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Tuesday, 19 May, 2026
होममत-विमतPM मोदी की सादगी की अपील ने भारत की त्याग और संघर्ष की भूली-बिसरी संस्कृति को फिर ज़िंदा किया

PM मोदी की सादगी की अपील ने भारत की त्याग और संघर्ष की भूली-बिसरी संस्कृति को फिर ज़िंदा किया

कई बार देश को बड़े बलिदान नहीं, बल्कि अनुशासन से जुड़े छोटे कदमों की ज़रूरत होती है, जैसे गैर-ज़रूरी खर्च को टालना.

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यह हमारे वेदों का एक प्राचीन मंत्र है: “आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि. आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपिधनैरपि॥”

इसे आपद्दमंत्र भी कहा जाता है—यानी कठिन समय, आपातकाल और ऐसे दौर के लिए मंत्र, जब हमें खर्च कम करना पड़े और मुश्किल समय के लिए तैयार रहना पड़े. कई बार देश को बड़े वीरतापूर्ण कामों की नहीं, बल्कि अनुशासन से जुड़े छोटे कदमों की जरूरत होती है. जैसे गैर-ज़रूरी चीज़ों की खरीद टालना और खर्च को सीमित रखना. हमारे धर्मग्रंथ भी कहते हैं कि सीमित संसाधनों को बचाकर परिवार और देश की रक्षा करनी चाहिए.

इसका मतलब सीधा है. संकट के समय धन बचाओ, धन से परिवार को बचाओ और जब बहुत बड़ा संकट हो, तो धन और परिवार से पहले खुद को बचाओ. यही बात हवाई जहाज में सुरक्षा निर्देशों के दौरान भी कही जाती है, जहां पहले खुद को सुरक्षित करने और फिर दूसरों की मदद करने को कहा जाता है. इसके पीछे तर्क यह है कि अगर आप खुद ही असमर्थ हो जाएंगे, तो किसी और की मदद नहीं कर पाएंगे और दूसरों पर बोझ बन जाएंगे.

और यही सोच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय नागरिकों से की गई अपील के पीछे भी है. विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने और बचाने के लिए मोदी ने कई कदम सुझाए हैं, जैसे सोने की खरीद सीमित करना, गैर-ज़रूरी विदेश यात्राएं कम करना और ईंधन की बचत पर ध्यान देना. मोदी ने कहा, “सरकार पिछले पांच-छह सालों से दुनिया की सप्लाई चेन में आई रुकावटों से पैदा हुई चुनौतियों से निपटने के लिए काम कर रही है.”

भारत ने कोविड महामारी से पैदा हुए संकट का सफलतापूर्वक सामना किया और इससे हुई रुकावटों को पार कर लिया. वैश्विक लड़ाई में भारत सबसे आगे रहा. वैक्सीन मैत्री जैसी योजनाओं और समय पर लगाए गए लॉकडाउन के जरिए भारत ने घरेलू संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया और इस बड़े वैश्विक संकट से अपेक्षाकृत कम नुकसान के साथ बाहर निकला.

किसी की नहीं यह जंग

मौजूदा वैश्विक संकट ऐसी जंग से पैदा हुआ है, जो किसी की भी नहीं है, लेकिन इसका भारी असर दुनिया की उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत पर पड़ रहा है. जैसे-जैसे यह संकट 90 दिनों के करीब पहुंच रहा है, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ काफी हद तक बंद बना हुआ है और ब्रेंट क्रूड की कीमतें बहुत तेज़ी से बढ़ गई हैं. पश्चिम एशिया दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम है और भारत उसके बिल्कुल करीब है. ऐसे में वहां किसी भी भू-राजनीतिक तनाव का असर तुरंत भारत पर दिखाई देता है. सप्लाई जोखिम काफी बढ़ गया है और युद्ध खत्म होने को लेकर बनी अनिश्चितता ने तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव पैदा कर दिया है.

