नीट-यूजी पेपर लीक मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बीच सरकार ने पिछले हफ्ते अदालत को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मामले की “व्यक्तिगत रूप से निगरानी” कर रहे हैं. हालांकि, प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर अब तक चुप्पी बनाए रखी है, लेकिन सरकार की यह बात तीन वजहों से सवाल खड़े करती है.
पहली बात, इसे प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और उनकी अच्छी छवि का इस्तेमाल करके उस बड़ी व्यवस्था की विफलता से ध्यान हटाने की कोशिश माना जा सकता है, जिसे लोग एक गंभीर प्रशासनिक नाकामी के रूप में देख रहे हैं. उनकी छवि चाहे कितनी भी मजबूत क्यों न हो, राजनीति में कोई भी छवि हमेशा एक ही तरह नहीं रहती. एक समय पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को “टेफ्लॉन-कोटेड” कहा जाता था, क्योंकि उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं था, जबकि उनकी सरकार कई घोटालों के आरोपों से घिरी हुई थी.
लेकिन उनकी साफ-सुथरी छवि भी 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी सरकार की विफलताओं की भरपाई नहीं कर सकी. तीन साल बाद उनके उत्तराधिकारी नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में उन पर तंज कसते हुए कहा था—
“डॉ. साहब ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें रेनकोट पहनकर नहाने की कला आती है.”
बेशक दोनों नेताओं की तुलना नहीं की जा सकती. यहां बात सिर्फ इतनी है कि यूपीए सरकार की नाकामियों ने मनमोहन सिंह की मजबूत व्यक्तिगत छवि को भी प्रभावित किया था. इसलिए परीक्षा में गड़बड़ियों और लापरवाही पर जनता के गुस्से का जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का नाम आगे करना एक जोखिम भरी रणनीति हो सकती है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और शिक्षा संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह ने शनिवार को कहा कि विपक्ष अब तक सिर्फ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहा था. उन्होंने कहा, “अगर प्रधानमंत्री की निगरानी में भी पेपर लीक हुआ है, तो फिर हमें प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग करनी पड़ेगी.”
दूसरी समस्या यह है कि सरकार का यह संदेश विपक्ष के उस आरोप को मजबूत कर सकता है कि शिक्षा मंत्री स्थिति संभालने में सक्षम नहीं हैं. क्या प्रधानमंत्री मोदी को अपने शिक्षा मंत्री पर भरोसा नहीं है कि वह इस समस्या का समाधान कर सकते हैं? धर्मेंद्र प्रधान मई 2014 से मोदी सरकार का हिस्सा हैं और कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके हैं. ऐसे में उनकी क्षमता पर अचानक भरोसा कम होना हैरानी की बात लगती है.
यहीं तीसरी समस्या सामने आती है.
प्रधानमंत्री मोदी आमतौर पर विपक्ष के दबाव में आकर अपने मंत्रियों की जिम्मेदारी तय करने या उन्हें हटाने के लिए नहीं जाने जाते. अगर किसी मंत्री को सौंपे गए काम की निगरानी प्रधानमंत्री को खुद करनी पड़े, तो इससे उस मंत्री की कैबिनेट में बने रहने पर सवाल खड़ा होता है और अगर प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों को उनकी निगरानी में हुई चूक और विफलताओं के लिए जवाबदेह ठहराने लगें, तो सवाल उठेगा कि इसकी सीमा कहां तक होगी. ऐसी घटनाओं की सूची लंबी है—सैकड़ों लोगों की जान लेने वाले रेल हादसे, आर्थिक चुनौतियां, मणिपुर संकट और कई अन्य मामले.
एक और उदाहरण भी है.
अगर जे. पी. नड्डा के नेतृत्व वाले स्वास्थ्य मंत्रालय ने नीट-यूजी को कंप्यूटर आधारित परीक्षा बनाने के प्रस्ताव का विरोध नहीं किया होता, तो संभव है कि पेपर लीक की घटना ही न होती. ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी के लिए धर्मेंद्र प्रधान जैसे पुराने और भरोसेमंद सहयोगी को अलग से जिम्मेदार ठहराना आसान नहीं होगा, खासकर तब जब अन्य मंत्री इससे भी गंभीर चूकों के बावजूद किसी कार्रवाई का सामना किए बिना आगे बढ़ गए हों.
2011 से क्या सीख मिलती है
26 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल के 12 साल पूरे किए. अब वे आगे क्या कदम उठाते हैं, इस पर सबकी नज़र रहेगी क्योंकि इससे 2029 और उसके बाद की उनकी राजनीतिक योजना का संकेत मिल सकता है. विपक्ष के कई नेताओं के विपरीत, बीजेपी नेतृत्व 2024 के लोकसभा चुनाव का संदेश समझता है, जिसमें पार्टी की सीटें घटकर 240 रह गई थीं. वे यह भी जानते हैं कि इसके बाद विधानसभा चुनावों में मिली सफलताएं सिर्फ “ब्रांड मोदी” की मजबूती की वजह से नहीं थीं. उनमें गृह मंत्री अमित शाह की चुनावी रणनीति और प्रबंधन के साथ-साथ विपक्षी दलों की कमजोरियों की भी बड़ी भूमिका थी.
ऐसा कोई संकेत नहीं है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद मोदी सरकार की लोकप्रियता और बढ़ी हो. सोशल मीडिया पर “कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)” का तेज़ी से वायरल होना इसका एक उदाहरण है. आज का Gen Z शायद किसी विपक्षी नेता से बहुत प्रभावित न हो, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के प्रति उनका आकर्षण भी कम होता दिख रहा है, क्योंकि रोजगार के सरकारी आंकड़े उनके वास्तविक अनुभवों से मेल नहीं खाते. अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियां भी जल्द खत्म होती नहीं दिख रहीं. कमजोर मानसून का अनुमान भी एक बड़ी चिंता है. वैसे भी रक्षा और विदेश नीति अब राजनीतिक रूप से उतनी रोमांचक नहीं रह गई हैं कि वे लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं को पीछे छोड़ दें.
