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Tuesday, 28 July, 2026
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CJP प्रदर्शन: घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों की SC में याचिका, ‘एकतरफा नैरेटिव’ पर उठाए सवाल

ड्यूटी के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के बच्चों और पत्नियों का कहना है कि पुलिसकर्मियों को भी संविधान के तहत समानता और जीवन के अधिकार का पूरा हक है.

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नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उनका कहना है कि अब तक इस मामले में सिर्फ प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर ध्यान दिया गया, जबकि सड़क हिंसा में घायल हुए पुलिसकर्मियों का “मानवीय पक्ष” नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

फिलहाल इस मामले में दो इंटरलोक्यूटरी एप्लिकेशन (IA) दाखिल की गई हैं. एक याचिका चार परिवारों ने और दूसरी पांच परिवारों ने दायर की है.

इन याचिकाओं में पुलिसकर्मियों के बच्चों और पत्नियों ने अपने पिता और पति को लगी चोटों का विवरण दिया है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि पुलिस और कानून-व्यवस्था संभालने वाले कर्मचारी भी अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत, ड्यूटी पर रहते हुए भी कानून की समान सुरक्षा पाने के हकदार हैं.

दोनों याचिकाओं में यह भी मांग की गई है कि कानून-व्यवस्था संभाल रहे पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा भड़काने, उसे बढ़ावा देने और हमला करने वालों की जिम्मेदारी तय की जाए.

चार परिवारों की पहली याचिका में 20 से 25 जुलाई के बीच जंतर-मंतर और दिल्ली के अन्य इलाकों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई हिंसक घटनाओं का जिक्र किया गया है.

याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिसकर्मियों पर बिना किसी उकसावे के भीड़ ने कांच की बोतलें, पत्थर, नुकीली फर्श की टाइलें और अन्य सामान से जानलेवा हमला किया. याचिका में 25 जुलाई को हुई “अचानक और सुनियोजित गुस्से की घटना” का भी जिक्र है. इसमें कहा गया है कि उस समय भी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रतिनिधि सरकार के साथ अंतिम दौर की बातचीत कर रहे थे. परिवारों का दावा है कि घटनाओं का पूरा क्रम यह दिखाता है कि यह हिंसा पहले से रची गई और सुनियोजित थी.

याचिकाकर्ताओं का यह भी आरोप है कि कुछ पुलिस अधिकारियों को भीड़ से अलग कर उनके साथ “मॉब लिंचिंग जैसी कोशिश” की गई.

मेडिकल रिकॉर्ड और अस्पताल से छुट्टी के दस्तावेजों का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि सब-इंस्पेक्टर संदीप कुमार को डंडों और पत्थरों से इतनी बुरी तरह पीटा गया कि उनके सिर पर कई गहरे घाव आए और टांके लगाने पड़े. याचिका के मुताबिक एसीपी कैलाश बिष्ट के सिर पर 5x1x1 सेंटीमीटर का गहरा घाव था और अस्पताल पहुंचने के समय उनकी नाड़ी 130 प्रति मिनट थी.

एएसआई हमेंद्र राठी के चेहरे के बाईं तरफ दो फ्रैक्चर और कूल्हे के पास एक हल्का फ्रैक्चर हुआ. वहीं कांस्टेबल धीरज के सिर पर गंभीर चोट और शरीर के मुलायम हिस्सों में चोटें आईं. याचिकाकर्ताओं का दावा है कि हिंसा के अलग-अलग दिनों में करीब 150 से 200 महिला और पुरुष पुलिसकर्मी घायल हुए.

अधिवक्ता डी.वी. रघुवंशी के जरिए दायर इस याचिका में मांग की गई है कि उन्हें ‘हिमांशु बनाम भारत सरकार’ वाली आपराधिक रिट याचिका में पक्षकार बनाया जाए. इस रिट में 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की गई है.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अदालत के सामने पूरा तथ्यात्मक पक्ष आना चाहिए और घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की बात भी सुनी जानी चाहिए. उनका कहना है कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार ड्यूटी कर रहे सरकारी कर्मचारियों पर भी समान रूप से लागू होता है. इसके अलावा उन्होंने केंद्र सरकार को यह निर्देश देने की भी मांग की है कि ड्यूटी के दौरान महिला और पुरुष पुलिसकर्मियों को हमलों से बचाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए जाएं.

5 परिवारों की अर्जी

दूसरी अर्जी पांच अधिकारियों—इंस्पेक्टर नंद किशोर सिंह, हेड कांस्टेबल राजेंद्र कुमार मीणा, ASI विनोद कुमार, ASI धर्मेंद्र सिंह सिद्धू और SI अशोक कुमार मीणा—के रिश्तेदारों ने फाइल की है, जो कथित तौर पर प्रोटेस्ट साइट पर ड्यूटी के दौरान घायल हो गए थे. अर्जी में कहा गया है कि वे लॉ-एनफोर्समेंट एजेंसियों और कर्मचारियों के खिलाफ ओरिजिनल अर्जी (हिमांशु बनाम UOI) में की गई प्रार्थनाओं से “सीधे तौर पर प्रभावित” हैं.

एप्लीकेंट इस बात पर गहरी चिंता जताते हैं कि उनके हिसाब से “यूनिफॉर्म पहने अधिकारियों के खिलाफ एकतरफा कहानी बनाई जा रही है”.

उनका आरोप है कि जब अधिकारी लॉ एंड ऑर्डर बनाए हुए थे, तो उन्हें “बिना उकसावे के हिंसा का सामना करना पड़ा और उन्हें भीड़ ने अलग करके खदेड़ दिया” जिसमें कुछ ऐसे तत्व शामिल थे जिन्होंने “शांतिपूर्ण प्रोटेस्टर के रूप में खुद को छिपा रखा था”.

एडवोकेट सृष्टि मिश्रा की फाइल की गई इस एप्लीकेशन में, जिसे सीनियर एडवोकेट श्रीधर पोताराजू और एडवोकेट नेहा कोहली ने रिप्रेजेंट किया, हमलों के “क्रूर” नेचर पर ज़ोर दिया गया है. इसमें कहा गया है कि इंस्पेक्टर नंद किशोर सिंह को “लाठियों और डंडों से बेरहमी से पीटा गया” और उनके सिर और चेहरे पर गंभीर चोटें आईं.

इसी तरह, दूसरे पुलिसवालों को भी अंदरूनी चोटें, खरोंचें और सिर में चोट लगी, ऐसा अर्जी में कहा गया है, साथ ही सबूत के तौर पर मेडिको-लीगल केस (MLC) रिपोर्ट और तस्वीरें भी लगाई गई हैं.

वे केंद्र सरकार को ड्यूटी के दौरान वर्दी पहने पुरुषों और महिलाओं को हमले और धमकी से बचाने के लिए एक पूरी पॉलिसी और गाइडलाइन बनाने और लागू करने के निर्देश भी मांगते हैं.

साथ ही, वे मांग करते हैं कि पुलिस के खिलाफ हिंसा के कामों को “उकसाने, भड़काने, बढ़ावा देने…या ऑर्केस्ट्रेट करने” के लिए ज़िम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए.

परिवारों का कहना है कि विरोध करने का अधिकार “शारीरिक नुकसान पहुंचाने की खुली छूट” या सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ हिंसा करने की छूट नहीं है, उन्होंने कोर्ट से अपील की कि वह उन लोगों के “इंसानी पक्ष” पर भी विचार करे, जिन्हें पब्लिक ऑर्डर बनाए रखने की कोशिश करते हुए तकलीफ हुई.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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