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Wednesday, 4 November, 2026
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वायु प्रदूषण का दिल्ली मॉडल गोवा तक पहुंच गया है. एयर क्वालिटी के लिए कोई जिम्मेदार नहीं

पिछले दिसंबर में पणजी का औसत PM2.5 लेवल 88 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर था, जो WHO की लिमिट से 18 गुना ज़्यादा था.

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दिल्ली में सर्दियों के आने की पहचान कभी सप्तपर्णी के फूलों से होती थी. एल्स्टोनिया स्कॉलरिस यानी इंडियन डेविल ट्री की तेज़ खुशबू के बारे में कहा जाता था कि यह किसी को पागल कर सकती है, लेकिन रात की हवा में हल्की ठंडक, गर्मी और मानसून के पूरी तरह बीत जाने के साथ यह खुशबू दिल्ली वालों के लिए हमेशा खुशी का संकेत होती थी. अब इस मीठी खुशबू से एक अलग तरह की बेचैनी होती है: अगर सप्तपर्णी खिल गई है, तो क्या जहरीली हवा का मौसम भी आने वाला है?

हर नवंबर दिल्ली के लिए एक नई शोक कहानी लिखी जाती है. आसमान उदास धूसर (ग्रे) रंग का हो जाता है, जबकि टीवी स्क्रीन पर एक्यूआई का आंकड़ा तेज़ नारंगी से गहरे लाल रंग में पहुंच जाता है. हम पीएम2.5 और पीएम10 के बीच के अंतर को समझाने वाले मुश्किल लेख ऐसे पढ़ते हैं, जैसे ‘द ग्रेट इंडियन कपिल शो’ के बीच में कोई रील देख रहे हों. अपने सांस लेने के अधिकार के लिए लड़ रहे नागरिकों का सामना पटाखे चलाने के अपने अधिकार के लिए लड़ रहे नागरिकों से होता है. जब कोई अखबार धुंध में ढके इंडिया गेट की तस्वीर पहले पन्ने पर छाप देता है—दिल्ली में वायु प्रदूषण का नज़ारा जितना नाटकीय होता है, उतना कहीं और नहीं—तो देश के बाकी हिस्से राजधानी को अपनी आंखों के सामने दम घुटते हुए देखने के लिए तैयार हो जाते हैं.

लेकिन वायु प्रदूषण अब सिर्फ दिल्ली की समस्या नहीं है. यह देश के छोटे शहरों में भी फैल गया है. पिछले साल दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद का फैला हुआ शहर लोनी था. यहां सालाना पीएम2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ की सीमा से 22 गुना ज्यादा था और भारत की ज्यादा ढीली सीमा से तीन गुना ज्यादा था. उससे एक साल पहले असम-मेघालय सीमा पर स्थित औद्योगिक शहर बिरनीहाट दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर था. यहां सीमेंट कारखाने और डिस्टिलरी हैं.

कुछ साल पहले गोवा दिल्ली के “प्रदूषण शरणार्थी” के लिए सुरक्षित जगह बन गया था. महामारी के बाद के वर्षों में भी राज्य साफ हवा की तलाश में आने वाले पेशेवरों और परिवारों को जगह देता रहा है. उन्होंने हिसाब लगाया कि धान के खेतों के बीच एक घर लेना, जीवन भर अस्पताल में भर्ती रहने से शायद सस्ता होगा.

लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में गोवा के कुछ हिस्सों में एक्यूआई बढ़कर 190 तक पहुंच गया. इससे राज्य “अस्वास्थ्यकर” श्रेणी में आ गया. पिछले दिसंबर में पणजी में औसत पीएम2.5 स्तर 88 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जो डब्ल्यूएचओ की सीमा से 18 गुना ज्यादा था. वह भी ऐसे शहर में जिसे मांडवी नदी और अरब सागर ने चारों तरफ से घेरा हुआ है. राज्य की राजधानी से दूर पोर्वोरिम में भी इसी दौरान सांस से जुड़ी बीमारियों के मामले बढ़े. उस समय वहां एक फ्लाई ओवर बनाया जा रहा था.

समुद्र के किनारे बसा शहर भारत-गंगा के मैदान के शहरों की तरह सांस लेने में मुश्किल वाली स्थिति में कैसे पहुंच गया?

