scorecardresearch
Monday, 31 August, 2026
होमफीचरनेपाल के रसुवा में 5 साल में 5 बार आई बाढ़, आखिर क्यों आपदा के लिहाज से इतना संवेदनशील है यह इलाका?

नेपाल के रसुवा में 5 साल में 5 बार आई बाढ़, आखिर क्यों आपदा के लिहाज से इतना संवेदनशील है यह इलाका?

नेपाल के 'नेशनल डिज़ास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी' के आंकड़ों से पता चलता है कि 2022 और 2026 के बीच रसुवा ज़िले में अचानक बाढ़ की पांच बड़ी घटनाएं हुईं.

Text Size:

नई दिल्ली: नेपाल के रसुवा जिले में 26 अगस्त को भयंकर अचानक आई बाढ़ ने तबाही मचाई थी. इस जिले में पिछले पांच सालों में कम से कम पांच बार ऐसी ही आपदाएं हो चुकी हैं. इस जिले की भौगोलिक स्थिति, ऊपरी हिमालय का बढ़ता तापमान और अस्थिर ग्लेशियर यहां के गांवों को जलवायु परिवर्तन से होने वाली आपदाओं के लिए खास तौर पर कमजोर बनाते हैं.

नेपाल की नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDRRMA) के आंकड़ों के मुताबिक, 2022 से 2026 के बीच रसुवा जिले में पांच बड़ी अचानक आई बाढ़ आईं.

2023 में भोटे कोशी नदी का जलस्तर दो बार अचानक बढ़ गया था: 3 जून और 13 जुलाई को. 25 अगस्त 2024 को केरुंग नदी से जिले में एक और बाढ़ आई थी. यह नदी रसुवागढ़ी के पास ल्हेंदे खोला नदी में मिलती है.

स्थानीय अधिकारियों ने अपने अलर्ट में कहा था कि गांवों को तुरंत खाली करा लिया गया था और इन बाढ़ों में किसी की जान नहीं गई थी.

हालांकि, 2025 में इन बाढ़ों की तीव्रता बढ़ गई और उनसे होने वाला नुकसान भी बढ़ गया. जुलाई में ल्हेंदे-भोटे कोशी नदी प्रणाली में दो बार बाढ़ आई, 8 और 30 जुलाई को. इन दोनों बाढ़ों में मिलाकर कम से कम 20 लोगों की मौत हुई.

NRRDMA की एक रिपोर्ट में 8 जुलाई की आपदा के बारे में लिखा था, “तिब्बत में प्योरपु ग्लेशियर पर एक ग्लेशियल झील से बहुत तेजी से पानी निकलने के कारण अचानक बाढ़ आई. यह जगह नेपाल-चीन सीमा से करीब 35 किलोमीटर ऊपर है. इस बाढ़ ने ल्हेंदे नदी के किनारे बड़े पैमाने पर तबाही मचाई. नेपाल में इसी नदी को भोटे कोशी नदी के नाम से जाना जाता है.”

जान-माल के भारी नुकसान के साथ-साथ रसुवागढ़ी में नेपाल-चीन मैत्री पुल, रसुवागढ़ी ड्राई पोर्ट का बड़ा हिस्सा और जलग्रहण क्षेत्र में बने तीन हाइड्रोपावर प्लांट नष्ट हो गए. स्याफ्रुबेसी और रसुवागढ़ी के बीच 16 किलोमीटर सड़क भी क्षतिग्रस्त हो गई.

जगह की वजह से बड़ा खतरा

विशेषज्ञों ने बताया कि रसुवा जिले में गांवों की भौगोलिक स्थिति एक बड़ा नुकसान है. यह इलाका बहुत ऊंचाई पर स्थित है और ऊपरी हिमालय से आने वाली नदियों के लिए पहला पड़ाव बनता है. जब ग्लेशियर की झीलों में पानी का स्तर बढ़ता है, तो नदियां तेजी से नीचे की ओर आती हैं और रसुवा के कुछ हिस्सों में पहुंचती हैं. जिले के उत्तरी हिस्से, जिनमें तिमुरे, रसुवागढ़ी और स्याब्रुबेसी शामिल हैं, इनसे खास तौर पर प्रभावित होते हैं.

