन्होंने आगाह किया कि मौखिक टिप्पणियों को अदालत का अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए. असल में, अदालत ने चुनाव आयोग के तरीके पर सवाल उठाए और उसमें सुधार करने को कहा, लेकिन इस मुद्दे की कानूनी वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया.

अदालत ने मौखिक तौर पर चुनाव आयोग को यह सलाह भी दी थी कि जिन मतदाताओं के नाम हट गए हैं या जो दूसरी जगह चले गए हैं, उन्हें फॉर्म 8 भरने की अनुमति दी जाए. फॉर्म 8 का इस्तेमाल पता बदलने या वोटर लिस्ट में सुधार के लिए किया जाता है. दूसरा विकल्प यह था कि उनसे पूरी तरह नए मतदाता के तौर पर रजिस्ट्रेशन कराने के बजाय उनके एन्यूमरेशन फॉर्म देर से भी जमा किए जाएं.

3 नवंबर 2026 को चुनाव आयोग ने एक नया स्पष्टीकरण जारी किया. इसमें दावा किया गया कि फॉर्म 6 भरने को तकनीकी तौर पर गलत घोषणा नहीं माना जाएगा और न ही इससे वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाया जाएगा.

4 नवंबर 2026 को वकील प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश के सामने तत्काल यह मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग फॉर्म 6 भरने पर जोर देकर सुप्रीम कोर्ट के मौखिक निर्देशों की अनदेखी कर रहा है. इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौखिक तौर पर कहा कि नागरिकों को ‘घबराने की जरूरत नहीं है’, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई कर रहा है.

बिहार

चुनाव आयोग की ओर से कराए गए SIR को पहली बार जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. कार्यकर्ताओं और याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि इस प्रक्रिया में दस्तावेजों की बहुत सख्त शर्तों और कम समयसीमा के कारण कमजोर समुदायों के बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से बाहर होने का खतरा है.

याचिकाओं में चुनाव आयोग के अधिकार और दस्तावेजों से जुड़ी शर्तों को भी चुनौती दी गई थी. याचिकाकर्ताओं ने आधार और राशन कार्ड जैसे आम पहचान पत्रों को शुरुआती दस्तावेजों की सूची में शामिल नहीं करने पर सवाल उठाए थे. उन्होंने चुनाव आयोग के उस अधिकार को भी चुनौती दी थी, जिसके तहत वह दशकों से इस्तेमाल हो रही वोटर लिस्ट को दरकिनार कर मतदाताओं का पूरा डेटा नए सिरे से जुटा रहा था.

जब एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और अन्य कार्यकर्ताओं ने जुलाई 2025 में पहली बार सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, तो उनकी मुख्य अंतरिम मांग थी कि नई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित होने से पहले SIR की प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाई जाए.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने के बजाय अंतिम फैसला आने तक के महीनों में कुछ अंतरिम सुधारात्मक कदम उठाए. अदालत ने दस्तावेजों से जुड़ी चुनाव आयोग की शर्तों पर सवाल उठाए और आयोग से सत्यापन के लिए तुरंत ज्यादा विकल्प देने को कहा.

अदालत ने चुनाव आयोग से आधार, राशन कार्ड और EPIC (वोटर आईडी) जैसे आम पहचान पत्र स्वीकार करने को भी कहा, ताकि मामले की सुनवाई के दौरान कमजोर वर्गों के मतदाता अपने मतदान के अधिकार से वंचित न हों. हालांकि, उस समय SIR की कानूनी वैधता पर फैसला नहीं दिया गया. 29 जनवरी 2026 को 29 दिनों तक चली सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया.

अदालत ने प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. इसलिए चुनाव आयोग ने बिना किसी रुकावट के SIR की प्रक्रिया पूरी की. इसके बाद बिहार विधानसभा चुनाव नई तैयार की गई वोटर लिस्ट के आधार पर हुए, जिसमें करीब 65 लाख नाम हटा दिए गए थे. उस समय तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित ही था.