हालांकि, भारत में अभी तक इसका असर काफी हद तक नियंत्रित रहा है क्योंकि सरकारी तेल कंपनियों ने युद्ध का बोझ खुद उठाया है. शुक्रवार को ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई. घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत इस साल सिर्फ एक बार मार्च में 60 रुपये बढ़ाई गई थी, लेकिन अगर यह युद्ध लंबा चला, तो गरीबों को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत जो प्रगति की है, वह बेअसर हो सकती है. डाउन टू अर्थ के अनुसार, “घरेलू एलपीजी अब भी सुरक्षित रखा गया है. दिल्ली में 14.2 किलो वाला घरेलू सिलेंडर मार्च में बढ़ोतरी के बाद 913 रुपये में मिल रहा है और वैश्विक अस्थिरता के बावजूद इसमें कोई नई बढ़ोतरी नहीं की गई है.”

परंपरागत रूप से भारतीय समाज बचत करने, चीज़ों को संभालकर रखने और दोबारा इस्तेमाल करने वाला समाज रहा है. हमारे वैदिक सिद्धांत भी सादगी और त्याग पर आधारित हैं. आज़ादी की लड़ाई के दौरान गांधीवादी सोच और ‘स्वदेशी’ आंदोलन में विदेशी कपड़ों को छोड़कर स्थानीय खादी अपनाने पर जोर दिया गया था. मैं इतनी तो पुरानी हूं कि 1971 के युद्ध के दौरान होने वाले ब्लैकआउट याद हैं. जैसे ही सायरन बजते थे, हमारी मां सारे लाइट बंद कर देती थीं और मोमबत्ती की रोशनी में खाना बनाती थीं. खिड़कियों को कागज़ से ढक दिया जाता था ताकि रोशनी की एक किरण भी बाहर न जाए. वे ब्लैकआउट डर से ज्यादा एक खेल जैसे लगने लगे थे. मुझे यह भी याद है कि मोहल्ले के लड़के रात में गश्त लगाते थे ताकि कोई लाइट न जलाए.

आपातकाल के दौरान किए गए त्याग लोगों के जीवन पर और ज्यादा असर डालने वाले थे. उस समय लोगों ने अपने नागरिक अधिकार, लोकतांत्रिक आजादी और स्वायत्तता खो दी थी. हज़ारों विपक्षी नेताओं, जिनमें पीएन लेखी, जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी शामिल थे, को बिना मुकदमे के जेल में डाल दिया गया था. एडीएम जबलपुर मामले में सुप्रीम कोर्ट के विवादित फैसले ने हैबियस कॉर्पस के जरिए मूल नागरिक अधिकारों को लगभग खत्म कर दिया था. मीडिया पर सख्त नियंत्रण लगा दिया गया था और पाठकों को अपनी रोज़ की खबरों से वंचित होना पड़ा, क्योंकि कई बड़े संपादक जेल में थे. ट्रेड यूनियनों को अवैध घोषित कर दिया गया था और मजदूरों ने विरोध का अधिकार खो दिया था.और सबसे बड़ी बात, मौजूदा नेता प्रतिपक्ष की दादी इंदिरा गांधी आपातकाल की प्रमुख थीं, जबकि संजय गांधी ने अपने चर्चित “फाइव पॉइंट प्रोग्राम” के तहत अनिवार्य सरकारी नसबंदी अभियान चलाया था.

राशन कार्ड पर चलती ज़िंदगी

राशन कार्ड एक छोटी सी किताब होती थी, जिसमें परिवार के सभी सदस्यों के नाम कई पीढ़ियों तक दर्ज रहते थे. 1990 के दशक के आखिर तक यह राष्ट्रीय पहचान पत्र की तरह हर जगह इस्तेमाल होता था. यह एक ऐसी ज़रूरी चीज़ थी, जिससे परिवारों को खाने-पीने के सामान से लेकर पासपोर्ट तक सब कुछ मिलता था.

