31 अगस्त को सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने बताया कि वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल-जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था वास्तविक रूप से 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी. यह भारतीय रिजर्व बैंक के 7 प्रतिशत के अनुमान से ज्यादा है. ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) इससे भी ज्यादा 8.2 प्रतिशत की दर से बढ़ा. यह आंकड़ा देखने में सकारात्मक था, लेकिन इसी समय MoSPI ने GDP की नई सीरीज भी जारी की, जिसमें आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया. घोषणा के पांच दिन बाद भी यह आंकड़ा बहस का विषय बना हुआ है. यह बहस भारत की आर्थिक स्थिति के साथ-साथ देश की सांख्यिकी से जुड़ी राजनीति की जटिलता को भी दिखाती है.
इसी वजह से 7.8 प्रतिशत का GDP आंकड़ा दिप्रिंट का इस हफ्ते का न्यूज़मेकर है.
असाधारण उपलब्धि, या आंकड़ों की चालाकी?
शुरुआती प्रतिक्रियाएं बहुत उत्साह वाली थीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए इस विकास दर को तेल की कीमतों के झटकों और दुनिया भर में सप्लाई चेन में आई रुकावटों के बावजूद हासिल की गई “बहुत बड़ी उपलब्धि” बताया. साथ ही उन्होंने आलोचकों पर निशाना साधते हुए लिखा, “Doomsayers were doomed and India bloomed…yet again!” यानी निराशा फैलाने वालों की बात गलत साबित हुई और भारत फिर से आगे बढ़ा.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस आंकड़े का श्रेय लगातार किए गए सुधारों और “अर्थव्यवस्था के चुस्त प्रबंधन” को दिया. HDFC Bank की मुख्य अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता ने अर्थव्यवस्था की मजबूती के पीछे मजबूत खपत, सरकारी खर्च, निवेश और निर्यात को वजह बताया. इसके अलावा, PM-EAC के सदस्य संजीव सान्याल ने कारों की बिक्री और कंपनियों के मुनाफे को सरकार से अलग ऐसे संकेतक बताया जो इस कहानी का समर्थन करते हैं. उन्होंने कहा कि “कोई गंभीर अर्थशास्त्री” इतनी मजबूत आर्थिक वृद्धि पर सवाल नहीं उठाएगा.
इसके बाद एक आलोचनात्मक आकलन सामने आया. पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने एनडीटीवी से कहा कि नई पद्धति को ध्यान में रखने के बाद मौजूदा कीमतों पर वास्तविक वृद्धि 7.8 प्रतिशत के बजाय लगभग 2.6 प्रतिशत थी. बिजनेस टुडे के मुताबिक, गर्ग की गणना से पता चला कि MoSPI की नई सीरीज में पिछले साल की पहली तिमाही के लिए नॉमिनल जीडीपी लगभग 80 लाख करोड़ रुपये आंका गया, जबकि पहले का अनुमान करीब 86 लाख करोड़ रुपये था. द फेडरल को दिए एक अलग इंटरव्यू में गर्ग ने कहा कि भारत की वास्तविक आर्थिक वृद्धि करीब 4-5 प्रतिशत के आसपास हो सकती है. उन्होंने “white lies, black lies, and statistics” यानी “सफेद झूठ, काला झूठ और आंकड़े” वाली कहावत का भी ज़िक्र किया. हालांकि, उन्होंने सीधे तौर पर सरकार पर धोखाधड़ी का आरोप लगाने से परहेज किया. कांग्रेस पार्टी ने तुरंत इन दावों को आगे बढ़ाया. पवन खेड़ा ने कहा कि गर्ग ने सरकार के आंकड़ों की “पोल खोल दी” है. जयराम रमेश ने 7.8 प्रतिशत के आंकड़े को “बहुत ज्यादा बदली हुई तस्वीर” बताया. वहीं सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसने आधार वर्ष के आंकड़ों में जानबूझकर बदलाव किया, ताकि मुख्य विकास दर को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा सके.