करीब एक साल बाद, 27 मई 2026 को मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने सर्वसम्मति से एक अहम फैसला सुनाया. इसमें बिहार SIR को सही ठहराया गया. अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया मनमानी नहीं थी और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के संवैधानिक उद्देश्य को पूरा करती है.

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में SIR को चुनौती देना चुनाव आयोग की देशव्यापी प्रक्रिया का अब तक का सबसे कानूनी रूप से विवादित और कामकाज के लिहाज से जटिल चरण रहा है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई थीं. इनमें मोस्तारी बानू बनाम भारत निर्वाचन आयोग का मामला भी शामिल था. याचिकाकर्ताओं ने मतदाताओं को सत्यापन के लिए अलग-अलग श्रेणियों में बांटने के तरीके और दस्तावेजों से जुड़ी शर्तों पर सवाल उठाए थे.

उन्होंने विधानसभा चुनाव से पहले SIR पर रोक लगाने सहित कई अंतरिम राहत की मांग भी की थी.

उनकी मुख्य आपत्ति ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ टैग को लेकर थी. इसके तहत चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने शुरुआत में 1.36 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के आंकड़ों को ‘वैज्ञानिक रूप से असंभव’ या असामान्य मानकर चिन्हित किया था. इसमें ऐसे रिकॉर्ड शामिल थे, जिनमें एक ही माता-पिता के नाम से 200 से ज्यादा बच्चे जुड़े हुए थे, माता-पिता और बच्चों की उम्र में 50 साल का अंतर था या स्थानीय बोलियों के कारण नामों की स्पेलिंग और भाषा में अंतर था.

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते स्पष्ट किया कि उसने 2026 के विधानसभा चुनाव कराने में मदद के लिए ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ फिल्टर को सिर्फ एक अस्थायी ‘अंतरिम व्यवस्था’ के तौर पर मंजूरी दी थी. अदालत ने इस श्रेणी की कानूनी वैधता पर अभी औपचारिक फैसला नहीं दिया है.

मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस जे. बागची की दो जजों वाली पीठ ने इससे पहले चुनाव आयोग को कई अंतरिम निर्देश दिए थे. इनमें ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ सूची में शामिल मतदाताओं के नाम ग्राम पंचायत भवनों, ब्लॉक कार्यालयों और वार्ड कार्यालयों में प्रदर्शित करना शामिल था. प्रभावित मतदाताओं को अधिकृत प्रतिनिधियों, जिनमें बूथ लेवल एजेंट भी शामिल हैं, के जरिए दस्तावेज और आपत्तियां जमा करने की अनुमति दी गई थी. इसके अलावा, आधार जैसे अतिरिक्त दस्तावेज स्वीकार करने और तय समयसीमा के बाद भी आपत्तियां दर्ज कराने की अनुमति दी गई थी.

अदालत ने राज्य सरकार को चुनाव आयोग की मदद के लिए पर्याप्त कर्मचारियों की व्यवस्था करने का निर्देश भी दिया था. इसके साथ ही जिला कलेक्टरों और पुलिस अधिकारियों को इस प्रक्रिया में सहयोग करने को कहा था.

इन निर्देशों का मकसद सत्यापन प्रक्रिया में मतदाताओं को आ रही व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करना था. इनका मतलब यह नहीं था कि अदालत ने लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी व्यवस्था की कानूनी वैधता पर अंतिम फैसला दे दिया है.

इसी साल मार्च में अदालत ने पूर्व या मौजूदा हाईकोर्ट जजों की एक अपीलीय व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया था. कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इस व्यवस्था में मदद करने और चुनाव आयोग को इसके लिए जरूरी अधिसूचना जारी करने को कहा गया था. अन्य निर्देशों में चुनाव आयोग के पोर्टल की तकनीकी समस्याओं को दूर करना और न्यायिक अधिकारियों को जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना शामिल था.

मार्च में ही एक अन्य आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक विवादों में और दखल देने से इनकार कर दिया था. अदालत ने पक्षों से कलकत्ता हाईकोर्ट जाने को कहा था.