सरकार से जुड़े लगभग हर काम में राशन कार्ड की कॉपी लगानी पड़ती थी, जैसे ज़मीन खरीदना, जन्म पंजीकरण करवाना या कार खरीदना, जो उस समय बहुत ही दुर्लभ बात मानी जाती थी.

दरअसल, मारुति 800 जिसे भारत की पहली आधुनिक कार माना जाता है, भी एक तरह से राशन व्यवस्था पर ही मिलती थी. खरीदारों को कार मिलने के लिए लॉटरी जैसी प्रक्रिया पर निर्भर रहना पड़ता था. हालांकि, यह अलग बात है कि जुगाड़ू भारतीयों ने ज्यादा पैसे देकर लाइन से आगे निकलने का तरीका भी खोज लिया था.

राशन कार्ड के जरिए परिवारों को हर महीने चावल, गेहूं, चीनी, मिट्टी का तेल और खाद्य तेल संकट के समय खाने का तेल तक मिलता था. सूखा, युद्ध, तेल संकट और खाद्यान्न की कमी जैसे हालातों और भारत की बंद अर्थव्यवस्था ने लोगों को कम खर्च में जीना सिखा दिया था. सादगी और बचत उस समय जीवन का सामान्य हिस्सा थी.

यहां तक कि राशन कार्ड बनवाना भी आसान नहीं होता था. कई परिवारों की पूरी महीने की ज़िंदगी राशन के अनाज, चीनी और मिट्टी के तेल के आने पर निर्भर रहती थी. इससे मेरी पीढ़ी के लोगों ने बचत, धैर्य और राष्ट्रीय संकट के समय मिलकर मुश्किल झेलने की सीख ली. यह आज के ब्लिंकिट वाले दौर से बिल्कुल उल्टा था.

1991 के आर्थिक उदारीकरण से पहले डॉलर भी सीमित मात्रा में मिलता था और भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार की कड़ी सुरक्षा करता था. विदेशी मुद्रा विनियमन कानून (FERA) के तहत आम लोग आरबीआई की अनुमति के बिना विदेशी मुद्रा न तो रख सकते थे, न खरीद सकते थे.

विदेश यात्रा के लिए करीब 751 डॉलर तक ही खरीदने की अनुमति थी और यह रकम पासपोर्ट पर दर्ज कर दी जाती थी. डॉलर की कमी के कारण घूमने के लिए विदेश जाना सीमित था और भारतीय कंपनियों को सामान आयात करने में भारी सरकारी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता था. इसी वजह से 1991 का आर्थिक संकट आया, जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि उससे सिर्फ दो हफ्ते के ज़रूरी आयात हो सकते थे. इसके बाद भारतीय रुपये का अवमूल्यन हुआ और विदेशी मुद्रा भंडार को संभालने के लिए सरकारी खजाने का सोना गिरवी रखना पड़ा.

और फिर यहीं से विदेशी निवेश, विदेशी सामान और नई आकांक्षाओं का दौर शुरू हुआ. देश तेजी से बदल गया. इंतज़ार वाली सूची की जगह तुरंत सामान मिलने लगा और एक पूरी पीढ़ी इंस्टेंट नूडल्स की आदी हो गई. बढ़ते मिडिल क्लास ने सुविधा और ग्लोबल लाइफस्टाइल को अपनाया. उदारीकरण ने देश को पूरी तरह बदल दिया. कोका-कोला, जो जनता पार्टी के दौर में भारत छोड़कर चली गई थी, 1991 के बाद फिर लौट आई, जबकि देसी कैंपा कोला धीरे-धीरे गायब हो गई. कुरकुरे और Lay’s जैसे स्नैक्स घर-घर में पहुंच गए.

इसके साथ ही संयम और त्याग की वह संस्कृति, जो आजादी की लड़ाई की सबसे बड़ी ताकत थी, धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी. अमेज़न और जैप्टो के दौर की पीढ़ी को कभी-कभी यह याद दिलाने की ज़रूरत पड़ती है कि भारत की पहचान त्याग और बलिदान की उसी परंपरा से बनी है.