‘सेब और संतरे’
सरकार की प्रतिक्रिया तुरंत और साफ थी. MoSPI के सचिव सौरभ गर्ग ने आंकड़ों में हेरफेर के आरोपों पर दुख जताया. उन्होंने इसे “दुखद” बताया और कहा कि इन आंकड़ों को तैयार करने में बहुत मेहनत लगी है. गर्ग की गणना की तकनीकी आलोचना में कहा गया कि उन्होंने पुरानी 2011-12 आधार वाली सीरीज के नॉमिनल GDP आंकड़े की तुलना नई 2022-23 आधार वाली सीरीज के आंकड़े से की. अधिकारियों ने इसे “सेब और संतरे” की तुलना बताया, क्योंकि दोनों सीरीज में इस्तेमाल किए गए वजन, आंकड़ों के स्रोत और अनुमान लगाने के तरीके अलग-अलग हैं. बीजेपी के अमित मालवीय ने भी सुभाष चंद्र गर्ग की 2.6 प्रतिशत की गणना को गलत बताया और उन पर आधिकारिक आंकड़ों को गलत तरीके से समझने का आरोप लगाया.
बहस तब और तेज़ हो गई जब आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी इस पर अपनी बात रखी. उन्होंने गणित पर बात करने के बजाय बताए गए विकास दर के असर पर सवाल उठाया. राजन ने पूछा कि अगर अर्थव्यवस्था वास्तव में इतनी तेजी से बढ़ रही है, तो नौकरियां क्यों नहीं बढ़ रही हैं, निजी निवेश धीमा क्यों है, उद्योगपति पूंजी लगाने से क्यों हिचक रहे हैं और बड़े स्तर पर पर्याप्त एफडीआई क्यों नहीं आ रहा है. उन्होंने इसे भारत के जनसांख्यिकीय लाभ के संदर्भ में देखा. उनका कहना था कि अगर मजबूत जीडीपी विकास दर नौकरियां और निवेश पैदा नहीं कर पा रही है, तो देश के युवा कामकाजी लोगों से मिलने वाले अवसर बर्बाद हो सकते हैं.
इसके अलावा, रॉयटर्स ने बताया कि कुछ निजी अर्थशास्त्रियों ने इस बात पर चिंता जताई है कि GDP डिफ्लेटर दूसरे कीमतों से जुड़े संकेतकों की तुलना में महंगाई को कम दिखा रहा हो सकता है. इससे वास्तविक आर्थिक विकास दर जरूरत से ज्यादा दिखाई दे सकती है, चाहे किसी भी सीरीज का इस्तेमाल किया जाए.
ऐसा आंकड़ा जो तकनीकी रूप से सही, लेकिन असलियत में सवालों के घेरे में
जब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को अलग रखकर देखा जाता है, तो एक बंटी हुई राय सामने आती है. खास तौर पर आंकड़ों से जुड़े मुद्दे पर सरकार का पक्ष ज्यादा मजबूत दिखाई देता है. सामान्य तौर पर जीडीपी की तुलना एक ही और लगातार इस्तेमाल की गई सीरीज के भीतर की जाती है. वहीं, सुभाष चंद्र गर्ग का चर्चा में आया 2.6 प्रतिशत का आंकड़ा वास्तव में दो अलग-अलग सीरीज को मिलाकर निकाला गया है.
हालांकि, यह तकनीकी बढ़त रघुराम राजन और दूसरे लोगों की ओर से उठाए गए बड़े सवालों का जवाब नहीं देती. द वायर के इसी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि मैन्युफैक्चरिंग की वास्तविक Gross Value Added (GVA) 9.2 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन कुल GVA में उसका नॉमिनल हिस्सा कई दशकों के सबसे निचले स्तर 12.9 प्रतिशत पर आ गया. इसके अलावा, निर्यात (25.8 प्रतिशत) की तुलना में आयात (30.9 प्रतिशत) ज्यादा रहा. इससे शुद्ध निर्यात घाटा और बढ़ गया. वहीं, भारी मौद्रिक और राजकोषीय मदद के बावजूद शुद्ध अप्रत्यक्ष कर संग्रह की वृद्धि 7.6 प्रतिशत से घटकर -0.4 प्रतिशत हो गई.
क्या 7.8 प्रतिशत का आंकड़ा अर्थव्यवस्था में वास्तव में एक बड़ा बदलाव दिखाता है या रोजगार और निवेश के आंकड़े अपडेट होने के बाद इस पर फिर से विचार किया जाएगा, यह अगले दो या तीन तिमाहियों में पता चलेगा. तब तक यह एक ऐसा असामान्य मामला बना रहेगा, जिसमें एक सीधा-सादा आर्थिक आंकड़ा राजनीतिक और तकनीकी बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है. यह बहस, सिर्फ आंकड़ा नहीं, इस हफ्ते की असली कहानी है.
बिदिशा भट्टाचार्य दिप्रिंट की कंसल्टिंग एडिटर (इकोनॉमिक्स) और चिंतन रिसर्च फाउंडेशन की एसोसिएट फेल हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.
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