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Wednesday, 29 July, 2026
होममत-विमतCAA-NRC आंदोलन के बाद देश में डर का माहौल था, युवाओं ने हंसकर उस डर को हरा दिया

CAA-NRC आंदोलन के बाद देश में डर का माहौल था, युवाओं ने हंसकर उस डर को हरा दिया

Gen Z ने दिखाया कि डराने वाले शब्दों की ताकत खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका उन पर हंसना है. पहले से तय नियमों वाले इस खेल को खेलने से इनकार करने के लिए मिलेनियल्स हमेशा उनका सम्मान करेंगे.

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पिछले एक हफ्ते में मैंने अपने फोन से चिपके रहकर कितने घंटे बिताए, इसका मुझे बिल्कुल अफसोस नहीं है क्योंकि एक आंदोलन चल रहा था, इतिहास बदलता हुआ दिख रहा था और यह सब सबसे साफ तौर पर इंस्टाग्राम पर ही नज़र आ रहा था. पुलिस की सख्ती, अफरा-तफरी, आंसू गैस और भगदड़ जैसे हालात से भरी लगातार अपडेट होती फीड के बीच “This Genre of Woman” नाम का एक वीडियो बार-बार सबसे ऊपर आता रहा और मैंने उसे हर बार देखा.

वीडियो की शुरुआत एक बिंदी लगाए युवा लड़की से होती है. उम्र रही होगी 20 या 21 साल. वह गुस्से में, लेकिन पूरी मजबूती से कहती हैं, “डेमोक्रेसी है, नौकर हैं वो हमारे. क्यों नहीं देंगे इस्तीफा? इनके बाप का देश है?” इसके बाद वीडियो तेज़ी से आगे बढ़ता है. दूसरी लड़कियां दिखाई देती हैं. कोई पुलिस की गाड़ी रोक रही है, कोई पुलिस को पीछे धकेल रही है. कोई नारे लगा रही है, कोई लड़ रही है. उनके चेहरे गुस्से और हिम्मत से भरे हैं. यह सब पुराने कैबरे गाने “हंगामा हो गया” के रीमिक्स पर चलता है.

मैं इस वीडियो को बार-बार इसलिए देख रही थी क्योंकि अब भी यकीन करना मुश्किल है कि भारत के युवाओं ने कुछ ही दिनों में इतना बड़ा काम कर दिखाया. यह जैसे बटरफ्लाई इफेक्ट का असली उदाहरण है. सिर्फ एक महीने से थोड़े ज्यादा वक्त में एक ऐसा आंदोलन, जिसकी शुरुआत भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा भारतीय युवाओं को “कॉकरोच” कहने जैसी टिप्पणी से हुई थी, उसने केंद्र के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने इस सरकार से वह चीज़ हासिल कर ली, जो वह सबसे कम देना चाहती थी—एक रियायत.

पिछले हफ्ते मैंने अपना कॉलम इस सवाल के साथ खत्म किया था कि क्या कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और भारत के छात्र उस सरकार के सामने टिक पाएंगे, जिसके पास इंतज़ार करने के लिए बहुत समय था, लेकिन भारत की Gen Z ने सरकार को इसका जवाब जानने का मौका ही नहीं दिया. रविवार दोपहर तक उन्होंने अपना जवाब दे दिया.

पिछले एक हफ्ते में जो कुछ हुआ, उसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं है. खासकर मेरे जैसे मिलेनियल्स के लिए. हमने अपने से लगभग दो दशक छोटे लड़के-लड़कियों को अपने भविष्य के लिए एक बेहद असमान लड़ाई लड़ते देखा. मैंने यह सब कभी दुख, कभी राहत, कभी हैरानी, कभी गर्व और कभी भावुक होकर देखा. उन निडर युवाओं पर मुझे बेहद गर्व महसूस हुआ, जिनकी उम्र मेरे भतीजे-भतीजियों के बराबर है.

