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Tuesday, 1 September, 2026
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भारत को मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए एक रास्ते की जरूरत है, उज्बेकिस्तान बन सकता है साझेदार

भारत और उज़्बेकिस्तान अपने साझा अतीत की मजबूती का सहारा लेकर कर सकते हैं साझा भविष्य का निर्माण.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य एशिया के साथ संबंधों को बढ़ाने का फैसला ऐसे महत्वपूर्ण समय में किया है जब इस क्षेत्र ने पश्चिम एशिया में जारी लड़ाइयों के कारण दुनिया की भू-राजनीति में उल्लेखनीय महत्व हासिल कर लिया है. ‘शांघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन’ (SCO) में, जिसका एक सदस्य उज़्बेकिस्तान भी है, भारत की भागीदारी इस क्षेत्र की सुरक्षा, उससे संपर्क, आर्थिक विकास, और दोनों क्षेत्रों की जनता के बीच सीधे संवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को उजागर करती है.

भारत जबकि एशिया के साथ संबंधों को विस्तार और मजबूती देने की कोशिश कर रहा है, तब उज़्बेकिस्तान के साथ उसके संबंध खास तौर से महत्वपूर्ण हो जाते हैं— न केवल आज के संदर्भ में रणनीतिक सहयोग के लिहाज से बल्कि दोनों सभ्यताओं के सदियों पुराने संबंधों के लिहाज से भी.

भारत और मध्य एशिया के बीच कोई बड़ी भौगोलिक दूरी नहीं है. प्राचीन ‘सिल्क रूट’ भारत को हिमालय के बोलन और खैबर जैसे दर्रों से होकर गुजरने वाले मार्गों से मध्य एशिया के साथ जोड़ता है. 2029 में बनकर तैयार होने वाला बहुआयामी ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरीडोर’ प्राचीन ‘सिल्क रूट’ से होने वाले संपर्क को फिर से सक्रिय करने के भारत के मजबूत प्रयासों का प्रतीक है. भारत की ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति का लक्ष्य इस क्षेत्र के साथ राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक संबंधों, और जनता के बीच सहयोग के मामलों में प्राचीन ऐतिहासिक गहराई को फिर से हासिल करना है.

इस लिहाज से उज़्बेकिस्तान का एक विशेष स्थान है, क्योंकि भारतीय उपमहादेश और वर्तमान उज़्बेकिस्तान के संबंध अनंत काल से चले आ रहे हैं.

प्राचीन कुषाण साम्राज्य ने मध्य एशिया को अफगानिस्तान और उत्तर भारत से जोड़ कर प्राचीन विश्व में संबंधों का विशाल तानाबाना बनाया था. इन नेटवर्कों ने व्यापारियों, साधुओं, विचारों, और कला परंपराओं के दूर-दूर तक फैलने की सुविधा प्रदान की थी. इस प्राचीन साझीदारी का एक सबसे ठोस यादगार प्रमाण उज़्बेकिस्तान में मौजूद है. वहां तरमेज़ शहर के पास ई.पूर्व पहली शताब्दी के बौद्ध पुरातात्विक स्थल कारा टेपा और फ़ायाज़ टेपा में संरक्षित हैं. कारा टेपा मध्य एशिया का एकमात्र गुफा वाला बौद्ध मठ है. ये स्थल इस बात के उल्लेखनीय प्रमाण हैं कि बौद्ध विचारों और भारतीय संस्कृति का मध्य एशिया के प्राचीन मार्गों से उत्तर में किस तरह विस्तार हुआ.

यह ऐतिहासिक रिश्ता कभी एकतरफा नहीं था. 8वीं से लेकर 11वीं सदी के बीच मध्य एशिया मध्ययुग में दुनिया के एक महान बौद्धिक केंद्र के रूप में उभरा. इस क्षेत्र के शहरों और विद्वत दायरों में उस समय गणित, खगोलशास्त्र, औषधि, दर्शन, और साहित्य की विधाओं में असाधारण विकास देखा गया. उस काल की बौद्धिक उपलब्धियों को ‘ज्ञानोदय’ कहा गया, जिसकी विरासत को अक्सर वह महत्व नहीं दिया गया जिसकी वह हकदार है.