अप्रैल में मालदा में सत्यापन प्रक्रिया में लगे न्यायिक अधिकारियों को कथित तौर पर घेरने की घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया था. हालांकि, यह अदालत की दखल का एक अलग पहलू था. इस मामले में अदालत ने स्वत: संज्ञान लेते हुए केस दर्ज किया था, ताकि मतदाताओं के दावों की जांच कर रही न्यायिक व्यवस्था अपना काम कर सके.

पश्चिम बंगाल में SIR को चुनौती देने वाला व्यापक कानूनी मामला, जिसमें लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के मानदंडों की वैधता भी शामिल है, अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. इसलिए यह मामला अभी विचाराधीन है.

महाराष्ट्र

26 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अरुण आनंदगिरी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की. इसमें महाराष्ट्र में SIR की प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी. मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया, लेकिन इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. याचिकाकर्ता ने यही मांग की थी.

याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य के 9.79 करोड़ मतदाताओं में से करीब 3 करोड़ (लगभग एक तिहाई) के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं.

पीठ ने अंतिम वोटर लिस्ट के प्रकाशन पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया. चुनाव आयोग ने इसके लिए 6 नवंबर की तारीख तय की थी. हालांकि, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने दोबारा रजिस्ट्रेशन को लेकर लोगों की आशंकाओं पर मौखिक तौर पर कहा कि “किसी के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जाएगा”, अगर वह वोटर लिस्ट में अपना नाम दोबारा जुड़वाने की कोशिश करता है.

इस मामले में अगली सुनवाई 5 नवंबर को होनी है.

‘न्यायिक टालमटोल’

दिप्रिंट से बात करते हुए विधि की JALDI टीम के साथ काम करने वाली प्रियमवदा शिवाजी ने कहा कि SIR से जुड़ी चुनौतियों पर सुप्रीम कोर्ट के रुख को न्यायिक देरी और विवादित संवैधानिक सवालों पर फैसला देने से हिचकिचाने की व्यापक प्रवृत्ति के संदर्भ में समझना चाहिए. वह इसे ‘ज्यूडिशियल इवेजन’ यानी ‘न्यायिक टालमटोल’ कहती हैं. यह शब्द संवैधानिक विशेषज्ञ और वकील गौतम भाटिया ने दिया है. इसका मतलब है कि अदालत किसी मुद्दे पर फैसला देने से बचती है और सुनवाई को इतना लंबा खींच देती है कि जमीन पर घटनाएं आगे निकल जाती हैं और फैसले का व्यावहारिक महत्व कम हो जाता है.

उन्होंने चुनावी बॉन्ड मामले, महाराष्ट्र में राजनीतिक दलों के विभाजन से जुड़े मामलों और अनुच्छेद 370 को खत्म करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका का उदाहरण दिया. उनका कहना है कि इन सभी मामलों में न्यायिक दखल तब आया, जब कई अहम घटनाएं पहले ही हो चुकी थीं. इससे अदालत के फैसले का व्यावहारिक असर सीमित हो गया.

शिवाजी का कहना है कि SIR से जुड़ा मामला न्यायिक टालमटोल का थोड़ा अलग उदाहरण है. दूसरे मामलों में जहां सालों तक सुनवाई नहीं होती, वहीं SIR से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में बार-बार सुनवाई हुई है. लेकिन क्या सुनवाई की इस बार-बार होने वाली प्रक्रिया से वास्तव में कोई सार्थक न्यायिक जांच हुई है, उन्होंने यह सवाल उठाया.

शिवाजी ने कहा, “आदर्श रूप से बिहार SIR के फैसले में अदालत को खुद SIR प्रक्रिया की वैधता पर फैसला देना चाहिए था. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और इसके बजाय पूरी प्रक्रिया के दौरान सिर्फ प्रशासनिक निर्देशों की एक श्रृंखला जारी की. ऐसा लगता है कि अदालत ने पहले ही मान लिया था कि यह प्रक्रिया वैध है. इसके बाद उसने इस मामले में फैसला सुनाने वाली अदालत की भूमिका निभाने के बजाय सिर्फ निगरानी करने की भूमिका अपना ली.”

