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Tuesday, 19 May, 2026
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भूटान की घटती आबादी बना रही अस्तित्व का संकट, क्या GMC इसका समाधान कर पाएगा?

भूटान के पढ़े-लिखे युवाओं की सबसे पसंदीदा जगहों में ऑस्ट्रेलिया शामिल हो गया है. विदेश जाने वालों में कई हाई स्किल वाले लोग और सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं.

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जब भी भूटान दुनिया भर की मीडिया का ध्यान खींचता है, तो अक्सर उसकी बौद्ध संस्कृति और खूबसूरत प्राकृतिक नज़ारों की चर्चा होती है, और कभी कभी उसकी रणनीतिक स्थिति पर. ज्ञात है की भूटान एक भू-आवेष्ठित देश है जहाँ वह उत्तर की तरफ से चीन का दबाव झेल रहा है, खासकर तब जब बीजिंग सीमा क्षेत्रों में अपनी मनमानी का प्रयास कर रहा है. ऐसे में भूटान जैसे देश के लिए चीन से लगी सीमा एक चिंता का विषय बना रहा है.

लेकिन पिछले एक दशक में भूटान एक दूसरी बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है. देश में घटती जन्म दर और ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका जैसे देशों की ओर तेज़ी से हो रहा पलायन अब अस्तित्व का संकट बनता जा रहा है.

मई 2026 के पहले हफ्ते में भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे ने स्वास्थ्य मंत्रालय की मध्यावधि समीक्षा पेश करते हुए कहा कि लगभग 8 लाख आबादी वाले देश में जन्म दर बढ़ाना बेहद ज़रूरी है.

उन्होंने कहा, “यह हम सभी की जिम्मेदारी है. युद्ध झेल रहे देशों में भी इतनी बड़ी आबादी गिरावट नहीं होती. यह स्थिति टिकाऊ नहीं है.”

अब सवाल यह है आज भूटान कहां खड़ा है और आगे उसके सामने क्या चुनौतियां हैं और क्या यह घटती जनसंख्या जैसे मुद्दे  का संधान कर सकता है?

आंकड़े खुद कहानी बताते हैं

भूटान में घटती जन्म दर के आंकड़े बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं. 2024 में देश में सिर्फ 9,914 बच्चों का जन्म दर्ज किया गया, जो पिछले साल के मुकाबले 0.5 प्रतिशत कम था.

1952 में भूटान की जनसंख्या वृद्धि दर 2.74 प्रतिशत थी और 1979 में यह बढ़कर 3.44 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, लेकिन 1980 के बाद से यह लगातार गिरती गई. 1993 में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज हुई, जब वृद्धि दर माइनस 4 प्रतिशत तक पहुंच गई.

आबादी में गिरावट के पीछे कई कारण हैं, लेकिन वैश्वीकरण और दुनिया की अर्थव्यवस्था के खुलने के बाद लोगों का विदेशों की ओर जाना इसका बड़ा कारण बना.

हालांकि, 2000 में आबादी वृद्धि दर में सुधार हुआ और यह 2.45 प्रतिशत तक पहुंची, लेकिन उसके बाद फिर गिरावट शुरू हो गई. मई 2026 तक यह दर सिर्फ 0.69 प्रतिशत रह गई है.

वहीं कम जन्म दर अब भी बड़ी चिंता बनी हुई है. पिछले दो दशकों के पलायन के आंकड़े स्थिति को और गंभीर बना देते हैं. अनुमान है कि पिछले 60 वर्षों में करीब 66,000 लोग रोजगार, शिक्षा और बेहतर अवसरों की तलाश में भूटान छोड़ चुके हैं.

ऑस्ट्रेलिया अब भूटान के पढ़े-लिखे युवाओं की सबसे पसंदीदा जगहों में शामिल हो गया है. विदेश जाने वालों में कई हाई स्किल वाले लोग शामिल हैं, जिनमें सरकारी कर्मचारी भी हैं, जो बेहतर वेतन और अवसरों की तलाश में दूसरे देशों में जा रहे हैं. प्रवासन पर विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया, “प्रवास करने वालों में 65 प्रतिशत लोग पहले प्रोफेशनल और तकनीकी नौकरियों में काम करते थे. वहीं 52.6 प्रतिशत लोग, जो विदेश जाने की इच्छा रखते हैं, अभी भी भूटान में इन्हीं पेशों में काम कर रहे हैं.”

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि देश छोड़ने वाले प्रवासियों में एक चौथाई लोग शिक्षा क्षेत्र में काम करते थे.

रिपोर्ट के मुताबिक, “प्रवासी बेहतर शिक्षा, ज्यादा कमाई की संभावना और ऑस्ट्रेलिया में तेज़ी से बढ़ते भूटानी समुदाय की वजह से आकर्षित हो रहे हैं.”

राजा ने चिंता बार-बार दोहराई है

जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक ने 17 दिसंबर 2023 को राष्ट्रीय दिवस समारोह के दौरान अपने संबोधन में बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन के मुद्दे को उठाया था.