‘ज्ञानोदय’ की विरासत

इस विरासत का अबु अली इब्न सिना (अविसेन्ना) और अबु रेहान अल-बरूनी से बेहतर प्रतिनिधित्व शायद ही कोई करता है. इब्न सिना की कृति ‘केनन ऑफ मेडीसिन’ मध्ययुगीन चिकित्सा विज्ञान का एक आधार बन गई; महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें आयुर्वेद समेत भारतीय औषधि एवं उपचार विज्ञान का भी उल्लेख किया गया है. अल-बरूनी ने आगे बढ़कर बौद्धिक क्षेत्र में भारत के साथ संबंध जोड़ा. वे भारत आए और संस्कृत, भारतीय दर्शनशास्त्र, खगोलशास्त्र, और गणित का अध्ययन किया और ‘किताब-ए-हिंद’ लिखी, जो भारतीय सभ्यता की एक सबसे महत्वपूर्ण मध्ययुगीन विद्वतापूर्ण रचना है.

15वीं सदी के समरकंद के राजदूत और इतिहासकार अब्दुर रज़्ज़ाक़ समरकंदी ने 1440 के दशक में दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य की यात्रा की थी. उनका वृहद यात्रा संस्मरण ‘मत्ला-उस-सादैन व मज्म-उल-बह्रैन‘ राज दरबार, प्रशासन, और दक्षिण भारत के शहरी जीवन का मूल्यवान ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध कराता है.

जाहिर है, भारत उस समय ज्ञान के व्यापक प्रसार में शामिल था, जो इस क्षेत्र को दुनिया का एक बौद्धिक केंद्र बनाता था. भारत में गणित और खगोलशास्त्र के ज्ञान की जो परंपराएं थीं वे इन नेटवर्क से प्रसारित हो रही थीं, जबकि मध्य एशिया के विद्वान भारतीय चिंतन के साथ गहरा संवाद कर रहे थे. यह आदान-प्रदान उन्हीं मार्गों से हो रहा था जिनसे व्यापार और संस्कृति का विस्तार हो रहा था.

शिक्षा, विद्वता, और संस्कृति के केंद्रों के रूप में लंबे समय तक विख्यात रहे समरकंद और बुखारा मध्ययुग में बौद्धिक तथा सांस्कृतिक कल्पनाशीलता के सशक्त संदर्भ केंद्र बने रहे. यह जुड़ाव वंशों के इतिहास से आगे जाकर वास्तुकला, भाषा, साहित्य, खाद्य व्यंजन, और विद्वता की परंपराओं तक से था. दोहरे गुंबद और बागों के चारबाग वाले लेआउट उज़्बेक प्रभावों की ही देन हैं. आज भी नान से लेकर नॉन और पुलाव से लेकर पिलाफ़ तक, और समोसा से लेकर सम्सा तक साझा व्यंजन सदियों के मेलजोल को ही उजागर करते हैं. नक़्शबंदी सूफ़ी परंपरा और दूसरे आध्यात्मिक सूत्र इस साझी विरासत के दूसरे आयाम को सामने लाते हैं.

सोवियत संघ वाले दौर में उज़्बेकिस्तान के साथ जो करीबी रिश्ते बने उन्होंने आधुनिक काल में जीवंत संबंध के विकास में अहम योगदान दिया. ताशकंद की स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ में हिंदी 1947 से ही पढ़ाई जा रही है, वहां के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी अब हिंदी पढ़ाई जा रही है. उज़्बेकिस्तान में हिंदी और अर्थशास्त्र विषयों के ICCR पीठ स्थापित हैं. रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचंद और अमृता प्रीतम सरीखे लेखकों की रचनाओं के उज़्बेक भाषा में अनुवाद के जरिए भारतीय साहित्य भी वहां पहुंच चुका है. रामायण, महाभारत, और महात्मा गांधी की आत्मकथा का भी उज़्बेक में अनुवाद हो चुका है. 2015 में उज़्बेकिस्तान के दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जिस हिंदी-उज़्बेक शब्दकोश का विमोचन किया था उसमें 23 हजार से ज्यादा शब्द दर्ज हैं, जबकि हजारों शब्द ऐसे हैं जो दोनों भाषाओं में इस्तेमाल होते हैं.