नेपाल के इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के एक वैज्ञानिक ने द प्रिंट से फोन पर बातचीत में कहा, “उस इलाके में बहुत कम समतल जमीन है, जहां नदी के पानी की ताकत धीमी हो सके या आगे बढ़ने से पहले पानी फैलकर जमीन में जा सके. इसलिए जब ऊंचे पहाड़ों से पानी तेजी से नीचे आता है और इतनी कम दूरी में संकरी घाटी से होकर गुजरता है, तो यह गांवों से बहुत तेज ताकत के साथ टकराता है और भारी नुकसान करता है.”

वैज्ञानिक ने बताया कि रसुवा में बाढ़ का खतरा सिर्फ हिमालय के ग्लेशियरों के गर्म होने और इन बर्फीले हिस्सों के तेजी से पिघलने की वजह से नहीं है, बल्कि नदी के बहाव को रोकने वाले बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से भी है.

इसका मतलब है कि जब पिघलते ग्लेशियरों का पानी तेजी से नीचे आता है, तो उसे फैलने और उतरने के लिए पर्याप्त जगह मिलने के बजाय तुरंत घरों, पुलों, सड़कों और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर का सामना करना पड़ता है.

इन गांवों के लोग खुद देख रहे हैं कि हर साल इन बाढ़ों की संख्या और उनकी तीव्रता बढ़ रही है.

“ये नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बाढ़ की आशंका वाले इलाके हैं और यहां लगभग हर साल छोटी बाढ़ आती रही है,” नुवाकोट जिले में नेपाल कांग्रेस के जिला अध्यक्ष रमेश कुमार महत ने कहा.

पिछले साल भी इस इलाके में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) आई थी.

महत ने कहा, “पिछले साल भी मुझे रसुवा में आई बाढ़ याद है. यह GLOF की वजह से आई थी और मुझे याद है कि करीब 20 लोगों की मौत हुई थी.”

महत ने कहा कि इन इलाकों में हर साल बाढ़ आना कोई असामान्य बात नहीं है. लेकिन 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए. लोगों को खाली करने का मौका मिलने से पहले ही पूरे गांव बह गए.

क्या आगे और आपदाएं आएंगी?

हिमालय पर किए गए कई अध्ययनों ने चेतावनी दी है कि इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली आपदाएं बढ़ने की संभावना है.

इस साल की शुरुआत में ICIMOD की ओर से जारी एक अध्ययन में पाया गया कि हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार इस सदी की शुरुआत के बाद तेजी से बढ़ी है. 2026 ग्लेशियर आउटलुक, जो 38 ग्लेशियरों के निरीक्षण पर आधारित है, में पाया गया कि 2000 के बाद बर्फ के नुकसान की रफ्तार लगभग दोगुनी हो गई है.

पिछले पांच दशकों में करीब 89 प्रतिशत ग्लेशियरों में नकारात्मक ग्लेशियर मास बैलेंस दर्ज किया गया. इसका मतलब है कि इन ग्लेशियरों ने जितनी बर्फ हासिल की, उससे ज्यादा बर्फ खोई.

ICIMOD के वैज्ञानिक ने कहा, “बाढ़ के बाद तुरंत पुलों और सड़कों को दोबारा बनाने का काम नहीं होना चाहिए. सबसे पहले यह समझना और आकलन करना चाहिए कि क्या हमें अपने समुदायों और इंफ्रास्ट्रक्चर को पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में रखना चाहिए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: ‘जो हिंदू भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं देखता, वह हिंदू नहीं है’—US में मोहन भागवत


 

share & View comments