ऐसा लगता है कि भारत-चीन संबंधों में अब ज्यादा स्थिरता आने वाली है. सीमा विवाद पर दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच 25 अगस्त को हुई बातचीत के बाद 12 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत हुई. दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति और धैर्य बनाए रखने के साथ-साथ व्यापक संबंधों को सुधारने और सीमा के सीमांकन और सीमा रेखा के प्रबंधन के मामले में ‘जल्द और महत्वपूर्ण’ बातचीत करने की बात कही है. दो एक्स्ट्रा हॉटलाइन और बातचीत के लिए जगह बनाने के अलावा नई सैन्य संचार व्यवस्था भी स्थापित की जा रही है.
लेकिन सीमा विवाद पर बातचीत से यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि समझौता होने ही वाला है. मूल समस्या यह है कि भारत और चीन, दोनों अपने-अपने हिस्से में ज्यादा ज़मीन पर दावा करते आ रहे हैं. भारत आज़ादी के वक्त मिली सीमा को ही मानता है, जिसमें पूर्व में मैकमोहन रेखा शामिल है और वह उस रेखा तक के इलाके पर अपना दावा करता है. चीन इसका विरोध करता है और अरुणाचल प्रदेश को जंगनान (दक्षिण तिब्बत) बताता है. वहीं लद्दाख में वह 1959 की अपनी दावा रेखा तक के इलाके पर अपना दावा करता है. यह दावा रेखा काफी हद तक मौजूदा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) से मिलती है. शायद ही कोई कारण है कि दोनों के बिल्कुल अलग-अलग मूल दावों के चलते बातचीत से निकट भविष्य में कोई समाधान निकल सके.
दोनों देश परमाणु शक्ति हैं और दोनों के पास बड़ी पारंपरिक सेनाएं हैं. इसलिए बड़े पैमाने पर युद्ध करके कोई एक पक्ष बड़े इलाके पर कब्ज़ा कर लेगा, इसकी संभावना काफी कम है. ज्यादा वास्तविक खतरा यह है कि दोनों के बीच LAC पर, जिसका निर्धारण तो दूर, सीमांकन तक नहीं हुआ है, युद्ध से नीचे के स्तर पर टकराव जारी रहे. इस अस्पष्टता का फायदा उठाकर चीन भारत को परेशान करता रहा है और जिन इलाकों पर वास्तविक कब्जा नहीं था, बल्कि जहां गश्त की जाती थी, वहां घुसकर अपना दबदबा दिखाता रहा है ताकि LAC में बदलाव हो जाए. इसके उदाहरण हैं—1986-87 में सुमद्रोंग चु, 2013 में देप्सांग, 2014 में चूमर, 2020-24 में पूर्वी लद्दाख के पांच इलाके, 2022 में यांग्त्जे रिज और 2026 में ताक्सिंग.
ऐसे मामलों में ज़रूरी है कि भारत नया तरीका अपनाए. यानी संबंधों को सुधारने और सीमा विवाद पर बातचीत करने की कोशिश जारी रखे और इसके साथ ‘इनकार की रणनीति’ अपनाकर एलएसी का प्रबंधन करे. यानी चीन को जीत हासिल करने से रोके.
सीमा विवाद का निपटारा और LAC का प्रबंधन
सीमा विवाद का निपटारा और एलएसी का प्रबंधन आपस में जुड़ी हुई समस्याएं हैं. खासकर इसलिए क्योंकि आखिर में जो सीमा समझौता होगा, वह ऊपर बताए गए कारणों से मौजूदा एलएसी के व्यापक स्वरूप पर ही आधारित होगा, लेकिन एलएसी का रोजाना प्रबंधन करना होगा. यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है.
एलएसी के प्रबंधन में सबसे ज़रूरी सवाल यह है कि जमीन पर क्या हो रहा है, गश्त कौन कर रहा है, वहां कौन मौजूद है जो इस सीमा रेखा का सम्मान करवाए और दूसरे पक्ष को नई स्थिति बनाने से रोके.