उन्होंने कहा कि यह तरीका सिर्फ SIR और चुनाव आयोग के मामले तक सीमित नहीं है.

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि अगर आप अदालत के हाल के दूसरे निर्देशों और आदेशों को देखें, तो वह आम तौर पर मौजूदा स्थिति को बनाए रखने के पक्ष में दिखती है. वह ठोस कानूनी फैसले लेने से बच रही है और धीरे-धीरे उसकी भूमिका नियामक जैसी होती जा रही है. यही वजह है कि चुनाव आयोग के सामने आने वाले पक्षों को इस समय इतने सारे सुझाव और निर्देश दिए जा रहे हैं.”

चुनाव आयोग के बारे में बात करते हुए शिवाजी ने कहा कि आयोग एक स्वतंत्र संस्था जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट उसकी आलोचना या उसके कामकाज को नियंत्रित नहीं कर सकता. संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट का अधिकार सर्वोपरि है और उसे अपनी समझ के मुताबिक कोई भी जरूरी निर्देश देने का अधिकार होना चाहिए.

उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संस्था है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट चुनाव से जुड़े खास फैसलों या नतीजों में आम तौर पर दखल नहीं देता. लेकिन संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत शीर्ष अदालत को न्याय के हित में किसी भी मामले की जांच करने और अपनी समझ के मुताबिक निर्देश देने का अधिकार है.

उन्होंने सवाल उठाया कि SIR के मामलों में अदालत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने से हिचकिचाती क्यों दिख रही है. उनके मुताबिक, यह ‘न्यायिक टालमटोल’ की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है.

दिप्रिंट से बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज अभय एस. ओका ने कहा कि 27 मई 2026 को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत वोटर लिस्ट में बदलाव करने के चुनाव आयोग के व्यापक अधिकार के सवाल को सुलझा दिया था. इस फैसले में बिहार SIR को सही ठहराया गया था.

हालांकि, उन्होंने कहा कि इस फैसले में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर रह गए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 के इस्तेमाल से जुड़े दो सवालों पर खास तौर पर विचार नहीं किया गया था.

ओका ने बताया कि बिहार मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला चुनाव आयोग के 24 जून 2025 के आदेश से जुड़ा था. उन्होंने कहा कि दूसरे राज्यों में बाद में कराए गए SIR भी बिहार में तय किए गए ढांचे के तहत ही हो रहे हैं, हालांकि उनमें कुछ बदलाव किए गए हैं.

पूर्व जज ने इस कानूनी विवाद को समझने के लिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21 के दो प्रावधानों के बीच अंतर को अहम बताया.

धारा 21(2) के तहत वोटर लिस्ट में तय तरीके से बदलाव किया जाता है. यह तरीका निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत तय है. इसके विपरीत, धारा 21(3) चुनाव आयोग को किसी भी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से में अपनी जरूरत के मुताबिक विशेष पुनरीक्षण कराने का अधिकार देती है.

ओका के मुताबिक, यह अंतर इसलिए अहम है क्योंकि दूसरे प्रावधान के तहत चुनाव आयोग को प्रक्रिया तय करने का ज्यादा अधिकार मिलता है.

उन्होंने कहा, “धारा 21 में कहीं भी इंटेंसिव रिवीजन शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है. इसमें सिर्फ रिवीजन यानी पुनरीक्षण कहा गया है.” उन्होंने बताया कि ‘इंटेंसिव रिवीजन’ शब्द 1960 के नियमों के नियम 25 में आता है.

ओका ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के सामने एक दलील यह भी दी गई थी कि धारा 21(3) का इस्तेमाल सभी निर्वाचन क्षेत्रों में विशेष पुनरीक्षण कराने के लिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि धारा 21(2) के तहत आम चुनाव से पहले सभी निर्वाचन क्षेत्रों की वोटर लिस्ट में बदलाव का प्रावधान पहले से मौजूद है. उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई के फैसले में इस दलील को खारिज कर दिया था.

