हाल में मैंने एक शाम सुंदर नर्सरी में सितारों और ‘ब्लू मून’ की रोशनी के नीचे बिताई. उस दौरान मुझे अपना बचपन याद आ गया, जब दिल्ली की तपती गर्मी में मेरे पिता मुझे यहां लाते थे और इस सरकारी नर्सरी में तरह-तरह के देसी और विदेशी फूल-पौधों के बारे में बताते थे. इसके बाद हम खुले मैदान में पिकनिक मनाते थे और मैं चटाई पर लेटकर आसमान में चमकते तारों को पहचानने की कोशिश करती रहती थी.
उन बेतरतीब घास वाले मैदानों की याद अब उन वास्तुकारों की तारीफ में बदल गई है, जिन्होंने ऐसे स्थान तैयार किए हैं जहां लोग गर्मियों में अपने तपते घरों से निकलकर बावड़ियों और छतरियों के पास आकर बैठ सकते हैं. इन्हें पारंपरिक भारतीय वास्तुकला के अनुसार बनाया गया है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने आगा खान ट्रस्ट और उसकी शहरी योजना टीम के साथ मिलकर हुमायूं के मकबरे की विकास परियोजना के तहत ऐसा स्थान बनाया है, जिसने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या किसी शहर का पुनर्विकास (री-डेवलपमेंट) वास्तव में शहरी जीवन के लिए बुरा होता है?
पिछले पांच-दस साल में मेरे शहर का स्वरूप तेज़ी से बदला है. रिंग रोड पर किदवई नगर, न्यू मोती बाग और सरोजिनी नगर जैसे इलाकों में बड़े पैमाने पर पुनर्विकास का काम चल रहा है. जहां पहले अंग्रेज़ों के समय के पुराने और जर्जर सरकारी क्वार्टर थे, वहां अब उनकी जगह ऊंची और आधुनिक इमारतें बन रही हैं. विकास की ज़रूरतों के साथ शहरों को भी बदलना पड़ता है.
लेकिन अंग्रेज़ों के समय की एक और निशानी, दिल्ली जिमखाना क्लब का शहर की ज़रूरतों के हिसाब से रीडेवलपमेंट कुछ खास लोगों के बजाय बड़े समुदाय के लिए ज़रूरी है.
शहरीकरण की तेज़ रफ्तार
शहरों के तेज़ी से फैलने के कारण पुनर्विकास का मुद्दा अब बहुत महत्वपूर्ण हो गया है. एशियाई शहरों पर संयुक्त राष्ट्र की ‘हैबिटाट रिपोर्ट’ बताती है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था वाला इलाका है. लेकिन रिपोर्ट यह भी कहती है कि तेज़ आर्थिक विकास की दौड़ में जलवायु परिवर्तन के कारण शहरों पर पड़ने वाले असर को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.
लगातार फैलते शहरों ने सुविधाओं और बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) पर इतना दबाव डाल दिया है कि कई शहर गंभीर संकट की स्थिति में पहुंच गए हैं.
इसके उलट ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, जापान, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देशों के शहर अच्छी योजना के साथ विकसित किए गए हैं. वहां रहने वालों को सुरक्षित, आरामदायक और बेहतर जीवन मिलता है.
संयुक्त राष्ट्र की 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक दुनिया की 68 प्रतिशत आबादी शहरों में रहेगी. रिपोर्ट कहती है कि गांवों से शहरों की ओर लोगों के लगातार आने और दुनिया की आबादी बढ़ने के कारण 2050 तक शहरों में 2.5 अरब लोग और जुड़ जाएंगे. इनमें से 90 प्रतिशत वृद्धि एशिया और अफ्रीका में होने की संभावना है.
संयुक्त राष्ट्र की ‘वर्ल्ड अर्बनाइजेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2025’ रिपोर्ट के अनुसार, जकार्ता दुनिया का सबसे बड़ा शहर है जिसकी आबादी 4.19 करोड़ है. इसके बाद ढाका (3.66 करोड़), टोक्यो (3.34 करोड़), नई दिल्ली (3.02 करोड़) और शंघाई (2.96 करोड़) आते हैं.
अनुमान है कि 2050 तक दिल्ली की आबादी बढ़कर 3.39 करोड़ हो जाएगी, जबकि वर्ष 2000 में यह सिर्फ 1.8 करोड़ थी. 2025 में दुनिया में 1 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले 33 बड़े शहर थे. 1975 में इनकी संख्या केवल 8 थी. अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या 37 हो जाएगी.
सबसे तेजी से बढ़ने वाले शहर वे हैं जिनकी आबादी 10 लाख से कम है. इनमें भारत के नागपुर, कोयंबटूर, जयपुर और सूरत जैसे शहर शामिल हैं.
एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक भारत में 70 प्रतिशत नए रोजगार शहरों में पैदा होंगे. रिपोर्ट में मैकिंसे का हवाला देते हुए कहा गया है कि तब तक दिल्ली की अर्थव्यवस्था मलेशिया की पूरी अर्थव्यवस्था से भी बड़ी हो जाएगी.
