21 अक्टूबर को इस मौसम में पहली बार दिल्ली की हवा ‘खराब’ श्रेणी में पहुंच गई. वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) बढ़कर 245 हो गया, जो पिछले करीब 100 दिनों में सबसे ज्यादा था. इसके बाद ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) का पहला चरण लागू कर दिया गया. गाजीपुर लैंडफिल से थोड़ी दूरी पर स्थित पटपड़गंज उन इलाकों में शामिल था, जहां हवा की गुणवत्ता ‘बेहद खराब’ दर्ज की गई. हर सर्दी की तरह इस बार भी वायु प्रदूषण पर हमारी बहस दिवाली और पराली के आसपास घूम रही है. इसके बाद वाहनों और धूल को जिम्मेदार ठहराया जाता है. लेकिन लैंडफिल को इस बहस से बाहर रखा जाता है, जबकि वे चुपचाप बच्चों की सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं. आखिर उन्हें इस तरह नजरअंदाज क्यों किया जाता है?
किसी शहर में कचरे का प्रबंधन कैसे होता है और वहां रहने वाले बच्चों की सेहत पर इसका क्या असर पड़ता है, इन दोनों के बीच का संबंध आसानी से नजर नहीं आता. लेकिन दिल्ली के लैंडफिल से मिले सबूत इस संबंध को सामने लाते हैं.
2019 में, बायोमाइनिंग शुरू होने से पहले, दिल्ली के तीन सबसे पुराने लैंडफिल – गाजीपुर, भलस्वा और ओखला – 55 से 65 मीटर ऊंचे थे और इनमें अनुमानित 2.8 करोड़ टन पुराना कचरा जमा था. नए नरेला-बवाना लैंडफिल के साथ मिलकर ये सभी जगहें अब भी आग पकड़ती हैं, धुआं, मीथेन और जहरीला रिसाव छोड़ती हैं और मक्खियों को आकर्षित करती हैं. इन लैंडफिल से कुछ किलोमीटर के दायरे में लाखों बच्चे रहते हैं.
आंकड़े क्या बताते हैं
पहले इंडिया फाउंडेशन में हमने पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के भौगोलिक स्थान से जुड़े आंकड़ों को दिल्ली के इन चार लैंडफिल से जोड़ा. इसमें दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के शहरी इलाकों के 518 सर्वे क्लस्टर शामिल थे. हमने लैंडफिल से 5 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले बच्चों की तुलना 15 से 30 किलोमीटर दूर रहने वाले ऐसे ही शहरी बच्चों से की. इस दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति, जाति, धर्म, मां की शिक्षा, बच्चे का जन्म क्रम और खाना पकाने में इस्तेमाल होने वाले ईंधन जैसे कारकों को भी ध्यान में रखा गया.
लैंडफिल के 5 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले पांच साल से कम उम्र के बच्चों में से 11.9 फीसदी को पिछले दो हफ्तों में दस्त हुए थे. वहीं, लैंडफिल से दूर रहने वाले बच्चों में यह आंकड़ा 5.3 फीसदी था. दूसरे कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी यह अंतर 4.2 प्रतिशत अंक रहा. पाइप से मिलने वाले पानी, शौचालय और जल निकासी की व्यवस्था को ध्यान में रखने के बाद भी यह अंतर कम नहीं हुआ.
बच्चों में खून की कमी यानी एनीमिया की स्थिति भी ज्यादा खराब है. जिन बच्चों की जांच की गई, उनमें से लैंडफिल से 15 से 30 किलोमीटर दूर रहने वाले 63.4 फीसदी बच्चे एनीमिया से पीड़ित थे. सामाजिक-आर्थिक स्थिति और परिवार व बच्चे से जुड़ी दूसरी विशेषताओं को ध्यान में रखने के बाद भी, लैंडफिल से 5 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले बच्चों में एनीमिया होने की आशंका इस समूह के बच्चों से 10.6 प्रतिशत अंक ज्यादा थी.

