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Wednesday, 15 April, 2026
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भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग का हल: परमाणु ऊर्जा और थोरियम

पिछले हफ्ते भारत के लिए बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि—कल्पक्कम में स्वदेशी न्यूक्लियर रिएक्टर ‘क्रिटिकल’ हुआ.

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यह हफ्ता विज्ञान और तकनीक को समर्पित रहा. मैंने नालंदा यूनिवर्सिटी, बिट्स पिलानी, पंडित दीनदयाल एनर्जी यूनिवर्सिटी और IILM जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के छात्रों से बातचीत की—ये सभी आज भारत में तकनीकी शिक्षा के अग्रणी संस्थान हैं.

मैंने विकसित भारत 2047 की दिशा में देश की यात्रा में युवाओं की भूमिका पर बात की. इस चर्चा के लिए विज्ञान और तकनीक के प्रसिद्ध संस्थानों से बेहतर जगह क्या हो सकती है? मुझे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साथ आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने का भी मौका मिला, जहां उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने “विज्ञान और तकनीकी नवाचार के जरिए जनजातीय जीवन में बदलाव—भाषा, आस्था और संस्कृति को बचाते हुए” विषय पर बात की.

उन्होंने कहा कि आधुनिक दुनिया की नई तकनीकों को अपनाते समय हमें अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और विरासत को नहीं भूलना चाहिए और जैसे-जैसे हम विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ रहे हैं, हमें अपनी पुरानी टिकाऊ और वैज्ञानिक परंपराओं की ओर भी ध्यान देना चाहिए, जो लंबे समय से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रही हैं.

साथ ही, हम अपने प्राकृतिक संसाधनों जैसे भारत में मौजूद थोरियम भंडार का उपयोग कर सकते हैं और स्वच्छ व हरित परमाणु ऊर्जा के जरिए अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकते हैं.

कल्पक्कम की ‘क्रिटिकलिटी’

पिछले हफ्ते भारत के लिए एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि रही—कल्पक्कम में भारत द्वारा डिजाइन किया गया स्वदेशी न्यूक्लियर रिएक्टर ‘क्रिटिकल’ हुआ. इसे इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च ने विकसित किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) की इस उपलब्धि की सराहना करते हुए इसे भारत की परमाणु यात्रा में “महत्वपूर्ण कदम” बताया. इससे देश की क्षमता बढ़ेगी कि वह जितना ईंधन इस्तेमाल करता है, उससे ज्यादा बना सके.

लेकिन “क्रिटिकलिटी” क्या होती है? यह वह स्थिति होती है जब न्यूक्लियर चेन रिएक्शन खुद से लगातार चलने लगता है. यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है.

PFBR में प्लूटोनियम आधारित मिक्स्ड ऑक्साइड ईंधन के रूप में और लिक्विड सोडियम कूलेंट के रूप में इस्तेमाल होता है. इससे भारत के फास्ट ब्रीडर रिएक्टर प्रोग्राम को गति मिली है. हालांकि इसमें यूरेनियम की ज़रूरत होती है, लेकिन यह हेवी वाटर रिएक्टर के मुकाबले कम यूरेनियम में बिजली पैदा करता है.

इसका मतलब है कि भारत अपने सीमित यूरेनियम भंडार से ज्यादा ऊर्जा निकाल पाएगा. साथ ही यह थोरियम आधारित रिएक्टरों के बड़े स्तर पर इस्तेमाल का रास्ता भी खोलेगा.

भारत के परमाणु कार्यक्रम का इतिहास

भारत की परमाणु यात्रा आज़ादी के बाद होमी जे. भाभा के नेतृत्व में शुरू हुई. उन्होंने एक मजबूत परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की नींव रखी, जिसका उद्देश्य इस शक्तिशाली ऊर्जा स्रोत का शांतिपूर्ण उपयोग करना था.