लेकिन इसके साथ बुनियादी सुविधाओं पर दबाव भी बहुत बढ़ेगा.
सुविधाओं का गिरता लेवल
दक्षिण दिल्ली में रहने वाले मेरे कई दोस्तों और पड़ोसियों को पिछले कुछ वर्षों से पानी की भारी समस्या का सामना करना पड़ा है. पिछले 30 साल से इस इलाके में गंदा पानी आने, पानी की पाइपलाइन में सीवर का पानी मिलने और दूषित पानी की शिकायतें होती रही हैं.
मेरी गली के ज्यादातर मकानों का पुनर्विकास हो चुका है. जहां पहले एक परिवार रहता था, वहां अब बहुमंजिला इमारतें बन गई हैं और उनमें तीन-चार आलीशान फ्लैट बना दिए गए हैं. उसी जगह में अब कई परिवार रह रहे हैं.
इन नए इलाकों में इमारतें इतनी पास-पास खड़ी हैं कि लगता है जैसे एक-दूसरे से चिपकी हुई हों. कई जगह भवन नियमों का उल्लंघन करके निर्माण किया गया है, जिसके कारण खासकर निचली मंजिलों तक धूप भी ठीक से नहीं पहुंचती.
जाहिर है, जो सीवर लाइनें दशकों पहले शरणार्थियों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बिछाई गई थीं, उनसे आज दुनिया के सबसे बड़े शहरों में शामिल दिल्ली की जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं.
चारों ओर से जमीन से घिरे और बढ़ती आबादी के बोझ से दबे इस शहर को साल के कई महीनों तक साफ हवा भी नसीब नहीं होती.
जब दिल्ली का विकास हुआ था तब इंटरनेट नहीं था, लेकिन आज तेज़ी से डिजिटल होती अर्थव्यवस्था की जरूरतों के कारण लुटियंस दिल्ली में इमारतों के ऊपर इंटरनेट के तारों का जाल दिखाई देता है.
यह सिर्फ दिल्ली की समस्या नहीं है. अफसोस की बात यह है कि बेतरतीब ट्रैफिक, डरे हुए पैदल यात्री, वायु प्रदूषण और पार्कों व हरित क्षेत्रों की कमी तेजी से बढ़ते लगभग सभी शहरों की पहचान बन गई है.
इसीलिए पुनर्विकास ज़रूरी हो गया है.
पुनर्विकास क्यों ज़रूरी है
जैसा कि पहले बताया गया है, आज शहरों की जरूरतों और उन्हें पूरा करने की मौजूदा क्षमता के बीच अंतर लगातार बढ़ रहा है. पुनर्विकास इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह शहरों को आर्थिक विकास, सामाजिक भागीदारी और पर्यावरणीय संतुलन के केंद्र के रूप में विकसित करने का अवसर देता है.
यह पुराने होते बुनियादी ढांचे, भीड़भाड़ वाली सड़कों, खराब ड्रेनेज व्यवस्था, कमजोर पड़ती सार्वजनिक इमारतों और अनियोजित बस्तियों को आधुनिक बनाने का मौका देता है. यही समस्याएं आज शहरों की व्यवस्था पर बोझ डाल रही हैं और लोगों के जीवन स्तर को प्रभावित कर रही हैं.
इसके अलावा जलवायु परिवर्तन का असर भारतीय शहरों में साफ दिखाई देता है. शहरों को ज्यादा गर्मी और बाढ़ जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. पुनर्विकास के जरिए जलवायु के अनुकूल निर्माण, हरित क्षेत्र और बेहतर शहरी योजना को बढ़ावा दिया जा सकता है.
दिल्ली का सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास इसका एक उदाहरण है. हालांकि, इसका दिल्ली के कई प्रभावशाली लोगों ने विरोध किया था. अंग्रेज़ों के समय की पुरानी इमारतों की जगह अब नई और ऊर्जा बचाने वाली इमारतें बनाई गई हैं. इनमें भारतीय वास्तुकला से प्रेरित चौड़े बरामदे और छज्जे हैं, जो दिल्ली की गर्मी और सर्दी दोनों के लिए उपयुक्त हैं.
कर्तव्य पथ के दोनों ओर पेड़ों की कतारें हैं. पानी के दोबारा इस्तेमाल और सौर ऊर्जा की व्यवस्था से यह भी दिखता है कि नई सरकारी इमारतों को कम खर्च और कम ऊर्जा खपत वाला बनाने की कोशिश की गई है.