धुआं कैसे खून को प्रभावित करता है
लैंडफिल में आग इसलिए लगती है, क्योंकि वहां खुद ही आग जलने के लिए ईंधन तैयार होता रहता है. कचरे के सड़ने से मीथेन गैस निकलती है और खुले कचरे में हवा पहुंचने से आग लग जाती है. यह आग कई दिनों तक जमीन के नीचे सुलगती रह सकती है. मिले-जुले कचरे को जलाने से बारीक कण (PM2.5), कार्बन मोनोऑक्साइड और डाइऑक्सिन निकलते हैं. मार्च 2022 में जब गाजीपुर लैंडफिल में आग लगी थी, तब आसपास के निगरानी केंद्रों पर पहले ही दिन PM2.5 का स्तर 20 से 60 फीसदी तक बढ़ गया था.
आमतौर पर हम एनीमिया को पोषण की समस्या मानते हैं. लेकिन बारीक प्रदूषित कण शरीर में हल्के स्तर की सूजन भी पैदा करते हैं. सूजन के कारण शरीर में कुछ संकेत पैदा होते हैं, जो लिवर को हेप्सिडिन नाम का हार्मोन ज्यादा बनाने के लिए प्रेरित करते हैं. यह हार्मोन शरीर में आयरन यानी लौह तत्व को नियंत्रित करता है. हेप्सिडिन का स्तर बढ़ने पर आयरन शरीर में ही बंद होकर रह जाता है और खाने से उसका अवशोषण भी कम हो जाता है. इस वजह से शरीर में मौजूद आयरन का इस्तेमाल लाल रक्त कोशिकाएं बनाने के लिए नहीं हो पाता. IIT दिल्ली और हार्वर्ड के शोधकर्ताओं के 2021 के एक अध्ययन में पाया गया कि बच्चे के PM2.5 के संपर्क में आने के स्तर में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी के साथ हीमोग्लोबिन में 0.14 ग्राम प्रति डेसीलीटर की कमी और एनीमिया होने की आशंका में 9 फीसदी की बढ़ोतरी जुड़ी थी.
हमारे निष्कर्ष इस संभावना से मेल खाते हैं, हालांकि वे यह साबित नहीं करते कि लैंडफिल का धुआं एनीमिया का कारण बनता है. दस्त के मामलों में ज्यादा बढ़ोतरी गरीब परिवारों और गाजीपुर के आसपास के इलाकों में देखी गई. यह मक्खियों, दूषित खाने या पानी और साफ-सफाई की कमी जैसे संभावित कारणों की ओर इशारा करता है. एनीमिया के मामले अलग हैं. लड़कियों में इसका अंतर 13.1 प्रतिशत अंक था, जबकि लड़कों में 5.4 प्रतिशत अंक. सबसे अमीर परिवारों में भी यह अंतर 10.9 प्रतिशत अंक था. कोई परिवार साफ पानी और बेहतर खाना खरीद सकता है, लेकिन अपने इलाके के लिए साफ हवा नहीं खरीद सकता.
हमने आंकड़ों के आधार पर यह भी जांच की कि क्या दिल्ली में किसी भी मनमानी जगह को चुनने पर इसी तरह के नतीजे मिल सकते हैं. हमने सांख्यिकीय रूप से यह भी जांच की कि क्या दिल्ली में किसी भी स्थान को चुनने पर इसी तरह के नतीजे सामने आ सकते हैं. इसके लिए, हर बार दिल्ली में लैंडफिल के चार काल्पनिक स्थानों का यादृच्छिक चयन (random selection) किया और इस विश्लेषण को 500 बार दोहराया. इन 500 अभ्यासों में से केवल 7 फीसदी मामलों में एनीमिया और लैंडफिल के बीच संबंध का अनुमान वास्तविक लैंडफिल के आसपास पाए गए संबंध के बराबर या उससे अधिक था और उसकी दिशा भी समान थी. दस्त के मामले में यह आंकड़ा 20 फीसदी था.