अपने कई पड़ोसी देशों के विपरीत, भारत ने परमाणु हथियारों की दौड़ में शामिल होने से इनकार किया. इसके बजाय हमने 1.5 अरब लोगों की जरूरतों को सुरक्षित और प्रभावी तरीके से परमाणु ऊर्जा के जरिए पूरा करने का लक्ष्य रखा.

भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर की स्थापना की गई, ताकि तीन-स्तरीय परमाणु ऊर्जा रणनीति पर काम किया जा सके, जिससे भारत के सीमित यूरेनियम और अधिक मात्रा में मौजूद थोरियम का बेहतर उपयोग हो सके.

भाभा की मृत्यु आल्प्स में विमान दुर्घटना में होने के बाद कुछ समय के लिए भारत का परमाणु कार्यक्रम धीमा पड़ गया, जब तक पोखरण नहीं हुआ.

पोखरण-1 ने भारत की तकनीकी क्षमता को “शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट” के जरिए दुनिया के सामने दिखाया. इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पोखरण-2 हुआ, जिसने भारत को एक घोषित परमाणु शक्ति बना दिया.

वैश्विक दबाव के बीच भारत ने “विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध” और “पहले इस्तेमाल न करने” की नीति अपनाई, जो जिम्मेदारी और संतुलन को दर्शाती है. साथ ही, भारत ने नागरिक उपयोग के लिए परमाणु ऊर्जा का विस्तार जारी रखा.

भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर डील जैसे समझौतों ने भारत को वैश्विक व्यवस्था में शामिल होने का मौका दिया, बिना परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर किए.

आज भारत की परमाणु यात्रा ऊर्जा सुरक्षा, वैज्ञानिक प्रगति और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का उदाहरण है. यह आज के जटिल वैश्विक माहौल में और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है.

क्या थोरियम भारत का ‘टाइटेनियम’ है?

भारत के पास थोरियम के बहुत बड़े और अभी तक पूरी तरह इस्तेमाल न किए गए भंडार हैं. दुनिया के कुल भंडार का लगभग 25 प्रतिशत भारत में है. ये भंडार मुख्य रूप से तमिलनाडु, केरल और ओडिशा के समुद्री तटों की मोनाज़ाइट वाली रेत में पाए जाते हैं. ये भंडार भारत को परमाणु ऊर्जा की योजना में लंबे समय तक फायदा देने की कुंजी हैं. जहां हमारे पास यूरेनियम सीमित है, वहीं थोरियम एक ऐसा संसाधन है जिसे अभी बहुत कम इस्तेमाल किया गया है और यह भविष्य की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा कर सकता है.

थोरियम को यूरेनियम का एक अच्छा विकल्प माना जाता है क्योंकि इससे अलग लेकिन असरदार तरीके से परमाणु ईंधन बनाया जा सकता है. हालांकि थोरियम खुद फिशाइल (टूटकर ऊर्जा देने वाला) नहीं है, लेकिन यह फर्टाइल (उपजाऊ) है. यानी यह न्यूट्रॉन को अपने अंदर लेकर यूरेनियम U233/235 में बदल सकता है, जो फिशाइल पदार्थ है और परमाणु चेन रिएक्शन को जारी रख सकता है. इसलिए यह न्यूक्लियर रिएक्टर में एक उपयोगी विकल्प बन जाता है.

थोरियम पर्यावरण के लिए भी ज्यादा बेहतर माना जाता है क्योंकि इससे लंबे समय तक रहने वाला रेडियोधर्मी कचरा कम बनता है और हथियार बनने का खतरा भी कम होता है. इसलिए साफ और टिकाऊ परमाणु ऊर्जा के लिए थोरियम एक अच्छा विकल्प है.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में भारतीय शोधकर्ता आनंद जोशी की रिसर्च के अनुसार, भारत के थोरियम भंडार सैद्धांतिक रूप से मौजूदा ऊर्जा खपत के हिसाब से देश को 700 साल से ज्यादा समय तक ऊर्जा दे सकते हैं. यानी यह भारत की लंबी अवधि की ऊर्जा जरूरतों का मजबूत आधार बन सकता है.