“पासपोर्ट है, तो घूमना है” अब मिडिल क्लास का नया मंत्र बन चुका है. सादगी और त्याग अब पुराने जमाने की बातें लगती हैं और हम अब उनके आदी नहीं रहे हैं.

रणनीतिक तैयारी के रूप में सादगी

फिलहाल अमेरिका-ईरान युद्ध से पैदा हुए वैश्विक संकट का अंत नज़र नहीं आ रहा है. यूक्रेन पहले से ही रूस के साथ युद्ध में है. डॉनल्ड ट्रंप की चीन यात्रा ने वहां कुछ समीकरण ज़रूर बदले होंगे और जब मैं यह लिख रही हूं, तब भारत BRICS सम्मेलन में हिस्सा ले रहा है, लेकिन इसके बावजूद सप्लाई चेन अब भी कमजोर बनी हुई हैं. ऊर्जा बाज़ार अस्थिर हैं. भू-राजनीतिक तनाव और संसाधनों को लेकर संघर्ष लगातार बढ़ रहे हैं.

आज की दुनिया बेहद अस्थिर हो चुकी है. अलग-अलग क्षेत्रों में युद्ध जारी हैं. सप्लाई चेन कमजोर हैं. ऊर्जा बाज़ारों में अनिश्चित उतार-चढ़ाव बना हुआ है. साइबर युद्ध, आर्थिक प्रतिबंध, संसाधनों पर संघर्ष और भू-राजनीतिक तनाव ने आधुनिक युद्ध की परिभाषा ही बदल दी है. इसलिए जहां हम अपनी सीमाओं पर टैंक, मिसाइल और रक्षा प्रणालियों में निवेश कम नहीं कर सकते, वहीं हमें अपनी सीमाओं को आर्थिक रूप से भी सुरक्षित बनाना होगा. और इसके लिए देश को आर्थिक मजबूती की ज़रूरत है, जो नागरिक अनुशासन से हासिल की जा सकती है.

संयम हमेशा से हमारी सभ्यता का हिस्सा रहा है. गांधीवादी सादगी पीढ़ी-दर-पीढ़ी कमजोर ज़रूर हुई, लेकिन पारंपरिक भारतीय परिवारों में बचत और सादगी की आदत इस सोच से आती थी कि जरूरत से ज्यादा खर्च ठीक नहीं होता.

Reuse, recycle और repair यानी दोबारा इस्तेमाल, पुनर्चक्रण और मरम्मत हमारे जीवन का हिस्सा तब से रहे हैं, जब “तीन R” दुनिया में मशहूर भी नहीं हुए थे. हमारी नानी-दादी हमेशा फिजूलखर्ची से बचने की सीख देती थीं. भारतीय परंपराएं सिर्फ आर्थिक मजबूरी नहीं थीं, बल्कि यह समझ भी थीं कि संसाधन सीमित होते हैं. पीएम नरेंद्र मोदी की सादगी वाली अपील को राजनीति का मुद्दा बनाना देश के हित में नहीं है. अगर कोविड-19 महामारी से कुछ सीख मिलती है, तो वह यह है कि मिलकर काम करना ही अच्छी राजनीति है और जो लोग बाधा पैदा करते हैं, वे लोगों की नजर में अपनी साख खो देते हैं.

इसके बजाय, देश की ज़रूरत के समय सभी राजनीतिक दलों को साथ आना चाहिए और दुनिया को दिखाना चाहिए कि सरकार की संयम बरतने की अपील सिर्फ भाषण नहीं है.

हां, युवा भारत बेहतर जीवन, अवसर और आगे बढ़ने का हकदार है, लेकिन विकास के साथ तैयारी भी ज़रूरी है.

और अनुशासन भी!

याद रखिए, देशहित हमेशा सबसे पहले आता है.

मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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