ओका ने आगे कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में धारा 21(3) के तहत SIR कराया जा सकता है, तो चुनाव आयोग की अपनाई गई प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उसके तहत बनाए गए 1960 के नियमों के खिलाफ नहीं हो सकती.

उन्होंने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से उन मतदाताओं के नाम हटाए जाने पर भी अदालत की टिप्पणी का जिक्र किया, जिन्होंने एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं किए थे. फैसले में कहा गया था कि ड्राफ्ट लिस्ट में नाम शामिल न होना अस्थायी है और इसका मतलब नाम को अंतिम तौर पर हटाना नहीं है. अदालत ने कहा था कि इसके बाद दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया में नोटिस, सुनवाई और अपील का प्रावधान है. इससे नियम 21A के तहत मिलने वाली सुरक्षा बनी रहती है.

हालांकि, ओका का तर्क है कि फैसले में इस सवाल पर खास तौर पर विचार नहीं किया गया कि अगर कोई पहले से रजिस्टर्ड मतदाता एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं करता और उसका नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल नहीं होता, तो उसके साथ आगे क्या होगा. उन्होंने कहा कि SIR के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, ऐसे मतदाता को फॉर्म 6 के जरिए आवेदन करना पड़ता है, जबकि आम तौर पर इस फॉर्म का इस्तेमाल नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए किया जाता है.

उन्होंने कहा, “पहले के फैसले में यह तय नहीं किया गया है कि आप किसी ऐसे व्यक्ति को फॉर्म 6 भरने के लिए कैसे मजबूर कर सकते हैं, जिसका नाम पहले से वोटर लिस्ट में मौजूद है.”

उन्होंने तर्क दिया कि पहले से वोटर लिस्ट में शामिल किसी मतदाता से नए मतदाता के तौर पर आवेदन करने की मांग का मुद्दा बिहार मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने खास तौर पर नहीं उठाया गया था. इसलिए उनके मुताबिक, बाद के मामलों में इस सवाल पर विचार किया जा सकता है.

ओका के मुताबिक, दूसरा सवाल फॉर्म 6 में चुनाव आयोग की ओर से कुछ घोषणाएं जोड़ने से जुड़ा है. चूंकि फॉर्म 6 निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत तय किया गया है, इसलिए उनका तर्क है कि आयोग अपने दिशा-निर्देशों के जरिए इसमें नई शर्तें जोड़कर इस कानूनी फॉर्म में बदलाव नहीं कर सकता.

ओका ने कहा कि जस्टिस वी. मोहना को शामिल करने वाली तीन जजों की बड़ी पीठ, जो बाद के SIR मामलों की सुनवाई कर रही है, पहले के फैसले पर फिर से विचार कर सकती है. हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि 27 मई का फैसला तब तक बाध्यकारी रहेगा, जब तक कानून के मुताबिक उसमें बदलाव नहीं किया जाता या उसे पलट नहीं दिया जाता.

जब उनसे पूछा गया कि क्या बिना अंतिम फैसला सुनाए बार-बार अंतरिम निर्देश और मौखिक टिप्पणियां करने से मतदाता असमंजस में रह सकते हैं, तो ओका ने कहा कि बिहार मामले में फैसला आने से पहले एक आसान अंतरिम सुरक्षा दी जा सकती थी.

उन्होंने कहा, “दरअसल, पश्चिम बंगाल में एक आसान आदेश दिया जा सकता था कि सिर्फ इसलिए कि किसी ने एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं किया है, उसका नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से न हटाया जाए.”

उन्होंने सुझाव दिया कि जिन मतदाताओं ने एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं किए हैं, उन्हें इसके बजाय नियम 21A के तहत नोटिस दिया जा सकता था. तय प्रक्रिया पूरी होने तक उनके नाम वोटर लिस्ट में बनाए रखे जा सकते थे.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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