आज प्रधानमंत्री मोदी के सामने दो रास्ते हैं. पहला, वे कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों की कमजोरियों पर भरोसा बनाए रखें और उम्मीद करें कि वे बीजेपी को आगे बढ़ने का मौका देते रहेंगे. मोदी अभी भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं. उनके पास अमित शाह जैसे चुनावी रणनीतिकार हैं, जिन्होंने बीजेपी को एक बड़ी चुनावी मशीन बना दिया है. साथ ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विशाल ज़मीनी नेटवर्क और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की लगातार उपलब्धता बीजेपी को हर चुनाव में बढ़त दिला सकती है.
प्रधानमंत्री मोदी अपनी किस्मत पर भी भरोसा कर सकते हैं. मार्च 2018 से मार्च 2020 तक भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार आठ तिमाहियों तक धीमी पड़ रही थी, लेकिन इसका दोष कोरोना पर चला गया. इसी तरह, मध्य-पूर्व संकट शुरू होने से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था चुनौतियों का सामना कर रही थी. अब इसकी जिम्मेदारी अमेरिका, इज़रायल और ईरान पर डाली जा सकती है.
ये सभी बातें मिलकर किसी भी नेता को आत्मसंतुष्ट बना सकती हैं. अगर प्रधानमंत्री मोदी मौजूदा स्थिति को वैसे ही रहने देने का फैसला करते हैं, तो क्या उन्हें दोष दिया जा सकता है? 75 साल की उम्र में वे क्यों नए प्रयोग करें और व्यवस्था को बदलने का जोखिम लें? वे 2029 तक इंतजार कर सकते हैं और देख सकते हैं कि परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं.
लेकिन यह एक जोखिम भरा विकल्प भी है. शासन में दिखने वाली छोटी-छोटी ढिलाइयां राजनीति में कभी-कभी बड़े पतन का कारण बन जाती हैं. 2011 को याद कीजिए. दूसरी बार सत्ता में आने के सिर्फ दो साल बाद ही मनमोहन सिंह की सरकार आर्थिक सुस्ती का सामना कर रही थी. विकास दर घट रही थी, निजी निवेश कम हो रहा था, पूंजी बाहर जा रही थी, निर्यात ठहर गया था और रुपया कमजोर हो रहा था. अचानक “पॉलिसी पैरालिसिस” यानी नीतिगत ठहराव एक चर्चित शब्द बन गया था. क्या यह आपको आज की कुछ बहसों की याद दिलाता है? आज भी कई अर्थशास्त्री इसी तरह की चिंताएं जता रहे हैं.
इसी 2011 में अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी शुरू हुआ, जिसने खासकर युवाओं के बीच बड़ी लोकप्रियता हासिल की. यह सवाल उठता है कि क्या सीजेपी के अभिजीत दीपके भी भारत लौटने की तैयारी करते समय 2011 के उस आंदोलन का अध्ययन कर रहे हैं.
मुद्दा यह है कि 2011 के बाद मनमोहन सिंह सरकार अपनी स्थिति को फिर से मजबूत नहीं कर पाई.
बेकार बोझ को हटाइए
2011 का ज़िक्र करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आज की स्थिति उससे पूरी तरह मिलती-जुलती है. मेरा सिर्फ इतना कहना है कि अगर शासन व्यवस्था में आई ढिलाई को समय रहते नहीं रोका गया, तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. प्रधानमंत्री मोदी, निश्चित रूप से, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसे नहीं हैं और बीजेपी भी कांग्रेस जैसी नहीं है. इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि मोदी दूसरा रास्ता चुनेंगे—विदेशी कारणों को दोष देने के बजाय सुधारों की एक नई लहर शुरू करेंगे. साथ ही, शासन में जवाबदेही तय करेंगे, जो कि “व्यक्तिगत निगरानी” से बिल्कुल अलग बात है.
बेकार बोझ को हटाइए. प्रधानमंत्री मोदी 81-वर्षीय जीतन राम मांझी को सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय कैसे सौंप सकते हैं, जबकि उनकी सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर रही है कि उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं से क्षेत्रीय विकास निधि में कमीशन लेने की सार्वजनिक अपील की थी? यह भी देखिए कि भारी उद्योग और इस्पात मंत्री एच. डी. कुमारस्वामी दिल्ली में कितने दिन बिताते हैं और अपने मंत्रालय के दफ्तर में कितने घंटे रहते हैं. इससे सरकार की प्राथमिकताओं के बारे में क्या संकेत मिलता है? और जब ऊर्जा मंत्रालय तथा आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग मनोहर लाल खट्टर को सौंपे जाते हैं, जिन्हें हरियाणा के मुख्यमंत्री पद से कथित खराब प्रदर्शन के कारण हटाना पड़ा था, तो यह भी सवाल खड़े करता है. इसी तरह, गिरिराज सिंह के पास कपड़ा मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग है. कैबिनेट में ऐसे और भी कई “नगीने” मौजूद हैं. अगर प्रधानमंत्री मोदी इन सभी मंत्रियों की भी व्यक्तिगत रूप से निगरानी करने का इरादा नहीं रखते, तो उन्हें ऐसे लोगों को हटाने पर विचार करना चाहिए—कम से कम तब, जब उनकी नजर सिर्फ 2029 के चुनाव तक नहीं, बल्कि उससे आगे के भविष्य पर भी हो.
डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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