लेकिन सबसे ज्यादा मैंने एक पुराने गुस्से को फिर से महसूस किया, जो पिछले कुछ सालों से कहीं दबा हुआ था. वह गुस्सा कभी बेबसी बना, कभी लाचारी और कभी नाराजगी. आखिर में वह फिर उसी जोश में बदल गया. आंसुओं और तकलीफ के बीच मुझे “vaaste gana huiyeen” जैसे शब्दों का मतलब गूगल करना पड़ा और यह भी समझना पड़ा कि Subway Surfers क्या होता है. मैंने इतने सारे रॉ वीडियो, एडिट और वीडियो कम्पाइलेशन देखे कि शायद अब मेरे शरीर और दिमाग को नॉर्मल होने में टाइम लगेगा.

अगर लोकतंत्र का असली एहसास ऐसा ही होता है, तो मुझे यह मानने में शर्म आती है कि मैंने सोच लिया था कि शायद मुझे दोबारा ऐसा कभी महसूस नहीं होगा. जिस पीढ़ी को हमेशा आलसी, बिगड़ी हुई और किसी भी चीज़ में दिलचस्पी न रखने वाली कहकर मज़ाक उड़ाया गया, उसी पीढ़ी ने इस बार सबको गलत साबित कर दिया. यह देखने का एक्सपीरियंस सच में विनम्र बना देने वाला था.

हंसी-मज़ाक से मिली जीत

मज़ाकिया अंदाज़ और तेज़ी से आगे बढ़ने की उनकी क्षमता से भी ज्यादा जिस चीज़ ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह था प्रदर्शनकारियों के मन में डर का बिल्कुल न होना. पूरा आंदोलन जैसे एक सटायर बन गया था. आप किसी ऐसे इंसान को लाठी से कैसे डराएंगे, जिसकी तख्ती पर लिखा हो कि उसे BDSM पसंद है? पानी की बौछारों से युवाओं को कैसे रोकेंगे, जब वे उसी को बारिश में डांस पार्टी बना दें? उनके मन में डर कैसे बैठाएंगे, जब वे अपना सेल्फी कैमरा खोलकर आपके सामने ही आपका मज़ाक उड़ाने लगें?

कुछ दिन पहले मैं उन अचानक हुए प्रदर्शनों में शामिल हुई थी, जो जंतर-मंतर के समर्थन में देश के कई हिस्सों में हुए. वहां सिर्फ Gen Z नहीं, बल्कि हर उम्र के लोग मौजूद थे. लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा साफ दिख रहा था. इसी बीच चेहरे पर मास्क लगाए एक युवक मिठाई का डिब्बा लेकर मेरे पास आया और बड़े प्यार से पूछा, “मैडम, मोदी-चोर लड्डू खाएंगी?”

मुझे याद नहीं कि 2019-20 के सीएए-एनआरसी विरोध प्रदर्शनों के दौरान किसी ने मुझे लड्डू ऑफर किए थे. हममें से कई लोगों के लिए CAA के खिलाफ आंदोलन हमारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा और सबसे अहम आंदोलन था. उससे पहले 2011 का इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन ज़रूर हुआ था, लेकिन वह एक अलग दौर था. उस समय सरकार के खिलाफ बोलने की कीमत इतनी भारी नहीं थी. मैंने उस सर्दी की यादों में पिछले 10 दिनों जैसा मज़ाकिया और बेफिक्र माहौल ढूंढ़ने की कोशिश की, लेकिन ऐसा कुछ नहीं मिला. मुझे लोगों का गुस्सा याद है, भीड़ याद है और पूरे देश का एकजुट होना याद है. कई महीनों तक ऐसा लगता था जैसे पूरा देश किसी न किसी सड़क पर प्रदर्शन कर रहा हो, लेकिन उस आंदोलन में गुस्सा बहुत गहरा और गंभीर था क्योंकि सवाल बहुत बुनियादी था. मानो सरकार कुछ लोगों से पूछ रही हो कि क्या इस देश में उनका कोई हक भी है या नहीं.