उज़्बेकिस्तान में भारतीय फिल्मों के लिए जो लगाव है उससे भारतीय संस्कृति के प्रति उनका प्यार जाहिर होता है. ताशकंद में राज कपूर की प्रतिमा स्थापित की गई है, जबकि 1970 के दशक में भारत-उज़्बेक सहयोग से निर्मित फिल्म ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ की शूटिंग उज़्बेकिस्तान में की गई और उसे आज भी वहां खूब पसंद किया जाता है. कई सड़कों और सार्वजनिक स्थानों के नाम महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर रखे गए हैं, जो यह दर्शाता है कि भारत के नेताओं और सांस्कृतिक हस्तियों को वहां कितने सम्मान से याद किया गया है.

प्राचीन लगाव से आधुनिक साझीदारी तक

आज जो साझेदारी वाला रिश्ता है उसने विकास संबंधी आयाम ग्रहण कर लिया है. वहां भारत का ‘जवाहरलाल नेहरू इंडिया-उज़्बेकिस्तान IT सेंटर’, महात्मा गांधी सेंटर, ITEC और ICCR स्कॉलरशिप्स;  ताशकंद, अंदिजान, बुखारा, और जिज़्ज़ख में भारतीय विश्वविद्यालयों की मौजूदगी क्षमता निर्माण, मानव संसाधन विकास के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को उजागर करती है. ITEC स्कॉलरशिप से करीब 2700 नागरिकों को, और ICCR स्कॉलरशिप से 426 उज़्बेकों  को लाभ मिला है. उज़्बेकिस्तान भारतीय शैक्षिक कार्यक्रमों का भी एक अहम केंद्र है और वहां से चिकित्सा कराने के लिए भी कई लोग भारत आते हैं.

दोनों देशों की जनता के बीच रिश्ते अगली पीढ़ी में भी आगे बढ़ रहे हैं. जनवरी 2022 में प्रधानमंत्री मोदी ने पहले भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन में भारत-मध्य एशिया युवा प्रतिनिधिमंडल के गठन का सुझाव दिया था. उसके तहत मध्य एशिया से युवाओं के कई दल भारत आए. 2026 तक इसके चार सम्मेलन हो चुके हैं, जिनमें ऐसे कार्यक्रम तैयार किए गए जिनके जरिए मध्य एशिया के युवाओं को भारतीय संस्कृति के साथ-साथ टेक्नोलॉजी, विकास, और आविष्कार के क्षेत्रों में भारत की उपलब्धियों से परिचित कराया जाता है.

योग इस सभ्यतागत जुड़ाव का एक समकालीन आयाम है. भारत के समर्थन से उज़्बेकिस्तान मध्य एशिया का पहला देश बन गया है, जहां भारत के ‘योग सर्टिफिकेशन बोर्ड’ के तहत योग के सर्टिफिकेट की परीक्षा आयोजित की जा रही है. सैकड़ों उज़्बेकों को यह सर्टिफिकेट दिया जा चुका है, जबकि ताशकंद ने 2025 में योग पर सातवें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया. मध्य एशिया में आइसीसीआर का यह पहला महत्वपूर्ण सम्मेलन था.

इस तरह, भारत-उज़्बेकिस्तान रिश्ते की कहानी केवल साझा इतिहास की कहानी नहीं है. यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी साझा बौद्धिक जिज्ञासा, सांस्कृतिक अपनेपन और मानवीय संबंधों में नयेपन की कहानी है. उज़्बेकिस्तान मध्य एशिया में भारत का एक अहम रणनीतिक और आर्थिक आधार है, और वह व्यापक यूरो-एशियाई महादेश के लिए प्रमुख प्रवेशद्वार जैसा है. वह कच्चे यूरेनियम का सबसे भरोसेमंद सप्लायर है और उन दुर्लभ खनिजों का एक अहम अछूता स्रोत है जिन पर भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी की मांगों का पूर्ति निर्भर है.

भारत जबकि अपनी ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति को मजबूती देने में जुटा है और सुरक्षा, संपर्क, आर्थिक अवसर, और मानव विकास को आगे बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर काम कर रहा है, तब उज़्बेकिस्तान उसका बड़ा साझीदार बना रहेगा.

प्रधानमंत्री मोदी मध्य एशिया पर जिस तरह ध्यान दे रहे हैं वह इस असाधारण रिश्ते को नयी गति प्रदान करने का अवसर उपलब्ध करा रहा है. भारत और उज़्बेकिस्तान अपने साझा अतीत की मजबूती का सहारा लेकर एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जो एशिया और उससे आगे भी शांति एवं समृद्धि में योगदान दे सकता है.

डॉ. अश्विन पारिजात अंशु दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिस्ट्री के एसोसिएट प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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