निजी वाहनों का बढ़ना

इस सवाल के कुछ जवाब पिछले हफ्ते पणजी में गोवा की संस्था ट्रांजिशंस रिसर्च की ओर से आयोजित एमर्जेंस नाम के महोत्सव-सम्मेलन में मिले. उभरते शहरों में एयर क्वालिटी पर एक जानकारी देने वाले सेशन में देशभर के विशेषज्ञ शामिल हुए. हालांकि, इस बात पर ज्यादा सहमति नहीं थी कि गोवा में सबसे ज्यादा प्रदूषण कौन फैला रहा है.

2018 में अर्बन एमिशंस की ओर से पणजी-मार्गाओ-वास्को पर किए गए प्रदूषण के स्रोत से जुड़ी एक स्टडी में पाया गया कि 30 प्रतिशत से ज्यादा प्रदूषण परिवहन से आता है. इसमें सड़क, रेल, विमान और जहाज शामिल हैं. एक और 30 प्रतिशत प्रदूषण सड़कों पर वाहनों की आवाजाही और निर्माण गतिविधियों से उड़ने वाली धूल से आता है. इसके अलावा 24 प्रतिशत प्रदूषण छोटे, मध्यम और बड़े उद्योगों से आता है, जिसमें बिजली का प्रोडक्शन भी शामिल है. मॉडल के मुताबिक, 2030 तक परिवहन की हिस्सेदारी बढ़कर 40 प्रतिशत हो जाएगी.

गोवा में यह हैरान करने वाली बात नहीं है. यहां 15.9 लाख की आबादी के लिए 13.5 लाख पंजीकृत वाहन हैं. यह पूरी तरह लोगों की पसंद भी नहीं है. ऐसी जगह पर निजी वाहन ज़रूरी हो जाता है, जहां सार्वजनिक परिवहन बेहद अविश्वसनीय और पर्याप्त नहीं है. इन बड़े कारणों के अलावा कई छोटे कारण भी हैं. इनमें राज्य की पहाड़ियों पर बने गेटेड समुदायों के लिए ईज़ी कंस्ट्रक्शन रूल, खनन गतिविधियों की दोबारा शुरुआत और हर शाम जलाया जाने वाला मिला-जुला कचरा शामिल है.

डब्ल्यूआरआई इंडिया में स्वच्छ हवा कार्यक्रम के निदेशक श्री कुमार कुमारस्वामी ने बताया कि प्लास्टिक, रबर और दूसरी जटिल चीजों वाले मिले-जुले कचरे को सही तरीके से फेंकने की व्यवस्था नहीं होने के कारण अक्सर जला दिया जाता है. इससे डायऑक्सिन, फ्यूरान और दूसरे रसायन जैसे कैंसर पैदा करने वाले पदार्थ निकलते हैं.

डब्ल्यूआरआई इंडिया की ओर से हाल ही में प्रकाशित एक वर्किंग पेपर में 11 भारतीय शहरों में खुले में कचरा जलाने के प्रभावों का अध्ययन किया गया. इसमें पाया गया कि गर्मी की तुलना में सर्दियों में कचरा जलाने की घटनाएं तीन गुना ज्यादा होती हैं. यह सबसे ज्यादा गरीब इलाकों में होता है, जहां कचरा उठाने की व्यवस्था सबसे खराब है. कचरा जलाने की घटनाएं सुबह 7 से 10 बजे और शाम 5 से रात 10 बजे के बीच सबसे ज्यादा होती हैं. यही वह समय है जब बच्चे और बुजुर्ग बाहर सड़कों पर होते हैं.

फिर भी, छोटे और मध्यम आकार के शहर बड़े शहरों को बहुत कुछ सिखा सकते हैं.

कुमारस्वामी ने कहा, “बड़े शहरों के लिए आकार और जगह समस्या हैं. लेकिन छोटे और मध्यम आकार के शहर व्यवस्था बना सकते हैं और दिखा सकते हैं कि यह किया जा सकता है.”

उन्होंने पुणे का उदाहरण दिया, जहां (SWaCH) के कर्मचारी कचरे को लैंडफिल में भेजने से पहले अलग करने के लिए सार्वजनिक बगीचों में तय जगहों का इस्तेमाल करते हैं.

