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Thursday, 17 September, 2026
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केंद्र का गोरखालैंड के लिए ‘स्थायी’ समाधान इतना आसान नहीं, 38 साल से समझौते और टकराव

केंद्र जब गोरखालैंड के लिए ‘स्थायी राजनीतिक समाधान’ खोजने की कोशिश कर रहा है, तब यह नहीं भूलना चाहिए कि पांचवीं और छठी अनुसूची ठीक इसी तरह के मुद्दों के लिए बनाई गई थीं.

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दार्जिलिंग में गोरखालैंड आंदोलन का पहला दौर एक समझौते के साथ खत्म हुआ था, लेकिन यह समझौता ज्यादा समय तक नहीं चला. दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल के समझौता ज्ञापन में शामिल तीनों पक्षों के अपने-अपने कारण थे. इस समझौते पर 22 अगस्त 1988 को कोलकाता के राजभवन में हस्ताक्षर हुए थे. इसमें भारत सरकार की ओर से केंद्रीय गृह सचिव जी.सी. सोमैया, पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से मुख्य सचिव आर.एन. सेनगुप्ता और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) के प्रमुख सुभाष घीसिंग शामिल थे.

समझौते के गारंटर के तौर पर काम करते हुए केंद्र ने यह सुनिश्चित किया कि GNLF ने गोरखालैंड के लिए संप्रभु या अलग राज्य की अपनी मांग औपचारिक रूप से छोड़ दी. इसके बदले राज्य के कानून के तहत एक अर्ध-स्वायत्त पहाड़ी परिषद बनाई गई. केंद्र सरकार घीसिंग की ओर से गोरखालैंड आंदोलन के लिए बड़ी संख्या में पूर्व सैनिकों को जुटाए जाने को लेकर चिंतित थी. खास तौर पर जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद रामगढ़ छावनी में सिख रेजिमेंटल सेंटर से सिख सैनिकों के एक समूह के चले जाने की घटना को देखते हुए यह चिंता और बढ़ गई थी.

वहीं, बंगाल की वाम मोर्चा सरकार राज्य की क्षेत्रीय एकता बनाए रखने में सफल रही थी. दार्जिलिंग में किसी तरह की रियायत देने से झारग्राम, बांकुड़ा और पुरुलिया के आसपास के इलाकों में संथाल, मुंडा, भूमिज और लोधा समुदायों की ओर से ‘जंगल महल’ की ऐसी ही मांगें उठ सकती थीं. इसके अलावा उत्तर बंगाल के कूचबिहार, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार जिलों में राजबंशियों की ओर से भी ऐसी मांगें उठ सकती थीं.

वाम मोर्चे के अंदर एक प्रभावशाली धड़ा, खास तौर पर उत्तर बंगाल का गुट, इस समझौते को कुछ समय के लिए राहत देने वाला कदम मानता था. उसका मकसद उस समय तक का वक्त हासिल करना था, जब तक CPM के कार्यकर्ता चाय बागानों और मजदूर यूनियनों पर दोबारा नियंत्रण हासिल नहीं कर लेते और इस तरह दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) पर भी ‘कब्जा’ कर लेते. यह उसी तरह होता, जैसे मालदा और मुर्शिदाबाद को छोड़कर पश्चिम बंगाल की सभी जिला परिषदों पर उनका कंट्रोल था.

जहां तक पूर्व सैनिक घीसिंग की बात है, उन्हें न सिर्फ बिना किसी स्पष्ट सीमा के अधिकारों वाली एक परिषद मिली, बल्कि राज्य मंत्री का प्रोटोकॉल और दर्जा भी मिला. इसके साथ उन्हें पायलट और सुरक्षा के लिए एस्कॉर्ट दिया गया. कोलकाता और नई दिल्ली में दो अलग गोरखा भवन भी उन्हें मिले.

1988 के DGHC Act के तहत परिषद को दिए गए अधिकार सामान्य जिला परिषद के अधिकारों से काफी ज्यादा थे. DGHC को 20 से ज्यादा विषयों की जिम्मेदारी दी गई थी. इनमें पहाड़ी सड़कें और लोक निर्माण, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा, पर्यटन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और अस्पताल और छोटे उद्योग शामिल थे. परिषद के पास अपना अलग काउंसिल फंड भी था. इसमें राज्य और केंद्र सरकारों की ओर से सीधे संयुक्त बजट से राशि देने का प्रावधान था.

परिषद को अपना प्रिंसिपल सेक्रेटरी और स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि आदि विकास विभागों के लिए सचिव भी मिले. लेकिन DGHC का इन पैसों या अधिकारियों पर सीधा नियंत्रण नहीं था. DGHC के सभी प्रस्ताव हिल अफेयर्स डिपार्टमेंट को भेजे जाते थे और ज्यादातर मामलों में इस विभाग का प्रभार गृह सचिव के पास होता था.