“हम कागज़ नहीं दिखाएंगे” का नारा पूरे देश में गूंजा था. उस दौर का सबसे बड़ा गीत फैज अहमद फैज की कविता “हम देखेंगे” था. लोग उसे पूरी गंभीरता और विश्वास के साथ गाते थे, लेकिन उसके बाद जो हुआ, वह अच्छा नहीं था. पूरे देश में विरोध करने वालों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई शुरू हो गई. एक के बाद एक कई घटनाएं सामने आईं. जेएनयू के छात्रों पर हमला, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पुलिस की कार्रवाई, जामिया मिल्लिया इस्लामिया की लाइब्रेरी में छात्रों पर हमला और प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारियां. शाहीन बाग में महिलाओं के शांतिपूर्ण धरने को बदनाम करने की कई कोशिशें हुईं. लोगों से कहा गया कि प्रदर्शनकारियों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है. जामिया के छात्रों पर एक बंदूकधारी ने गोली चलाई, जबकि पुलिस वहीं मौजूद थी. उमर खालिद को UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया और लगभग छह साल बाद भी उनका मुकदमा शुरू होने का इंतज़ार जारी है. फरवरी 2020 में दिल्ली में दंगे हुए. बीजेपी के कई वरिष्ठ नेताओं के भाषणों के बाद हिंसा भड़की. पड़ोसी एक-दूसरे के खिलाफ हो गए. इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई और हज़ारों लोग घायल हुए, लेकिन सार्वजनिक बहस का बड़ा हिस्सा सिर्फ जली हुई बसों तक सीमित रह गया.

आखिरकार कोविड महामारी की वजह से सीएए विरोध प्रदर्शन खत्म हो गए. इससे आंदोलन से जुड़े लोगों के मन में कहीं न कहीं हार का एहसास रह गया. उस सर्दी का सबसे बड़ा असर डर था. लोगों के मन में धीरे-धीरे यह बात बैठा दी गई कि अगर आप आवाज़ उठाएंगे तो इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. 2020 का यही सबक लोगों को सिखाया गया. कहीं न कहीं, खुद को “देशविरोधी” या “विदेशी फंडिंग से चलने वाला” साबित होने से बचाने की कोशिश में, हमने इन आरोपों को बहुत गंभीरता से लिया. ऐसा करके हम उसी जाल में फंस गए, जो हमारे लिए बिछाया गया था.

लेकिन इस हफ्ते Gen Z ने हमें एक नई बात सिखाई. उन्होंने दिखाया कि ऐसे शब्दों की ताकत खत्म करने का सबसे आसान तरीका है—उन पर हंस देना. युवा प्रदर्शनकारियों ने “देशविरोधी” जैसे शब्द को उठाकर उसी तरह वापस फेंक दिया, जैसे कोई ग्रेनेड फेंकता है. उन्होंने उन बड़े-बुजुर्ग नेताओं का मज़ाक बनाया, जो उन्हें सबक सिखाने की कोशिश कर रहे थे. “विदेशी फंडिंग” वाले आरोपों का उन्होंने ऐसा मज़ाक उड़ाया कि आरोप लगाने वाले ही हास्यास्पद लगने लगे. उन्हें डराने, सांप्रदायिक तनाव फैलाने या वर्ग और लैंगिक एकजुटता के इस दुर्लभ पल को तोड़ने की हर कोशिश का उन्होंने हंसी में जवाब दिया. पहले से तय नियमों वाले इस खेल को खेलने से इनकार करने के लिए Gen Z हमेशा मेरे जैसे मिलेनियल्स का सम्मान हासिल करेगी.

एक ऐसा साथ, जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी

काश मैं यह कह पाती कि हम पहले दिन से ही इस आंदोलन का हिस्सा थे, लेकिन ऐसा नहीं था. जब CJP ने पहली बार जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू किया, तब हममें से कई लोग उसे वैसे ही देख रहे थे जैसे सड़क पर हुए किसी छोटे हादसे को लोग देखते हैं—दिलचस्पी से, लेकिन थोड़ी दूरी बनाकर. हमने सोचा, “आपको शुभकामनाएं. मगर यह आपकी लड़ाई है.”