खास तौर पर पणजी ने अपने ठोस कचरा प्रबंधन मॉडल से एक अच्छा उदाहरण पेश किया है. कुमारस्वामी ने कहा कि गोवा में बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं. ऐसे में होटल जैसे बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करने वाले स्थान कचरे को वहीं अलग करके उसकी मात्रा कम कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, “इस क्षेत्र में कारोबार शुरू करने और रोजगार के बहुत सारे मौके हैं.”

‘हूज एयर इज इट एनीवे’

इनमें से किसी भी व्यवस्था को लागू करने के लिए छोटे शहरों को पैसे की जरूरत है. इसका ज्यादातर पैसा 2019 में शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम से आता है. इसका लक्ष्य 130 “मानकों को पूरा नहीं करने वाले” शहरों में कण प्रदूषण को 40 प्रतिशत तक कम करना है. बेंगलुरु की संस्था जनाग्रह सेंटर फॉर सिटिजनशिप एंड डेमोक्रेसी की एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि इन पैसों का इस्तेमाल कैसे किया गया.

“हूज एयर इज इट एनीवे?” नाम की रिपोर्ट के अनुसार, 7,600 करोड़ रुपये में से करीब दो-तिहाई पैसा सड़क की धूल कम करने पर खर्च किया गया. इसमें सड़क बनाना, गड्ढे भरना, मशीनों से सफाई और पानी का छिड़काव शामिल था. वहीं औद्योगिक प्रदूषण और घरों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन पर एक-एक प्रतिशत से भी कम पैसा खर्च हुआ. जिन 69 शहरों का इस्तेमाल करने लायक आंकड़ा उपलब्ध था, उनमें से सिर्फ 10 अपने लक्ष्य तक पहुंच पाए. वहीं 31 शहरों की हवा पहले से ज्यादा खराब हो गई. रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि किसी शहर ने कितना पैसा खर्च किया और उसकी हवा कितनी बेहतर हुई, इनके बीच कोई सांख्यिकीय संबंध नहीं था.

जनाग्रह के मुख्य नीति और जानकारी अधिकारी आनंद अय्यर ने मुझे बताया कि सड़क की धूल पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च होने का कारण यह है कि शहरी स्थानीय निकाय के पास जितना काम करने की क्षमता है, वह उतना ही कर सकता है. नगर निकाय सड़कों और सफाई पर नियंत्रण रखते हैं, लेकिन औद्योगिक प्रदूषण, परिवहन या पराली जलाने जैसे प्रदूषण के दूसरे स्रोतों को नियंत्रित नहीं कर सकते.

अय्यर ने कहा, “किसी शहर की स्थानीय सरकार में हवा की गुणवत्ता के लिए जिम्मेदार कौन है? इसका आसान जवाब है- कोई नहीं.”

अक्सर इसका समाधान एक नोडल अधिकारी नियुक्त करना होता है. कई बार उसके पास तकनीकी योग्यता भी नहीं होती और वह पहले से कई दूसरी जिम्मेदारियां भी संभाल रहा होता है.

उन्होंने कहा, “लेकिन आप सिर्फ पानी का छिड़काव करके उम्मीद नहीं कर सकते कि समस्या खत्म हो जाएगी.”

जनाग्रह की सिफारिश है कि हर शहर में 5-7 तकनीकी कर्मचारियों वाली एक स्वच्छ हवा इकाई बनाई जाए. इसके साथ हवा की सही माप के लिए उचित सुविधाएं भी होनी चाहिए. जनाग्रह में सार्वजनिक वित्त प्रबंधन के निदेशक और अय्यर के सहयोगी प्रभात कुमार ने कहा कि बड़े स्तर की योजनाएं अक्सर नियमों का पालन करने की जल्दबाजी पैदा करती हैं.

कुमार ने पूछा, “क्या हम सही चीजों के लिए योजना बना रहे हैं? क्या हम ज्यादा तेजी से काम कर सकते हैं?”

कुमार ने कहा कि कोई भी योजना उतनी ही अच्छी होती है, जितना वह अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच समन्वय पैदा करती है.

तब तक भारत के छोटे शहर भी दिल्ली मॉडल को अपनाते रहेंगे: हर कमरे में एयर प्यूरिफायर, घर के अंदर मास्क और आंखें बंद करके रहना.

करनजीत कौर पत्रकार हैं. वे TWO Design में पार्टनर हैं. उनका एक्स हैंडल @Kaju_Katri है. व्यक्त विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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