ऑन-ग्राउंड अमल

राज्य के दूसरे जिलों के उलट, जहां वाम मोर्चा सरकार ने विकास प्रशासन का प्रभावी नियंत्रण चुनी हुई पंचायतों को दे दिया था और BDO को कार्यकारी अधिकारी बनाया था, DGHC के मामले में ऐसा नहीं था. राजस्व और पुलिस अधिकारी भी परिषद के नियंत्रण में नहीं थे. इस वजह से दार्जिलिंग का डीएम ढांचे के हिसाब से परिषद के अध्यक्ष से ज्यादा ताकतवर था. वहीं, परिषद के अध्यक्ष का अधिकार क्षेत्र पूरे जिले तक भी नहीं था.

उस समय घीसिंग इस ढांचे की इस समस्या को समझते थे या नहीं, यह साफ नहीं है. वह अपनी लोकप्रियता का पूरा आनंद ले रहे थे. कांग्रेस और सीपीएम दोनों ही दार्जिलिंग लोकसभा सीट के लिए उनका समर्थन हासिल करना चाहती थीं. 1989 और 1991 में उन्होंने इंदर जीत को समर्थन दिया. पहले GNLF उम्मीदवार के तौर पर और फिर कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर. इसके बाद 1996, 1998 और 1999 के अगले तीन चुनावों में उन्होंने सीधे तौर पर नहीं, लेकिन सीपीएम उम्मीदवारों रत्न बहादुर राय, आनंद पाठक और एस.पी. लेपचा का समर्थन किया.

इस समय तक घीसिंग को यह भी समझ आ गया था कि पश्चिम बंगाल के कानून के तहत DGHC चलाना काफी मुश्किल है. इसलिए उन्होंने छठी अनुसूची का दर्जा पाने की कोशिश शुरू कर दी. मार्च 2004 में DGHC के प्रमुख के तौर पर उनका तीसरा कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें इसका एकमात्र कार्यवाहक प्रशासक नियुक्त किया गया. सीपीएम और कांग्रेस दोनों ने दार्जिलिंग हिल काउंसिल को छठी अनुसूची का दर्जा देने की उनकी मांग का समर्थन किया.

2007 में लोकसभा में संविधान (107वां संशोधन) विधेयक पेश किया गया. इसका मकसद गोरखा हिल काउंसिल, दार्जिलिंग बनाने के जरिए दार्जिलिंग के पहाड़ी इलाकों को छठी अनुसूची के तहत लाना था. साथ ही गैर-आदिवासियों के मौजूदा प्रतिनिधित्व और अधिकारों को सुरक्षित रखना था. इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 244 और 332 में संशोधन करना पड़ता. लेकिन बीजेपी ने इसका विरोध किया.

इस बीच, पहाड़ों में घीसिंग का प्रभाव कम हो गया था. वहीं नंदीग्राम और सिंगूर के बाद सीपीएम की स्थिति भी कमजोर हो गई थी.

घीसिंग के पूर्व करीबी सहयोगी बिमल गुरुंग ने 2007 में GNLF से अलग होकर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) बनाया. उनका कहना था कि अलग गोरखालैंड राज्य के अंतिम लक्ष्य के मुकाबले छठी अनुसूची पर्याप्त नहीं थी. उन्होंने घीसिंग पर समझौता करने का आरोप लगाया.

विडंबना यह रही कि GJM ने अपना नेतृत्व मजबूत करने के बाद केंद्र और राज्य सरकारों के साथ तीन पक्षों की बातचीत शुरू की. कुछ समय के लिए वह अंतरिम व्यवस्था के तौर पर छठी अनुसूची का दर्जा स्वीकार करने पर भी राजी हो गया. 2008 में DGHC को छठी अनुसूची का दर्जा देने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी किए गए.

2009 में गुरुंग के नेतृत्व वाले GJM ने दार्जिलिंग लोकसभा सीट के लिए बीजेपी को समर्थन दिया. इसके लिए पार्टी ने इस बात पर सहमति जताई थी कि वह “गोरखाओं, आदिवासियों और दार्जिलिंग जिले और डूआर्स क्षेत्र के अन्य लोगों की लंबे समय से लंबित मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी और उचित तरीके से उन्हें देखेगी” — यानी अलग राज्य के दर्जे को छोड़कर बाकी सभी मांगों पर.

छठी अनुसूची का दर्जा अधर में

ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने के बाद, विधानसभा और मैदानी इलाकों के बंगाली भाषी समूहों के बीच छठी अनुसूची के दर्जे के मुद्दे को कड़े राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा. GJM छठी अनुसूची की मांग से पीछे हट गया और आखिरकार 2012 में गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) पर सहमत हो गया.