लेकिन सोमवार की घटनाओं ने यह दूरी खत्म कर दी. जब हमने देखा कि सरकार एक बार फिर अपने ही नागरिकों पर पानी की बौछारें और लाठियां चला रही है, तो हम चुप बैठ नहीं सके. यह सब हममें से कई लोग पहले भी देख चुके थे. रातों-रात एक-दूसरे की मदद करने वाले नेटवर्क फिर से एक्टिव हो गए. मुफ्त में कानूनी मदद देने वाले वकील और डॉक्टर सामने आ गए. खाना और पानी बांटने वाले, प्रदर्शन स्थल की सफाई करने वाले दर्जनों स्वयंसेवक पहुंच गए. जो लोग जंतर-मंतर नहीं जा सकते थे, उन्होंने छोटे-बड़े हर तरीके से आर्थिक मदद की, ताकि आंदोलन कर रहे छात्रों का हौसला बना रहे. और जो जा सकते थे, वे सड़कों पर उतर आए. अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग पहली बार एक साथ दिखाई दिए.

शायद हमें सिर्फ एक वजह चाहिए थी, ताकि हम ज़रूरत से ज्यादा समझदारी दिखाना छोड़ दें. इंस्टाग्राम पर एक AMA (Ask Me Anything) के दौरान किसी ने एक कंटेंट क्रिएटर से पूछा कि आखिर 2026 के इन प्रदर्शनों में मिलेनियल्स ने किया ही क्या? क्रिएटर नाराज़ नहीं हुआ. उसने Gen Z से सीखे उसी मज़ाकिया अंदाज़ में जवाब दिया. उसने कहा, “तुम लोगों के लिए खाना Zomato से कौन भेज रहा था? हम तुम्हारे विरोधियों की इतनी चिंता कर रहे थे कि हमारे अपने लोग हमसे नाराज़ हो गए और हम भी वीकेंड पर जंतर-मंतर आने वाले थे, लेकिन तुम लोगों ने आंदोलन उससे पहले ही खत्म कर दिया.”

यह बात मजेदार इसलिए है क्योंकि इसमें सच्चाई भी है. उसने बिना गंभीर हुए एक तीखे सवाल का जवाब दे दिया. कुछ साल पहले हम शायद इसके जवाब में अपनी पीढ़ी की कुर्बानियों पर लंबा लेख लिख देते, लेकिन अब हम मज़ाक से जवाब देते हैं. यह छोटी बात नहीं है. इससे पता चलता है कि इस महीने दोनों पीढ़ियों ने एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखा है. शायद Gen Z को इसकी ज़रूरत नहीं थी, लेकिन उन्हें एक ऐसे देश का साथ मिला, जिसे अब भी एकजुट होकर खड़ा होना आता है. बदले में उन्होंने हमें वह चीज़ वापस दी, जो 2019 की सर्दियों में हमसे छिन गई थी— यह भरोसा कि डर को भी आंसू गैस के गोले की तरह लात मारकर दूर किया जा सकता है.

अब असली और मुश्किल काम शुरू होता है. आंदोलन की रफ्तार बनाए रखना, लोगों को साथ जोड़कर रखना, मजबूत नेटवर्क बनाना, विचारधारा की छोटी-छोटी लड़ाइयों से आगे बढ़ना, अपने ही साथियों से मुकाबला करने की आदत छोड़ना और इस गुस्से को लंबे समय तक चलने वाले बदलाव में बदलना. यह काम न तो बहुत आकर्षक है, न ही रोमांचक. यह पर्दे के पीछे होने वाला ऐसा काम है, जो किसी वायरल वीडियो या एडिट में नहीं दिखेगा. लेकिन कम से कम एक ऐसी पीढ़ी है, जिसे इस तरह का काम करने का थोड़ा एक्सपीरियंस है.

हम साथ रहेंगे.

करनजीत कौर एक पत्रकार, ‘Arré’ की पूर्व संपादक और ‘TWO Design’ में पार्टनर हैं. वह @Kaju_Katri पर ट्वीट करती हैं. विचार उनके निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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