इस अस्पष्ट इलाके में कार्रवाई करने के मामले में चीन बार-बार अपनी बढ़त दिखाता रहा है. उसकी रणनीति में भारत की तय रक्षात्मक स्थिति पर पारंपरिक तरीके से हमला करना शामिल नहीं है. ज्यादा असरदार तरीका यह है कि उन इलाकों का फायदा उठाया जाए जहां भारत की मौजूदगी नहीं है, उसका निगरानी तंत्र या बुनियादी ढांचा मौजूद नहीं है या कमजोर है, या जहां एलएसी को लेकर विवाद है. ऐसे में भारत के पास बदलाव को स्वीकार करने या उसका सैन्य जवाब देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता. जिस बड़ी ताकत को इस क्षेत्र में भारी बढ़त हासिल है, उससे सैन्य तनाव बढ़ने का खतरा हर तरफ बना रहता है.
टुकड़ों में काटकर कमजोर करने यानी ‘सलामी स्लाइसिंग’ की रणनीति का सार यही है. ज़रूरी नहीं कि लक्ष्य ज़मीन पर बड़े पैमाने पर कब्जा करना हो. इस रणनीति के तहत छोटी-छोटी बढ़त हासिल की जाती है और हर कार्रवाई को युद्ध से नीचे के स्तर पर रखा जाता है, ताकि भारत को बड़ा सैन्य जवाब देने का बहाना न मिले. लेकिन किसी बड़ी ताकत से चुपचाप सहमत होते दिखना भारत की इज्ज़त को नुकसान पहुंचाता है.
ताक्सिंग एक चेतावनी है
अरुणाचल प्रदेश के ताक्सिंग में हाल में जो कुछ हुआ, वह सीमा प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत को एक बार फिर सामने लाता है.
जुलाई के आखिरी दिनों में अपर सुबनसिरी के ताक्सिंग इलाके में भारत और चीन के गश्ती सैनिक कथित तौर पर आमने-सामने आ गए. इस टकराव के बाद भारतीय सैनिकों की गश्त कथित तौर पर रुक गई. अरुणाचल प्रदेश में कोर कमांडरों की पहली फ्लैग मीटिंग वाचा और दमई में क्रमशः 6 और 7 सितंबर को हुई.
एक तरफ 25 अगस्त को दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधि अजित डोभाल और वांग यी और 12 सितंबर को मोदी और शी बैठकें कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कथित घुसपैठ और टकराव चल रहा था. यह गंभीर चिंता का विषय है.
व्यापक संबंधों में सुधार के बावजूद LAC तब तक विस्फोटक बनी रहेगी, जब तक सीमा विवाद का अंतिम समाधान नहीं होता और फिलहाल इसकी कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही है.
यहां यह बताना सही होगा कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अक्टूबर 2013 में ‘बॉर्डर डिफेंस को-ऑपरेशन एग्रीमेंट 2013’ पर औपचारिक दस्तखत होने के बाद भी ऐसी बड़ी घटनाएं और टकराव हुए हैं.
जीत हासिल करने से इनकार
टुकड़ों-टुकड़ों में बढ़त लेने की चीनी रणनीति के खिलाफ भारत का जवाब अक्सर प्रतिक्रिया देने तक सीमित रहा है. चीनी सेना यानी PLA का कोई गश्ती दल जब विवादित इलाके में घुसता है, तो उसका मुकाबला करने के लिए वहां भारतीय सेना की तैनाती की जाती है, लेकिन टकराव से बचने के लिए उस दल को वहां से हटाया नहीं जाता. कमांडरों की बैठक होती है, कूटनीतिक माध्यमों को सक्रिय किया जाता है और तुलनात्मक रूप से कमजोर स्थिति में रहकर बातचीत की जाती है. आखिर में नतीजा यह होता है कि जिस इलाके पर पहले भारतीय सेना का कब्जा था और जहां वह गश्त करती थी, उसे रियायत के तौर पर सैन्य कार्रवाई से मुक्त बफर जोन घोषित कर दिया जाता है. पूर्वी लद्दाख में 2020-24 के दौरान जो कुछ हुआ, वह इसका सटीक उदाहरण है.
भारत अब तक संकट का समाधान करने की कार्रवाई करता रहा है. इसमें प्रतिद्वंद्वी को जीतने से रोककर उसमें डर पैदा करने यानी ‘deterrence by denial’ की रणनीति का कोई इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसका लक्ष्य यह है कि चीन जब भी कार्रवाई करे, तब उसके खिलाफ जवाबी कार्रवाई की चेतावनी देने के बजाय पहली कोशिश यह हो कि उसकी कार्रवाई को सफल ही न होने दिया जाए.