ये निष्कर्ष एक सर्वेक्षण से मिले संबंधों को दिखाते हैं, किसी कारण को साबित नहीं करते. हो सकता है कि गरीब परिवार सस्ती जमीन की वजह से इन इलाकों में रहते हों और लैंडफिल के आसपास उद्योग तथा हाईवे भी हों. लेकिन कार्रवाई करने के लिए नीति बनाने वालों को किसी समस्या के कारण का बिल्कुल सटीक अनुमान मिलने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है. ये निष्कर्ष उन इलाकों की पहचान करते हैं, जहां बच्चों की सेहत पर ध्यान देने की जरूरत है और बेहतर निगरानी व बुनियादी जन स्वास्थ्य सेवाओं से फर्क पड़ सकता है.
दिल्ली को क्या करना चाहिए
कचरे के इन ऊंचे ढेरों को हटाने में कई साल लगेंगे. दिल्ली नगर निगम ने इस दिशा में काफी प्रगति की है. बायोमाइनिंग के जरिए भलस्वा, ओखला और गाजीपुर में करीब 100 एकड़ जमीन को कचरे से मुक्त कराया गया है. निगम का ताजा लक्ष्य दिसंबर 2026 तक ओखला, फरवरी 2027 तक भलस्वा और दिसंबर 2027 तक गाजीपुर के कचरे के ढेर को पूरी तरह समतल करना है. हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि यह बच्चों की सेहत से जुड़ा कार्यक्रम भी है. आग लगने की हर घटना को रोकने और कचरे से मुक्त होने वाले हर एकड़ जमीन का मतलब आसपास रहने वाले परिवारों के लिए साफ हवा और कम मक्खियां होना चाहिए.
पहला, इन जगहों पर आग रोकने के मौजूदा प्रयासों को और मजबूत किया जाए. रोजाना कचरे को मिट्टी से ढकना, उसे दबाकर रखना, मीथेन गैस को इकट्ठा करना और आग लगने की आशंका वाले गर्म स्थानों की पहचान के लिए थर्मल स्कैनिंग करना, आग लगने से पहले ही उसे रोक सकता है. आग लगने की हर रोकी गई घटना का मतलब है कि किसी बच्चे को उस धुएं में सांस नहीं लेनी पड़ेगी.
दूसरा, हर लैंडफिल के किनारे हवा की गुणवत्ता मापने वाले निगरानी केंद्र लगाए जाएं. आग लगने के दौरान आसपास के स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों को अलर्ट किया जाए. साथ ही, ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान के तहत लैंडफिल में लगने वाली आग को स्थानीय प्रदूषण स्रोत के रूप में मान्यता दी जाए.
तीसरा, इन जगहों के आसपास रहने वाले बच्चों, खासकर लड़कियों की एनीमिया के लिए जांच की जाए. इसके बाद इलाज के दौरान सिर्फ आयरन की कमी पर ही ध्यान न दिया जाए, बल्कि दूसरे कारणों को भी देखा जाए. सूजन की वजह से होने वाले एनीमिया को सिर्फ आयरन की गोलियों से ठीक नहीं किया जा सकता.
चौथा, इन इलाकों को साफ-सफाई और मक्खियों पर नियंत्रण के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्र बनाया जाए. यह भी सुनिश्चित किया जाए कि दस्त से पीड़ित हर बच्चे को ORS और जिंक उपलब्ध हो.
दिल्ली में कचरे के पहाड़ों और हर सर्दी में हवा की गुणवत्ता को लेकर बहस होती है. लेकिन इन लैंडफिल के पास बड़े हो रहे बच्चों के लिए ये दोनों एक ही रोजमर्रा की हकीकत हैं. इन दोनों बहसों के केंद्र में उनकी सेहत होनी चाहिए.
सिला मिश्रा एक इकोनॉमिस्ट हैं और पायल सेठ नई दिल्ली में पहले इंडिया फाउंडेशन में चीफ रिसर्च ऑफिसर हैं. विचार निजी हैं.
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