नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली पुलिस और बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल और केरल सरकारों को आदेश दिया कि जिन छात्रों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और जिन्हें 20 जुलाई के ‘चलो संसद’ प्रदर्शन या उसके बाद गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया था, उन्हें तुरंत रिहा किया जाए.
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने दिल्ली और इन सात राज्यों की पुलिस को यह भी आदेश दिया कि प्रदर्शन के दौरान की सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन फुटेज, बॉडी-वॉर्न कैमरा रिकॉर्डिंग, वायरलेस कम्युनिकेशन और PCR लॉग सुरक्षित रखे जाएं.
अदालत नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) पेपर लीक के विरोध में हुए छात्र आंदोलन के दौरान हिंसा की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल पुलिस को यह भी निर्देश दिया कि प्रदर्शन करने वाले छात्रों का डेटा और उनकी निजी जानकारी सार्वजनिक न की जाए.
बेंच ने संकेत दिया कि प्रदर्शनकारियों, 20 जुलाई की हिंसा में घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवारों और केंद्र सरकार की चिंताओं पर विचार करने के लिए एक जांच समिति बनाई जाएगी. अदालत ने कहा कि इस समिति की अध्यक्षता संभव हो तो किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश को सौंपी जाएगी.
अदालत ने कहा कि दिल्ली पुलिस अपनी जांच जारी रख सकती है, लेकिन किसी भी छात्र के खिलाफ फिलहाल कोई सख्त (जबरन) कार्रवाई नहीं करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को यह छूट भी दी कि वह चाहे तो दर्ज मामलों को वापस ले सकती है. हालांकि, जिन लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड है या जो असामाजिक तत्व पाए जाते हैं, उनके खिलाफ पुलिस अपनी जांच जारी रख सकती है.
याचिकाकर्ताओं, घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों, केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की दलीलें सुनने के बाद बेंच ने अपने आदेश में कहा, “याचिकाकर्ताओं के आरोप पहली नजर में हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की ज़रूरत बताते हैं. ऐसी जांच से पुलिसकर्मियों के आरोपों और सॉलिसिटर जनरल द्वारा उठाई गई चिंताओं की भी सही तरीके से जांच हो सकेगी.”
हालांकि, अदालत ने कहा कि वह शुरुआती राय के आधार पर कोई अंतिम आदेश नहीं देना चाहती. इसलिए उसने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से इन आरोपों पर औपचारिक जवाब मांगा है. ये आरोप 20 जुलाई को पुलिस द्वारा कथित तौर पर ज़रूरत से ज्यादा बल प्रयोग और सात राज्यों में हुई ऐसी ही घटनाओं से जुड़े हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया. साथ ही सातों राज्यों के मुख्य सचिवों को 3 अगस्त, अगली सुनवाई की तारीख पर पेश होने का निर्देश दिया. वे चाहें तो अपने वकीलों के जरिए भी पेश हो सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर हाल में हुए युवाओं, खासकर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा पर गंभीर चिंता जताई. अदालत ने कहा कि यह हिंसा दूसरे राज्यों तक भी फैली और कई राज्यों से नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हुए पुलिस द्वारा जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग की शिकायतें मिली हैं.
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि उसके सामने रखी गई घटनाओं की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए. कानून अपना काम करे और जिम्मेदारी तय की जाए.
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने दिल्ली पुलिस पर अंधाधुंध और जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के कई आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन, लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया.
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिंसा में सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मी शामिल थे. वर्दी में मौजूद पुलिसकर्मियों ने भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया. अदालत को यह भी बताया गया कि 20 जुलाई को प्रदर्शन स्थल पर कोई निषेधाज्ञा (प्रतिबंधात्मक आदेश) लागू नहीं थी.
बेंच ने घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की ओर से पेश वकील की भी दलील सुनी. उन्होंने कहा कि प्रदर्शन में कई असामाजिक तत्व शामिल हो गए थे, जिन्होंने पुलिस पर हमला किया और कई पुलिसकर्मियों को गंभीर रूप से घायल कर दिया.
दोनों पक्षों ने हिंसा के सबूत के तौर पर तस्वीरें और पेन ड्राइव अदालत को सौंपीं.
इस दौरान केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत द्वारा सुझाई गई निष्पक्ष जांच पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. हालांकि, उन्होंने पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के आरोपों से इनकार किया और कहा कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद आदतन अपराधियों और अवांछित तत्वों ने हिंसा की थी.
मेहता ने कहा कि 200 से ज्यादा पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए. उन्होंने अदालत से कहा, “अगर छात्रों पर हमला हुआ है तो यह गंभीर मामला है और सरकार इसे हल्के में नहीं ले सकती.”
इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि पुलिस थानों के लॉग बुक, जनरल डायरी और यह रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखा जाए कि ‘संसद चलो’ प्रदर्शन वाले दिन हथियार और गोला-बारूद किसके आदेश पर जारी किए गए थे.
सुप्रीम कोर्ट से यह भी अनुरोध किया गया कि दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया जाए कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हमला झेलने वाले छात्र अपनी शिकायतें ऑनलाइन (ई-रजिस्ट्रेशन) दर्ज कर सकें. अदालत को बताया गया कि दिल्ली पुलिस के पोर्टल पर फिलहाल चोरी जैसे मामलों की ऑनलाइन शिकायत दर्ज की जा सकती है. अगर यह सुविधा खोली जाती है तो छात्रों को शिकायत दर्ज कराने के लिए थाने जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
सुनवाई के दौरान बेंच ने पुलिसकर्मियों के पास पर्याप्त सुरक्षा उपकरण न होने पर भी मौखिक टिप्पणी की. अदालत ने कहा, “हमले के लिए इस्तेमाल होने वाले उपकरणों से ज्यादा जरूरी सुरक्षा के उपकरण हैं.”
इस पर याचिकाकर्ताओं के वकील ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध पूरी पुलिस से नहीं है. उन्होंने कहा कि उनका मकसद किसी पर उंगली उठाना नहीं है. उनकी शिकायत सिर्फ उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई न होने को लेकर है, जो वर्दी में नहीं थे और जिन्होंने छात्रों पर हमला किया.
अदालत को यह भी बताया गया कि प्रदर्शन स्थल पर लगाए गए फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम के जरिए पुलिस ने छात्रों का डेटा इकट्ठा किया. इस डेटा का मिलान आधार से करके छात्रों की पहचान की गई और अब दिल्ली पुलिस उन्हें बयान दर्ज कराने के लिए नोटिस भेज रही है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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