पहली ज़रूरत है कि सीमा के आखिरी छोर तक पहुंचने की व्यवस्था की जाए. अग्रिम मोर्चे सड़कों से जुड़े न हों, यह नहीं चल सकता. यह नागरिक प्रशासन के लिए भी ज़रूरी है और सैन्य नज़रिए से भी. सड़कों की कमी दुश्मन को रोकने और उसे जवाब देने के लिए सेना की तैनाती में बाधा बनती है. यही वजह है कि चीन अपनी शानदार सड़कों के सहारे आगे बढ़त लेने में सफल रहता है. सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास अपने आप दुश्मन के लिए एक बाधा बनता है. इससे नागरिक प्रशासन, विकास और पर्यटन के अलावा क्षेत्रीय सुरक्षा भी मजबूत होती है.
दूसरी ज़रूरत सीमा पर लगातार मौजूदगी की है. ऊंचाई वाले इलाकों में आगे बढ़ने के रास्ते और रणनीतिक जगहें साफ हैं. इन्हें इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस यानी आईटीबीपी की चौकियों से जोड़ना चाहिए. यहां यह बताना सही होगा कि नाथू ला में 1967 में हुई घटना के बाद से चीन ने ITBP या सेना की चौकियों पर कभी हमला नहीं किया और आगे बढ़ने के लिए खाली इलाकों का ही फायदा उठाया है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 3,488 किलोमीटर लंबी उत्तरी सीमा पर ITBP की कुल 195 चौकियां हैं. मेरे विचार से इन चौकियों की संख्या तीन गुना की जानी चाहिए, जहां स्थायी तैनाती नहीं की जा सकती, वहां टेक्नोलॉजी से इसकी भरपाई की जानी चाहिए.
तीसरी ज़रूरत लगातार निगरानी की है. चीन बार-बार मुख्य रूप से इसलिए घुसपैठ करता है क्योंकि हमारी खुफिया, निगरानी और टोही व्यवस्था नाकाम रही है. LAC को केवल चौकियों और गश्त के सहारे नहीं संभाला जा सकता. सैटेलाइट, मजबूत UAV, सामरिक ड्रोन, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर, जमीन पर निगरानी करने वाले सिस्टम और मजबूत संचार व्यवस्था मिलकर सामरिक यूनिट से लेकर थिएटर मुख्यालय तक लगातार ऑपरेशन की एक साझा तस्वीर उपलब्ध कराएं. सिद्धांत सीधा होना चाहिए: LAC पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण निगरानी व्यवस्था में कोई कमी नहीं होनी चाहिए.
चौथी ज़रूरत है: ‘रैपिड एक्शन रिजर्व’. हर जगह पूरी ताकत के साथ सेना की तैनाती करना व्यावहारिक नहीं है. लेकिन चीन को दूरदराज के किसी खाली इलाके का फायदा उठाने या किसी छोटी चौकी पर कब्जा करने नहीं दिया जा सकता और न ही अतिरिक्त सेना के पहुंचने से पहले उसे अपनी स्थिति मजबूत करने दी जा सकती है. जिस सेक्टर पर खतरा हो, उसके लिए सही हथियारों से लैस, अग्रिम मोर्चे पर तैनात और उस इलाके की स्थिति से अच्छी तरह परिचित रिजर्व फोर्स उपलब्ध होनी चाहिए. उसे संबंधित वायुसेना और मजबूत ‘ISR’ का समर्थन हासिल हो. लक्ष्य होना चाहिए: कम संख्या में तैनात सेना के साथ तेज़ी से सामूहिक युद्ध करने वाली ताकत का मेल तैयार करना.
पांचवीं ज़रूरत स्पष्ट लाइन की है. पूर्वी लद्दाख में अप्रैल-मई 2020 में हुए कई समझौतों के बाद LAC/1959 की दावा रेखा के वास्तविक निरूपण के कारण संकट पैदा हुआ. अरुणाचल प्रदेश में मैकमोहन रेखा पहले से ही एक निर्देश चिह्न के रूप में मौजूद है. LAC को लेकर धारणाओं में अंतर ‘स्मॉल स्केल’ नक्शों पर खींची गई मोटी रेखा की वजह से है, जिसे ‘लार्ज स्केल’ वाले नक्शों पर उतारने से धारणाओं में अंतर पैदा होता है. समय बीतने के साथ ये सभी इलाके काफी परिचित हो चुके हैं.