भारत की लंबी अवधि की ऊर्जा ज़रूरतें

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बहुत ज्यादा ऊर्जा खपत करता है. जैसे-जैसे हम पारंपरिक जीवनशैली से हटकर शहरी और डिजिटल सिस्टम की ओर बढ़ रहे हैं, हमारी ऊर्जा की जरूरत तेजी से बढ़ रही है. “जल्दी सोना, जल्दी उठना” वाली पुरानी कहावत अब कम होती जा रही है और उसकी जगह डिजिटल दुनिया के कारण देर रात तक काम करना बढ़ गया है.

डिजिटलाइजेशन बढ़ने के साथ डेटा सेंटर की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है. डेटा सेंटर हर साल दुनिया की कुल बिजली का लगभग 1.5 से 2 प्रतिशत (करीब 415-460 TWh) इस्तेमाल करते हैं और यह मांग हर साल करीब 12 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. अनुमान है कि AI की वजह से 2030 तक यह मांग दोगुनी हो सकती है.

खुद AI भी बहुत ज्यादा ऊर्जा लेता है. जनरेटिव AI मॉडल को ट्रेन करने और चलाने में बहुत बिजली लगती है. अनुमान है कि 2026 तक दुनिया भर के डेटा सेंटर की बिजली मांग करीब 1000 TWh तक पहुंच सकती है. इसके अलावा इन डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए भी काफी ऊर्जा चाहिए होती है. आंकड़े बताते हैं कि इनकी ऊर्जा जरूरत इतनी बढ़ सकती है कि कुल ऊर्जा उत्पादन का 8 प्रतिशत तक हो जाए.

इसके अलावा ग्लोबल वार्मिंग भी ऊर्जा की मांग बढ़ा रही है. पहले ऊर्जा की मांग हर साल 1-2 प्रतिशत बढ़ती थी, लेकिन अब यह करीब 2.4 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. भारत जैसे गर्म देशों में तापमान बढ़ने से एसी और कूलिंग की जरूरत ज्यादा होती है, जिससे बिजली की खपत बढ़ती है.

भारत सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक सड़कों पर 30 प्रतिशत से ज्यादा गाड़ियां इलेक्ट्रिक (EV) हों. लेकिन ऊर्जा की बढ़ती मांग और उत्पादन के बीच लगातार अंतर बना हुआ है. पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में मौजूदा संकट ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है.

दुनिया की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत में बिजली की मांग जीवन स्तर बढ़ने के कारण भी तेजी से बढ़ी है. उत्पादन क्षमता बढ़ी है, लेकिन ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन में नुकसान और फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता के कारण यह अभी भी पर्याप्त नहीं है.

सौर, जल और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों की भी अपनी समस्याएं हैं, जैसे स्टोरेज और लगातार उपलब्ध न होना. कोयला अभी भी भारत की ऊर्जा का मुख्य आधार है, लेकिन यह साफ ईंधन नहीं है और सीमित भी है.

भारत के पास थोरियम के बड़े भंडार होने के कारण परमाणु ऊर्जा एक भरोसेमंद और टिकाऊ विकल्प बनती है, जो ऊर्जा की मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ते अंतर को कम कर सकती है. परमाणु बिजली घर मौसम पर निर्भर नहीं होते, इसलिए वे लगातार बिजली दे सकते हैं.

लंबी अवधि की रणनीति यह होनी चाहिए कि देश अपने थोरियम भंडार का इस्तेमाल करके परमाणु ईंधन पर ध्यान दे. इससे आयातित ईंधन पर निर्भरता कम होगी. परमाणु ऊर्जा का विस्तार कार्बन उत्सर्जन को भी कम कर सकता है और उद्योग व शहरों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है.

ऊर्जा विकास के क्षेत्र में भारत अपनी क्षमता दिखाकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक उम्मीद बन सकता है, खासकर विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में.

मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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