उन्होंने कहा, “मैं उन युवाओं की स्थिति को समझता हूं जो एक कठिन मोड़ पर खड़े हैं. देश में सीमित अवसरों की वजह से उन्हें बेहतर कमाई के लिए विदेश जाने जैसा मुश्किल फैसला लेना पड़ रहा है. हमारे प्रोफेशनल लोग—डॉक्टर, नर्स, इंजीनियर, शिक्षक, वकील, आर्किटेक्ट और इंजीनियर—भी इसी स्थिति में हैं.”

किंग ने आगे इस समस्या की गंभीरता पर जोर दिया.

उन्होंने कहा, “हमारी चुनौती यह है कि हमारे देश की आबादी मुश्किल से 7 लाख है. अगर हमने सही समाधान नहीं निकाला, तो हमारी आबादी इतनी कम हो सकती है कि दुकानों से ज्यादा ग्राहक कम होंगे, रेस्तरां ज्यादा होंगे लेकिन खाने वाले कम होंगे और घर ज्यादा होंगे लेकिन किरायेदार कम होंगे.” उन्होंने कहा कि विकास ही इसका समाधान है.

इसी वजह से भूटान ने गेलेफू माइंडफुल सिटी (जीएमसी) की शुरुआत की है, जो भूटान में बनने वाला एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र है. जीएमसी ‘वन कंट्री, टू सिस्टम’ मॉडल पर काम करेगा और इसका उद्देश्य “दुनिया भर की बेहतरीन प्रशासनिक और व्यापारिक व्यवस्थाओं को अपनाना और उन्हें स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से ढालना” है. इस योजना की घोषणा राजा ने 2023 के राष्ट्रीय दिवस भाषण में की थी.

जीएमसी अपनी खास सोच की वजह से दुनिया भर में चर्चा में है. यह आर्थिक विकास को लोगों की भलाई, पर्यावरण संरक्षण और संतुलित जीवनशैली के साथ जोड़ने की कोशिश करता है. यह मॉडल बौद्ध दर्शन पर आधारित है और इसमें वैश्विक नवाचार व टिकाऊ विकास को साथ रखा गया है.

इसके बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर लक्ष्यों में गेलेफू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की स्थापना, जलविद्युत परियोजनाएं, ग्रीन टेक्नोलॉजी, फाइनेंस और डिजिटल एसेट्स से जुड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं. इसके साथ ही शिक्षा, कृषि, वानिकी, नए मठ और आध्यात्मिक केंद्रों पर भी ध्यान दिया जाएगा. इन योजनाओं का मकसद नई पीढ़ी की उम्मीदों को पूरा करना और विदेश पलायन को कम करना है.

भारत सहित कई देशों की मदद और निवेश से तैयार हो रहा जीएमसी, भारत के असम राज्य के नजदीक होने का फायदा उठाना चाहता है.

जुलाई 2025 में भूटान यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषण में जीएमसी का ज़िक्र किया था. उन्होंने कहा था कि भारत “गेलेफू और समत्से को भारत के बड़े रेलवे नेटवर्क से जोड़ेगा.” रेल कनेक्टिविटी पूरी होने के बाद “भूटान के उद्योगों और किसानों को भारत के बड़े बाजारों तक आसान पहुंच मिलेगी.” जीएमसी के साथ रेलवे संपर्क भारत के लिए रणनीतिक रूप से भी अहम हो सकता है, क्योंकि भारत हिमालयी क्षेत्र में अपना इंफ्रास्ट्रक्चर लगातार मजबूत कर रहा है.

भारत ने यह भी वादा किया है कि “गेलेफू के पास एक इमिग्रेशन चेकपॉइंट बनाया जाएगा ताकि पर्यटकों और निवेशकों को आसानी हो सके.” यह व्यापार और पर्यटन के लिए बड़ा प्रवेश द्वार बन सकता है.

भारत जहां भूटान की पंचवर्षीय योजना को आर्थिक मदद देता रहा है, वहीं जीएमसी को “फोर प्लस वन” मॉडल के तहत विकसित किया जा रहा है. शहर के पास अपना शुरुआती फंड है. इसके बाद गेलेफू निवेश विकास निगम के “नेशन बिल्डिंग बॉन्ड” के जरिए 100 मिलियन डॉलर जुटाने की योजना है. तीसरे मॉडल में परियोजनाएं स्थानीय और विदेशी साझेदारों को जोड़कर खुद निवेश जुटाएंगी. चौथा फंडिंग मॉडल विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसे बहुपक्षीय संस्थानों से मिलने वाले अनुदान और कर्ज पर आधारित होगा.

2045 तक जीएमसी की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं आकार लेंगी, लेकिन कई अहम सवाल अब भी बने हुए हैं. क्या यह शहर आने वाले दशकों में बदलती विकास जरूरतों के हिसाब से खुद को ढाल पाएगा? क्या देश के भीतर मिलने वाले अवसर इतने मजबूत होंगे कि भूटानी लोग वापस लौटें और ब्रेन ड्रेन रुके?

सीमित आर्थिक अवसरों और गहरी विकास सोच वाले इस देश में जीएमसी की सफलता सिर्फ उसकी रफ्तार, आकार या ऊंची इमारतों से नहीं मापी जाएगी. असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह लोगों को बेहतर रोजगार दे पाता है और बड़े संकटों—जैसे बड़े पैमाने पर पलायन—का समय पर समाधान निकाल पाता है.

ऋषि गुप्ता ग्लोबल अफेयर्स पर कॉमेंटेटर हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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