GTA के पास औपचारिक रूप से 59 विभागों का नियंत्रण था. DGHC के तहत करीब 20 से कुछ ज्यादा विषयों की तुलना में यह काफी ज्यादा था. सार्वजनिक स्वास्थ्य, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा, पर्यटन, इंजीनियरिंग और खेल जैसे प्रमुख क्षेत्रों को एक ही क्षेत्रीय प्रशासनिक व्यवस्था के तहत लाया गया. हालांकि, कानून-व्यवस्था, पुलिस, सामान्य प्रशासन और भूमि राजस्व जैसे विषय पश्चिम बंगाल सरकार के पास ही रहे. यह पुराने DGHC की ढांचागत सीमाओं जैसा ही था.

तनाव तब भी सामने आया, जब ममता बनर्जी ने 2013 की शुरुआत में मायेल लियांग लेपचा विकास बोर्ड बनाने की घोषणा की. इसके बाद पहाड़ों के दूसरे समुदायों, जिनमें तमांग, शेरपा और भूटिया समुदाय शामिल थे, के लिए भी बोर्ड बनाए गए. GTA का कहना था कि इन घोषणाओं का मकसद पहाड़ी समुदायों के बीच फूट पैदा करना था.

मई 2017 में बनर्जी की सभी स्कूलों में बांग्ला को अनिवार्य करने की घोषणा के बाद पहाड़ों में फिर बड़ा आंदोलन शुरू हो गया. इसके साथ ही 2017 के GTA चुनाव रद्द कर दिए गए और एक बार फिर अशांति शुरू हो गई.

हालांकि, 2022 में चुनाव हुए, लेकिन प्रमुख राजनीतिक ताकतों ने चुनाव से दूरी बनाए रखी. बिमल गुरुंग के GJM ने आधिकारिक तौर पर चुनाव का बहिष्कार किया, जबकि BJP-GNLF गठबंधन ने इसका विरोध किया. इससे TMC समर्थित भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (BGPM) के लिए GTA में स्पष्ट बहुमत हासिल करने का रास्ता साफ हो गया. इसका नेतृत्व अनित थापा कर रहे थे. अजय एडवर्ड्स के नेतृत्व वाली हाम्रो पार्टी और TMC ने भी सीटें जीतीं.

लेकिन ममता बनर्जी को सत्ता से हटाए जाने के बाद, जब नए BJP मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने GTA में कथित भ्रष्टाचार और शिक्षक भर्ती घोटाले की जांच के आदेश दिए, तो अनित थापा ने 17 जून 2026 को अपना इस्तीफा दे दिया. इसके बाद दार्जिलिंग की पहाड़ियां एक बार फिर अधर में आ गईं.

यही वह संदर्भ है जिसमें केंद्र के वार्ताकार पंकज सिंह को गोरखालैंड के मुद्दे का ‘स्थायी राजनीतिक समाधान’ खोजने की कोशिश करनी होगी. थापा ने GTA के अध्यक्ष के तौर पर सिंह से मुलाकात जरूर की, लेकिन BGPM ने अमित शाह की बैठक का बहिष्कार किया. 2022 के GTA चुनाव में BGPM को सबसे ज्यादा वोट मिले थे. पार्टी ने इस बैठक को BJP और उसके सहयोगियों की ओर से किया गया पक्षपातपूर्ण प्रयास बताया.

स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए न सिर्फ सभी पक्षों के साथ व्यापक बातचीत की जरूरत है, बल्कि ऐतिहासिक संदर्भ और देश के दूसरे हिस्सों में इसी तरह की मांगों पर किसी समझौते या रियायत के लंबे समय के असर को भी साफ तौर पर समझना होगा. केंद्र दार्जिलिंग के ज्यादातर गोरखाओं को ST का दर्जा देने पर विचार कर रहा है. लेकिन यह निश्चित रूप से कोई ऐसा आसान समाधान नहीं है, जिससे सारी समस्या एक बार में खत्म हो जाए, क्योंकि पूरे देश में गोरखा रहते हैं.

इसलिए, यह कॉलम संयम और रिसर्च का सुझाव देता है और किसी को यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि पांचवां और छठा शेड्यूल खास तौर पर इसी तरह के मुद्दों को सुलझाने के लिए बनाया गया था. असल में, इन शेड्यूल को असरदार बनाने के तरीके पर नेशनल स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन इस तरह के विवादित मुद्दों को सुलझाने की कोशिशों के लिए एक अच्छी शुरुआत हो सकती है.

(टू बी कंटीन्यूड)

यह हिमालयी क्षेत्र दार्जिलिंग-कलिम्पोंग और आठ उत्तर-पूर्वी राज्यों में राजनीतिक समझौतों पर चार कॉलम की सीरीज़ का दूसरा लेख है, जिन्हें अब अष्टलक्ष्मी कहा जाता है—धन और समृद्धि की आठ बहनें.

संजीव चोपड़ा नई दिल्ली में सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज, प्राइम मिनिस्टर्स म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (PMML) में सीनियर फेलो हैं. उनके फेलोशिप का विषय Borders, Boundaries and Bluewaters of Bharat है. यह लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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