नए संसद भवन के त्रिकोणीय डिजाइन में गर्मियों की धूप और गर्मी को कम करने के लिए गणित और जियोमेट्री का इस्तेमाल किया गया है. जालियां तेज धूप से बचाव करती हैं. मुझे याद है कि इस भवन के निर्माण का कितना विरोध हुआ था, जबकि यह आधुनिक वास्तुकला का अच्छा उदाहरण है. इसे भविष्य में सांसदों की संख्या बढ़ने की संभावना को ध्यान में रखकर बनाया गया है. नई प्रशासनिक इमारतों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, रिचार्ज कुएं और वर्षा जल संचयन की व्यवस्था भी की गई है. इससे पानी को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकेगा और कूलिंग सिस्टम की जरूरतें भी पूरी होंगी.
इसी तरह दिल्ली के जिमखाना क्लब को लेकर भी विरोध हो रहा है. यह 27.3 एकड़ सरकारी ज़मीन पर बना है, लेकिन इसका इस्तेमाल केवल कुछ खास लोगों तक सीमित है.
लुटियंस दिल्ली की पेड़ों से घिरी सड़कों पर चलते हुए मुझे पुराने बंगले, दूतावास और पूर्व प्रधानमंत्रियों को समर्पित संग्रहालय दिखाई देते हैं. इन जगहों तक आमतौर पर सिर्फ खास लोगों की पहुंच रही है.
इसके विपरीत, कर्तव्य पथ को अब वाहनों से मुक्त कर दिया गया है ताकि आम लोग वहां आसानी से घूम सकें. अब दिल्ली के लोग परिवार के साथ वहां पिकनिक मनाते हैं, आइसक्रीम खाते हैं और डूबते सूरज या राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की पृष्ठभूमि में तस्वीरें खिंचवाते हैं.
एशिया के दूसरे शहर क्या कर रहे हैं
एशिया के कई देशों में सरकारें तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच अपने शहरों को ज्यादा साफ, ज्यादा हरा-भरा और रहने के लिए ज्यादा आरामदायक बनाने की दिशा में काम कर रही हैं.
इसके लिए बाढ़ से बचाव, बेहतर जल प्रबंधन, हरित बुनियादी ढांचा, पानी को जमीन में जाने देने वाली सड़कें, शहरी जल निकाय और वर्षा जल संचयन जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है.
जापान ने सार्वजनिक परिवहन आधारित शहरी विकास को अपनाया है. दक्षिण कोरिया की च्योंग्येच्योन पुनर्जीवन परियोजना में पर्यावरण संरक्षण को जनहित से जोड़ा गया है. थाईलैंड, वियतनाम और मलेशिया जैसे देश सार्वजनिक परिवहन, पैदल यात्रियों के लिए बेहतर रास्तों, साइकिल ट्रैक और हरित सार्वजनिक स्थानों में निवेश कर रहे हैं. इन सभी प्रयासों का उद्देश्य ऐसे शहर बनाना है जो आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और लोगों के बेहतर जीवन स्तर के बीच संतुलन बना सकें.
पुनर्विकास को केवल कुछ लोगों की बहस तक सीमित नहीं रखना चाहिए. इसे लोगों के हित में होने वाली प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए. सफल पुनर्विकास वही है जो सांस्कृतिक विरासत को बचाए, समुदायों को मजबूत बनाए और यह सुनिश्चित करे कि विकास का फायदा हर वर्ग के लोगों को मिले, न कि उन्हें वहां से हटना पड़े. शहरी विशेषज्ञ इसे ‘री-डेवलपमेंट 2.0’ कहते हैं—एक ऐसी लंबी अवधि की योजना, जिसके केंद्र में लोग, उनके मोहल्ले और टिकाऊ विकास हो.
हाल ही में एक आईटी कार्यक्रम में मैंने कुछ प्रतिभाशाली युवाओं को जलभराव की चेतावनी देने वाला सेंसर आधारित सिस्टम पेश करते देखा.
कितना अच्छा होगा अगर हम केवल बिजली और पानी के स्मार्ट मीटर ही नहीं, बल्कि बेहतर कचरा प्रबंधन व्यवस्था भी विकसित करें और उसे शहरों के बुनियादी ढांचे से जोड़ें.
ऐसे सुधार, जो आर्थिक विकास के साथ सामाजिक समानता और पर्यावरणीय जिम्मेदारी का संतुलन बनाए रखें, तभी संभव हैं जब भारतीय शहरों का सोच-समझकर पुनर्विकास किया जाए.
मध्य-पूर्व के संकट से एक सीख मिलती है कि इमारतें कम से कम 100 साल की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए. ऐसी इमारतें सिर्फ सबसे कम कीमत वाले ठेके (L-1) के आधार पर नहीं बन सकतीं.
इसके लिए नियम बदलने होंगे और निर्माण की योजना व क्रियान्वयन में सुधार करना होगा.
हुमायूं के मकबरे के आसपास हुए पुनर्विकास ने पर्यावरण के लिहाज से एक बेहद सुंदर और उपयोगी स्थान तैयार किया है, जो केवल निजामुद्दीन बस्ती के लिए नहीं, बल्कि पूरी दिल्ली के लिए फायदेमंद है.
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
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