भारत को ‘वर्किंग मेकनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड को-ऑर्डिनेशन ऑन इंडिया-चाइना बॉर्डर अफेयर्स’ के जरिए LAC का निरूपण करवाने की सक्रिय कोशिश करनी चाहिए. अगर यह नहीं हो पाता है तो उसे LAC के निरूपण की एकतरफा औपचारिक घोषणा करनी चाहिए और निशानों के साथ नक्शा चीन को सौंपना चाहिए. इससे LAC को ज़मीन पर मौजूद सीमा रेखा के रूप में स्थापित किया जा सकेगा, जिसका उल्लंघन उचित सैन्य जवाब को बुलावा देगा. इस जवाबी कार्रवाई के लिए ज़रूरी सेना क्षेत्रीय ‘रैपिड एक्शन रिजर्व’ के रूप में तुरंत उपलब्ध रहनी चाहिए. सैन्य जवाब की निश्चितता डर पैदा करेगी, भले ही सेना का इस्तेमाल सामरिक स्थिति पर निर्भर हो.
छठी जरूरत यह है कि LAC से लगे इलाकों में ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ को तेजी से लागू किया जाए और सीमावर्ती इलाकों को पर्यटन के लिए खोला जाए. बसी हुई आबादी और लोगों की आवाजाही उग्र गतिविधियों पर रोक लगाती है, जैसा कि 2005 के ‘एग्रीमेंट ऑन द पॉलिटिकल पैरामीटर्स एंड गाइडिंग प्रिंसिपल्स फॉर सेटलमेंट ऑफ इंडिया-चाइना बाउंड्री क्वेश्चन’ में कहा गया है कि “सीमा समझौते में दोनों पक्षों को सीमावर्ती इलाकों में बसे लोगों के हितों की सुरक्षा करनी चाहिए.”
भारत अगली अनहोनी को होने न दे
‘deterrence by denial’ की रणनीति को टकराव की रणनीति समझने की गलती नहीं करनी चाहिए. भारत को हर स्तर की बातचीत जारी रखनी चाहिए. भारत यह तय नहीं कर सकता कि सीमा को लेकर उसके दावों को चीन आखिरकार मानेगा या नहीं. न ही वह यह तय कर सकता है कि बातचीत कितनी लंबी चल सकती है.
लेकिन भारत यह जरूर तय कर सकता है कि चीन भारत के सीमा प्रबंधन की कमियों का फायदा न उठा सके.
लक्ष्य हर विवादित ज़मीन पर कब्ज़ा करके चीन को उकसाना या सैन्य टकराव पैदा करना नहीं होना चाहिए. लक्ष्य यह होना चाहिए कि कोई भी पक्ष एकतरफा तरीके से मौजूदा स्थिति को बदलने की कोशिश न कर पाए और दूसरे पक्ष को उस स्थिति का नुकसान उठाने के लिए मजबूर न करे.
पूर्वी लद्दाख में मिले अनुभव से भारत को यह सबक मिल जाना चाहिए कि एक बार मौजूदा स्थिति बदल जाने के बाद उसे वापस पहले जैसा करना, उसे बदलने से रोकने की तुलना में ज्यादा महंगा है. ताक्सिंग का अनुभव याद दिलाता है कि इस सबक का इस्तेमाल केवल लद्दाख ही नहीं, बल्कि पूरी LAC के मामले में किया जाना चाहिए.
बातचीत से आखिरकार सीमा विवाद का समाधान हो सकता है. तब तक भारत को LAC को इस तरह संभालना चाहिए, जैसे यह विवाद अनिश्चित समय तक चलने वाला है.
चीन के साथ बातचीत ऐसे करें जैसे समाधान कल ही होने वाला है; LAC का प्रबंधन इस तरह करें जैसे समाधान होने में एक पीढ़ी लग जाएगी. पहले विकल्प के लिए कूटनीति की जरूरत होगी, दूसरे विकल्प के लिए दूसरे पक्ष को ‘deterrence by denial’ की रणनीति से डर पैदा करने की जरूरत होगी.
लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में GOC थे. रिटायरमेंट के बाद वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. उनका एक्स हैंडल @rwac48 है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.
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